भगवान गणेश को विघ्नहर्ता, बुद्धि और शुभारंभ के देवता के रूप में पूजा जाता है। गणेश जी की उपासना में अनेक स्तोत्र, मंत्र और कवच का पाठ किया जाता है। इनमें श्री गणेश कवच विशेष रूप से भगवान गणपति से शरीर, परिवार और जीवन के विभिन्न पक्षों की रक्षा की प्रार्थना करने वाला महत्वपूर्ण स्तोत्र माना जाता है।
गणेश कवच में भगवान गणेश के अलग-अलग नामों और स्वरूपों का स्मरण करते हुए शरीर के विभिन्न अंगों तथा चारों दिशाओं की रक्षा की प्रार्थना की गई है। आगे कवच के पाठ की परंपरागत महिमा भी बताई गई है।
नीचे श्री गणेश कवच का संस्कृत पाठ और सरल हिंदी अर्थ दिया गया है, ताकि भक्त केवल पाठ ही नहीं बल्कि उसके भाव को भी समझ सकें।
श्री गणेश कवच का संपूर्ण पाठ
श्रीगणेशाय नमः ॥
गौरी उवाच
एषोऽतिचपलो दैत्यान्बाल्येऽपि नाशयत्यहो ।
अग्रे किं कर्म कर्तेति न जाने मुनिसत्तम ॥ १॥
हिंदी अर्थ:
माता गौरी कहती हैं—हे श्रेष्ठ मुनि! यह बालक अत्यंत चंचल है और बाल्यावस्था में ही दैत्यों का नाश कर देता है। आगे चलकर यह क्या-क्या करेगा, मैं नहीं जानती।
दैत्या नानाविधा दुष्टाः साधुदेवद्रुहः खलाः ।
अतोऽस्य कण्ठे किञ्चित्त्वं रक्षार्थं बद्धुमर्हसि ॥ २॥
हिंदी अर्थ:
दैत्यों के अनेक प्रकार हैं। वे दुष्ट, साधु और देवताओं से द्वेष रखने वाले तथा अत्याचारी हैं। इसलिए आप इसकी रक्षा के लिए इसके कंठ में कोई ऐसा कवच बांध दें, जिससे इसकी सुरक्षा हो सके।
मुनिरुवाच
ध्यायेत्सिंहगतं विनायकममुं दिग्बाहुमाद्ये युगे
त्रेतायां तु मयूरवाहनममुं षड्बाहुकं सिद्धिदम् ।
द्वापारे तु गजाननं युगभुजं रक्ताङ्गरागं विभुं
तुर्ये तु द्विभुजं सिताङ्गरुचिरं सर्वार्थदं सर्वदा ॥ ३॥
हिंदी अर्थ:
मुनि कहते हैं—सतयुग में सिंह पर विराजमान, दस भुजाओं वाले विनायक का ध्यान करना चाहिए। त्रेतायुग में मयूर पर सवार, छह भुजाओं वाले और सिद्धि प्रदान करने वाले गणेश का ध्यान करना चाहिए। द्वापर में गजानन, चार भुजाओं वाले और रक्तवर्ण स्वरूप वाले भगवान गणेश का ध्यान करना चाहिए। कलियुग में दो भुजाओं वाले, गौरवर्ण और सुंदर स्वरूप वाले भगवान गणेश का ध्यान करना चाहिए, जो सभी प्रकार के मनोरथों को पूर्ण करने वाले हैं।
विनायकः शिखां पातु परमात्मा परात्परः ।
अतिसुन्दरकायस्तु मस्तकं सुमहोत्कटः ॥ ४॥
हिंदी अर्थ:
परमात्मा और परात्पर भगवान विनायक मेरी शिखा की रक्षा करें। अत्यंत सुंदर शरीर वाले तथा सुमहोत्कट स्वरूप वाले गणेश मेरे मस्तक की रक्षा करें।
ललाटं कश्यपः पातु भ्रूयुगं तु महोदरः ।
नयने फालचन्द्रस्तु गजास्यस्त्वोष्ठपल्लवौ ॥ ५॥
हिंदी अर्थ:
