दुर्गा सप्तशती पाठ बारहवाँ अध्याय देवी के माहात्म्य और उसके पाठ से मिलने वाले फल का वर्णन करता है। इस अध्याय में स्वयं देवी बताती हैं कि उनके माहात्म्य का श्रद्धापूर्वक पाठ या श्रवण करने से साधक को अनेक प्रकार के भय, बाधाओं और संकटों से रक्षा मिलती है। इसमें देवी के चरित्र का स्मरण, पूजा, हवन और विशेष अवसरों पर देवी माहात्म्य सुनने के महत्व का वर्णन किया गया है।
यह अध्याय यह भी बताता है कि देवी अपने भक्तों की रक्षा करने के लिए विभिन्न रूपों में प्रकट होती हैं और संसार के पालन का कार्य करती हैं। इसलिए दुर्गा सप्तशती के पाठ में बारहवें अध्याय का विशेष महत्व माना जाता है।
श्रीदुर्गासप्तशती – द्वादश अध्याय
देवी-चरित्रों के पाठ का माहात्म्य
॥ध्यानम्॥
ॐ विद्युद्दामसमप्रभां मृगपतिस्कन्धस्थितां भीषणां
कन्याभिः करवालखेटविलसद्धस्ताभिरासेविताम्।
हस्तैश्चक्रगदासिखेटविशिखांश्चापं गुणं तर्जनीं
बिभ्राणामनलात्मिकां शशिधरां दुर्गां त्रिनेत्रां भजे॥
सरल हिंदी अर्थ: मैं तीन नेत्रों वाली देवी दुर्गा का ध्यान करता हूँ, जिनकी आभा बिजली के समान चमकदार है और जो सिंह के कंधे पर विराजमान हैं। उनके चारों ओर कन्याएँ तलवार और ढाल आदि धारण किए हुए सेवा में उपस्थित हैं। देवी अपने हाथों में चक्र, गदा, तलवार, ढाल, बाण, धनुष और अन्य दिव्य आयुध धारण करती हैं तथा उनके मस्तक पर चंद्रमा सुशोभित है।
॥ ॐ देव्युवाच ॥१॥
एभिः स्तवैश्च मां नित्यं स्तोष्यते यः समाहितः।
तस्याहं सकलां बाधां नाशयिष्याम्यसंशयम्॥२॥
सरल हिंदी अर्थ: देवी कहती हैं कि जो व्यक्ति एकाग्रचित्त होकर इन स्तुतियों द्वारा नियमित रूप से मेरी आराधना करेगा, उसकी सभी प्रकार की बाधाओं को मैं निश्चय ही दूर कर दूँगी।
मधुकैटभनाशं च महिषासुरघातनम्।
कीर्तयिष्यन्ति ये तद्वद्वधं शुम्भनिशुम्भयोः॥३॥
सरल हिंदी अर्थ: जो लोग मेरे द्वारा मधु-कैटभ और महिषासुर के वध का तथा उसी प्रकार शुम्भ और निशुम्भ के वध का स्मरण और कीर्तन करेंगे, उन्हें देवी की कृपा प्राप्त होगी।
अष्टम्यां च चतुर्दश्यां नवम्यां चै कचेतसः।
श्रोष्यन्ति चैव ये भक्त्या मम माहात्म्यमुत्तमम्॥४॥
सरल हिंदी अर्थ: जो भक्त अष्टमी, चतुर्दशी और नवमी तिथियों में एकाग्र मन से मेरे इस महान माहात्म्य को श्रद्धापूर्वक सुनेंगे, वे देवी की विशेष कृपा के अधिकारी होंगे।
न तेषां दुष्कृतं किञ्चिद् दुष्कृतोत्था न चापदः।
भविष्यति न दारिद्र्यं न चैवेष्टवियोजनम्॥५॥
सरल हिंदी अर्थ: ऐसे भक्तों पर उनके किए हुए पापों का प्रभाव नहीं रहेगा और पापों से उत्पन्न होने वाली विपत्तियाँ भी उन्हें परेशान नहीं करेंगी। उनके जीवन में दरिद्रता नहीं रहेगी और उन्हें अपने प्रियजनों से अनावश्यक वियोग का कष्ट भी नहीं सहना पड़ेगा।
शत्रुतो न भयं तस्य दस्युतो वा न राजतः।
न शस्त्रानलतोयौघात्कदाचित्सम्भविष्यति॥६॥
