दुर्गा सप्तशती पाँचवाँ अध्याय
देवताओं द्वारा देवी की स्तुति, कौशिकी देवी का प्रकट होना और शुम्भ के दूत का देवी के पास जाना
दुर्गा सप्तशती के पाँचवें अध्याय में देवताओं द्वारा देवी भगवती की विस्तृत स्तुति की जाती है। इसी अध्याय में “या देवी सर्वभूतेषु…” के प्रसिद्ध मंत्र आते हैं, जिनमें देवी को चेतना, बुद्धि, निद्रा, शक्ति, क्षमा, शांति, श्रद्धा, दया, मातृभाव और अनेक रूपों में सभी प्राणियों के भीतर स्थित बताया गया है।
इसके बाद पार्वती के शरीर से कौशिकी देवी के प्रकट होने का वर्णन आता है। देवी के अद्भुत स्वरूप को देखकर चण्ड और मुण्ड शुम्भ को उनके बारे में बताते हैं। देवी के सौंदर्य और दिव्य शक्ति का वर्णन सुनकर शुम्भ अपने दूत सुग्रीव को देवी के पास भेजता है।
दूत देवी से शुम्भ और निशुम्भ की शक्ति तथा ऐश्वर्य का वर्णन करते हुए उनसे शुम्भ या निशुम्भ में से किसी एक को पति के रूप में स्वीकार करने के लिए कहता है। देवी शांत भाव से उत्तर देती हैं कि उन्होंने पहले ही यह प्रतिज्ञा की है कि जो उन्हें युद्ध में पराजित करेगा, वही उनका पति होगा। इस प्रकार इस अध्याय में देवी की प्रतिज्ञा और शुम्भ के दूत के साथ उनका संवाद सामने आता है।
श्रीदुर्गासप्तशती — पञ्चम अध्याय
देव्या दूतसंवादो नाम पञ्चमोऽध्यायः
॥ विनियोगः ॥
ॐ अस्य श्रीउत्तरचरित्रस्य रुद्र ऋषिः, महासरस्वती देवता, अनुष्टुप् छन्दः, भीमा शक्तिः, भ्रामरी बीजम्, सूर्यतत्त्वम्, सामवेदः स्वरूपम्, महासरस्वतीप्रीत्यर्थे उत्तरचरित्रपाठे विनियोगः।
॥ ध्यानम् ॥
ॐ घण्टाशूलहलानि शङ्खमुसले चक्रं धनुः सायकं
हस्ताब्जैर्दधतीं घनान्तविलसच्छीतांशुतुल्यप्रभाम्।
गौरीदेहसमुद्भवां त्रिजगतामाधारभूतां महा-
पूर्वामत्र सरस्वतीमनुभजे शुम्भादिदैत्यार्दिनीम्॥
अर्थ: मैं उन महासरस्वती देवी का ध्यान करता हूँ, जो अपने कमल के समान हाथों में घंटा, त्रिशूल, हल, शंख, मूसल, चक्र, धनुष और बाण धारण करती हैं। जिनकी आभा बादलों से मुक्त चंद्रमा के समान उज्ज्वल है, जो गौरी के शरीर से प्रकट हुई हैं, तीनों लोकों का आधार हैं और शुम्भ आदि दैत्यों का नाश करने वाली हैं।
देवताओं की परेशानी और देवी का स्मरण
ॐ क्लीं ऋषिरुवाच॥ १॥
पुरा शुम्भनिशुम्भाभ्यामसुराभ्यां शचीपतेः।
त्रैलोक्यं यज्ञभागांश्च हृता मदबलाश्रयात्॥ २॥
बहुत पहले शुम्भ और निशुम्भ नाम के दोनों असुरों ने अपने बल और अहंकार के सहारे इन्द्र से तीनों लोक और यज्ञों में मिलने वाले उनके भाग को छीन लिया था।
तावेव सूर्यतां तद्वदधिकारं तथैन्दवम्।
कौबेरमथ याम्यं च चक्राते वरुणस्य च॥ ३॥
उन्होंने सूर्य और चंद्रमा के अधिकार भी अपने हाथ में कर लिए। इसी प्रकार कुबेर, यम और वरुण के अधिकार भी उन्होंने अपने अधीन कर लिए।
तावेव पवनर्द्धिं च चक्रतुर्वह्निकर्म च।
ततो देवा विनिर्धूता भ्रष्टराज्याः पराजिताः॥ ४॥
उन्होंने वायु के अधिकार और अग्नि के कार्यों पर भी अधिकार कर लिया। इस प्रकार देवताओं को उनके स्थान से हटा दिया गया और वे अपने राज्य से वंचित होकर पराजित हो गए।
हृताधिकारास्त्रिदशास्ताभ्यां सर्वे निराकृताः।
महासुराभ्यां तां देवीं संस्मरन्त्यपराजिताम्॥ ५॥
इस प्रकार सभी देवता अपने अधिकारों से वंचित कर दिए गए। तब उन सभी ने उस अपराजिता देवी का स्मरण किया, जिन्होंने पहले संकट के समय उनकी रक्षा करने का आश्वासन दिया था।
तयास्माकं वरो दत्तो यथापत्सु स्मृताखिलाः।
भवतां नाशयिष्यामि तत्क्षणात्परमापदः॥ ६॥
देवी ने उन्हें वर दिया था कि जब भी वे संकट में उनका स्मरण करेंगे, देवी उसी समय उनके बड़े से बड़े संकट को दूर कर देंगी।
इति कृत्वा मतिं देवा हिमवन्तं नगेश्वरम्।
जग्मुस्तत्र ततो देवीं विष्णुमायां प्रतुष्टुवुः॥ ७॥
यह निश्चय करके देवता पर्वतराज हिमालय के पास गए और वहाँ उन्होंने भगवान विष्णु की माया स्वरूप देवी की स्तुति की।
देवताओं द्वारा देवी की स्तुति
देवा ऊचुः॥ ८॥
नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम्॥ ९॥
देवताओं ने कहा—हे देवी! हे महादेवी! आपको बार-बार नमस्कार है। हे कल्याणमयी देवी! हे प्रकृति स्वरूपा भगवती! हम आपको श्रद्धापूर्वक प्रणाम करते हैं।
