ऋग्वेदोक्तं देवीसूक्तम् – दुर्गा सप्तशती पाठ
ऋग्वेदोक्त देवीसूक्तम् को वागाम्भृणी सूक्त भी कहा जाता है। यह ऋग्वेद के दशम मंडल के 125वें सूक्त में आता है और इसमें आठ ऋचाएँ हैं। इस सूक्त में देवी शक्ति स्वयं अपने व्यापक स्वरूप, सामर्थ्य और समस्त संसार में अपनी व्याप्ति का वर्णन करती हैं। ऋग्वेदीय परंपरा में इसकी ऋषिका वागाम्भृणी मानी गई हैं।
दुर्गा सप्तशती के पारंपरिक पाठ-विधान में उपसंहार के बाद नवार्ण मंत्र जप और उसके पश्चात ऋग्वेदोक्त देवीसूक्त के पाठ का विधान कई पाठ-परंपराओं में मिलता है। इसलिए इसे दुर्गा सप्तशती पाठ के समापन क्रम से जुड़े महत्वपूर्ण पाठ के रूप में पढ़ा जाता है।
॥ ऋग्वेदोक्तं देवीसूक्तम् ॥
॥ विनियोगः ॥
ॐ अहमित्यष्टर्चस्य सूक्तस्य वागाम्भृणी ऋषिः,
सच्चित्सुखात्मकः सर्वगतः परमात्मा देवता, द्वितीयाया ऋचो जगती,
शिष्टानां त्रिष्टुप् छन्दः, देवीमाहात्म्यपाठे विनियोगः॥
हिन्दी अर्थ:
इस आठ ऋचाओं वाले देवीसूक्त की ऋषिका वागाम्भृणी हैं। इसकी देवता सर्वव्यापक, सच्चिदानंद स्वरूप परमात्मा मानी गई हैं। दूसरी ऋचा जगती छंद में और शेष ऋचाएँ त्रिष्टुप् छंद में हैं। देवी माहात्म्य अर्थात दुर्गा सप्तशती के पाठ में इस सूक्त का विनियोग किया जाता है।
॥ ध्यानम् ॥
ॐ सिंहस्था शशिशेखरा मरकतप्रख्यैश्चतुर्भिर्भुजैः
शङ्खं चक्रधनुःशरांश्च दधती नेत्रैस्त्रिभिः शोभिता।
आमुक्ताङ्गदहारकङ्कणरणत्काञ्चीरणन्नूपुरा
दुर्गा दुर्गतिहारिणी भवतु नो रत्नोल्लसत्कुण्डला॥
हिन्दी अर्थ:
जो सिंह पर विराजमान हैं, जिनके मस्तक पर चंद्रमा सुशोभित है, जिनका वर्ण मरकत मणि के समान चमकीला है और जो चार भुजाओं में शंख, चक्र, धनुष और बाण धारण करती हैं, ऐसी तीन नेत्रों वाली मां दुर्गा हमारी रक्षा करें। उनके शरीर पर बाजूबंद, हार, कंगन, करधनी और नूपुर सुशोभित हैं तथा उनके कानों में रत्नजटित कुंडल चमक रहे हैं। वे मां दुर्गा हमारी सभी दुर्गतियों और कष्टों को दूर करें।
॥ देवीसूक्तम् ॥
ॐ अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः।
अहं मित्रावरुणोभा बिभर्म्यहमिन्द्राग्नी अहमश्विनोभा॥१॥
हिन्दी अर्थ:
मैं रुद्रों और वसुओं के साथ विचरण करती हूं। मैं आदित्यों और सभी देवताओं के साथ विद्यमान हूं। मैं मित्र और वरुण दोनों को धारण करती हूं। मैं इंद्र और अग्नि तथा दोनों अश्विनीकुमारों को भी धारण करने वाली शक्ति हूं।
अहं सोममाहनसं बिभर्म्यहं त्वष्टारमुत पूषणं भगम्।
अहं दधामि द्रविणं हविष्मते सुप्राव्ये यजमानाय सुन्वते॥२॥
हिन्दी अर्थ:
मैं सोम, त्वष्टा, पूषा और भग को धारण करती हूं। जो यजमान श्रद्धापूर्वक यज्ञ करता है और देवताओं को हवि अर्पित करता है, उसे समृद्धि और आवश्यक धन-संपदा प्रदान करने वाली शक्ति भी मैं ही हूं।
अहं राष्ट्री संगमनी वसूनां चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम्।
तां मा देवा व्यदधुः पुरुत्रा भूरिस्थात्रां भूर्यावेशयन्तीम्॥३॥
हिन्दी अर्थ:
मैं समस्त जगत की अधिष्ठात्री शक्ति हूं और सभी प्रकार की संपदाओं को एकत्र करने वाली हूं। मैं यज्ञ के योग्य शक्तियों में प्रमुख और ज्ञानस्वरूप हूं। देवताओं ने मुझे अनेक स्थानों पर स्थापित किया है और मैं अपने व्यापक स्वरूप से संसार के अनेक क्षेत्रों में व्याप्त हूं।