सरल हिंदी अर्थ: देवी के माहात्म्य का श्रद्धापूर्वक स्मरण करने वाले व्यक्ति को शत्रुओं, डाकुओं, शासक के भय तथा अस्त्र-शस्त्र, अग्नि और जल से उत्पन्न संकट का भय नहीं रहेगा।
तस्मान्ममैतन्माहात्म्यं पठितव्यं समाहितैः।
श्रोतव्यं च सदा भक्त्या परं स्वस्त्ययनं हि तत्॥७॥
सरल हिंदी अर्थ: इसलिए मेरे इस माहात्म्य का एकाग्रचित्त होकर पाठ करना और श्रद्धा से सुनना चाहिए। यह कल्याण और मंगल प्रदान करने वाला उत्तम साधन है।
उपसर्गानशेषांस्तु महामारीसमुद्भवान्।
तथा त्रिविधमुत्पातं माहात्म्यं शमयेन्मम॥८॥
सरल हिंदी अर्थ: मेरे माहात्म्य का पाठ विभिन्न प्रकार की बाधाओं, महामारी से उत्पन्न संकटों और तीन प्रकार के उत्पातों को शांत करने वाला माना गया है।
यत्रैतत्पठ्यते सम्यङ् नित्यमायतने मम।
सदा न तद्विमोक्ष्यामि सान्निध्यं तत्र मे स्थितम्॥९॥
सरल हिंदी अर्थ: जिस स्थान पर मेरे इस माहात्म्य का नियमित और विधिपूर्वक पाठ होता है, उस स्थान को मैं कभी नहीं छोड़ती। वहाँ मेरी उपस्थिति बनी रहती है।
बलिप्रदाने पूजायामग्निकार्ये महोत्सवे।
सर्वं ममैतच्चरितमुच्चार्यं श्राव्यमेव च॥१०॥
सरल हिंदी अर्थ: देवी की पूजा, नैवेद्य या बलि अर्पण, अग्नि से संबंधित धार्मिक कार्य तथा बड़े धार्मिक उत्सवों के अवसर पर उनके संपूर्ण चरित्र का पाठ और श्रवण करना चाहिए।
जानताऽजानता वापि बलिपूजां तथा कृताम्।
प्रतीच्छिष्याम्यहं प्रीत्या वह्निहोमं तथा कृतम्॥११॥
सरल हिंदी अर्थ: भक्त द्वारा पूजा या अर्पण की विधि जानकर अथवा अनजाने में किए जाने पर भी देवी उसे प्रेमपूर्वक स्वीकार करती हैं। इसी प्रकार श्रद्धा से किया गया हवन भी देवी को प्रिय है।
शरत्काले महापूजा क्रियते या च वार्षिकी।
तस्यां ममैतन्माहात्म्यं श्रुत्वा भक्तिसमन्वितः॥१२॥
सरल हिंदी अर्थ: शरद ऋतु में होने वाली वार्षिक महापूजा के अवसर पर जो भक्त श्रद्धा और भक्ति से देवी के इस माहात्म्य को सुनता है, उसे विशेष पुण्य और देवी की कृपा प्राप्त होती है।
सर्वाबाधाविनिर्मुक्तो धनधान्यसुतान्वितः।
मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशयः॥१३॥
सरल हिंदी अर्थ: देवी की कृपा से मनुष्य सभी प्रकार की बाधाओं से मुक्त होकर धन, अन्न और संतान से सम्पन्न हो सकता है। इसमें किसी प्रकार का संदेह नहीं बताया गया है।
श्रुत्वा ममैतन्माहात्म्यं तथा चोत्पत्तयः शुभाः।
पराक्रमं च युद्धेषु जायते निर्भयः पुमान्॥१४॥
सरल हिंदी अर्थ: मेरे माहात्म्य और देवी के शुभ प्राकट्यों का श्रवण करने से व्यक्ति में साहस और पराक्रम बढ़ता है तथा युद्ध या कठिन परिस्थितियों में वह निर्भय होकर सामना करने की शक्ति प्राप्त करता है।
रिपवः संक्षयं यान्ति कल्याणं चोपपद्यते।
नन्दते च कुलं पुंसां माहात्म्यं मम शृण्वताम्॥१५॥
सरल हिंदी अर्थ: देवी के माहात्म्य को सुनने वालों के शत्रु कमजोर होते हैं, उनका कल्याण होता है और उनके परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है।
शान्तिकर्मणि सर्वत्र तथा दुःस्वप्नदर्शने।
ग्रहपीडासु चोग्रासु माहात्म्यं शृणुयान्मम॥१६॥