रौद्रायै नमो नित्यायै गौर्यै धात्र्यै नमो नमः।
ज्योत्स्नायै चेन्दुरूपिण्यै सुखायै सततं नमः॥ १०॥
रौद्र रूप वाली देवी को नमस्कार है। नित्य स्वरूपा गौरी और सबका पालन करने वाली देवी को बार-बार प्रणाम है। चंद्रमा की उज्ज्वल चांदनी जैसी देवी तथा सुख देने वाली भगवती को नमस्कार है।
कल्याण्यै प्रणतां वृद्ध्यै सिद्ध्यै कुर्मो नमो नमः।
नैरृत्यै भूभृतां लक्ष्म्यै शर्वाण्यै ते नमो नमः॥ ११॥
कल्याण देने वाली, वृद्धि प्रदान करने वाली और सिद्धि देने वाली देवी को हम बार-बार प्रणाम करते हैं। नैरृति रूप वाली, पर्वतों में स्थित लक्ष्मी स्वरूपा और भगवान शंकर की शक्ति देवी को नमस्कार है।
दुर्गायै दुर्गपारायै सारायै सर्वकारिण्यै।
ख्यात्यै तथैव कृष्णायै धूम्रायै सततं नमः॥ १२॥
दुर्गा देवी को नमस्कार है, जो कठिनाइयों से पार लगाने वाली हैं। सब कार्यों का मूल कारण और सबमें प्रसिद्ध देवी को नमस्कार है। कृष्णा और धूम्रा स्वरूप वाली देवी को भी बार-बार प्रणाम है।
अतिसौम्यातिरौद्रायै नतास्तस्यै नमो नमः।
नमो जगत्प्रतिष्ठायै देव्यै कृत्यै नमो नमः॥ १३॥
अत्यंत सौम्य और अत्यंत रौद्र दोनों रूपों वाली देवी को बार-बार प्रणाम है। जो पूरे जगत का आधार हैं और समस्त कार्यों को करने वाली हैं, उन देवी को नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु स्तुति
या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ १४–१६॥
जो देवी सभी प्राणियों में विष्णुमाया के रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ १७–१९॥
जो देवी सभी प्राणियों में चेतना के रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ २०–२२॥
जो देवी सभी प्राणियों में बुद्धि के रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु निद्रारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ २३–२५॥
जो देवी सभी प्राणियों में निद्रा के रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु क्षुधारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ २६–२८॥
जो देवी सभी प्राणियों में भूख के रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु छायारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ २९–३१॥
जो देवी सभी प्राणियों में छाया के रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ ३२–३४॥
जो देवी सभी प्राणियों में शक्ति के रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु तृष्णारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ ३५–३७॥
जो देवी सभी प्राणियों में तृष्णा के रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु क्षान्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ ३८–४०॥
जो देवी सभी प्राणियों में क्षमा के रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु जातिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ ४१–४३॥
जो देवी सभी प्राणियों में जन्म और जाति के रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु लज्जारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ ४४–४६॥
जो देवी सभी प्राणियों में लज्जा के रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु शान्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ ४७–४९॥
जो देवी सभी प्राणियों में शांति के रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ ५०–५२॥
जो देवी सभी प्राणियों में श्रद्धा के रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु कान्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ ५३–५५॥
जो देवी सभी प्राणियों में कांति के रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ ५६–५८॥
जो देवी सभी प्राणियों में लक्ष्मी के रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु वृत्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ ५९–६१॥
