श्री दुर्गा सप्तशती — तन्त्रोक्तं रात्रिसूक्तम्
दुर्गा सप्तशती में देवी की महिमा, शक्ति और विभिन्न स्वरूपों का वर्णन अत्यंत श्रद्धा के साथ किया गया है। तन्त्रोक्तं रात्रिसूक्तम् इसी स्तुति का एक महत्वपूर्ण भाग है। इसमें देवी को जगत की आधारभूत शक्ति, महामाया, महाविद्या, प्रकृति तथा सृष्टि की रचना, पालन और संहार करने वाली शक्ति के रूप में नमन किया गया है।
इस स्तुति में देवी से भगवान विष्णु की योगनिद्रा दूर करने और उन्हें जागृत करने की प्रार्थना की गई है, ताकि वे मधु और कैटभ नामक असुरों का वध कर सकें। तन्त्रोक्तं रात्रिसूक्तम् में देवी के अनेक दिव्य स्वरूपों और शक्तियों का सुंदर वर्णन मिलता है।
नीचे तन्त्रोक्तं रात्रिसूक्तम् का मूल संस्कृत पाठ सरल हिंदी अर्थ सहित दिया गया है।
॥ अथ तन्त्रोक्तं रात्रिसूक्तम् ॥
ॐ विश्वेश्वरीं जगद्धात्रीं स्थितिसंहारकारिणीम्।
निद्रां भगवतीं विष्णोरतुलां तेजसः प्रभुः॥१॥
हिंदी अर्थ:
जो संपूर्ण संसार की ईश्वरी और समस्त जगत को धारण करने वाली हैं, जो सृष्टि की स्थिति और संहार करने वाली शक्ति हैं तथा भगवान विष्णु की अतुलनीय तेजस्विनी भगवती योगनिद्रा के रूप में स्थित हैं, उन देवी को प्रणाम है।
ब्रह्मोवाच
त्वं स्वाहा त्वं स्वधा त्वं हि वषट्कारः स्वरात्मिका।
सुधा त्वमक्षरे नित्ये त्रिधा मात्रात्मिका स्थिता॥२॥
हिंदी अर्थ:
हे देवी! आप ही स्वाहा हैं, आप ही स्वधा हैं और आप ही वषट्कार स्वरूप हैं। आप ही स्वर की आत्मशक्ति हैं। आप अमृतस्वरूपा और नित्य अक्षर हैं तथा तीन मात्राओं के रूप में स्थित हैं।
अर्धमात्रास्थिता नित्या यानुच्चार्या विशेषतः।
त्वमेव सन्ध्या सावित्री त्वं देवि जननी परा॥३॥
हिंदी अर्थ:
हे देवी! आप उस नित्य अर्धमात्रा के रूप में स्थित हैं जिसका विशेष रूप से उच्चारण नहीं किया जाता। आप ही संध्या हैं, आप ही सावित्री हैं और आप ही परम जननी हैं।
त्वयैतद्धार्यते विश्वं त्वयैतत्सृज्यते जगत्।
त्वयैतत्पाल्यते देवि त्वमत्स्यन्ते च सर्वदा॥४॥
हिंदी अर्थ:
हे देवी! यह संपूर्ण विश्व आपके द्वारा धारण किया जाता है। इसी जगत की सृष्टि भी आपके द्वारा होती है और इसका पालन भी आप ही करती हैं। अंत में यह संपूर्ण जगत आपकी ही शक्ति में विलीन हो जाता है।
विसृष्टौ सृष्टिरूपा त्वं स्थितिरूपा च पालने।
तथा संहृतिरूपान्ते जगतोऽस्य जगन्मये॥५॥
हिंदी अर्थ:
हे जगन्मयी देवी! सृष्टि के समय आप सृष्टि के रूप में प्रकट होती हैं, पालन के समय स्थिति के रूप में रहती हैं और संसार के अंत में संहार के रूप में स्थित होती हैं।
महाविद्या महामाया महामेधा महास्मृतिः।
महामोहा च भवती महादेवी महासुरी॥६॥
हिंदी अर्थ:
आप महाविद्या, महामाया, महान बुद्धि और महान स्मृति स्वरूप हैं। आप महामोह की शक्ति हैं, महादेवी हैं और महान शक्ति के रूप में विराजमान हैं।
प्रकृतिस्त्वं च सर्वस्य गुणत्रयविभाविनी।
कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहरात्रिश्च दारुणा॥७॥
हिंदी अर्थ:
आप ही संपूर्ण जगत की मूल प्रकृति हैं और सत्त्व, रज तथा तम—इन तीनों गुणों को प्रकट करने वाली शक्ति हैं। आप कालरात्रि, महारात्रि और भयंकर मोहरात्रि के रूप में भी जानी जाती हैं।
त्वं श्रीस्त्वमीश्वरी त्वं ह्रीस्त्वं बुद्धिर्बोधलक्षणा।
लज्जा पुष्टिस्तथा तुष्टिस्त्वं शान्तिः क्षान्तिरेव च॥८॥
हिंदी अर्थ:
आप ही श्री अर्थात समृद्धि हैं, आप ही ईश्वरी हैं। आप ही लज्जा और बुद्धि हैं। आप ही ज्ञान का स्वरूप हैं। आप ही पुष्टि, संतोष, शांति और क्षमा के रूप में प्राणियों में स्थित हैं।
खड्गिनी शूलिनी घोरा गदिनी चक्रिणी तथा।
शङ्खिनी चापिनी बाणभुशुण्डीपरिघायुधा॥९॥
हिंदी अर्थ:
आप हाथ में खड्ग धारण करने वाली, त्रिशूल धारण करने वाली और भयंकर स्वरूप वाली हैं। आप गदा और चक्र धारण करती हैं। आप शंख, धनुष, बाण, भुशुण्डी और परिघ जैसे अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाली देवी हैं।
सौम्या सौम्यतराशेषसौम्येभ्यस्त्वतिसुन्दरी।
परापराणां परमा त्वमेव परमेश्वरी॥१०॥
हिंदी अर्थ:
हे देवी! आप सौम्य हैं और सभी सौम्य वस्तुओं से भी अधिक सौम्य तथा अत्यंत सुंदर हैं। आप परा और अपरा दोनों शक्तियों से परे परम शक्ति हैं। आप ही परमेश्वरी हैं।
यच्च किञ्चित् क्वचिद्वस्तु सदसद्वाखिलात्मिके।
तस्य सर्वस्य या शक्तिः सा त्वं किं स्तूयसे तदा॥११॥
हिंदी अर्थ:
हे अखिलात्मिके देवी! संसार में कहीं भी जो कुछ सत् या असत् रूप में दिखाई देता है, उस सबमें जो शक्ति विद्यमान है, वह आप ही हैं। ऐसी सर्वव्यापी शक्ति की स्तुति करने में भी मनुष्य की सामर्थ्य कितनी है?