सरल हिंदी अर्थ: शांति से संबंधित धार्मिक कार्यों में, बुरे स्वप्न आने पर और गंभीर ग्रह-बाधा की स्थिति में देवी के माहात्म्य का श्रद्धापूर्वक श्रवण करना बताया गया है।
उपसर्गाः शमं यान्ति ग्रहपीडाश्च दारुणाः।
दुःस्वप्नं च नृभिर्दृष्टं सुस्वप्नमुपजायते॥१७॥
सरल हिंदी अर्थ: देवी के माहात्म्य के श्रवण से विभिन्न बाधाएँ और कठिन ग्रहपीड़ाएँ शांत होती हैं तथा व्यक्ति द्वारा देखे गए बुरे स्वप्न का प्रभाव कम होकर शुभ परिणाम की भावना उत्पन्न होती है।
बालग्रहाभिभूतानां बालानां शान्तिकारकम्।
संघातभेदे च नृणां मैत्रीकरणमुत्तमम्॥१८॥
सरल हिंदी अर्थ: यह अध्याय बच्चों से संबंधित पारंपरिक रूप से मानी जाने वाली बाधाओं में शांति के लिए उपयोगी बताया गया है। लोगों के बीच मतभेद या विवाद होने पर आपसी मैत्री और सद्भाव स्थापित करने में भी इसे श्रेष्ठ माना गया है।
दुर्वृत्तानामशेषाणां बलहानिकरं परम्।
रक्षोभूतपिशाचानां पठनादेव नाशनम्॥१९॥
सरल हिंदी अर्थ: देवी के माहात्म्य का पाठ दुष्ट आचरण करने वालों के प्रभाव को कमजोर करने वाला और राक्षस, भूत तथा पिशाच आदि से संबंधित भय को दूर करने वाला बताया गया है।
सर्वं ममैतन्माहात्म्यं मम सन्निधिकारकम्।
पशुपुष्पार्घ्यधूपैश्च गन्धदीपैस्तथोत्तमैः॥२०॥
सरल हिंदी अर्थ: देवी बताती हैं कि उनका यह संपूर्ण माहात्म्य उनके सान्निध्य को प्राप्त कराने वाला है। पशु, पुष्प, अर्घ्य, धूप, सुगंधित पदार्थ और उत्तम दीप आदि से की जाने वाली पूजा भी देवी की उपासना का अंग है।
विप्राणां भोजनैर्होमैः प्रोक्षणीयैरहर्निशम्।
अन्यैश्च विविधैर्भोगैः प्रदानैर्वत्सरेण या॥२१॥
सरल हिंदी अर्थ: ब्राह्मणों को भोजन कराने, हवन करने, पवित्र जल से प्रोक्षण करने तथा विभिन्न प्रकार के भोग और दान अर्पित करने से देवी की पूजा की जाती है।
प्रीतिर्मे क्रियते सास्मिन् सकृत्सुचरिते श्रुते।
श्रुतं हरति पापानि तथाऽऽरोग्यं प्रयच्छति॥२२॥
सरल हिंदी अर्थ: देवी का माहात्म्य एक बार भी श्रद्धापूर्वक और विधिपूर्वक सुन लिया जाए तो देवी प्रसन्न होती हैं। इसके श्रवण से पापों का नाश और आरोग्य की प्राप्ति होने का माहात्म्य में वर्णन है।
रक्षां करोति भूतेभ्यो जन्मनां कीर्तनं मम।
युद्धेषु चरितं यन्मे दुष्टदैत्यनिबर्हणम्॥२३॥
सरल हिंदी अर्थ: देवी के नाम और चरित्र का कीर्तन विभिन्न प्रकार के भय से रक्षा करने वाला बताया गया है। विशेष रूप से युद्ध के समय देवी द्वारा दुष्ट दैत्यों के विनाश का स्मरण साहस प्रदान करता है।
तस्मिञ्छ्रुते वैरिकृतं भयं पुंसां न जायते।
युष्माभिः स्तुतयो याश्च याश्च ब्रह्मर्षिभिः कृताः॥२४॥
सरल हिंदी अर्थ: देवी के उन चरित्रों का श्रवण करने पर मनुष्य को शत्रुओं से उत्पन्न भय नहीं रहता। देवताओं और ब्रह्मर्षियों द्वारा की गई देवी की स्तुतियाँ भी कल्याणकारी हैं।
ब्रह्मणा च कृतास्तास्तु प्रयच्छन्ति शुभां मतिम्।
अरण्ये प्रान्तरे वापि दावाग्निपरिवारितः॥२५॥