जो देवी सभी प्राणियों में जीवन-यापन की वृत्ति के रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु स्मृतिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ ६२–६४॥
जो देवी सभी प्राणियों में स्मृति के रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ ६५–६७॥
जो देवी सभी प्राणियों में दया के रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु तुष्टिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ ६८–७०॥
जो देवी सभी प्राणियों में संतोष के रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ ७१–७३॥
जो देवी सभी प्राणियों में माता के रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु भ्रान्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ ७४–७६॥
जो देवी सभी प्राणियों में भ्रम के रूप में भी स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है।
इन्द्रियाणामधिष्ठात्री भूतानां चाखिलेषु या।
भूतेषु सततं तस्यै व्याप्तिदेव्यै नमो नमः॥ ७७॥
जो देवी सभी इंद्रियों की अधिष्ठात्री हैं और समस्त प्राणियों में व्याप्त हैं, उन व्याप्ति स्वरूपा देवी को बार-बार नमस्कार है।
चितिरूपेण या कृत्स्नमेतद् व्याप्य स्थिता जगत्।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ ७८–८०॥
जो देवी चेतना के रूप में पूरे संसार में व्याप्त होकर स्थित हैं, उन देवी को बार-बार नमस्कार है।
देवताओं की प्रार्थना
स्तुता सुरैः पूर्वमभीष्टसंश्रयात्तथा सुरेन्द्रेण दिनेषु सेविता।
करोतु सा नः शुभहेतुरीश्वरी शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापदः॥ ८१॥
देवताओं ने कहा कि जिन देवी की पहले भी देवताओं ने अपनी इच्छा की पूर्ति के लिए स्तुति की थी और देवराज इन्द्र ने जिनकी आराधना की थी, वे जगदम्बा हमारे लिए कल्याण का कारण बनें और हमारी सभी विपत्तियों को दूर करें।
या साम्प्रतं चोद्धतदैत्यतापितैरस्माभिरीशा च सुरैर्नमस्यते।
या च स्मृता तत्क्षणमेव हन्ति नः सर्वापदो भक्तिविनम्रमूर्तिभिः॥ ८२॥
जो देवी इस समय अहंकारी दैत्यों से पीड़ित हम देवताओं द्वारा भी नमस्कार की जा रही हैं, और जिनका स्मरण करते ही भक्तिभाव से झुके हुए भक्तों की सभी विपत्तियाँ तुरंत दूर हो जाती हैं, वे देवी हमारी रक्षा करें।
कौशिकी देवी का प्रकट होना
ऋषिरुवाच॥ ८३॥
एवं स्तवादियुक्तानां देवानां तत्र पार्वती।
स्नातुमभ्याययौ तोये जाह्नव्या नृपनन्दन॥ ८४॥
ऋषि ने कहा—हे राजनन्दन! जब देवता इस प्रकार देवी की स्तुति कर रहे थे, उसी समय पार्वती देवी गंगाजी के जल में स्नान करने के लिए वहाँ आईं।
साब्रवीत्तान् सुरान् सुभ्रूर्भवद्भिः स्तूयतेऽत्र का।
शरीरकोशतश्चास्या समुद्भूताब्रवीच्छिवा॥ ८५॥
पार्वती ने देवताओं से पूछा—आप लोग यहाँ किस देवी की स्तुति कर रहे हैं? उसी समय उनके शरीर के आवरण से एक दिव्य देवी प्रकट हुईं और उन्होंने कहा कि देवता मेरी ही स्तुति कर रहे हैं।
स्तोत्रं ममैतत् क्रियते शुम्भदैत्यनिराकृतैः।
देवैः समेतैः समरे निशुम्भेन पराजितैः॥ ८६॥
देवताओं ने कहा कि शुम्भ और निशुम्भ जैसे दैत्यों से पराजित होकर वे देवी की स्तुति कर रहे हैं।
शरीरकोशाद्यत्तस्याः पार्वत्या निःसृताम्बिका।
कौशिकीति समस्तेषु ततो लोकेषु गीयते॥ ८७॥
पार्वती के शरीर के आवरण से जो देवी प्रकट हुईं, वे कौशिकी नाम से संसार में प्रसिद्ध हुईं।
तस्यां विनिर्गतायां तु कृष्णाभूत्सापि पार्वती।
कालिकेति समाख्याता हिमाचलकृताश्रया॥ ८८॥
जब कौशिकी देवी पार्वती के शरीर से बाहर प्रकट हुईं, तब पार्वती का स्वरूप कृष्णवर्ण हो गया और वे कालिका नाम से प्रसिद्ध हुईं। उन्होंने हिमालय को अपना निवास बनाया।
चण्ड और मुण्ड ने देवी को देखा
ततोऽम्बिकां परं रूपं बिभ्राणां सुमनोहरम्।
ददर्श चण्डो मुण्डश्च भृत्यौ शुम्भनिशुम्भयोः॥ ८९॥
इसके बाद शुम्भ और निशुम्भ के सेवक चण्ड और मुण्ड ने अत्यंत सुंदर और मन को मोह लेने वाले रूप में स्थित अम्बिका देवी को देखा।
ताभ्यां शुम्भाय चाख्याता अतीव सुमनोहरा।
काप्यास्ते स्त्री महाराज भासयन्ती हिमाचलम्॥ ९०॥
उन्होंने शुम्भ को बताया कि हे महाराज! हिमालय को प्रकाशित करती हुई एक अत्यंत सुंदर स्त्री वहाँ विराजमान हैं।