कश्यप नाम वाले गणेश मेरे ललाट की रक्षा करें और महोदर मेरे दोनों भौंहों की रक्षा करें। फालचंद्र मेरे दोनों नेत्रों की तथा गजानन मेरे होंठों की रक्षा करें।
जिह्वां पातु गणक्रीडश्चिबुकं गिरिजासुतः ।
वाचं विनायकः पातु दन्तान् रक्षतु दुर्मुखः ॥ ६॥
हिंदी अर्थ:
गणक्रीड़ मेरी जिह्वा की, गिरिजासुत मेरी ठोड़ी की रक्षा करें। विनायक मेरी वाणी की तथा दुर्मुख मेरे दांतों की रक्षा करें।
श्रवणौ पाशपाणिस्तु नासिकां चिन्तितार्थदः ।
गणेशस्तु मुखं कण्ठं पातु देवो गणञ्जयः ॥ ७॥
हिंदी अर्थ:
पाश धारण करने वाले भगवान गणेश मेरे दोनों कानों की रक्षा करें और चिंतितार्थद भगवान मेरी नासिका की रक्षा करें। गणेश मेरे मुख की तथा गणञ्जय देव मेरे कंठ की रक्षा करें।
स्कन्धौ पातु गजस्कन्धः स्तनौ विघ्नविनाशनः ।
हृदयं गणनाथस्तु हेरम्बो जठरं महान् ॥ ८॥
हिंदी अर्थ:
गजस्कंध मेरे दोनों कंधों की और विघ्नविनाशक मेरे दोनों वक्षस्थलों की रक्षा करें। गणनाथ मेरे हृदय की और हेरम्ब मेरे उदर की रक्षा करें।
धराधरः पातु पार्श्वौ पृष्ठं विघ्नहरः शुभः ।
लिङ्गं गुह्यं सदा पातु वक्रतुण्डो महाबलः ॥ ९॥
हिंदी अर्थ:
धराधर मेरे दोनों पार्श्वों की और शुभ विघ्नहर मेरी पीठ की रक्षा करें। महाबली वक्रतुण्ड मेरे गुप्त अंगों की रक्षा करें।
गणक्रीडो जानुजङ्घे ऊरू मङ्गलमूर्तिमान् ।
एकदन्तो महाबुद्धिः पादौ गुल्फौ सदाऽवतु ॥ १०॥
हिंदी अर्थ:
गणक्रीड़ मेरे घुटनों और जंघाओं की तथा मंगलमूर्ति मेरी दोनों जंघाओं की रक्षा करें। महाबुद्धि एकदंत मेरे पैरों और टखनों की सदैव रक्षा करें।
क्षिप्रप्रसादनो बाहू पाणी आशाप्रपूरकः ।
अङ्गुलीश्च नखान्पातु पद्महस्तोऽरिनाशनः ॥ ११॥
हिंदी अर्थ:
शीघ्र प्रसन्न होने वाले भगवान गणेश मेरी दोनों भुजाओं की और आशाप्रपूरक मेरे दोनों हाथों की रक्षा करें। पद्महस्त, जो शत्रुओं का नाश करने वाले हैं, मेरी अंगुलियों और नाखूनों की रक्षा करें।
सर्वाङ्गानि मयूरेशो विश्वव्यापी सदाऽवतु ।
अनुक्तमपि यत्स्थानं धूम्रकेतुः सदाऽवतु ॥ १२॥
हिंदी अर्थ:
मयूरेश भगवान मेरे सभी अंगों की रक्षा करें और विश्वव्यापी गणेश सदैव मेरी रक्षा करते रहें। शरीर का जो स्थान ऊपर स्पष्ट रूप से नहीं कहा गया है, उसकी भी धूम्रकेतु भगवान रक्षा करें।
आमोदस्त्वग्रतः पातु प्रमोदः पृष्ठतोऽवतु ।
प्राच्यां रक्षतु बुद्धीश आग्नेय्यां सिद्धिदायकः ॥ १३॥
हिंदी अर्थ:
आमोद मेरे आगे की ओर से और प्रमोद पीछे की ओर से मेरी रक्षा करें। बुद्धीश पूर्व दिशा से तथा सिद्धिदायक आग्नेय दिशा से मेरी रक्षा करें।
दक्षिणस्यामुमापुत्रो नैरृत्यां तु गणेश्वरः ।
प्रतीच्यां विघ्नहर्ताऽव्याद्वायव्यां गजकर्णकः ॥ १४॥