सरल हिंदी अर्थ: ब्रह्मा तथा अन्य ऋषियों द्वारा की गई स्तुतियाँ मनुष्य को शुभ बुद्धि प्रदान करती हैं। जंगल या निर्जन स्थान में भी यदि कोई व्यक्ति संकट में पड़ जाए तो देवी का स्मरण उसके लिए आश्रय बनता है।
दस्युभिर्वा वृतः शून्ये गृहीतो वापि शत्रुभिः।
सिंहव्याघ्रानुयातो वा वने वा वनहस्तिभिः॥२६॥
सरल हिंदी अर्थ: यदि कोई व्यक्ति सुनसान स्थान में डाकुओं से घिर जाए, शत्रुओं द्वारा पकड़ लिया जाए, सिंह या बाघ उसका पीछा कर रहे हों अथवा जंगल में जंगली हाथियों से घिर जाए, तब भी देवी के चरित्र का स्मरण संकट से मुक्ति का साधन बताया गया है।
राज्ञा क्रुद्धेन चाज्ञप्तो वध्यो बन्धगतोऽपि वा।
आघूर्णितो वा वातेन स्थितः पोते महार्णवे॥२७॥
सरल हिंदी अर्थ: यदि कोई व्यक्ति क्रोधित राजा के आदेश से दंड का पात्र बन जाए, बंधन में पड़ जाए, तेज हवा के कारण संकट में फँस जाए या विशाल समुद्र में नाव पर विपत्ति में पड़ जाए, तो देवी का स्मरण उसे संकट से बचाने वाला माना गया है।
पतत्सु चापि शस्त्रेषु संग्रामे भृशदारुणे।
सर्वाबाधासु घोरासु वेदनाभ्यर्दितोऽपि वा॥२८॥
सरल हिंदी अर्थ: भयंकर युद्ध में जब चारों ओर अस्त्र-शस्त्र गिर रहे हों या किसी व्यक्ति पर गंभीर संकट और कष्ट आ पड़े, तब भी देवी के चरित्र का स्मरण करने से उसे संकट से निकलने की आशा मिलती है।
स्मरन्ममैतच्चरितं नरो मुच्येत संकटात्।
मम प्रभावात्सिंहाद्या दस्यवो वैरिणस्तथा॥२९॥
सरल हिंदी अर्थ: जो मनुष्य संकट के समय मेरे चरित्र का स्मरण करता है, वह संकट से मुक्त हो जाता है। मेरे प्रभाव से सिंह आदि हिंसक जीव, डाकू और शत्रु भी उससे दूर हो जाते हैं।
दूरादेव पलायन्ते स्मरतश्चरितं मम॥३०॥
सरल हिंदी अर्थ: मेरे चरित्र का स्मरण करने वाले व्यक्ति से संकट उत्पन्न करने वाले शत्रु और भय के कारण दूर से ही भाग जाते हैं।
॥ ऋषिरुवाच ॥३१॥
इत्युक्त्वा सा भगवती चण्डिका चण्डविक्रमा॥३२॥
सरल हिंदी अर्थ: ऋषि कहते हैं कि इस प्रकार कहकर अत्यंत पराक्रमी भगवती चण्डिका ने अपनी बात समाप्त की।
पश्यतामेव देवानां तत्रैवान्तरधीयत।
तेऽपि देवा निरातङ्काः स्वाधिकारान् यथा पुरा॥३३॥
सरल हिंदी अर्थ: सभी देवताओं के देखते-देखते देवी वहीं अंतर्धान हो गईं। इसके बाद देवता भयमुक्त हो गए और पहले की तरह अपने-अपने अधिकार तथा कार्यों का पालन करने लगे।
यज्ञभागभुजः सर्वे चक्रुर्विनिहतारयः।
दैत्याश्च देव्या निहते शुम्भे देवरिपौ युधि॥३४॥
सरल हिंदी अर्थ: देवी द्वारा देवताओं के शत्रुओं का विनाश हो जाने के बाद सभी देवता फिर से यज्ञ में अपना भाग प्राप्त करने लगे। शुम्भ जैसे दैत्य युद्ध में देवी के हाथों मारे जा चुके थे।
जगद्विध्वंसिनि तस्मिन् महोग्रेऽतुलविक्रमे।
निशुम्भे च महावीर्ये शेषाः पातालमाययुः॥३५॥
सरल हिंदी अर्थ: अत्यंत भयंकर और अपार शक्ति वाले शुम्भ तथा महावीर निशुम्भ के मारे जाने के बाद बचे हुए दैत्य पाताल लोक की ओर चले गए।
