प्राधानिकं रहस्यम्
दुर्गा सप्तशती के रहस्यत्रय में प्राधानिकं रहस्यम् प्रथम रहस्य है। इसमें महालक्ष्मी के आदि एवं प्रधान शक्ति-स्वरूप का वर्णन किया गया है। इसी के साथ महाकाली और महासरस्वती के स्वरूप, उनके नाम तथा ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र से संबंधित शक्ति-तत्त्व का निरूपण मिलता है।
इस रहस्य में देवी को निराकार और साकार दोनों स्वरूपों में सम्पूर्ण जगत् में व्याप्त परम शक्ति के रूप में बताया गया है।
॥ अथ प्राधानिकं रहस्यम् ॥
॥ विनियोगः ॥
ॐ अस्य श्रीसप्तशतीरहस्यत्रयस्य नारायण ऋषिरनुष्टुप्छन्दः,
महाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वत्यो देवता यथोक्तफलावाप्त्यर्थं जपे विनियोगः।
हिन्दी अर्थ: श्रीसप्तशती के तीनों रहस्यों के नारायण ऋषि, अनुष्टुप् छन्द तथा महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती देवता हैं। शास्त्रोक्त फल की प्राप्ति के उद्देश्य से जप में इनका विनियोग किया जाता है।
राजा बोले
भगवन्नवतारा मे चण्डिकायास्त्वयोदिताः।
एतेषां प्रकृतिं ब्रह्मन् प्रधानं वक्तुमर्हसि॥१॥
हिन्दी अर्थ: हे भगवन्! आपने मुझसे चण्डिका देवी के जिन अवतारों का वर्णन किया है, हे ब्रह्मन्! अब उन सभी की प्रधान प्रकृति का स्वरूप मुझे बताने की कृपा करें।
आराध्यं यन्मया देव्याः स्वरूपं येन च द्विज।
विधिना ब्रूहि सकलं यथावत्प्रणतस्य मे॥२॥
हिन्दी अर्थ: हे द्विजश्रेष्ठ! मैं आपकी शरण में हूँ। देवी के जिस स्वरूप की मुझे आराधना करनी चाहिए और जिस विधि से उनकी उपासना करनी चाहिए, वह सब मुझे यथार्थ रूप से बताइए।
ऋषि बोले
इदं रहस्यं परममनाख्येयं प्रचक्षते।
भक्तोऽसीति न मे किञ्चित्तवावाच्यं नराधिप॥३॥
हिन्दी अर्थ: हे राजन्! यह अत्यन्त गूढ़ रहस्य है, जिसे सामान्यतः कहने योग्य नहीं माना जाता। लेकिन तुम मेरे भक्त हो, इसलिए तुमसे ऐसी कोई बात नहीं है जिसे मैं न कहूँ।
सर्वस्याद्या महालक्ष्मीस्त्रिगुणा परमेश्वरी।
लक्ष्यालक्ष्यस्वरूपा सा व्याप्य कृत्स्नं व्यवस्थिता॥४॥
हिन्दी अर्थ: महालक्ष्मी ही समस्त जगत् की आदि कारणरूप परमेश्वरी हैं। वे तीनों गुणों से युक्त हैं तथा दृश्य और अदृश्य दोनों स्वरूपों में सम्पूर्ण जगत् में व्याप्त होकर स्थित हैं।
मातुलुङ्गं गदां खेटं पानपात्रं च बिभ्रती।
नागं लिङ्गं च योनिं च बिभ्रती नृप मूर्धनि॥५॥
हिन्दी अर्थ: हे राजन्! देवी अपने हाथों में मातुलुङ्ग फल, गदा, ढाल और पानपात्र धारण करती हैं तथा मस्तक पर नाग, लिङ्ग और योनि धारण करती हैं।
तप्तकाञ्चनवर्णाभा तप्तकाञ्चनभूषणा।
शून्यं तदखिलं स्वेन पूरयामास तेजसा॥६॥
हिन्दी अर्थ: उनका वर्ण तपाए हुए स्वर्ण के समान प्रकाशमान है और उनके आभूषण भी तपे हुए स्वर्ण के समान हैं। उन्होंने अपने तेज से उस सम्पूर्ण शून्य को भर दिया।
शून्यं तदखिलं लोकं विलोक्य परमेश्वरी।
बभार परमं रूपं तमसा केवलेन हि॥७॥
हिन्दी अर्थ: सम्पूर्ण लोक को शून्य देखकर परमेश्वरी ने केवल तमोगुण के आधार पर अपना एक विशेष स्वरूप धारण किया।
सा भिन्नाञ्जनसंकाशा दंष्ट्राङ्कितवरानना।