हिंदी अर्थ:
उमापुत्र दक्षिण दिशा से और गणेश्वर नैऋत्य दिशा से मेरी रक्षा करें। विघ्नहर्ता पश्चिम दिशा से तथा गजकर्ण वायव्य दिशा से मेरी रक्षा करें।
कौबेर्यां निधिपः पायादीशान्यामीशनन्दनः ।
दिवाऽव्यादेकदन्तस्तु रात्रौ सन्ध्यासु विघ्नहृत् ॥ १५॥
हिंदी अर्थ:
निधिपति कुबेर दिशा अर्थात उत्तर दिशा से और ईशनंदन ईशान दिशा से मेरी रक्षा करें। एकदंत दिन में तथा विघ्नहृत भगवान रात्रि और संध्याकाल में मेरी रक्षा करें।
राक्षसासुरभेतालग्रहभूतपिशाचतः ।
पाशाङ्कुशधरः पातु रजःसत्त्वतमः स्मृतीः ॥ १६॥
हिंदी अर्थ:
पाश और अंकुश धारण करने वाले भगवान गणेश राक्षस, असुर, वेताल, ग्रह, भूत और पिशाच आदि से मेरी रक्षा करें तथा मेरी स्मृति को रज, सत्त्व और तम के विकारों से सुरक्षित रखें।
ज्ञानं धर्मं च लक्ष्मीं च लज्जां कीर्तिं तथा कुलम् ।
वपुर्धनं च धान्यं च गृहान्दारान्सुतान्सखीन् ॥ १७॥
हिंदी अर्थ:
भगवान गणेश मेरे ज्ञान, धर्म, लक्ष्मी, लज्जा, कीर्ति और कुल की रक्षा करें। मेरे शरीर, धन, अन्न-धान्य, घर, पत्नी, पुत्र और मित्रों की भी रक्षा करें।
सर्वायुधधरः पौत्रान्मयूरेशोऽवतात्सदा ।
कपिलोऽजाविकं पातु गजाश्वान्विकटोऽवतु ॥ १८॥
हिंदी अर्थ:
सभी आयुध धारण करने वाले भगवान मेरे पौत्रों की रक्षा करें। मयूरेश सदैव मेरी रक्षा करें। कपिल मेरे बकरियों आदि पशुओं की और विकट मेरे हाथियों तथा घोड़ों की रक्षा करें।
भूर्जपत्रे लिखित्वेदं यः कण्ठे धारयेत्सुधीः ।
न भयं जायते तस्य यक्षरक्षःपिशाचतः ॥ १९॥
हिंदी अर्थ:
जो बुद्धिमान व्यक्ति इस कवच को भोजपत्र पर लिखकर अपने कंठ में धारण करता है, उसे यक्ष, राक्षस और पिशाच आदि से भय नहीं रहता—ऐसी इस कवच की पारंपरिक मान्यता बताई गई है।
त्रिसन्ध्यं जपते यस्तु वज्रसारतनुर्भवेत् ।
यात्राकाले पठेद्यस्तु निर्विघ्नेन फलं लभेत् ॥ २०॥
हिंदी अर्थ:
जो व्यक्ति तीनों संध्याओं में इस कवच का जप करता है, उसका शरीर वज्र के समान दृढ़ होने की पारंपरिक मान्यता कही गई है। यात्रा के समय इसका पाठ करने वाले को यात्रा निर्विघ्न होने का फल प्राप्त होता है, ऐसा शास्त्रीय पाठ में वर्णित है।
युद्धकाले पठेद्यस्तु विजयं चाप्नुयाद्ध्रुवम् ।
मारणोच्चाटनाकर्षस्तम्भमोहनकर्मणि ॥ २१॥
हिंदी अर्थ:
कवच के इस श्लोक में युद्ध अथवा कठिन परिस्थितियों में पाठ करने से विजय प्राप्त होने की पारंपरिक मान्यता बताई गई है। आगे कुछ तांत्रिक कर्मों का उल्लेख आता है; इन्हें आधुनिक समय में व्यावहारिक निर्देश के रूप में नहीं, बल्कि ग्रंथ में वर्णित पारंपरिक संदर्भ के रूप में समझना चाहिए।