एवं भगवती देवी सा नित्यापि पुनः पुनः।
सम्भूय कुरुते भूप जगतः परिपालनम्॥३६॥
सरल हिंदी अर्थ: हे राजन्! यद्यपि भगवती देवी सनातन और नित्य हैं, फिर भी वे समय-समय पर विभिन्न रूपों में प्रकट होकर संसार की रक्षा और पालन करती हैं।
तयैतन्मोह्यते विश्वं सैव विश्वं प्रसूयते।
सा याचिता च विज्ञानं तुष्टा ऋद्धिं प्रयच्छति॥३७॥
सरल हिंदी अर्थ: वही देवी अपनी शक्ति से पूरे संसार को मोहित करती हैं और वही इस संसार को उत्पन्न करती हैं। प्रसन्न होकर जब उनकी प्रार्थना की जाती है, तब वे ज्ञान और समृद्धि प्रदान करती हैं।
व्याप्तं तयैतत्सकलं ब्रह्माण्डं मनुजेश्वर।
महाकाल्या महाकाले महामारीस्वरूपया॥३८॥
सरल हिंदी अर्थ: हे मनुष्यों के स्वामी! वही देवी महामाया की शक्ति के रूप में संपूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त हैं और महाकाल के समय में महामारी के स्वरूप में भी प्रकट होती हैं।
सैव काले महामारी सैव सृष्टिर्भवत्यजा।
स्थितिं करोति भूतानां सैव काले सनातनी॥३९॥
सरल हिंदी अर्थ: समय विशेष में वही देवी महामारी का रूप धारण करती हैं और वही अजन्मा शक्ति सृष्टि के रूप में प्रकट होती हैं। वही सनातनी देवी सभी प्राणियों की स्थिति और पालन का कार्य करती हैं।
भवकाले नृणां सैव लक्ष्मीर्वृद्धिप्रदा गृहे।
सैवाभावे तथाऽलक्ष्मीर्विनाशायोपजायते॥४०॥
सरल हिंदी अर्थ: जब मनुष्य के जीवन में समृद्धि का समय आता है, तब वही देवी घर में लक्ष्मी के रूप में प्रकट होकर वृद्धि और सुख प्रदान करती हैं। विपरीत समय में वही शक्ति अलक्ष्मी के रूप में अभाव और विनाश का कारण बनती है।
स्तुता सम्पूजिता पुष्पैर्धूपगन्धादिभिस्तथा।
ददाति वित्तं पुत्रांश्च मतिं धर्मे गतिं शुभाम्॥४१॥
सरल हिंदी अर्थ: जो देवी पुष्प, धूप, सुगंध आदि से श्रद्धापूर्वक पूजित और स्तुति की जाती हैं, वे भक्त को धन, संतान, धर्म में शुभ बुद्धि और कल्याणकारी मार्ग प्रदान करती हैं।
।। श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये फलस्तुतिर्नाम द्वादशोऽध्यायः सम्पूर्णम् ।।
दुर्गा सप्तशती पाठ – बारहवाँ अध्याय हिन्दी में
देवी के चरित्रों के पाठ का माहात्म्य
देवी ने कहा— हे देवताओं! जो मनुष्य श्रद्धा और एकाग्र मन से इन स्तुतियों के द्वारा मेरी आराधना करता है, उसके सभी कष्टों को मैं निश्चित रूप से दूर करती हूँ। मधु-कैटभ, महिषासुर तथा शुम्भ और निशुम्भ के वध से संबंधित मेरे दिव्य चरित्रों का जो भक्त श्रद्धापूर्वक वर्णन करता है या सुनता है, उसे देवी की कृपा प्राप्त होती है। विशेष रूप से अष्टमी, नवमी और चतुर्दशी के दिन मेरे माहात्म्य को ध्यानपूर्वक सुनने वाले भक्त के पाप और उनसे उत्पन्न होने वाली विपत्तियाँ दूर होती हैं। उसके जीवन में दरिद्रता और प्रियजनों से अनावश्यक वियोग का दुःख नहीं रहता तथा वह विभिन्न प्रकार के भय से सुरक्षित रहता है।