यया त्वया जगत्स्रष्टा जगत्पात्यत्ति यो जगत्।
सोऽपि निद्रावशं नीतः कस्त्वां स्तोतुमिहेश्वरः॥१२॥
हिंदी अर्थ:
हे देवी! जिस शक्ति के द्वारा जगत के रचयिता और जगत का पालन करने वाले भगवान भी निद्रा के अधीन हो गए हैं, उस शक्ति की पूर्ण स्तुति करने में यहाँ कौन समर्थ हो सकता है?
विष्णुः शरीरग्रहणमहमीशान एव च।
कारितास्ते यतोऽतस्त्वां कः स्तोतुं शक्तिमान् भवेत्॥१३॥
हिंदी अर्थ:
हे देवी! भगवान विष्णु तथा भगवान ईशान भी आपके प्रभाव से अपने-अपने शरीर और कार्यों को धारण करने के लिए प्रेरित होते हैं। इसलिए आपकी महिमा का पूर्ण वर्णन करने में कौन समर्थ हो सकता है?
सा त्वमित्थं प्रभावैः स्वैरुदारैर्देवि संस्तुता।
मोहयैतौ दुराधर्षावसुरौ मधुकैटभौ॥१४॥
हिंदी अर्थ:
हे देवी! अपने इन महान और अद्भुत प्रभावों के कारण आप इस प्रकार स्तुति की जा रही हैं। अब आप इन अत्यंत बलवान और कठिनाई से पराजित होने वाले मधु और कैटभ नामक दोनों असुरों को मोहित कर दीजिए।
प्रबोधं च जगत्स्वामी नीयतामच्युतो लघु।
बोधश्च क्रियतामस्य हन्तुमेतौ महासुरौ॥१५॥
हिंदी अर्थ:
हे देवी! जगत के स्वामी भगवान अच्युत को शीघ्र निद्रा से जगा दीजिए और उन्हें चेतना प्रदान कीजिए, ताकि वे इन दोनों महाबलशाली असुरों का वध कर सकें।
तन्त्रोक्तं रात्रिसूक्तम् का धार्मिक महत्व
तन्त्रोक्तं रात्रिसूक्तम् में देवी को केवल एक देवी स्वरूप के रूप में नहीं, बल्कि संपूर्ण सृष्टि की मूल शक्ति के रूप में देखा गया है। स्तुति में उन्हें महामाया, महाविद्या, प्रकृति, बुद्धि, स्मृति, शांति, क्षमा, पुष्टि और संतोष आदि अनेक रूपों में प्रणाम किया गया है।
इस स्तुति का मुख्य भाव यह है कि संसार में दिखाई देने वाली समस्त शक्ति के पीछे देवी की ही शक्ति कार्य कर रही है। इसी कारण साधक देवी को जगत की आधारभूत शक्ति मानकर उनकी उपासना करता है।
दुर्गा सप्तशती के पाठ में देवी के इस स्वरूप का स्मरण भक्त के मन में श्रद्धा, भक्ति और आत्मसमर्पण की भावना को दृढ़ करता है।
निष्कर्ष
तन्त्रोक्तं रात्रिसूक्तम् देवी की सर्वव्यापक शक्ति और महामाया स्वरूप की सुंदर स्तुति है। इसमें देवी को सृष्टि की रचना, पालन और संहार करने वाली शक्ति के साथ-साथ बुद्धि, स्मृति, शांति, क्षमा, पुष्टि और संतोष के रूप में भी नमन किया गया है।
इस स्तुति का पाठ करते समय भक्त देवी की उसी परम शक्ति का स्मरण करता है, जिसके कारण समस्त जगत संचालित होता है। देवी की कृपा से मन में श्रद्धा और भक्ति का भाव बढ़े तथा जीवन में सद्बुद्धि, शांति और शक्ति प्राप्त हो—इसी भावना के साथ तन्त्रोक्तं रात्रिसूक्तम् का पाठ किया जाता है।
॥ जय माता दी ॥
