दुर्गा सप्तशती प्रथम अध्याय में भगवान विष्णु और मधु-कैटभ वध का दृश्य

दुर्गा सप्तशती प्रथम अध्याय (Durga Saptashati Pratham Adhyay)

श्री दुर्गा सप्तशती का प्रथम अध्याय मधु-कैटभ वध के नाम से प्रसिद्ध है। इसमें राजा सुरथ और समाधि नामक वैश्य की कथा के माध्यम से भगवती महामाया की शक्ति का वर्णन मिलता है। मेधा ऋषि बताते हैं कि ज्ञान होने के बाद भी मनुष्य ममता और मोह से क्यों बंधा रहता है और किस प्रकार वही महामाया प्रसन्न होकर मुक्ति का मार्ग भी प्रदान करती हैं।

इस अध्याय में ब्रह्माजी द्वारा भगवती योगनिद्रा की स्तुति, भगवान विष्णु का जागना और मधु-कैटभ नामक असुरों का वध मुख्य प्रसंग हैं। प्रथम अध्याय को दुर्गा सप्तशती के प्रथम चरित्र का आरंभ माना जाता है।

श्री दुर्गा सप्तशती — प्रथम अध्याय

राजा सुरथ और समाधि को मेधा ऋषि द्वारा महामाया की शक्ति और मधु-कैटभ की कथा समझाना

॥ विनियोगः ॥

ॐ प्रथमचरित्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, महाकाली देवता, गायत्री छन्दः,
नन्दा शक्तिः, रक्तदन्तिका बीजम्, अग्निस्तत्त्वम्,
ऋग्वेदः स्वरूपम्, श्रीमहाकालीप्रीत्यर्थे प्रथमचरित्रजपे विनियोगः।

सरल अर्थ:
प्रथम चरित्र के ऋषि ब्रह्मा, देवता महाकाली, छंद गायत्री, शक्ति नन्दा, बीज रक्तदन्तिका, तत्त्व अग्नि और स्वरूप ऋग्वेद माना गया है। श्रीमहाकाली की प्रसन्नता के लिए प्रथम चरित्र के पाठ में इस विनियोग का विधान किया जाता है।

॥ ध्यानम् ॥

ॐ खड्गं चक्रगदेषुचापपरिघाञ्छूलं भुशुण्डीं शिरः
शङ्खं संदधतीं करैस्त्रिनयनां सर्वाङ्गभूषावृताम्।
नीलाश्मद्युतिमास्यपाददशकां सेवे महाकालिकां
यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्तुं मधुं कैटभम्॥

सरल अर्थ:
मैं महाकाली देवी का ध्यान करता हूँ, जिनके हाथों में खड्ग, चक्र, गदा, धनुष, परिघ, शूल, भुशुण्डी, मस्तक और शंख जैसे आयुध हैं। उनके तीन नेत्र हैं और उनका संपूर्ण शरीर दिव्य आभूषणों से सुशोभित है। उनका तेज नीलमणि के समान दिखाई देता है। भगवान विष्णु के योगनिद्रा में स्थित होने पर ब्रह्माजी ने मधु और कैटभ के वध के लिए जिन देवी की स्तुति की, वे वही महाकाली हैं।

ॐ नमश्चण्डिकायै।

प्रथम अध्याय का मूल पाठ

ॐ ऐं मार्कण्डेय उवाच॥ १॥

सावर्णिः सूर्यतनयो यो मनुः कथ्यतेऽष्टमः।
निशामय तदुत्पत्तिं विस्तराद्गदतो मम॥ २॥

सरल अर्थ:
मार्कण्डेय ऋषि कहते हैं—सूर्य के पुत्र सावर्णि आठवें मनु कहे जाते हैं। अब उनकी उत्पत्ति और मनु बनने की कथा मैं विस्तार से बताता हूँ, उसे सुनो।

महामायानुभावेन यथा मन्वन्तराधिपः।
स बभूव महाभागः सावर्णिस्तनयो रवेः॥ ३॥

सरल अर्थ:
भगवती महामाया के प्रभाव से सूर्यपुत्र सावर्णि किस प्रकार एक मन्वन्तर के अधिपति बने, उस प्रसंग का वर्णन आगे किया जाता है।

स्वारोचिषेऽन्तरे पूर्वं चैत्रवंशसमुद्भवः।
सुरथो नाम राजाभूत्समस्ते क्षितिमण्डले॥ ४॥

सरल अर्थ:
पूर्वकाल में स्वारोचिष मन्वन्तर के समय चैत्र वंश में जन्मे सुरथ नामक राजा थे। उनका अधिकार समस्त पृथ्वी पर था।

तस्य पालयतः सम्यक् प्रजाः पुत्रानिवौरसान्।
बभूवुः शत्रवो भूपाः कोलाविध्वंसिनस्तदा॥ ५॥

सरल अर्थ:
राजा सुरथ अपनी प्रजा का अपने पुत्रों की तरह उचित ढंग से पालन करते थे। उसी समय कोलाविध्वंसी नामक राजा उनके शत्रु बन गए।

तस्य तैरभवद् युद्धमतिप्रबलदण्डिनः।
न्यूनैरपि स तैर्युद्धे कोलाविध्वंसिभिर्जितः॥ ६॥

सरल अर्थ:
राजा सुरथ और उनके शत्रुओं के बीच घोर युद्ध हुआ। शत्रुओं की संख्या कम होने पर भी युद्ध में राजा सुरथ उनसे पराजित हो गए।

ततः स्वपुरमायातो निजदेशाधिपोऽभवत्।
आक्रान्तः स महाभागस्तैस्तदा प्रबलारिभिः॥ ७॥

सरल अर्थ:
युद्ध के बाद राजा सुरथ अपने नगर लौट आए और अपने देश तक सीमित होकर रहने लगे। वहाँ भी उनके शक्तिशाली शत्रुओं ने आक्रमण कर दिया।

अमात्यैर्बलिभिर्दुष्टैर्दुर्बलस्य दुरात्मभिः।
कोशो बलं चापहृतं तत्रापि स्वपुरे ततः॥ ८॥

सरल अर्थ:
राजा के दुष्ट और स्वार्थी मंत्रियों ने उनकी दुर्बल स्थिति का लाभ उठाया तथा राजधानी में उनका खजाना और सैन्य शक्ति अपने अधिकार में कर ली।