इसी कारण मनुष्य को श्रद्धापूर्वक देवी के इस कल्याणकारी माहात्म्य का पाठ और श्रवण करना चाहिए। इसका स्मरण महामारी से उत्पन्न होने वाले संकटों और विभिन्न प्रकार के उत्पातों को शांत करने वाला बताया गया है। जिस घर, मंदिर या अन्य पवित्र स्थान पर देवी के इस माहात्म्य का विधिपूर्वक पाठ किया जाता है, वहाँ देवी की कृपा और उपस्थिति बनी रहती है।
बलि, पूजा, हवन तथा धार्मिक उत्सवों के अवसर पर देवी के चरित्र का पाठ और श्रवण करना चाहिए। भक्त यदि पूजा या हवन की विधि को पूरी तरह जानता हो या अनजाने में कुछ कमी रह जाए, देवी श्रद्धा से किए गए उस पूजन को स्वीकार करती हैं। शरद ऋतु में प्रतिवर्ष होने वाली महापूजा के समय जो व्यक्ति भक्ति के साथ देवी के माहात्म्य को सुनता है, वह अनेक प्रकार की बाधाओं से मुक्त होकर धन, अन्न और संतान आदि से सम्पन्न होने का सौभाग्य प्राप्त करता है।
देवी के माहात्म्य और उनके दिव्य चरित्रों का श्रवण मनुष्य के भीतर निर्भयता उत्पन्न करता है। इससे शत्रुओं के भय से मुक्ति, कल्याण और परिवार में सुख की प्राप्ति होती है। विभिन्न प्रकार के कष्टों, बुरे स्वप्नों और जीवन की परेशानियों को शांत करने में भी इसके श्रवण का विशेष महत्व बताया गया है। बच्चों को प्रभावित करने वाली पारंपरिक रूप से मानी जाने वाली बाधाओं में भी इसे शांति प्रदान करने वाला माना गया है। यदि लोगों के बीच मतभेद या विवाद उत्पन्न हो जाएँ, तो यह आपसी प्रेम और मैत्री स्थापित करने वाला माना गया है।
देवी का यह माहात्म्य भक्त को साहस और सामर्थ्य प्रदान करने वाला है। पशु, पुष्प, अर्घ्य, धूप, सुगंध और दीप आदि से पूजा करने, ब्राह्मणों को भोजन कराने, हवन करने, अभिषेक करने, विभिन्न प्रकार के भोग अर्पित करने तथा दान आदि के माध्यम से देवी की आराधना की जाती है। देवी बताती हैं कि जिस प्रकार इन विधियों से की गई पूजा उन्हें प्रसन्न करती है, उसी प्रकार उनके चरित्र और माहात्म्य को श्रद्धा से सुनने मात्र से भी वे प्रसन्न होती हैं।
देवी के माहात्म्य का श्रवण पापों से मुक्ति और आरोग्य की प्राप्ति का साधन बताया गया है। देवी के प्राकट्य और उनके दिव्य कार्यों का स्मरण विभिन्न प्रकार के दुष्ट प्रभावों से रक्षा करने वाला माना गया है। युद्ध जैसी कठिन परिस्थितियों में देवी द्वारा दैत्यों के विनाश का स्मरण मनुष्य को साहस देता है और शत्रुओं के भय को दूर करता है।
देवी कहती हैं कि देवताओं और ब्रह्माजी द्वारा की गई उनकी स्तुतियाँ भी मनुष्य के लिए शुभ और कल्याणकारी बुद्धि प्रदान करने वाली हैं। यदि कोई व्यक्ति घने जंगल में अकेला हो, सुनसान मार्ग में फँस जाए, चारों ओर दावानल हो, चोरों से घिर जाए या शत्रुओं के हाथों पड़ जाए, तब देवी के चरित्र का स्मरण उसे संकट से निकलने का विश्वास देता है।
यदि जंगल में सिंह, बाघ या जंगली हाथियों जैसे हिंसक जीवों का भय हो, राजा के क्रोध के कारण जीवन पर संकट आ जाए, समुद्र में नाव किसी विपत्ति में फँस जाए, भयंकर युद्ध के बीच व्यक्ति घिर जाए या किसी अन्य गंभीर पीड़ा और बाधा से परेशान हो, तब देवी के चरित्र का श्रद्धापूर्वक स्मरण संकट से मुक्ति का सहारा बनता है।