मया सोऽन्नमत्ति यो विपश्यति यः प्राणिति य ईं शृणोत्युक्तम्।
अमन्तवो मां त उप क्षियन्ति श्रुधि श्रुत श्रद्धिवं ते वदामि॥४॥
हिन्दी अर्थ:
जो प्राणी अन्न ग्रहण करता है, जो संसार को देखता है, जो प्राण धारण करता है और जो कही गई वाणी को सुनता है, वह मेरी ही शक्ति से ऐसा करता है। जो मुझे समझने और सुनने का प्रयास नहीं करते, वे मेरी वास्तविक सत्ता को नहीं पहचान पाते। इसलिए मेरी कही हुई बात को ध्यानपूर्वक सुनो और श्रद्धा के साथ ग्रहण करो।
अहमेव स्वयमिदं वदामि जुष्टं देवेभिरुत मानुषेभिः।
यं कामये तं तमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम्॥५॥
हिन्दी अर्थ:
मैं स्वयं उस सत्य को प्रकट करती हूं जिसे देवता और मनुष्य दोनों स्वीकार करते हैं। जिस व्यक्ति पर मेरी कृपा होती है, उसे मैं सामर्थ्यवान बनाती हूं। उसे ज्ञानवान, ऋषिस्वरूप और उत्तम बुद्धि से संपन्न करने वाली शक्ति भी मैं ही हूं।
अहं रुद्राय धनुरा तनोमि ब्रह्मद्विषे शरवे हन्तवा उ।
अहं जनाय समदं कृणोम्यहं द्यावापृथिवी आ विवेश॥६॥
हिन्दी अर्थ:
मैं रुद्र के लिए धनुष को खींचती हूं, जिससे धर्म और ब्रह्मज्ञान से द्वेष करने वाली शक्तियों का नाश हो। मैं जनसमुदाय के लिए संघर्ष में सामर्थ्य प्रदान करती हूं और आकाश तथा पृथ्वी दोनों में व्याप्त हूं।
अहं सुवे पितरमस्य मूर्धन्मम योनिरप्स्वन्तः समुद्रे।
ततो वि तिष्ठे भुवनानु विश्वोतामूं द्यां वर्ष्मणोप स्पृशामि॥७॥
हिन्दी अर्थ:
मैं इस जगत के पिता स्वरूप परम तत्व को भी उत्पन्न करने वाली शक्ति हूं। जलराशि और समुद्र के भीतर भी मेरी ही शक्ति का आधार है। वहां से निकलकर मैं समस्त लोकों में व्याप्त रहती हूं और अपने व्यापक स्वरूप से आकाश के उच्चतम भाग तक पहुंचती हूं।
अहमेव वात इव प्रवाम्यारभमाणा भुवनानि विश्वा।
परो दिवा पर एना पृथिव्यैतावती महिना संबभूव॥८॥
हिन्दी अर्थ:
मैं वायु के समान अपनी शक्ति से समस्त संसार में प्रवाहित होती हूं और सभी लोकों को गतिशील करती हूं। मैं आकाश से भी परे और पृथ्वी से भी परे अपनी व्यापक महिमा के कारण विद्यमान हूं। मेरी शक्ति की सीमा समस्त सृष्टि में व्याप्त है।
।इति ऋग्वेदोक्तं देवीसूक्तम् समाप्तं।
ऋग्वेदोक्त देवीसूक्त का महत्व
ऋग्वेदोक्त देवीसूक्त में देवी को केवल किसी एक स्थान या रूप तक सीमित नहीं माना गया है। यहां देवी शक्ति को देवताओं, मनुष्यों, प्रकृति और समस्त जगत में व्याप्त सार्वभौमिक शक्ति के रूप में व्यक्त किया गया है। यही इस सूक्त की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है।
इसमें देवी स्वयं कहती हैं कि वे रुद्र, वसु, आदित्य, मित्र, वरुण, इंद्र, अग्नि और अश्विनीकुमारों सहित विभिन्न दैवी शक्तियों को धारण करती हैं। आगे वे स्वयं को ज्ञान, सामर्थ्य, समृद्धि और समस्त प्राणियों के जीवन का आधार बताती हैं।
दुर्गा सप्तशती के पाठ के संदर्भ में यह सूक्त साधक को देवी के व्यापक स्वरूप का स्मरण कराता है। मां दुर्गा को केवल संकट दूर करने वाली शक्ति के रूप में ही नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि में व्याप्त परम शक्ति के रूप में समझने की प्रेरणा मिलती है।
दुर्गा सप्तशती के बाद देवीसूक्त का पाठ