ततो मृगयाव्याजेन हृतस्वाम्यः स भूपतिः।
एकाकी हयमारुह्य जगाम गहनं वनम्॥ ९॥

सरल अर्थ:
राज्य का अधिकार खो चुके राजा सुरथ शिकार खेलने के बहाने घोड़े पर सवार होकर अकेले ही घने वन की ओर चले गए।

स तत्राश्रममद्राक्षीद् द्विजवर्यस्य मेधसः।
प्रशान्तश्वापदाकीर्णं मुनिशिष्योपशोभितम्॥ १०॥

सरल अर्थ:
वन में उन्होंने श्रेष्ठ ऋषि मेधा का आश्रम देखा। वहाँ हिंसक पशु भी शांत दिखाई देते थे और मुनि के शिष्यों के कारण आश्रम सुंदर लग रहा था।

तस्थौ कंचित्स कालं च मुनिना तेन सत्कृतः।
इतश्चेतश्च विचरंस्तस्मिन्मुनिवराश्रमे॥ ११॥

सरल अर्थ:
ऋषि मेधा ने राजा का आदरपूर्वक स्वागत किया। राजा कुछ समय तक उनके आश्रम में रहे और वहाँ इधर-उधर विचरते रहे।

सोऽचिन्तयत्तदा तत्र ममत्वाकृष्टचेतनः।
मत्पूर्वैः पालितं पूर्वं मया हीनं पुरं हि तत्॥ १२॥

सरल अर्थ:
राजा का मन अपने पुराने राज्य के प्रति ममता से जुड़ा हुआ था। वे सोचते थे कि जिस नगर की रक्षा उनके पूर्वजों ने की और जिसे उन्होंने भी संभाला, वह अब उनके बिना कैसा होगा।

मद्भृत्यैस्तैर्सद्वृत्तैर्धर्मतः पाल्यते न वा।
न जाने स प्रधानो मे शूरहस्ती सदामदः॥ १३॥

सरल अर्थ:
वे चिंतित थे कि उनके सेवक अब राज्य की उचित देखभाल करते भी हैं या नहीं। उन्हें अपने उस वीर हाथी की भी चिंता थी जो कभी उनका प्रमुख हाथी था।

मम वैरिवशं यातः कान् भोगानुपलप्स्यते।
ये ममानुगता नित्यं प्रसादधनभोजनैः॥ १४॥

सरल अर्थ:
राजा सोचते थे कि उनका वह हाथी अब शत्रुओं के अधिकार में जाकर कैसी स्थिति में होगा। जो लोग पहले उनके अनुग्रह, धन और भोजन पर आश्रित थे, वे अब किसके साथ होंगे।

अनुवृत्तिं ध्रुवं तेऽद्य कुर्वन्त्यन्यमहीभृताम्।
असम्यग्व्ययशीलैस्तैः कुर्वद्भिः सततं व्ययम्॥ १५॥

सरल अर्थ:
राजा को लगता था कि उनके पुराने सेवक अब किसी दूसरे राजा का अनुसरण कर रहे होंगे और संभव है कि वे राज्य की संपत्ति का उचित उपयोग न कर रहे हों।

संचितः सोऽतिदुःखेन क्षयं कोशो गमिष्यति।
एतच्चान्यच्च सततं चिन्तयामास पार्थिवः॥ १६॥

सरल अर्थ:
उन्हें चिंता थी कि बहुत कठिनाई से जमा किया गया राजकोष भी अनुचित खर्च के कारण समाप्त हो जाएगा। ऐसी ही अनेक बातें वे लगातार सोचते रहते थे।

तत्र विप्राश्रमाभ्याशे वैश्यमेकं ददर्श सः।
स पृष्टस्तेन कस्त्वं भो हेतुश्चागमनेऽत्र कः॥ १७॥

सरल अर्थ:
ऋषि के आश्रम के पास राजा ने एक वैश्य को देखा। उन्होंने उससे पूछा कि वह कौन है और यहाँ आने का कारण क्या है।

सशोक इव कस्मात्त्वं दुर्मना इव लक्ष्यसे।
इत्याकर्ण्य वचस्तस्य भूपतेः प्रणयोदितम्॥ १८॥

सरल अर्थ:
राजा ने पूछा कि तुम इतने दुखी और चिंतित क्यों दिखाई दे रहे हो। राजा की प्रेमपूर्वक कही बात सुनकर उस वैश्य ने उत्तर देना आरंभ किया।

प्रत्युवाच स तं वैश्यः प्रश्रयावनतो नृपम्॥ १९॥

सरल अर्थ:
वह वैश्य विनम्र होकर राजा के सामने झुका और अपनी स्थिति बताने लगा।

वैश्य उवाच॥ २०॥

समाधिर्नाम वैश्योऽहमुत्पन्नो धनिनां कुले॥ २१॥

सरल अर्थ:
वैश्य ने कहा—मेरा नाम समाधि है और मेरा जन्म एक संपन्न वैश्य परिवार में हुआ है।

पुत्रदारैर्निरस्तश्च धनलोभादसाधुभिः।
विहीनश्च धनैर्दारैः पुत्रैरादाय मे धनम्॥ २२॥

सरल अर्थ:
धन के लोभ में मेरे अपने ही स्त्री-पुत्रों ने मुझे घर से निकाल दिया और मेरा धन अपने अधिकार में ले लिया।

वनमभ्यागतो दुःखी निरस्तश्चाप्तबन्धुभिः।
सोऽहं न वेद्मि पुत्राणां कुशलाकुशलात्मिकाम्॥ २३॥

सरल अर्थ:
अपने स्वजनों से अलग होकर दुखी अवस्था में मैं वन में आ गया हूँ। अब मुझे यह भी पता नहीं कि मेरे पुत्र सुखी हैं या किसी परेशानी में हैं।

प्रवृत्तिं स्वजनानां च दाराणां चात्र संस्थितः।
किं नु तेषां गृहे क्षेममक्षेमं किं नु साम्प्रतम्॥ २४॥

सरल अर्थ:
यहाँ रहते हुए भी मेरा मन अपने परिवार और स्वजनों के बारे में ही सोचता रहता है। पता नहीं वे घर में कुशल से हैं या किसी कठिनाई में।

कथं ते किं नु सद्वृत्ता दुर्वृत्ताः किं नु मे सुताः॥ २५॥

सरल अर्थ:
मेरे पुत्रों का व्यवहार कैसा है, वे सदाचारी हैं या गलत आचरण करने लगे हैं—यह चिंता भी मुझे सताती रहती है।

राजोवाच॥ २६॥

यैर्निरस्तो भवाँल्लुब्धैः पुत्रदारादिभिर्धनैः॥ २७॥

तेषु किं भवतः स्नेहमनुबध्नाति मानसम्॥ २८॥

सरल अर्थ:
राजा ने पूछा—जिन लोभी पुत्र और परिवार वालों ने धन के कारण तुम्हें घर से निकाल दिया, उन्हीं के प्रति तुम्हारे मन में इतना स्नेह क्यों बना हुआ है?