देवी के प्रभाव से सिंह, चोर और शत्रु जैसे भय उत्पन्न करने वाले तत्व दूर चले जाते हैं और भक्त को हानि पहुँचाने में समर्थ नहीं होते। इस प्रकार देवी का चरित्र कठिन परिस्थितियों में भक्त के लिए आश्वासन और संरक्षण का आधार बनता है।
महर्षि ने कहा— अत्यंत प्रचंड पराक्रम वाली भगवती चण्डिका ने इस प्रकार देवताओं को आश्वासन देने के बाद उनके देखते-देखते वहाँ से अंतर्धान कर लिया। देवी के द्वारा देवताओं के शत्रुओं का विनाश हो जाने के बाद सभी देवता भयमुक्त होकर फिर से अपने-अपने अधिकारों में स्थापित हुए और पहले की तरह यज्ञ में मिलने वाले अपने भाग को प्राप्त करने लगे।
युद्ध में शुम्भ और निशुम्भ के देवी के हाथों मारे जाने के बाद बचे हुए दैत्य पाताल लोक की ओर चले गए। हे राजन्! इस प्रकार भगवती अम्बिका नित्य और सनातन होते हुए भी समय-समय पर विभिन्न रूपों में प्रकट होकर संसार की रक्षा करती हैं। वही अपनी शक्ति से संसार को मोहित करती हैं, उसी से सृष्टि की उत्पत्ति होती है और प्रसन्न होकर प्रार्थना करने वाले भक्त को समृद्धि प्रदान करती हैं।
हे राजन्! महाप्रलय के समय वही भगवती महामारी के रूप में प्रकट होती हैं और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त रहती हैं। समय और परिस्थिति के अनुसार वही शक्ति महाकाली तथा महामारी आदि रूपों में दिखाई देती है। अजन्मा होते हुए भी वही देवी सृष्टि के रूप में प्रकट होकर संसार के प्राणियों का पालन करती हैं।
मनुष्य के उन्नति और समृद्धि के समय वही देवी उसके घर में लक्ष्मी के रूप में निवास करती हैं और सुख-संपन्नता बढ़ाती हैं। इसके विपरीत अभाव और विपरीत परिस्थितियों में वही शक्ति दरिद्रता के रूप में दिखाई देकर विनाश का कारण बनती है। पुष्प, धूप, सुगंध आदि से देवी की श्रद्धापूर्वक पूजा और स्तुति करने पर वे भक्त को धन, संतान तथा धर्म के मार्ग पर चलने वाली शुभ बुद्धि प्रदान करती हैं।
दुर्गा सप्तशती के बारहवें अध्याय का महत्व
दुर्गा सप्तशती का बारहवाँ अध्याय मुख्य रूप से देवी माहात्म्य के फल को बताता है। इसमें देवी स्वयं अपने चरित्र, स्तुति और माहात्म्य के श्रवण-पाठ से मिलने वाले लाभों का वर्णन करती हैं।
इस अध्याय में विशेष रूप से अष्टमी, नवमी और चतुर्दशी के अवसर पर देवी माहात्म्य के श्रवण का उल्लेख मिलता है। शरद ऋतु की वार्षिक महापूजा में भी देवी के चरित्र को श्रद्धा से सुनने का महत्व बताया गया है।
अध्याय में यह भाव प्रमुख है कि कठिन परिस्थितियों में मनुष्य को भय के बजाय देवी का स्मरण करना चाहिए। देवी को संसार की उत्पत्ति, पालन और विभिन्न परिस्थितियों में प्रकट होने वाली सनातन शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
बारहवाँ अध्याय कब पढ़ना चाहिए?