नैव तादृक् क्वचिद्रूपं दृष्टं केनचिदुत्तमम्।
ज्ञायतां काप्यसौ देवी गृह्यतां चासुरेश्वर॥ ९१॥
उन्होंने कहा कि ऐसा अद्भुत रूप उन्होंने पहले कहीं नहीं देखा। हे असुरराज! पता लगाइए कि वह देवी कौन हैं और उन्हें अपने अधिकार में ले आइए।
स्त्रीरत्नमतिचार्वङ्गी द्योतयन्ती दिशस्त्विषा।
सा तु तिष्ठति दैत्येन्द्र तां भवान् द्रष्टुमर्हति॥ ९२॥
उन्होंने कहा कि वह स्त्री अत्यंत सुंदर और दिव्य आभा से चारों दिशाओं को प्रकाशित कर रही हैं। हे दैत्यराज! आपको स्वयं जाकर उन्हें देखना चाहिए।
शुम्भ के ऐश्वर्य का वर्णन
यानि रत्नानि मणयो गजाश्वादीनि वै प्रभो।
त्रैलोक्ये तु समस्तानि साम्प्रतं भान्ति ते गृहे॥ ९३॥
चण्ड और मुण्ड ने कहा कि तीनों लोकों में जितने भी श्रेष्ठ रत्न, मणियाँ, हाथी, घोड़े आदि प्रसिद्ध हैं, वे इस समय आपके भवन में शोभा बढ़ा रहे हैं।
ऐरावतः समानीतो गजरत्नं पुरन्दरात्।
पारिजाततरुश्चायं तथैवोच्चैःश्रवा हयः॥ ९४॥
इन्द्र का श्रेष्ठ हाथी ऐरावत भी आपके पास लाया गया है। पारिजात वृक्ष और उच्चैःश्रवा नामक श्रेष्ठ घोड़ा भी आपके पास है।
विमानं हंससंयुक्तमेतत्तिष्ठति तेऽङ्गणे।
रत्नभूतमिहानीतं यदासीद्वेधसोऽद्भुतम्॥ ९५॥
हंसों से जुड़ा हुआ अद्भुत विमान भी आपके आंगन में खड़ा है, जो पहले ब्रह्मा के पास था और अत्यंत मूल्यवान माना जाता था।
निधिरेष महापद्मः समानीतो धनेश्वरात्।
किञ्जल्किनीं ददौ चाब्धिर्मालामम्लानपङ्कजाम्॥ ९६॥
कुबेर से महापद्म नामक निधि भी आपके पास लाई गई है। समुद्र ने कभी न मुरझाने वाले कमल की सुंदर माला भी आपको दी है।
छत्रं ते वारुणं गेहे काञ्चनस्रावि तिष्ठति।
तथायं स्यन्दनवरो यः पुरासीत्प्रजापतेः॥ ९७॥
वरुण का स्वर्ण प्रदान करने वाला छत्र आपके भवन में स्थित है। प्रजापति का श्रेष्ठ रथ भी आपके पास है।
मृत्योरुत्क्रान्तिदा नाम शक्तिरीश त्वया हृता।
पाशः सलिलराजस्य भ्रातुस्तव परिग्रहे॥ ९८॥
मृत्यु से बाहर निकालने वाली शक्ति भी आपके अधिकार में है और जल के राजा वरुण का पाश भी आपके पास है।
निशुम्भस्याब्धिजाताश्च समस्ता रत्नजातयः।
वह्निरपि ददौ तुभ्यमग्निशौचे च वाससी॥ ९९॥
समुद्र से उत्पन्न होने वाले अनेक प्रकार के रत्न भी आपके भाई निशुम्भ के अधिकार में हैं। अग्नि ने भी आपको अग्नि के समान शुद्ध और तेजस्वी वस्त्र दिए हैं।
एवं दैत्येन्द्र रत्नानि समस्तान्याहृतानि ते।
स्त्रीरत्नमेषा कल्याणी त्वया कस्मान्न गृह्यते॥ १००॥
इस प्रकार तीनों लोकों के सभी श्रेष्ठ रत्न आपके पास आ चुके हैं। फिर यह अत्यंत सुंदर और श्रेष्ठ स्त्री आपके अधिकार में क्यों नहीं है?
शुम्भ ने सुग्रीव को दूत बनाकर भेजा
ऋषिरुवाच॥ १०१॥
निशम्येति वचः शुम्भः स तदा चण्डमुण्डयोः।
प्रेषयामास सुग्रीवं दूतं देव्या महासुरम्॥ १०२॥
ऋषि ने कहा—चण्ड और मुण्ड की बातें सुनकर शुम्भ ने सुग्रीव नामक एक शक्तिशाली असुर को देवी के पास अपना दूत बनाकर भेजा।
इति चेति च वक्तव्या सा गत्वा वचनान्मम।
यथा चाभ्येति सम्प्रीत्या तथा कार्यं त्वया लघु॥ १०३॥
शुम्भ ने दूत से कहा कि तुम देवी के पास जाकर मेरी ओर से ये बातें कहना और उन्हें इस प्रकार समझाना कि वे प्रसन्न होकर मेरे पास आने के लिए तैयार हो जाएँ।
स तत्र गत्वा यत्रास्ते शैलोद्देशेऽतिशोभने।
सा देवी तां ततः प्राह श्लक्ष्णं मधुरया गिरा॥ १०४॥
दूत उस सुंदर पर्वतीय स्थान पर पहुँचा जहाँ देवी विराजमान थीं और उसने मधुर वाणी में उनसे बात करनी शुरू की।
शुम्भ के दूत का देवी से संवाद
दूत उवाच॥ १०५॥
देवि दैत्येश्वरः शुम्भस्त्रैलोक्ये परमेश्वरः।
दूतोऽहं प्रेषितस्तेन त्वत्सकाशमिहागतः॥ १०६॥
दूत ने कहा—हे देवी! दैत्यराज शुम्भ तीनों लोकों के स्वामी हैं। उन्होंने मुझे आपके पास अपना दूत बनाकर भेजा है।
अव्याहताज्ञः सर्वासु यः सदा देवयोनिषु।
निर्जिताखिलदैत्यारिः स यदाह शृणुष्व तत्॥ १०७॥
उनकी आज्ञा सभी देव शक्तियों और लोकों में चलती है। उन्होंने सभी शत्रुओं को पराजित किया है। उन्होंने जो संदेश आपके लिए भेजा है, उसे सुनिए।