सप्तवारं जपेदेतद्दिनानामेकविंशतिः ।
तत्तत्फलमवाप्नोति साधको नात्र संशयः ॥ २२॥
हिंदी अर्थ:
जो साधक इक्कीस दिनों तक प्रतिदिन सात बार इस कवच का जप करता है, उसे उसके साधना-संकल्प के अनुसार फल प्राप्त होने की बात इस कवच की फलश्रुति में कही गई है।
एकविंशतिवारं च पठेत्तावद्दिनानि यः ।
कारागृहगतं सद्यो राज्ञा वध्यं च मोचयेत् ॥ २३॥
हिंदी अर्थ:
जो व्यक्ति निर्धारित अवधि तक प्रतिदिन इक्कीस बार इस कवच का पाठ करता है, उसके लिए कारागार अथवा गंभीर संकट से मुक्ति मिलने की पारंपरिक फलश्रुति बताई गई है।
राजदर्शनवेलायां पठेदेतत्त्रिवारतः ।
स राजानं वशं नीत्वा प्रकृतीश्च सभां जयेत् ॥ २४॥
हिंदी अर्थ:
राजा या शासक के दर्शन के समय तीन बार इस कवच का पाठ करने की परंपरागत फलश्रुति बताई गई है। श्लोक में राजा और सभा में सफलता प्राप्त होने की बात कही गई है।
इदं गणेशकवचं कश्यपेन समीरितम् ।
मुद्गलाय च तेनाथ माण्डव्याय महर्षये ॥ २५॥
हिंदी अर्थ:
यह गणेश कवच कश्यप ऋषि द्वारा कहा गया और उनके द्वारा मुद्गल तथा महर्षि माण्डव्य को सुनाया गया, ऐसा इस पाठ में वर्णित है।
मह्यं स प्राह कृपया कवचं सर्वसिद्धिदम् ।
न देयं भक्तिहीनाय देयं श्रद्धावते शुभम् ॥ २६॥
हिंदी अर्थ:
उन्होंने कृपापूर्वक मुझे यह सर्वसिद्धिप्रद कवच बताया। इसे श्रद्धा और भक्ति से रहित व्यक्ति को नहीं, बल्कि श्रद्धावान व्यक्ति को देना चाहिए—ऐसा निर्देश इस श्लोक में दिया गया है।
अनेनास्य कृता रक्षा न बाधाऽस्य भवेत्क्वचित् ।
राक्षसासुरभेतालदैत्यदानवसम्भवा ॥ २७॥
हिंदी अर्थ:
जिसकी इस कवच द्वारा रक्षा की जाती है, उसे राक्षस, असुर, वेताल, दैत्य और दानव आदि से उत्पन्न बाधाओं का सामना नहीं करना पड़ता—ऐसी इस कवच की पारंपरिक फलश्रुति बताई गई है।
॥ इति श्रीगणेशपुराणे उत्तरखण्डे बालक्रीडायां षडशीतितमेऽध्याये श्री गणेश कवच संपूर्ण ॥
श्री गणेश कवच की विशेषता
श्री गणेश कवच की सबसे सुंदर विशेषता यह है कि इसमें भगवान गणेश के अनेक नामों के माध्यम से सिर से लेकर पैरों तक शरीर के अलग-अलग अंगों की रक्षा की प्रार्थना की गई है। इसके बाद पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण और अन्य दिशाओं में भी गणेश जी के विभिन्न स्वरूपों को रक्षक के रूप में स्मरण किया गया है।
कवच में गणेश जी को केवल विघ्नहर्ता के रूप में ही नहीं, बल्कि विनायक, महोदर, एकदंत, वक्रतुण्ड, हेरम्ब, मयूरेश, कपिल, विकट, धूम्रकेतु और गणेश्वर जैसे अनेक नामों से स्मरण किया गया है।
इसी कारण गणेश उपासना में इसका पाठ श्रद्धा के साथ किया जाता है।
श्री गणेश कवच का पाठ कब करें?