विशाललोचना नारी बभूव तनुमध्यमा॥८॥
हिन्दी अर्थ: वह देवी गाढ़े काजल के समान श्याम वर्ण वाली थीं। उनका मुख दाँतों से सुशोभित था, नेत्र विशाल थे और उनकी कमर पतली थी।
खड्गपात्रशिरःखेटैरलङ्कृतचतुर्भुजा।
कबन्धहारं शिरसा बिभ्राणा हि शिरःस्रजम्॥९॥
हिन्दी अर्थ: उनकी चार भुजाएँ खड्ग, पात्र, कटे हुए मस्तक और ढाल से सुशोभित थीं। वे धड़ की माला तथा सिरों की माला धारण करती थीं।
सा प्रोवाच महालक्ष्मीं तामसी प्रमदोत्तमा।
नाम कर्म च मे मातर्देहि तुभ्यं नमो नमः॥१०॥
हिन्दी अर्थ: वह श्रेष्ठ तामसी देवी महालक्ष्मी से बोलीं—हे माता! आपको बार-बार नमस्कार है। कृपा करके मेरा नाम और मेरे कर्म बताइए।
तां प्रोवाच महालक्ष्मीस्तामसीं प्रमदोत्तमाम्।
ददामि तव नामानि यानि कर्माणि तानि ते॥११॥
हिन्दी अर्थ: तब महालक्ष्मी ने उस श्रेष्ठ तामसी देवी से कहा—मैं तुम्हें तुम्हारे नाम और तुम्हारे कर्म बताती हूँ।
महामाया महाकाली महामारी क्षुधा तृषा।
निद्रा तृष्णा चैकवीरा कालरात्रिर्दुरत्यया॥१२॥
हिन्दी अर्थ: तुम्हारे नाम महामाया, महाकाली, महामारी, क्षुधा, तृषा, निद्रा, तृष्णा, एकवीरा, कालरात्रि और दुरत्यया होंगे।
इमानि तव नामानि प्रतिपाद्यानि कर्मभिः।
एभिः कर्माणि ते ज्ञात्वा योऽधीते सोऽश्नुते सुखम्॥१३॥
हिन्दी अर्थ: ये तुम्हारे नाम हैं और तुम्हारे कर्मों के द्वारा इनकी सार्थकता प्रकट होगी। जो व्यक्ति इन नामों के माध्यम से तुम्हारे कर्मों को जानकर इनका अध्ययन करता है, वह सुख प्राप्त करता है।
तामित्युक्त्वा महालक्ष्मीः स्वरूपमपरं नृप।
सत्त्वाख्येनातिशुद्धेन गुणेनेन्दुप्रभं दधौ॥१४॥
हिन्दी अर्थ: हे राजन्! महालक्ष्मी ने तामसी देवी से ऐसा कहकर अत्यन्त शुद्ध सत्त्वगुण से युक्त चन्द्रमा के समान उज्ज्वल दूसरा स्वरूप धारण किया।
अक्षमालाङ्कुशधरा वीणापुस्तकधारिणी।
सा बभूव वरा नारी नामान्यस्यै च सा ददौ॥१५॥
हिन्दी अर्थ: वह श्रेष्ठ देवी हाथों में अक्षमाला, अंकुश, वीणा और पुस्तक धारण किए हुए थीं। महालक्ष्मी ने उन्हें उनके विभिन्न नाम प्रदान किए।
महाविद्या महावाणी भारती वाक् सरस्वती।
आर्या ब्राह्मी कामधेनुर्वेदगर्भा च धीश्वरी॥१६॥
हिन्दी अर्थ: उनके नाम महाविद्या, महावाणी, भारती, वाक्, सरस्वती, आर्या, ब्राह्मी, कामधेनु, वेदगर्भा और धीश्वरी हैं।
अथोवाच महालक्ष्मीर्महाकालीं सरस्वतीम्।
युवां जनयतां देव्यौ मिथुने स्वानुरूपतः॥१७॥
हिन्दी अर्थ: इसके बाद महालक्ष्मी ने महाकाली और महासरस्वती से कहा—हे देवियो! तुम दोनों अपने-अपने स्वरूप के अनुरूप स्त्री और पुरुष के जोड़े उत्पन्न करो।
इत्युक्त्वा ते महालक्ष्मीः ससर्ज मिथुनं स्वयम्।
हिरण्यगर्भौ रुचिरौ स्त्रीपुंसौ कमलासनौ॥१८॥
हिन्दी अर्थ: ऐसा कहकर महालक्ष्मी ने स्वयं एक स्त्री-पुरुष का जोड़ा उत्पन्न किया। वे दोनों सुंदर थे और कमल पर विराजमान थे।
ब्रह्मन् विधे विरिञ्चेति धातरित्याह तं नरम्।
श्रीः पद्मे कमले लक्ष्मीत्याह माता च तां स्त्रियम्॥१९॥
हिन्दी अर्थ: माता ने उस पुरुष को ब्रह्मन्, विधे, विरिञ्च और धाता आदि नामों से संबोधित किया तथा उस स्त्री को श्री, पद्मा, कमला और लक्ष्मी नाम प्रदान किए।