वैश्य उवाच॥ २९॥

एवमेतद्यथा प्राह भवानस्मद्गतं वचः॥ ३०॥

किं करोमि न बध्नाति मम निष्ठुरतां मनः।
यैः संत्यज्य पितृस्नेहं धनलुब्धैर्निराकृतः॥ ३१॥

पतिस्वजनहार्दं च हार्दि तेष्वेव मे मनः।
किमेतन्नाभिजानामि जानन्नपि महामते॥ ३२॥

यत्प्रेमप्रवणं चित्तं विगुणेष्वपि बन्धुषु।
तेषां कृते मे निःश्वासो दौर्मनस्यं च जायते॥ ३३॥

करोमि किं यन्न मनस्तेष्वप्रीतिषु निष्ठुरम्॥ ३४॥

सरल अर्थ:
समाधि ने कहा—राजन्, आपने मेरे बारे में बिल्कुल सही कहा। मैं जानता हूँ कि उन्हीं लोगों ने धन के लोभ में मुझे छोड़ दिया, फिर भी मेरा मन उनके प्रति कठोर नहीं हो पाता। वे गुणहीन हों, फिर भी मेरे मन में उनके लिए स्नेह बना हुआ है। उनके बारे में सोचकर मुझे चिंता और दुख होता है। मैं यह समझ नहीं पाता कि ऐसा क्यों हो रहा है।

मार्कण्डेय उवाच॥ ३५॥

ततस्तौ सहितौ विप्र तं मुनिं समुपस्थितौ॥ ३६॥

समाधिर्नाम वैश्योऽसौ स च पार्थिवसत्तमः।
कृत्वा तु तौ यथान्यायं यथार्हं तेन संविदम्॥ ३७॥

उपविष्टौ कथाः काश्चिच्चक्रतुर्वैश्यपार्थिवौ॥ ३८॥

सरल अर्थ:
मार्कण्डेय ऋषि कहते हैं—राजा सुरथ और समाधि दोनों मेधा ऋषि के पास पहुँचे। उचित सम्मान और विनम्र व्यवहार के बाद वे उनके पास बैठ गए और आपस में कुछ बातें करने लगे।

राजोवाच॥ ३९॥

भगवंस्त्वामहं प्रष्टुमिच्छाम्येकं वदस्व तत्॥ ४०॥

दुःखाय यन्मे मनसः स्वचित्तायत्ततां विना।
ममत्वं गतराज्यस्य राज्याङ्गेष्वखिलेष्वपि॥ ४१॥

जानतोऽपि यथाज्ञस्य किमेतन्मुनिसत्तम।
अयं च निकृतः पुत्रैर्दारैर्भृत्यैस्तथोज्झितः॥ ४२॥

स्वजनेन च संत्यक्तस्तेषु हार्दी तथाप्यति।
एवमेष तथाहं च द्वावप्यत्यन्तदुःखितौ॥ ४३॥

दृष्टदोषेऽपि विषये ममत्वाकृष्टमानसौ।
तत्किमेतन्महाभाग यन्मोहो ज्ञानिनोरपि॥ ४४॥

ममास्य च भवत्येषा विवेकान्धस्य मूढता॥ ४५॥

सरल अर्थ:
राजा ने ऋषि से पूछा—मेरा राज्य मेरे हाथ में नहीं है, फिर भी उसके प्रति मेरा मोह क्यों बना हुआ है? यह वैश्य भी अपने परिवार से दुख पाकर अलग हो चुका है, फिर भी उसका मन उन्हीं लोगों में लगा हुआ है। जब हम दोनों जानते हैं कि जिन वस्तुओं और संबंधों में दोष दिखाई देता है, उनके प्रति ममता रखना उचित नहीं है, तब भी यह मोह क्यों बना रहता है?

ऋषिरुवाच॥ ४६॥

ज्ञानमस्ति समस्तस्य जन्तोर्विषयगोचरे॥ ४७॥

विषयश्च महाभागयाति चैवं पृथक् पृथक्।
दिवान्धाः प्राणिनः केचिद्रात्रावन्धास्तथापरे॥ ४८॥

केचिद्दिवा तथा रात्रौ प्राणिनस्तुल्यदृष्टयः।
ज्ञानिनो मनुजाः सत्यं किं तु ते न हि केवलम्॥ ४९॥

यतो हि ज्ञानिनः सर्वे पशुपक्षिमृगादयः।
ज्ञानं च तन्मनुष्याणां यत्तेषां मृगपक्षिणाम्॥ ५०॥

मनुष्याणां च यत्तेषां तुल्यमन्यत्तथोभयोः।
ज्ञानेऽपि सति पश्यैतान् पतङ्गाञ्छावचञ्चुषु॥ ५१॥

कणमोक्षादृतान्मोहात्पीड्यमानानपि क्षुधा।
मानुषा मनुजव्याघ्र साभिलाषाः सुतान् प्रति॥ ५२॥

लोभात्प्रत्युपकाराय नन्वेतान् किं न पश्यसि।
तथापि ममतावर्त्ते मोहगर्ते निपातिताः॥ ५३॥

महामायाप्रभावेण संसारस्थितिकारिणा।
तन्नात्र विस्मयः कार्यो योगनिद्रा जगत्पतेः॥ ५४॥

महामाया हरेश्चैषा तया सम्मोह्यते जगत्।
ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा॥ ५५॥

बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति।
तया विसृज्यते विश्वं जगदेतच्चराचरम्॥ ५६॥