गणेश जी की पूजा के समय इस कवच का पाठ किया जा सकता है। विशेष रूप से बुधवार, गणेश चतुर्थी, संकष्टी चतुर्थी तथा किसी शुभ कार्य के आरंभ से पहले श्रद्धापूर्वक गणेश जी का स्मरण करना भक्तों की सामान्य परंपरा है।
पाठ करते समय स्थान को स्वच्छ रखें, भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र के सामने दीपक जलाएं और अपनी श्रद्धा के अनुसार गणेश जी का ध्यान करके कवच का पाठ करें।
गणेश कवच पढ़ने का आध्यात्मिक भाव
गणेश कवच का मूल भाव केवल बाहरी सुरक्षा की कामना तक सीमित नहीं है। इसमें भगवान गणेश से बुद्धि, ज्ञान, धर्म, लक्ष्मी, कीर्ति, परिवार और जीवन के विभिन्न पक्षों की मंगलमय रक्षा की प्रार्थना की गई है।
इसलिए इसका पाठ करते समय केवल शब्दों का उच्चारण करने के बजाय भगवान गणेश के प्रति श्रद्धा, विनम्रता और सकारात्मक भाव रखना अधिक महत्वपूर्ण है।
श्री गणेश कवच से जुड़ी महत्वपूर्ण बात
गणेश कवच के उपलब्ध प्रकाशित पाठों में कुछ पाठांतर मिलते हैं। उदाहरण के लिए कुछ संस्करणों में “सिंहगतं” मिलता है, जबकि Sanskrit Documents के उपलब्ध PDF में अलग पाठ दिखाई देता है। इसी प्रकार कुछ शब्दों और अंतिम अध्याय-सूचना में भी अंतर मिलता है। इसलिए अलग-अलग पुस्तकों या वेबसाइटों में छोटे शब्दांतर दिखाई देना असामान्य नहीं है।
यहां दिया गया पाठ एकरूप रूप में प्रस्तुत किया गया है ताकि पाठक आसानी से इसका पाठ और अर्थ समझ सके।
श्री गणेश कवच की फलश्रुति
गणेश कवच की अंतिम पंक्तियों में इसकी पारंपरिक फलश्रुति बताई गई है। इसमें भगवान गणेश की कृपा से विभिन्न प्रकार की बाधाओं से रक्षा, यात्रा में विघ्नों से मुक्ति और कठिन परिस्थितियों में सहायता मिलने की कामना व्यक्त की गई है।
भक्त के लिए इसका सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि जीवन में किसी भी शुभ कार्य से पहले विघ्नहर्ता भगवान गणेश का स्मरण, श्रद्धा और सद्भावना के साथ किया जाए।
श्री गणेश जी का सरल मंत्र
कवच के पाठ के साथ भगवान गणेश के इस सरल मंत्र का भी स्मरण किया जा सकता है:
ॐ गं गणपतये नमः।
इस मंत्र का श्रद्धापूर्वक जाप करते हुए भगवान गणेश से बुद्धि, विवेक, सद्बुद्धि और जीवन में आने वाले विघ्नों को दूर करने की प्रार्थना करें।
श्री गणेश कवच से जुड़े प्रश्न
श्री गणेश कवच क्या है?
श्री गणेश कवच भगवान गणेश को समर्पित एक रक्षा-स्तोत्र है, जिसमें भगवान गणेश के विभिन्न नामों और स्वरूपों का स्मरण करके शरीर तथा जीवन के अलग-अलग क्षेत्रों की रक्षा की प्रार्थना की गई है।
गणेश कवच में कितने श्लोक हैं?
प्रचलित 27-श्लोक वाले पाठ में श्री गणेश कवच के 27 श्लोक हैं।
गणेश कवच का पाठ कब करना चाहिए?
इसे भगवान गणेश की पूजा के समय श्रद्धापूर्वक पढ़ा जा सकता है। बुधवार, गणेश चतुर्थी और संकष्टी चतुर्थी जैसे अवसरों पर गणेश उपासना में इसका पाठ विशेष रूप से किया जाता है।
क्या गणेश कवच का अर्थ सहित पाठ कर सकते हैं?
हाँ। अर्थ समझकर पाठ करने से स्तोत्र में व्यक्त प्रार्थना और भगवान गणेश के विभिन्न स्वरूपों का भाव अधिक स्पष्ट रूप से समझ में आता है।
गणेश कवच का मुख्य भाव क्या है?
इसका मुख्य भाव भगवान गणेश की शरण लेकर शरीर, परिवार, धन, ज्ञान, धर्म, यात्रा और जीवन के विभिन्न पक्षों में मंगल एवं रक्षा की प्रार्थना करना है।
निष्कर्ष
श्री गणेश कवच (Shri Ganesh Kavach) भगवान गणेश की उपासना का एक सुंदर और भावपूर्ण स्तोत्र है। इसमें गणपति के अनेक दिव्य नामों का स्मरण करते हुए शरीर के विभिन्न अंगों और चारों दिशाओं से रक्षा की प्रार्थना की गई है।
यदि आप गणेश जी के भक्त हैं, तो इस कवच का पाठ केवल किसी विशेष फल की इच्छा से नहीं, बल्कि श्रद्धा, भक्ति और भगवान गणेश के प्रति समर्पण के भाव से करना सबसे सुंदर साधना है।
वक्रतुण्ड महाकाय, सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव, शुभकार्येषु सर्वदा॥
गणपति बप्पा मोरया।