मम त्रैलोक्यमखिलं मम देवा वशानुगाः।
यज्ञभागानहं सर्वानुपाश्नामि पृथक् पृथक्॥ १०८॥
शुम्भ कहते हैं कि तीनों लोक मेरे अधिकार में हैं और सभी देवता मेरे अधीन हैं। यज्ञों में मिलने वाले सभी भागों को मैं ही प्राप्त करता हूँ।
त्रैलोक्ये वररत्नानि मम वश्यान्यशेषतः।
तथैव गजरत्नं च हृत्वा देवेन्द्रवाहनम्॥ १०९॥
तीनों लोकों के सभी श्रेष्ठ रत्न मेरे अधिकार में हैं। देवराज इन्द्र का श्रेष्ठ हाथी भी मैंने अपने अधिकार में कर लिया है।
क्षीरोदमथनोद्भूतमश्वरत्नं ममामरैः।
उच्चैःश्रवससंज्ञं तत्प्रणिपत्य समर्पितम्॥ ११०॥
क्षीरसागर के मंथन से उत्पन्न श्रेष्ठ घोड़ा उच्चैःश्रवा भी देवताओं ने मेरे सामने समर्पित कर दिया है।
यानि चान्यानि देवेषु गन्धर्वेषूरगेषु च।
रत्नभूतानि भूतानि तानि मय्येव शोभने॥ १११॥
देवताओं, गंधर्वों और नागों के पास जो भी श्रेष्ठ वस्तुएँ और रत्न हैं, वे सब मेरे अधिकार में हैं।
स्त्रीरत्नभूतां त्वां देवि लोके मन्यामहे वयम्।
सा त्वमस्मानुपागच्छ यतो रत्नभुजो वयम्॥ ११२॥
हे देवी! हम आपको संसार की श्रेष्ठ स्त्रियों में एक श्रेष्ठ रत्न मानते हैं। इसलिए आप हमारे पास आ जाइए, क्योंकि हम सभी श्रेष्ठ रत्नों के स्वामी हैं।
मां वा ममानुजं वापि निशुम्भमुरुविक्रमम्।
भज त्वं च चञ्चलापाङ्गि रत्नभूतासि वै यतः॥ ११३॥
हे सुंदर नेत्रों वाली देवी! आप मुझे या मेरे अत्यंत शक्तिशाली भाई निशुम्भ को पति के रूप में स्वीकार कर लें, क्योंकि आप स्वयं भी एक श्रेष्ठ रत्न हैं।
परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यसे मत्परिग्रहात्।
एतद् बुद्ध्या समालोच्य मत्परिग्रहतां व्रज॥ ११४॥
मेरे साथ रहने से आपको अतुलनीय ऐश्वर्य प्राप्त होगा। इसलिए इन बातों पर विचार करके मेरे साथ रहने के लिए तैयार हो जाइए।
देवी का उत्तर
ऋषिरुवाच॥ ११५॥
इत्युक्ता सा तदा देवी गम्भीरान्तःस्मिता जगौ।
दुर्गा भगवती भद्रा ययेदं धार्यते जगत्॥ ११६॥
ऋषि ने कहा—दूत की बातें सुनकर जगत को धारण करने वाली दुर्गा भगवती ने गंभीर भाव से मंद मुस्कान के साथ उत्तर दिया।
देव्युवाच॥ ११७॥
सत्यमुक्तं त्वया नात्र मिथ्या किञ्चित्त्वयोदितम्।
त्रैलोक्याधिपतिः शुम्भो निशुम्भश्चापि तादृशः॥ ११८॥
देवी ने कहा—तुमने जो कहा है, उसमें कोई असत्य बात नहीं है। शुम्भ तीनों लोकों के स्वामी हैं और निशुम्भ भी महान शक्तिशाली है।
किं त्वत्र यत्प्रतिज्ञातं मिथ्या तत्क्रियते कथम्।
श्रूयतामल्पबुद्धित्वात्प्रतिज्ञा या कृता पुरा॥ ११९॥
लेकिन मैंने पहले जो प्रतिज्ञा की है, उसे मैं झूठा कैसे कर सकती हूँ? मेरी प्रतिज्ञा क्या है, वह सुनो।
यो मां जयति सङ्ग्रामे यो मे दर्पं व्यपोहति।
यो मे प्रतिबलो लोके स मे भर्ता भविष्यति॥ १२०॥
जो मुझे युद्ध में पराजित करेगा, जो मेरे गर्व को युद्ध में समाप्त करेगा और जो संसार में मेरे समान शक्तिशाली सिद्ध होगा, वही मेरा पति बनेगा।
तदागच्छतु शुम्भोऽत्र निशुम्भो वा महाबलः।
मां जित्वा किं चिरेणात्र पाणिं गृह्णातु मे लघु॥ १२१॥
इसलिए शुम्भ या निशुम्भ में से जो भी स्वयं को इतना शक्तिशाली मानता है, वह यहाँ आए, मुझे युद्ध में पराजित करे और बिना देर किए मेरा हाथ स्वीकार करे।
दूत का अहंकारपूर्ण उत्तर
दूत उवाच॥ १२२॥
अवलिप्तासि मैवं त्वं देवि ब्रूहि ममाग्रतः।
त्रैलोक्ये कः पुमांस्तिष्ठेदग्रे शुम्भनिशुम्भयोः॥ १२३॥
दूत ने कहा—हे देवी! तुम बहुत अभिमान से बोल रही हो। तीनों लोकों में ऐसा कौन पुरुष है जो शुम्भ और निशुम्भ के सामने खड़ा होने का साहस कर सकता है?
अन्येषामपि दैत्यानां सर्वे देवा न वै युधि।
तिष्ठन्ति सम्मुखे देवि किं पुनः स्त्री त्वमेकिका॥ १२४॥
हे देवी! अन्य शक्तिशाली दैत्यों के सामने भी देवता युद्ध में टिक नहीं पाते। फिर तुम तो अकेली स्त्री हो, तुम शुम्भ और निशुम्भ के सामने कैसे खड़ी हो सकती हो?
इन्द्राद्याः सकला देवास्तस्थुर्येषां न संयुगे।
शुम्भादीनां कथं तेषां स्त्री प्रयास्यसि सम्मुखम्॥ १२५॥
जिन शुम्भ और निशुम्भ के सामने इन्द्र सहित सभी देवता युद्ध में टिक नहीं सके, उनके सामने तुम अकेली कैसे युद्ध करने का प्रयास करोगी?