सैषा प्रसन्ना वरदा नृणां भवति मुक्तये।
सा विद्या परमा मुक्तेर्हेतुभूता सनातनी॥ ५७॥

संसारबन्धहेतुश्च सैव सर्वेश्वरेश्वरी॥ ५८॥

सरल अर्थ:
मेधा ऋषि बताते हैं कि सभी जीवों में अपने-अपने विषयों का ज्ञान होता है। मनुष्य ही नहीं, पशु-पक्षी भी अपने बच्चों और प्रियजनों के प्रति स्नेह रखते हैं। भूख और कठिनाई के बीच भी पक्षी अपने बच्चों को भोजन देते हैं। इसी प्रकार मनुष्य भी अपने परिवार के प्रति मोह और ममता से बंधा रहता है।

यह सब भगवती महामाया के प्रभाव से होता है। वही महामाया भगवान विष्णु की योगनिद्रा कही गई हैं और उन्हीं की शक्ति से यह संसार मोहित होता है। वे ज्ञानियों के मन को भी मोह में डाल सकती हैं। वही देवी प्रसन्न होकर मनुष्यों को मुक्ति प्रदान करने वाली परम विद्या का रूप धारण करती हैं और वही संसार के बंधन का कारण भी बनती हैं।

राजोवाच॥ ५९॥

भगवन् का हि सा देवी महामायेति यां भवान्॥ ६०॥

ब्रवीति कथमुत्पन्ना सा कर्मास्याश्च किं द्विज।
यत्प्रभावा च सा देवी यत्स्वरूपा यदुद्भवा॥ ६१॥

तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि त्वत्तो ब्रह्मविदां वर॥ ६२॥

सरल अर्थ:
राजा ने पूछा—हे भगवन्! जिन्हें आप महामाया कहते हैं, वे देवी कौन हैं? उनका प्राकट्य किस प्रकार हुआ और उनके कार्य क्या हैं? उनका स्वरूप और प्रभाव कैसा है? मैं इन सभी बातों को आपसे सुनना चाहता हूँ।

ऋषिरुवाच॥ ६३॥

नित्यैव सा जगन्मूर्तिस्तया सर्वमिदं ततम्॥ ६४॥

तथापि तत्समुत्पत्तिर्बहुधा श्रूयतां मम।
देवानां कार्यसिद्ध्यर्थमाविर्भवति सा यदा॥ ६५॥

उत्पन्नेति तदा लोके सा नित्याप्यभिधीयते।
योगनिद्रां यदा विष्णुर्जगत्येकार्णवीकृते॥ ६६॥

आस्तीर्य शेषमभजत्कल्पान्ते भगवान् प्रभुः।
तदा द्वावसुरौ घोरौ विख्यातौ मधुकैटभौ॥ ६७॥

विष्णुकर्णमलोद्भूतो हन्तुं ब्रह्माणमुद्यतौ।
स नाभिकमले विष्णोः स्थितो ब्रह्मा प्रजापतिः॥ ६८॥

दृष्ट्वा तावसुरौ चोग्रौ प्रसुप्तं च जनार्दनम्।
तुष्टाव योगनिद्रां तामेकाग्रहृदयस्थितः॥ ६९॥

विबोधनार्थाय हरेर्हरिनेत्रकृतालयाम्।
विश्वेश्वरीं जगद्धात्रीं स्थितिसंहारकारिणीम्॥ ७०॥

निद्रां भगवतीं विष्णोरतुलां तेजसः प्रभुः॥ ७१॥

सरल अर्थ:
ऋषि कहते हैं—भगवती वास्तव में नित्य हैं और पूरा जगत उन्हीं से व्याप्त है। देवताओं के कार्य की सिद्धि के लिए वे अलग-अलग रूपों में प्रकट होती हैं। कल्प के अंत में जब पूरा संसार एक विशाल जलराशि में स्थित था, तब भगवान विष्णु शेषनाग पर योगनिद्रा में थे। उसी समय मधु और कैटभ नामक दो असुर प्रकट हुए और ब्रह्माजी को मारने के लिए आगे बढ़े।

भगवान विष्णु के नाभिकमल पर स्थित ब्रह्माजी ने उन्हें देखा और भगवान विष्णु को जगाने के लिए उनकी योगनिद्रा की स्तुति की। उन्होंने उस देवी की आराधना की जो जगत की अधीश्वरी और सृष्टि के पालन तथा संहार की शक्ति हैं।

ब्रह्मोवाच॥ ७२॥

त्वं स्वाहा त्वं स्वधां त्वं हि वषट्कारःस्वरात्मिका॥ ७३॥

सुधा त्वमक्षरे नित्ये त्रिधा मात्रात्मिका स्थिता।
अर्धमात्रास्थिता नित्या यानुच्चार्या विशेषतः॥ ७४॥

त्वमेव संध्या सावित्री त्वं देवि जननी परा।
त्वयैतद्धार्यते विश्वं त्वयैतत्सृज्यते जगत्॥ ७५॥

त्वयैतत्पाल्यते देवि त्वमत्स्यन्ते च सर्वदा।
विसृष्टौ सृष्टिरूपा त्वं स्थितिरूपा च पालने॥ ७६॥

तथा संहृतिरूपान्ते जगतोऽस्य जगन्मये।
महाविद्या महामाया महामेधा महास्मृतिः॥ ७७॥

महामोहा च भवती महादेवी महासुरी।
प्रकृतिस्त्वं च सर्वस्य गुणत्रयविभाविनी॥ ७८॥

कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहरात्रिश्च दारुणा।
त्वं श्रीस्त्वमीश्वरी त्वं ह्रीस्त्वं बुद्धिर्बोधलक्षणा॥ ७९॥

लज्जा पुष्टिस्तथा तुष्टिस्त्वं शान्तिः क्षान्तिरेव च।
खड्गिनी शूलिनी घोरा गदिनी चक्रिणी तथा॥ ८०॥

शङ्खिनी चापिनी बाणभुशुण्डीपरिघायुधा।
सौम्या सौम्यतराशेषसौम्येभ्यस्त्वतिसुन्दरी॥ ८१॥