महाकाली भारती च मिथुने सृजतः सह।
एतयोरपि रूपाणि नामानि च वदामि ते॥२०॥
हिन्दी अर्थ: इसके बाद महाकाली और महासरस्वती ने भी स्त्री-पुरुष का एक-एक जोड़ा उत्पन्न किया। अब मैं उनके रूप और नाम भी तुम्हें बताता हूँ।
नीलकण्ठं रक्तबाहुं श्वेताङ्गं चन्द्रशेखरम्।
जनयामास पुरुषं महाकाली सितां स्त्रियम्॥२१॥
हिन्दी अर्थ: महाकाली ने नीलकण्ठ, लाल भुजाओं, श्वेत शरीर और मस्तक पर चन्द्रमा धारण करने वाले पुरुष को तथा श्वेत वर्ण वाली स्त्री को उत्पन्न किया।
स रुद्रः शंकरः स्थाणुः कपर्दी च त्रिलोचनः।
त्रयी विद्या कामधेनुः सा स्त्री भाषाक्षरा स्वरा॥२२॥
हिन्दी अर्थ: उस पुरुष के नाम रुद्र, शंकर, स्थाणु, कपर्दी और त्रिलोचन हुए। उस स्त्री के नाम त्रयी, विद्या, कामधेनु, भाषा, अक्षरा और स्वरा हुए।
सरस्वती स्त्रियं गौरीं कृष्णं च पुरुषं नृप।
जनयामास नामानि तयोरपि वदामि ते॥२३॥
हिन्दी अर्थ: हे राजन्! महासरस्वती ने एक गौर वर्ण की स्त्री और एक कृष्ण वर्ण के पुरुष को उत्पन्न किया। अब मैं उन दोनों के नाम भी बताता हूँ।
विष्णुः कृष्णो हृषीकेशो वासुदेवो जनार्दनः।
उमा गौरी सती चण्डी सुन्दरी सुभगा शिवा॥२४॥
हिन्दी अर्थ: उस पुरुष के नाम विष्णु, कृष्ण, हृषीकेश, वासुदेव और जनार्दन हुए। स्त्री के नाम उमा, गौरी, सती, चण्डी, सुन्दरी, सुभगा और शिवा हुए।
एवं युवतयः सद्यः पुरुषत्वं प्रपेदिरे।
चक्षुष्मन्तो नु पश्यन्ति नेतरेऽतद्विदो जनाः॥२५॥
हिन्दी अर्थ: इस प्रकार वे तीनों युवतियाँ तत्काल पुरुषरूप को प्राप्त हो गईं। इस रहस्य को ज्ञान-दृष्टि वाले लोग ही देख और समझ सकते हैं; जो इसे नहीं जानते, वे इसे नहीं समझ पाते।
ब्रह्मणे प्रददौ पत्नीं महालक्ष्मीर्नृप त्रयीम्।
रुद्राय गौरीं वरदां वासुदेवाय च श्रियम्॥२६॥
हिन्दी अर्थ: हे राजन्! महालक्ष्मी ने त्रयी को ब्रह्मा की पत्नी के रूप में, वर देने वाली गौरी को रुद्र के लिए और श्रीरूपा लक्ष्मी को वासुदेव के लिए प्रदान किया।
स्वरया सह सम्भूय विरिञ्चोऽण्डमजीजनत्।
बिभेद भगवान् रुद्रस्तद् गौर्या सह वीर्यवान्॥२७॥
हिन्दी अर्थ: स्वरा के साथ संयुक्त होकर विरिञ्चि अर्थात् ब्रह्मा ने ब्रह्माण्ड को उत्पन्न किया और पराक्रमी भगवान् रुद्र ने गौरी के साथ मिलकर उस ब्रह्माण्ड का भेदन किया।
अण्डमध्ये प्रधानादि कार्यजातमभून्नृप।
महाभूतात्मकं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम्॥२८॥
हिन्दी अर्थ: हे राजन्! उस ब्रह्माण्ड के भीतर प्रधान आदि से कार्यसमूह की उत्पत्ति हुई। पंचमहाभूतों से बना हुआ समस्त स्थावर-जंगम जगत् भी उसी में प्रकट हुआ।
पुपोष पालयामास तल्लक्ष्म्या सह केशवः।
संजहार जगत्सर्वं सह गौर्या महेश्वरः॥२९॥
हिन्दी अर्थ: भगवान् केशव ने लक्ष्मी के साथ उस सम्पूर्ण जगत् का पालन-पोषण किया और भगवान् महेश्वर ने गौरी के साथ उस सम्पूर्ण जगत् का संहार किया।
महालक्ष्मीर्महाराज सर्वसत्त्वमयीश्वरी।
निराकारा च साकारा सैव नानाभिधानभृत्॥३०॥
हिन्दी अर्थ: हे महाराज! महालक्ष्मी ही सर्वसत्त्वमयी और सभी सत्त्वों की अधीश्वरी हैं। वही निराकार और साकार दोनों स्वरूपों में स्थित होकर अनेक नामों को धारण करती हैं।