सा त्वं गच्छ मयैवोक्ता पार्श्वं शुम्भनिशुम्भयोः।
केशाकर्षणनिर्धूतगौरवा मा गमिष्यसि॥ १२६॥
इसलिए मेरी बात मानकर शुम्भ और निशुम्भ के पास चली जाओ। ऐसा न हो कि युद्ध में तुम्हारा सम्मान बलपूर्वक छीनकर तुम्हें वहाँ ले जाना पड़े।
देवी ने अपनी प्रतिज्ञा दोहराई
देव्युवाच॥ १२७॥
एवमेतद् बली शुम्भो निशुम्भश्चापितादृशः।
किं करोमि प्रतिज्ञा मे यदनालोचिता पुरा॥ १२८॥
देवी ने कहा—हाँ, शुम्भ शक्तिशाली है और निशुम्भ भी बहुत बलवान है। लेकिन मैं क्या करूँ? मैंने पहले बिना पूरी तरह विचार किए जो प्रतिज्ञा कर दी है, उसे तो निभाना ही होगा।
स त्वं गच्छ मयोक्तं ते यदेतत्सर्वमादृतः।
तदाचक्ष्वासुरेन्द्राय स च युक्तं करोतु यत्॥ १२९॥
इसलिए तुम वापस जाओ और मैंने जो कुछ कहा है, वह सब असुरराज शुम्भ को बता दो। इसके बाद उन्हें जो उचित लगे, वे वही करें।
॥ पञ्चम अध्याय का समापन ॥
॥ स्वस्ति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये देव्या दूतसंवादो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥
इस प्रकार श्रीमार्कण्डेय पुराण के सावर्णिक मन्वन्तर में देवीमाहात्म्य का “देव्या दूतसंवाद” नामक पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।
पाँचवें अध्याय की कथा का सार
दुर्गा सप्तशती के पाँचवें अध्याय की शुरुआत शुम्भ और निशुम्भ द्वारा देवताओं के अधिकार छीन लिए जाने से होती है। पराजित देवता देवी भगवती का स्मरण करते हैं और हिमालय पर जाकर उनकी स्तुति करते हैं।
देवताओं की स्तुति में देवी को केवल एक बाहरी शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि प्रत्येक प्राणी के भीतर अलग-अलग रूपों में स्थित बताया गया है। चेतना, बुद्धि, निद्रा, भूख, छाया, शक्ति, तृष्णा, क्षमा, शांति, श्रद्धा, कांति, लक्ष्मी, स्मृति, दया, संतोष और मातृभाव जैसे अनेक रूपों में देवी की उपस्थिति का वर्णन इसी अध्याय में मिलता है।
इसके बाद पार्वती देवी वहाँ आती हैं। उनके शरीर से कौशिकी देवी के प्रकट होने का वर्णन किया गया है। कौशिकी के अलग होने के बाद पार्वती का स्वरूप कृष्णवर्ण हो जाता है और वे कालिका नाम से प्रसिद्ध होती हैं।
कौशिकी देवी के सुंदर और दिव्य स्वरूप को चण्ड और मुण्ड देखते हैं। वे शुम्भ को देवी के बारे में बताते हैं और उसके पास मौजूद अनेक दिव्य रत्नों तथा ऐश्वर्य का वर्णन करते हुए कहते हैं कि देवी भी एक श्रेष्ठ रत्न के समान हैं।
शुम्भ अपनी शक्ति और ऐश्वर्य के अहंकार में देवी को अपना संदेश देने के लिए सुग्रीव नामक दूत को भेजता है। दूत देवी के सामने शुम्भ और निशुम्भ की शक्ति का वर्णन करता है और उनमें से किसी एक को पति के रूप में स्वीकार करने के लिए कहता है।
देवी दूत को शांत भाव से उत्तर देती हैं कि उन्होंने पहले ही प्रतिज्ञा की है कि जो उन्हें युद्ध में पराजित करेगा, वही उनका पति बनेगा। दूत देवी को डराने का प्रयास करता है, लेकिन देवी अपनी प्रतिज्ञा से पीछे नहीं हटतीं।
अध्याय के अंत में देवी दूत से कहती हैं कि वह वापस जाकर शुम्भ को उनका संदेश बता दे। इसके बाद शुम्भ जो उचित समझे, वह करे। इसी के साथ पाँचवाँ अध्याय समाप्त होता है और आगे की कथा छठे अध्याय में बढ़ती है।
पाँचवें अध्याय में क्या विशेष है?
दुर्गा सप्तशती का यह अध्याय कई कारणों से महत्वपूर्ण माना जाता है। सबसे प्रमुख रूप से इसमें “या देवी सर्वभूतेषु…” की प्रसिद्ध स्तुति आती है। इसमें देवी को संसार के प्रत्येक प्राणी के भीतर अलग-अलग रूपों में विद्यमान बताया गया है।
इस अध्याय में देवी की शक्ति का एक और महत्वपूर्ण पक्ष सामने आता है। शुम्भ के पास अपार ऐश्वर्य और शक्ति होने के बावजूद देवी उसके सामने झुकती नहीं हैं। वह अपने निर्णय और अपनी प्रतिज्ञा पर अडिग रहती हैं।
कौशिकी देवी का प्रकट होना भी इसी अध्याय की महत्वपूर्ण घटना है। इसके बाद देवी के विभिन्न स्वरूपों से जुड़ी कथा आगे के अध्यायों में और विस्तार से सामने आती है।
पाँचवें अध्याय से मिलने वाली सीख
इस अध्याय में देवी की स्तुति के माध्यम से यह भाव सामने आता है कि शक्ति केवल किसी एक स्थान या रूप तक सीमित नहीं है। जीवन में चेतना, बुद्धि, शांति, श्रद्धा, दया, संतोष और मातृभाव जैसे गुण भी देवी के ही रूप माने गए हैं।
दूसरी ओर देवी का शुम्भ के दूत को दिया गया उत्तर यह संदेश देता है कि अपनी प्रतिज्ञा और सत्य के प्रति दृढ़ रहना चाहिए। सामने वाला कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, केवल उसके बल और ऐश्वर्य के कारण अपने सिद्धांतों को नहीं छोड़ना चाहिए।