दुर्गा सप्तशती के बारहवें अध्याय का पाठ नवरात्रि, दुर्गा पूजा तथा देवी की नियमित आराधना के समय किया जा सकता है। अष्टमी, नवमी और चतुर्दशी के दिन इसके श्रवण का विशेष उल्लेख अध्याय में मिलता है।
यदि कोई व्यक्ति पूरी दुर्गा सप्तशती का पाठ कर रहा है, तो इस अध्याय को निर्धारित क्रम के अनुसार पढ़ना चाहिए। पाठ करते समय उच्चारण की शुद्धता, श्रद्धा और एकाग्रता का ध्यान रखना महत्वपूर्ण है।
बारहवें अध्याय का सरल संदेश
बारहवें अध्याय का मुख्य संदेश यह है कि देवी केवल किसी एक रूप या एक समय तक सीमित नहीं हैं। वे सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और परिवर्तन के पीछे स्थित सनातन शक्ति के रूप में वर्णित हैं।
देवी का स्मरण भक्त के भीतर साहस, श्रद्धा और विश्वास उत्पन्न करता है। इसलिए दुर्गा सप्तशती के इस अध्याय में देवी के माहात्म्य को पढ़ने और सुनने को विशेष महत्व दिया गया है।
निष्कर्ष
दुर्गा सप्तशती का बारहवाँ अध्याय देवी के माहात्म्य और उसके श्रवण-पाठ के फल का विस्तृत वर्णन करता है। इसमें देवी अपने भक्तों को विभिन्न प्रकार के संकटों में संरक्षण देने वाली शक्ति के रूप में प्रकट होती हैं। साथ ही यह अध्याय बताता है कि देवी ही संसार की उत्पत्ति, पालन और परिवर्तन की सनातन शक्ति हैं।
श्रद्धा और एकाग्रता से दुर्गा सप्तशती का पाठ करने वाला साधक देवी की उपासना के माध्यम से अपने जीवन में साहस, भक्ति और सकारात्मक भाव को मजबूत कर सकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती का बारहवाँ अध्याय किस नाम से जाना जाता है?
दुर्गा सप्तशती का बारहवाँ अध्याय फलस्तुति के नाम से प्रसिद्ध है। इसमें देवी के माहात्म्य के पाठ और श्रवण से प्राप्त होने वाले फलों का वर्णन किया गया है।
दुर्गा सप्तशती के बारहवें अध्याय में क्या बताया गया है?
इस अध्याय में देवी के माहात्म्य का पाठ और श्रवण करने के लाभ, संकटों में देवी के स्मरण का महत्व तथा देवी के विभिन्न स्वरूपों द्वारा संसार के पालन का वर्णन मिलता है।
बारहवाँ अध्याय कब पढ़ना चाहिए?
इसे दुर्गा सप्तशती के नियमित पाठ के क्रम में पढ़ा जा सकता है। अध्याय में अष्टमी, नवमी और चतुर्दशी के दिन देवी माहात्म्य सुनने का विशेष उल्लेख मिलता है।
क्या बारहवाँ अध्याय अकेले पढ़ सकते हैं?
हाँ, देवी की श्रद्धापूर्वक उपासना के अंतर्गत इस अध्याय का पाठ या श्रवण किया जा सकता है। यदि संपूर्ण दुर्गा सप्तशती का पाठ किया जा रहा हो तो अध्यायों को निर्धारित क्रम में पढ़ना उचित है।
बारहवें अध्याय में देवी के किस स्वरूप का वर्णन मिलता है?
इस अध्याय में देवी को संसार को उत्पन्न करने वाली, उसका पालन करने वाली तथा समय के अनुसार विभिन्न रूप धारण करने वाली सनातन शक्ति के रूप में वर्णित किया गया है।
दुर्गा सप्तशती के बारहवें अध्याय का मुख्य संदेश क्या है?
इस अध्याय का मुख्य संदेश देवी की शक्ति, उनके माहात्म्य और संकट के समय उनके स्मरण की महत्ता को समझना है। इसमें भक्त के लिए श्रद्धा, भक्ति और देवी के प्रति विश्वास को महत्वपूर्ण बताया गया है।