दुर्गा सप्तशती के पारंपरिक उपसंहार क्रम में नवार्ण मंत्र जप के बाद ऋग्वेदोक्त देवीसूक्त का पाठ किया जाता है। हालांकि अलग-अलग पाठ-परंपराओं में क्रम और विधि में कुछ अंतर मिल सकता है। इसलिए साधक अपने गुरु, कुल-परंपरा या जिस प्रमाणित पाठ-विधि का अनुसरण करता है, उसी के अनुसार पाठ करे।
ऋग्वेद का मूल देवीसूक्त आठ ऋचाओं का है और इसे वागाम्भृणी सूक्त के नाम से भी जाना जाता है।
देवीसूक्त से मिलने वाली आध्यात्मिक प्रेरणा
देवीसूक्त का मुख्य संदेश यह है कि संसार में दिखाई देने वाली विभिन्न शक्तियों के पीछे एक व्यापक चेतना और शक्ति का आधार है। मनुष्य के भीतर ज्ञान, प्राण, बुद्धि और कर्म करने की क्षमता भी उसी व्यापक शक्ति से जुड़ी हुई मानी गई है।
इस सूक्त का पाठ करते समय केवल शब्दों का उच्चारण ही नहीं, बल्कि उसके भाव को समझना भी उपयोगी है। देवी को सर्वव्यापक शक्ति के रूप में स्मरण करने से साधक के भीतर श्रद्धा, आत्मविश्वास, विनम्रता और आध्यात्मिक जागरूकता का भाव विकसित हो सकता है।
पाठ करते समय ध्यान रखने योग्य बातें
देवीसूक्त वैदिक मंत्रों से संबंधित पाठ है, इसलिए संभव हो तो इसका उच्चारण किसी योग्य आचार्य या प्रमाणित पाठ से सीखकर करना उचित है। वैदिक स्वर सहित पाठ और सामान्य स्वररहित पाठ में अंतर होता है। उपलब्ध प्रमाणित पाठों में भी स्वरयुक्त और स्वररहित दोनों रूप दिए गए हैं।
यदि किसी साधक को वैदिक उच्चारण का पूर्ण अभ्यास नहीं है, तो वह अपनी परंपरा के अनुसार श्रद्धापूर्वक पाठ कर सकता है, लेकिन कठिन वैदिक स्वरों का अनुमान से प्रयोग करने के बजाय प्रमाणित पाठ का सहारा लेना बेहतर है।
निष्कर्ष
ऋग्वेदोक्त देवीसूक्त दुर्गा सप्तशती के उपसंहार से जुड़ा अत्यंत महत्वपूर्ण देवी पाठ है। इसके आठ मंत्रों में देवी शक्ति को समस्त देवताओं, प्राणियों और सृष्टि में व्याप्त शक्ति के रूप में अभिव्यक्त किया गया है।
दुर्गा सप्तशती के पाठ के बाद इसका पाठ साधक को मां भगवती के व्यापक और सर्वव्यापी स्वरूप का स्मरण कराता है। श्रद्धा, शुद्ध भाव और उचित उच्चारण के साथ देवीसूक्त का पाठ आध्यात्मिक साधना को अधिक गहराई देने वाला माना जाता है।
॥ इति ऋग्वेदोक्तं देवीसूक्तम् समाप्तम् ॥
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
ऋग्वेदोक्त देवीसूक्त क्या है?
ऋग्वेदोक्त देवीसूक्त ऋग्वेद के दशम मंडल के 125वें सूक्त में वर्णित आठ ऋचाओं का सूक्त है। इसे वागाम्भृणी सूक्त भी कहा जाता है।
ऋग्वेदोक्त देवीसूक्त की ऋषिका कौन हैं?
इस सूक्त की ऋषिका वागाम्भृणी मानी जाती हैं। ऋग्वेद के प्रमाणित पाठ में भी वागाम्भृणी का उल्लेख मिलता है।
देवीसूक्त में कितने मंत्र हैं?
ऋग्वेदोक्त देवीसूक्त में कुल 8 ऋचाएँ हैं। इसका मूल पाठ ऋग्वेद 10.125 के रूप में उपलब्ध है।
क्या देवीसूक्त दुर्गा सप्तशती के बाद पढ़ा जाता है?
दुर्गा सप्तशती की कई प्रचलित पाठ-परंपराओं में उपसंहार और नवार्ण मंत्र जप के बाद ऋग्वेदोक्त देवीसूक्त का पाठ किया जाता है। अलग-अलग परंपराओं में विधि और क्रम में अंतर हो सकता है।
क्या ऋग्वेदोक्त देवीसूक्त और तन्त्रोक्त देवीसूक्त एक ही हैं?
नहीं। दोनों अलग पाठ हैं। ऋग्वेदोक्त देवीसूक्त ऋग्वेद 10.125 का आठ ऋचाओं वाला वागाम्भृणी सूक्त है, जबकि तन्त्रोक्त देवीसूक्त अलग स्तुति-पाठ है। इसलिए दोनों को एक ही सूक्त नहीं मानना चाहिए।