दुर्गा सप्तशती पाँचवाँ अध्याय हिंदी में
देवताओं ने की देवी की स्तुति
दुर्गा सप्तशती के पाँचवें अध्याय में देवताओं द्वारा माता भगवती की स्तुति, कौशिकी देवी के प्रकट होने और शुम्भ के दूत के साथ देवी के संवाद का वर्णन मिलता है। इस अध्याय का एक अत्यंत प्रसिद्ध भाग “या देवी सर्वभूतेषु…” स्तुति है, जिसमें देवी को सभी प्राणियों के भीतर चेतना, बुद्धि, निद्रा, शक्ति, शांति, श्रद्धा, दया, संतोष और मातृभाव सहित अनेक रूपों में स्थित बताया गया है।
महर्षि मेधा राजा सुरथ को बताते हैं कि शुम्भ और निशुम्भ नामक असुरों ने अपनी शक्ति के बल पर देवताओं के अधिकार छीन लिए थे। उन्होंने इन्द्र से तीनों लोकों का शासन और यज्ञों में मिलने वाले देवताओं के हिस्से छीन लिए। इसके बाद सूर्य, चंद्रमा, यम और वरुण आदि के अधिकार भी उन्होंने अपने नियंत्रण में कर लिए।
वायु और अग्नि से जुड़े कार्यों पर भी उन्होंने अधिकार कर लिया। इस प्रकार देवताओं को उनके पद और अधिकारों से वंचित कर दिया गया। पराजित और परेशान देवताओं को उस समय देवी का स्मरण हुआ, क्योंकि देवी ने पहले उन्हें आश्वासन दिया था कि संकट के समय उनका स्मरण करने पर वे उनकी रक्षा करेंगी।
देवताओं ने विचार किया कि अब देवी की ही शरण लेनी चाहिए। वे हिमालय पर पहुँचे और वहाँ भगवती की स्तुति करने लगे।
देवताओं की देवी स्तुति
देवताओं ने देवी को महादेवी, शिवा, प्रकृति, भद्रा, गौरी, लक्ष्मी, दुर्गा और अनेक दिव्य स्वरूपों वाली शक्ति के रूप में प्रणाम किया। उन्होंने देवी से प्रार्थना की कि वे संसार का कल्याण करें और संकट में पड़े देवताओं की रक्षा करें।
देवताओं की स्तुति में देवी को केवल एक विशेष रूप में नहीं, बल्कि पूरे संसार में व्याप्त शक्ति के रूप में देखा गया है। इसी भाव को आगे “या देवी सर्वभूतेषु…” स्तुति में विस्तार मिलता है।
देवताओं ने कहा कि जो देवी सभी प्राणियों में विष्णुमाया के रूप में विद्यमान हैं, उन्हें बार-बार प्रणाम है। जो चेतना बनकर जीवों में रहती हैं, उन्हें प्रणाम है। जो बुद्धि, निद्रा, भूख, छाया और शक्ति के रूप में सभी प्राणियों में उपस्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है।
इसी प्रकार देवी को तृष्णा, क्षमा, शांति, जन्म, लज्जा, श्रद्धा, कांति, लक्ष्मी, जीवन-व्यवस्था, स्मृति, दया, संतोष और माता के रूप में भी प्रणाम किया गया है।
देवताओं ने यह भी स्वीकार किया कि देवी संसार के प्रत्येक प्राणी में किसी न किसी रूप में उपस्थित हैं। वे चेतना के रूप में पूरे जगत को व्याप्त करके स्थित हैं। इसलिए उन्होंने जगदम्बा से अपनी सभी विपत्तियों को दूर करने और उनका कल्याण करने की प्रार्थना की।
देवताओं ने कहा कि जिन देवी की पहले भी देवताओं ने आराधना की है और जिनका स्मरण भक्तिभाव से करने पर संकट दूर हो जाते हैं, वही परमेश्वरी इस समय भी उनकी रक्षा करें।
कौशिकी देवी का प्रकट होना
जब देवता देवी की स्तुति कर रहे थे, उसी समय पार्वती देवी गंगाजी में स्नान करने के लिए वहाँ पहुँचीं। उसी समय उनके शरीर से एक दिव्य देवी प्रकट हुईं।
देवी के उस स्वरूप ने देवताओं की ओर संकेत करते हुए बताया कि ये देवता शुम्भ और निशुम्भ से परेशान होकर मेरी ही स्तुति कर रहे हैं।
पार्वती के शरीर से प्रकट होने के कारण उस देवी को कौशिकी नाम से प्रसिद्ध बताया गया है। कौशिकी देवी के प्रकट होने के बाद पार्वती का शरीर कृष्णवर्ण हो गया और वे कालिका नाम से प्रसिद्ध हुईं। उनका निवास हिमालय पर बताया गया है।
यह प्रसंग दुर्गा सप्तशती की कथा में बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि आगे देवी के विभिन्न स्वरूपों से जुड़ी घटनाएँ इसी क्रम में आगे बढ़ती हैं।
चण्ड और मुण्ड ने देवी को देखा
इसी समय शुम्भ और निशुम्भ के सेवक चण्ड और मुण्ड उस स्थान पर पहुँचे। वहाँ उन्होंने अत्यंत सुंदर और दिव्य आभा से युक्त अम्बिका देवी को देखा।
देवी के अद्भुत रूप को देखकर दोनों ने शुम्भ को इसकी जानकारी दी। उन्होंने कहा कि हिमालय के उस सुंदर स्थान पर एक ऐसी देवी विराजमान हैं, जैसा अद्भुत रूप उन्होंने पहले कभी नहीं देखा।
उन्होंने शुम्भ से कहा कि देवी की आभा से पूरा हिमालय प्रकाशित हो रहा है। उनके अनुसार देवी स्वयं एक श्रेष्ठ स्त्री-रत्न के समान हैं, इसलिए शुम्भ को उन्हें अपने अधिकार में ले लेना चाहिए।
शुम्भ के ऐश्वर्य का वर्णन
चण्ड और मुण्ड ने शुम्भ के सामने उसके अधिकार में आए अनेक दिव्य रत्नों और वस्तुओं का भी उल्लेख किया।