परापराणां परमा त्वमेव परमेश्वरी।
यच्च किंचित्क्वचिद्वस्तु सदसद्वाखिलात्मिके॥ ८२॥

तस्य सर्वस्य या शक्तिः सा त्वं किं स्तूयसे तदा।
यया त्वया जगत्स्रष्टा जगत्पात्यत्ति यो जगत्॥ ८३॥

सोऽपि निद्रावशं नीतः कस्त्वां स्तोतुमिहेश्वरः।
विष्णुः शरीरग्रहणमहमीशान एव च॥ ८४॥

कारितास्ते यतोऽतस्त्वां कः स्तोतुं शक्तिमान् भवेत्।
सा त्वमित्थं प्रभावैः स्वैरुदारैर्देवि संस्तुता॥ ८५॥

मोहयैतौ दुराधर्षावसुरौ मधुकैटभौ।
प्रबोधं च जगत्स्वामी नीयतामच्युतो लघु॥ ८६॥

बोधश्च क्रियतामस्य हन्तुमेतौ महासुरौ॥ ८७॥

सरल अर्थ:
ब्रह्माजी देवी की स्तुति करते हुए कहते हैं कि स्वाहा, स्वधा और यज्ञ में प्रयुक्त वषट्कार भी देवी के ही रूप हैं। वे नित्य शक्ति हैं और सृष्टि, पालन तथा संहार में अलग-अलग रूपों में कार्य करती हैं।

वे महामाया, महाविद्या, महामेधा, महास्मृति, महादेवी और प्रकृति हैं। लज्जा, पुष्टि, तुष्टि, शांति और क्षमा भी उन्हीं के रूप हैं। वे अनेक दिव्य आयुध धारण करने वाली देवी हैं और सौम्यता तथा सुंदरता की परम सीमा हैं।

ब्रह्माजी कहते हैं कि संसार में जो कुछ भी शक्ति के रूप में विद्यमान है, वह देवी की ही शक्ति है। भगवान विष्णु भी उनकी योगनिद्रा के अधीन हैं। इसलिए वे देवी से प्रार्थना करते हैं कि मधु और कैटभ को मोह में डालें, भगवान विष्णु को जगाएँ और उन्हें इन दोनों असुरों के वध के लिए समर्थ करें।

ऋषिरुवाच॥ ८८॥

एवं स्तुता तदा देवी तामसी तत्र वेधसा॥ ८९॥

विष्णोः प्रबोधनार्थाय निहन्तुं मधुकैटभौ।
नेत्रास्यनासिकाबाहुहृदयेभ्यस्तथोरसः॥ ९०॥

निर्गम्य दर्शने तस्थौ ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः।
उत्तस्थौ च जगन्नाथस्तया मुक्तो जनार्दनः॥ ९१॥

एकार्णवेऽहिशयनात्ततः स ददृशे च तौ।
मधुकैटभो दुरात्मानावतिवीर्यपराक्रमौ॥ ९२॥

क्रोधरक्तेक्षणावत्तुं ब्रह्माणं जनितोद्यमौ।
समुत्थाय ततस्ताभ्यां युयुधे भगवान् हरिः॥ ९३॥

पञ्चवर्षसहस्राणि बाहुप्रहरणो विभुः।
तावप्यतिबलोन्मत्तौ महामायाविमोहितौ॥ ९४॥

उक्तवन्तौ वरोऽस्मत्तो व्रियतामिति केशवम्॥ ९५॥

सरल अर्थ:
ब्रह्माजी की स्तुति से देवी प्रकट हुईं और भगवान विष्णु की योगनिद्रा उनसे अलग हो गई। इसके बाद भगवान विष्णु जागे और उन्होंने मधु तथा कैटभ को देखा। दोनों असुर अत्यंत शक्तिशाली थे और ब्रह्माजी को मारने के लिए तैयार थे।

भगवान विष्णु ने दोनों असुरों से युद्ध किया। यह बाहुयुद्ध पाँच हजार वर्षों तक चला। महामाया के प्रभाव से मोहित होकर दोनों असुर स्वयं को अत्यंत शक्तिशाली समझने लगे और भगवान विष्णु से बोले कि वे उनसे कोई वर माँग लें।

श्रीभगवानुवाच॥ ९६॥

भवेतामद्य मे तुष्टौ मम वध्यावुभावपि॥ ९७॥

किमन्येन वरेणात्र एतावद्धि वृतं मया॥ ९८॥

सरल अर्थ:
भगवान विष्णु ने कहा—यदि तुम दोनों मुझसे प्रसन्न हो तो मुझे यही वर दो कि तुम दोनों मेरे हाथों मारे जाओ। मुझे किसी दूसरे वर की आवश्यकता नहीं है।

ऋषिरुवाच॥ ९९॥

वञ्चिताभ्यामिति तदा सर्वमापोमयं जगत्॥ १००॥

विलोक्य ताभ्यां गदितो भगवान् कमलेक्षणः।
आवां जहि न यत्रोर्वी सलिलेन परिप्लुता॥ १०१॥

सरल अर्थ:
तब दोनों असुरों को अपनी स्थिति का बोध हुआ। उन्होंने देखा कि चारों ओर जल ही जल है। इसलिए उन्होंने भगवान विष्णु से कहा कि जहाँ पृथ्वी जल में डूबी हुई न हो, ऐसे स्थान पर ही उनका वध किया जाए।

ऋषिरुवाच॥ १०२॥

तथेत्युक्त्वा भगवता शङ्खचक्रगदाभृता।
कृत्वा चक्रेण वै छिन्ने जघने शिरसी तयोः॥ १०३॥

सरल अर्थ:
भगवान विष्णु ने उनकी बात स्वीकार की। उन्होंने दोनों असुरों के मस्तक अपनी जाँघ पर रखे और चक्र से उनके सिर काट दिए। इस प्रकार मधु और कैटभ का वध हुआ।

एवमेषा समुत्पन्ना ब्रह्मणा संस्तुता स्वयम्।
प्रभावमस्या देव्यास्तु भूयः शृणु वदामि ते॥ ऐं ॐ॥ १०४॥

सरल अर्थ:
इस प्रकार ब्रह्माजी की स्तुति से देवी महामाया का प्राकट्य हुआ और उनकी शक्ति से मधु-कैटभ का अंत हुआ। अब देवी के अन्य प्रभावों का वर्णन आगे किया जाएगा।