नामान्तरैर्निरूप्यैषा नाम्ना नान्येन केनचित्॥ॐ॥३१॥
हिन्दी अर्थ: महालक्ष्मी का निरूपण उनके विभिन्न नामों और स्वरूपों के द्वारा किया जाता है। केवल किसी एक नाम से उनका पूर्ण निरूपण नहीं किया जा सकता।
॥ इति प्राधानिकं रहस्यं सम्पूर्णम् ॥
प्राधानिकं रहस्यम् का महत्व
प्राधानिकं रहस्यम् में देवी की प्रधान प्रकृति और आदिशक्ति के स्वरूप का वर्णन मिलता है। इसमें महालक्ष्मी को समस्त जगत् की आदि शक्ति के रूप में बताया गया है और उनके माध्यम से महाकाली तथा महासरस्वती के स्वरूपों का निरूपण किया गया है।
इस रहस्य में देवी के विभिन्न नामों और स्वरूपों के साथ सृष्टि, पालन और संहार के कार्यों का भी वर्णन मिलता है। इसके माध्यम से देवी-तत्त्व को व्यापक रूप में समझने का मार्ग मिलता है।
प्राधानिकं रहस्यम् का पाठ क्यों किया जाता है?
प्राधानिकं रहस्यम् देवी के स्वरूप और उनकी प्रधान प्रकृति को समझने वाला महत्वपूर्ण पाठ है। श्रद्धापूर्वक इसके पाठ और श्रवण से साधक देवी के विभिन्न स्वरूपों, नामों और शक्ति-तत्त्व का चिंतन कर सकता है।
धार्मिक पाठ करते समय शुद्ध उच्चारण, श्रद्धा और पाठ की परंपरा का ध्यान रखना उचित माना जाता है।
निष्कर्ष
प्राधानिकं रहस्यम् दुर्गा सप्तशती के रहस्यत्रय का प्रथम और महत्वपूर्ण भाग है। इसमें महालक्ष्मी की प्रधान प्रकृति, महाकाली और महासरस्वती के स्वरूप तथा ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र से संबंधित शक्ति-तत्त्व का वर्णन मिलता है।
इस रहस्य का मुख्य भाव यह है कि देवी की शक्ति अनेक रूपों और नामों में प्रकट होकर सम्पूर्ण जगत् में व्याप्त है। वे निराकार भी हैं और साकार भी तथा अनेक नामों से उनका स्मरण और निरूपण किया जाता है।
प्राधानिकं रहस्यम् से जुड़े प्रश्न
प्राधानिकं रहस्यम् क्या है?
प्राधानिकं रहस्यम् दुर्गा सप्तशती के रहस्यत्रय का प्रथम रहस्य है। इसमें महालक्ष्मी की प्रधान प्रकृति और देवी के विभिन्न शक्ति-स्वरूपों का वर्णन मिलता है।
प्राधानिकं रहस्यम् में मुख्य रूप से किस देवी का वर्णन है?
इसमें महालक्ष्मी को आदि और प्रधान शक्ति के रूप में वर्णित किया गया है। आगे महाकाली और महासरस्वती के स्वरूपों का भी वर्णन आता है।
प्राधानिकं रहस्यम् में कितने श्लोक हैं?
इस पाठ में 31 क्रमांकित श्लोक हैं और 31वें श्लोक के बाद “इति प्राधानिकं रहस्यं सम्पूर्णम्” से पाठ समाप्त होता है।
प्राधानिकं रहस्यम् में किन देवियों के नाम बताए गए हैं?
इसमें महालक्ष्मी, महाकाली और महासरस्वती के स्वरूपों के साथ महामाया, महाकाली, महामारी, सरस्वती, महाविद्या, महावाणी, भारती, ब्राह्मी, कामधेनु आदि अनेक नामों का वर्णन मिलता है।
प्राधानिकं रहस्यम् में ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र का क्या वर्णन है?
इसमें ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र के साथ उनकी संबंधित शक्तियों का वर्णन करते हुए सृष्टि, पालन और संहार के कार्यों का निरूपण किया गया है।