प्रथम अध्याय का समापन

॥ श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये मधुकैटभवधो नाम प्रथमोऽध्यायः सम्पूर्णम् ॥

॥ श्रीदुर्गायै नमः ॥

प्रथम अध्याय का धार्मिक महत्व

दुर्गा सप्तशती का प्रथम अध्याय केवल मधु और कैटभ के वध की कथा नहीं है। इसमें भगवती महामाया की व्यापक शक्ति का वर्णन मिलता है। मेधा ऋषि राजा सुरथ और समाधि को समझाते हैं कि मनुष्य ज्ञान होने के बाद भी ममता और मोह से क्यों बंधा रहता है।

इस अध्याय का एक महत्वपूर्ण संदेश यह है कि संसार में दिखाई देने वाली ममता, आकर्षण और मोह के पीछे भी देवी की शक्ति कार्य करती है। वही शक्ति जब प्रसन्न होती है तो मनुष्य को बंधन से मुक्त होने का मार्ग भी प्रदान करती है।

ब्रह्माजी द्वारा की गई देवी की स्तुति में भगवती को सृष्टि, पालन, संहार, ज्ञान, स्मृति, बुद्धि, शांति, शक्ति और प्रकृति के विभिन्न रूपों के रूप में प्रणाम किया गया है। इसलिए देवी उपासना की दृष्टि से यह अध्याय विशेष महत्व रखता है।

प्रथम अध्याय का मुख्य प्रसंग

दुर्गा सप्तशती का प्रथम अध्याय मधु-कैटभ वध के प्रसंग के लिए प्रसिद्ध है। इस अध्याय में केवल मधु और कैटभ के वध की कथा ही नहीं आती, बल्कि राजा सुरथ और समाधि नामक वैश्य के माध्यम से मनुष्य के मन में रहने वाले मोह, ममता और आसक्ति का भी सुंदर वर्णन मिलता है। मेधा ऋषि दोनों को समझाते हैं कि संसार में दिखाई देने वाली अनेक प्रकार की आसक्ति के पीछे भगवती महामाया की शक्ति कार्य करती है।

इस अध्याय में कथा धीरे-धीरे आगे बढ़ती है और अंत में भगवान विष्णु द्वारा मधु और कैटभ के वध के साथ प्रथम अध्याय पूर्ण होता है।

इस अध्याय में मुख्य रूप से ये प्रसंग आते हैं:

  • राजा सुरथ का अपना राज्य और अधिकार खो देना।
  • राज्य से दूर होने के बाद भी राजा का अपने राज्य और प्रजा के प्रति मोह बना रहना।
  • राजा सुरथ का मेधा ऋषि के आश्रम में पहुँचना।
  • वहाँ समाधि नामक एक वैश्य से उनकी भेंट होना।
  • समाधि का अपने परिवार द्वारा अपमानित और घर से अलग किए जाने के बाद भी पत्नी और पुत्रों के प्रति स्नेह रखना।
  • राजा और वैश्य दोनों का अपने मन में उठने वाले मोह और ममता को लेकर चिंतित होना।
  • मेधा ऋषि द्वारा महामाया की शक्ति का वर्णन करना।
  • ब्रह्माजी द्वारा भगवान विष्णु को जगाने के लिए योगनिद्रा देवी की स्तुति करना।
  • भगवान विष्णु का योगनिद्रा से जागना।
  • मधु और कैटभ नामक शक्तिशाली असुरों का भगवान विष्णु से युद्ध करना।
  • महामाया के प्रभाव से मधु और कैटभ का मोहित होना।
  • भगवान विष्णु द्वारा दोनों असुरों का वध करना।

इस प्रकार प्रथम अध्याय में एक ओर देवी महामाया की शक्ति का वर्णन मिलता है, तो दूसरी ओर मनुष्य के जीवन में मोह और ममता किस प्रकार कार्य करते हैं, इसका भी गहरा संदेश मिलता है।

राजा सुरथ और समाधि की कथा

प्रथम अध्याय के आरंभिक प्रसंग में राजा सुरथ की कथा आती है। राजा सुरथ एक शक्तिशाली राजा थे, लेकिन शत्रुओं से संघर्ष के बाद उन्हें अपना राज्य खोना पड़ा। वे अपने राज्य से दूर हो गए, फिर भी उनके मन से राज्य और उससे जुड़ी वस्तुओं का मोह समाप्त नहीं हुआ।

राजा के मन में बार-बार अपने राज्य, प्रजा, हाथियों, घोड़ों, धन और राजकीय व्यवस्था की चिंता उठती थी। वे जानते थे कि अब उनका राज्य उनके अधिकार में नहीं है, फिर भी मन उसी के बारे में सोचता रहता था।

इसी अवस्था में वे वन की ओर चले गए और मेधा ऋषि के आश्रम में पहुँचे।

वहीं उनकी भेंट समाधि नामक एक वैश्य से हुई। समाधि भी अपने जीवन की कठिन परिस्थितियों से परेशान थे। उनके अपने लोगों ने उन्हें घर से अलग कर दिया था और उनके धन-संपत्ति पर भी दूसरों का अधिकार हो गया था। इसके बाद भी उनका मन अपने परिवार से जुड़ा हुआ था।

राजा सुरथ और समाधि ने जब एक-दूसरे से अपनी स्थिति बताई तो दोनों को यह देखकर आश्चर्य हुआ कि जिन लोगों और वस्तुओं से उन्हें दुख मिला, उनके प्रति भी उनका मन पूरी तरह विरक्त नहीं हो पा रहा था।

राजा अपने राज्य के बारे में सोचते थे और समाधि अपने परिवार के बारे में। दोनों के मन में एक ही प्रश्न था कि जब उन्हें पता है कि ये लोग और वस्तुएँ अब उनके अधिकार में नहीं हैं, तब भी उनके प्रति इतना मोह क्यों बना हुआ है।

मेधा ऋषि ने मोह के बारे में क्या बताया?

राजा सुरथ और समाधि ने अपनी जिज्ञासा मेधा ऋषि के सामने रखी। उन्होंने पूछा कि बुद्धि से सब कुछ समझने के बाद भी मन उसी विषय की ओर क्यों खिंचता रहता है।

मेधा ऋषि ने उन्हें समझाया कि संसार के जीवों में मोह और ममता का होना केवल सामान्य बुद्धि से समझ लेने की बात नहीं है। इसके पीछे भगवती महामाया की शक्ति भी कार्य करती है।

मनुष्य को कई बार यह पता होता है कि कोई वस्तु स्थायी नहीं है, कोई संबंध उसके अनुसार नहीं चल रहा है या किसी विषय से उसे दुख मिल रहा है, फिर भी मन उसी से जुड़ा रहता है। यही मोह और ममता मनुष्य को बार-बार उसी विषय की ओर खींचती है।

मेधा ऋषि इसी प्रसंग के माध्यम से भगवती महामाया की शक्ति का वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि यही देवी समस्त संसार को अपनी शक्ति से प्रभावित करती हैं और जीवों को अपने-अपने विषयों तथा संबंधों में बाँधे रखती हैं।

इस प्रसंग का उद्देश्य केवल राजा और वैश्य की समस्या का उत्तर देना नहीं है, बल्कि मनुष्य को अपने भीतर के मोह को पहचानने की प्रेरणा देना भी है।

महामाया और भगवान विष्णु की योगनिद्रा

इसके बाद कथा भगवान विष्णु और मधु-कैटभ से संबंधित प्रसंग की ओर बढ़ती है।

एक समय भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में स्थित थे। उसी समय उनके कानों के मैल से मधु और कैटभ नामक दो अत्यंत शक्तिशाली असुर उत्पन्न हुए। उन्होंने ब्रह्माजी को देखा और उन्हें मारने के लिए आगे बढ़े।

ब्रह्माजी ने भगवान विष्णु को योगनिद्रा में देखा। तब उन्होंने भगवान विष्णु को जगाने के लिए उस देवी की स्तुति की जो भगवान की योगनिद्रा के रूप में स्थित थीं।

ब्रह्माजी की स्तुति से प्रसन्न होकर देवी ने भगवान विष्णु के नेत्रों से योगनिद्रा के रूप में अपनी शक्ति को अलग किया। इसके बाद भगवान विष्णु जागे और उन्होंने मधु तथा कैटभ को युद्ध के लिए ललकारा।

यहाँ देवी की शक्ति का एक महत्वपूर्ण स्वरूप सामने आता है। भगवान विष्णु जैसे परम शक्तिशाली देवता के जागरण के प्रसंग में भी महामाया की शक्ति का वर्णन किया गया है।

भगवान विष्णु और मधु-कैटभ का युद्ध

भगवान विष्णु और मधु-कैटभ के बीच अत्यंत लंबा और भयंकर युद्ध हुआ। दोनों असुर बहुत शक्तिशाली थे और लगातार भगवान विष्णु के साथ युद्ध करते रहे।

देवी महामाया के प्रभाव से मधु और कैटभ मोहित हो गए। युद्ध करते-करते वे अपने बल और पराक्रम के अभिमान में भगवान विष्णु से प्रसन्न होकर उन्हें वर देने की बात कहने लगे।

भगवान विष्णु ने उनकी इसी बात का उपयोग करते हुए उनसे वर माँगा कि वे दोनों उनके हाथों मारे जाएँ।

मधु और कैटभ को जब अपनी शक्ति पर बहुत अभिमान था, तब उन्होंने ऐसी शर्त रखी कि उनका वध वहीं किया जाए जहाँ पृथ्वी जल में डूबी हुई न हो।

भगवान विष्णु ने उनकी शर्त स्वीकार की। उन्होंने दोनों असुरों को अपनी जाँघ पर रखा और अपने चक्र से उनके मस्तकों का वध कर दिया।

इस प्रकार मधु और कैटभ का अंत हुआ और देवताओं पर आया संकट दूर हुआ।

मधु और कैटभ का वध कैसे हुआ?

मधु और कैटभ अत्यंत शक्तिशाली असुर थे। भगवान विष्णु ने उनसे लंबे समय तक युद्ध किया, लेकिन दोनों असुर आसानी से पराजित नहीं हुए। अंततः भगवती महामाया के प्रभाव से वे मोहित हो गए और भगवान विष्णु से वर माँगने के लिए तैयार हो गए।

भगवान विष्णु ने उनसे यही वर माँगा कि वे दोनों उनके हाथों मारे जाएँ।

असुरों ने अपनी ओर से एक शर्त रखी कि उनका वध ऐसी जगह किया जाए जहाँ पृथ्वी जल में डूबी हुई न हो। उस समय चारों ओर जल ही जल था। भगवान विष्णु ने दोनों असुरों को अपनी जाँघ पर रख लिया, जो जल से ऊपर थी, और वहाँ अपने चक्र से उनके मस्तकों का वध कर दिया।

इस प्रकार प्रथम अध्याय में मधु और कैटभ के वध का प्रसंग पूर्ण होता है।

यह प्रसंग यह भी दर्शाता है कि केवल बाहरी शक्ति और पराक्रम ही पर्याप्त नहीं होते। देवी की महामाया शक्ति के प्रभाव से परिस्थितियाँ बदलती हैं और अंततः भगवान विष्णु असुरों का संहार करते हैं।

राजा सुरथ और समाधि की कथा का संदेश

राजा सुरथ और समाधि की कथा प्रथम अध्याय का अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है। दोनों अलग-अलग परिस्थितियों से आए थे, लेकिन उनके मन की समस्या एक जैसी थी।

राजा सुरथ अपना राज्य खो चुके थे, फिर भी उनका मन राज्य और प्रजा में लगा हुआ था। वे जानते थे कि अब उनका राज्य उनके अधिकार में नहीं है, फिर भी उसके प्रति उनका लगाव कम नहीं हुआ।

समाधि को उनके अपने परिवार ने अलग कर दिया था, फिर भी उनके मन में पत्नी और पुत्रों के प्रति स्नेह बना हुआ था। वे जानते थे कि उनके साथ अन्याय हुआ है, फिर भी मन उन्हीं लोगों की चिंता करता था।

मेधा ऋषि ने इसी स्थिति को समझाते हुए महामाया की शक्ति का वर्णन किया।

इस कथा का एक महत्वपूर्ण संदेश यह है कि मनुष्य का मन केवल तर्क से नहीं चलता। कई बार बुद्धि किसी बात को सही या गलत समझ लेती है, लेकिन मन फिर भी उसी विषय में उलझा रहता है। मोह और ममता मनुष्य को बार-बार उन्हीं संबंधों, वस्तुओं और परिस्थितियों की ओर खींचते हैं।

दुर्गा सप्तशती का यह प्रसंग साधक को अपने मन को समझने और अपने भीतर के मोह तथा आसक्ति पर विचार करने की प्रेरणा देता है।

दुर्गा सप्तशती प्रथम अध्याय का पाठ

दुर्गा सप्तशती के पाठ की परंपरा में प्रथम अध्याय का पाठ श्रद्धा और एकाग्रता के साथ किया जाता है। पाठ करने वाले साधक अपनी परंपरा और गुरु से प्राप्त विधि के अनुसार विनियोग, ध्यान आदि का पाठ करके अध्याय का पाठ करते हैं।

मूल संस्कृत श्लोकों का पाठ करते समय उच्चारण को यथासंभव स्पष्ट रखना उचित माना जाता है। विशेष रूप से संस्कृत के शब्दों में मात्रा और उच्चारण का ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि पाठ की परंपरा में शुद्ध उच्चारण को महत्व दिया गया है।

यदि कोई साधक दुर्गा सप्तशती का संपूर्ण पाठ कर रहा हो, तो प्रथम अध्याय के बाद क्रम के अनुसार आगे के अध्यायों का पाठ किया जाता है। प्रथम अध्याय को केवल मधु-कैटभ वध की कथा के रूप में पढ़ना ही पर्याप्त नहीं है; इसमें राजा सुरथ, समाधि और मेधा ऋषि के माध्यम से मनुष्य के मोह और महामाया की शक्ति का भी महत्वपूर्ण संदेश मिलता है।

प्रथम अध्याय से मिलने वाली सीख

प्रथम अध्याय का सबसे महत्वपूर्ण संदेश मनुष्य के मन और उसकी आसक्ति को समझना है। राजा सुरथ और समाधि दोनों जानते थे कि जिन चीजों से वे जुड़े हुए हैं, वे अब उनके नियंत्रण में नहीं हैं, फिर भी उनका मन उनसे अलग नहीं हो पा रहा था।

यह स्थिति आज के सामान्य जीवन में भी दिखाई देती है। मनुष्य कई बार किसी पुराने संबंध, वस्तु, पद, प्रतिष्ठा या बीती हुई परिस्थिति से जुड़ा रहता है। बुद्धि आगे बढ़ने को कहती है, लेकिन मन पीछे की ओर खिंचता रहता है।

दुर्गा सप्तशती का यह प्रसंग बताता है कि मन की इस प्रवृत्ति को समझना आवश्यक है। भगवती महामाया की शक्ति का स्मरण करते हुए साधक अपने भीतर के मोह, ममता और आसक्ति को पहचानने का प्रयास कर सकता है।

इसी कारण प्रथम अध्याय केवल एक पौराणिक युद्ध की कथा नहीं है, बल्कि मनुष्य के भीतर चलने वाले मोह और विवेक के संघर्ष को समझने का भी महत्वपूर्ण प्रसंग है।

निष्कर्ष

दुर्गा सप्तशती का प्रथम अध्याय मधु-कैटभ वध के नाम से जाना जाता है। इसमें राजा सुरथ और समाधि की कथा से लेकर मेधा ऋषि द्वारा महामाया की शक्ति का वर्णन, ब्रह्माजी द्वारा योगनिद्रा देवी की स्तुति, भगवान विष्णु का जागरण और मधु-कैटभ के साथ उनका युद्ध तथा वध तक का प्रसंग आता है।

इस अध्याय में देवी महामाया की शक्ति और भगवान विष्णु की लीला के साथ-साथ मनुष्य के मोह और ममता का भी गहरा वर्णन मिलता है। राजा सुरथ और समाधि की स्थिति यह समझाती है कि मनुष्य की आसक्ति केवल बाहरी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि उसके भीतर काम करने वाली शक्ति से भी जुड़ी होती है।

श्रद्धा और एकाग्रता के साथ प्रथम अध्याय का पाठ करने से साधक इसके कथा-प्रसंग और आध्यात्मिक संदेश को बेहतर ढंग से समझ सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दुर्गा सप्तशती के प्रथम अध्याय का नाम क्या है?

दुर्गा सप्तशती के प्रथम अध्याय का नाम मधुकैटभवधः है। इसमें मधु और कैटभ के वध का प्रसंग मुख्य रूप से आता है।

दुर्गा सप्तशती के प्रथम अध्याय में किसका वध होता है?

प्रथम अध्याय में भगवान विष्णु द्वारा मधु और कैटभ नामक दो असुरों का वध किया जाता है।

प्रथम अध्याय में राजा सुरथ की कथा क्यों आती है?

राजा सुरथ की कथा के माध्यम से मनुष्य के मोह, ममता और आसक्ति को समझाया गया है। राजा अपना राज्य खोने के बाद भी उसके प्रति मोह से मुक्त नहीं हो पाते।

समाधि कौन थे?

समाधि एक वैश्य थे, जिन्हें उनके परिवार से अलग कर दिया गया था। इसके बाद भी उनके मन में अपने परिवार के प्रति स्नेह बना रहा। उनकी कथा राजा सुरथ के साथ मिलकर मोह और ममता के विषय को समझाती है।

प्रथम अध्याय में मेधा ऋषि क्या समझाते हैं?

मेधा ऋषि राजा सुरथ और समाधि को समझाते हैं कि संसार के जीवों में मोह और ममता के पीछे भगवती महामाया की शक्ति कार्य करती है।

मधु और कैटभ का वध भगवान विष्णु ने कैसे किया?

महामाया के प्रभाव से मधु और कैटभ मोहित हुए और भगवान विष्णु से वर माँगने को तैयार हुए। भगवान विष्णु ने उनसे अपने हाथों मारे जाने का वर माँगा। उनकी शर्त के अनुसार भगवान विष्णु ने उन्हें अपनी जाँघ पर रखकर चक्र से उनका वध किया।

दुर्गा सप्तशती के प्रथम अध्याय में कितने श्लोक हैं?

प्रथम अध्याय में परंपरागत पाठ के अनुसार 104 श्लोक हैं और इसका समापन मधु तथा कैटभ के वध के साथ होता है।

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