उन्होंने बताया कि तीनों लोकों में प्रसिद्ध अनेक श्रेष्ठ वस्तुएँ अब शुम्भ के पास हैं। देवराज इन्द्र का ऐरावत हाथी और उच्चैःश्रवा घोड़ा भी उसके अधिकार में हैं। ब्रह्मा से संबंधित दिव्य विमान, कुबेर की निधि, समुद्र की माला, वरुण का छत्र और प्रजापति का श्रेष्ठ रथ भी उसके पास बताए गए हैं।
इसी प्रकार अनेक दिव्य वस्तुओं और शक्तियों पर भी शुम्भ तथा निशुम्भ का अधिकार बताया गया। चण्ड और मुण्ड ने इसी आधार पर शुम्भ से कहा कि जब उसके पास संसार की इतनी सारी श्रेष्ठ वस्तुएँ हैं, तो फिर इतनी सुंदर देवी को भी अपने अधिकार में क्यों न लिया जाए।
उनकी बातें सुनकर शुम्भ ने देवी के पास अपना संदेश भेजने का निर्णय किया।
सुग्रीव को देवी के पास भेजा गया
शुम्भ ने सुग्रीव नामक असुर को अपना दूत बनाया। उसने दूत को समझाया कि देवी के पास जाकर उसके ऐश्वर्य और शक्ति का वर्णन करे तथा इस तरह बात करे कि देवी प्रसन्न होकर उसके पास आने के लिए तैयार हो जाएँ।
सुग्रीव देवी के पास पहुँचा और शुम्भ का संदेश सुनाने लगा।
उसने कहा कि दैत्यराज शुम्भ इस समय तीनों लोकों के स्वामी हैं और देवता भी उनकी आज्ञा का पालन करते हैं। तीनों लोकों के श्रेष्ठ रत्न उनके अधिकार में हैं।
दूत ने ऐरावत और उच्चैःश्रवा सहित अनेक दिव्य वस्तुओं का उल्लेख किया और कहा कि देवताओं के पास मौजूद श्रेष्ठ रत्न भी अब शुम्भ के अधिकार में हैं।
इसके बाद उसने देवी को संसार की श्रेष्ठ स्त्री बताते हुए कहा कि जिस प्रकार शुम्भ सभी रत्नों का स्वामी है, उसी प्रकार वह देवी को भी अपने पास देखना चाहता है।
शुम्भ का देवी को विवाह का प्रस्ताव
सुग्रीव ने देवी से कहा कि वे चाहें तो शुम्भ को अपना पति स्वीकार कर सकती हैं या उसके भाई निशुम्भ को। उसके अनुसार शुम्भ के साथ रहने पर देवी को अत्यंत बड़ा ऐश्वर्य प्राप्त होगा।
दूत ने देवी को समझाने का प्रयास किया कि शुम्भ के पास अपार शक्ति और संपत्ति है, इसलिए उन्हें उसके प्रस्ताव को स्वीकार कर लेना चाहिए।
देवी ने अपनी प्रतिज्ञा बताई
दूत की पूरी बात सुनने के बाद देवी ने शांत भाव से उत्तर दिया।
देवी ने कहा कि शुम्भ और निशुम्भ के संबंध में दूत ने जो कुछ कहा है, वह गलत नहीं है। वे दोनों वास्तव में शक्तिशाली हैं। लेकिन देवी पहले ही एक प्रतिज्ञा कर चुकी हैं और अब वे उस प्रतिज्ञा से पीछे नहीं हट सकतीं।
देवी ने अपनी प्रतिज्ञा स्पष्ट शब्दों में बताई—
“जो मुझे युद्ध में पराजित करेगा, जो मेरी शक्ति के समान बलवान सिद्ध होगा और जो मुझे युद्ध में जीत लेगा, वही मेरा पति होगा।”
इसलिए देवी ने कहा कि यदि शुम्भ या निशुम्भ स्वयं को इतना शक्तिशाली मानते हैं, तो वे यहाँ आएँ और युद्ध में उन्हें पराजित करके उनका हाथ स्वीकार करें।
देवी ने यह बात बिना किसी भय के कही। उनके लिए शुम्भ की शक्ति और ऐश्वर्य से अधिक महत्वपूर्ण अपनी प्रतिज्ञा थी।
दूत ने देवी को धमकाने का प्रयास किया
देवी की बात सुनकर सुग्रीव ने उन्हें अभिमानी बताते हुए कहा कि तीनों लोकों में ऐसा कोई नहीं है जो शुम्भ और निशुम्भ के सामने टिक सके।
उसने कहा कि जब इन्द्र सहित दूसरे देवता भी शुम्भ और निशुम्भ के सामने युद्ध में नहीं टिक पाए, तो एक अकेली स्त्री उनसे कैसे मुकाबला कर सकती है।
दूत ने देवी को फिर समझाया कि वे शुम्भ या निशुम्भ के पास चली जाएँ। उसने यह भी कहा कि यदि देवी उसकी बात नहीं मानेंगी तो उन्हें बलपूर्वक ले जाया जा सकता है और उनका सम्मान नष्ट हो सकता है।
लेकिन देवी अपने निर्णय से पीछे नहीं हटीं।
देवी ने अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ़ रहने का निर्णय लिया
देवी ने दूत से कहा कि उसने जो कुछ कहा है, वह अपनी जगह सही है। शुम्भ और निशुम्भ निश्चित रूप से बहुत शक्तिशाली हैं, लेकिन देवी अपनी पहले की हुई प्रतिज्ञा को नहीं बदल सकतीं।
उन्होंने दूत से कहा कि वह वापस जाए और असुरराज शुम्भ को उनका पूरा संदेश बता दे। इसके बाद शुम्भ जो उचित समझे, वह कर सकता है।
इस प्रकार देवी ने स्पष्ट कर दिया कि वे किसी के ऐश्वर्य या भय के कारण अपनी प्रतिज्ञा नहीं बदलेंगी।
पाँचवें अध्याय की मुख्य बातें
दुर्गा सप्तशती के पाँचवें अध्याय में कई महत्वपूर्ण प्रसंग एक साथ आते हैं।
- देवताओं का शुम्भ और निशुम्भ से पराजित होकर देवी की शरण में जाना।
- हिमालय पर देवताओं द्वारा भगवती की स्तुति करना।
- “या देवी सर्वभूतेषु…” स्तुति में देवी के अनेक रूपों का वर्णन।
- कौशिकी देवी का प्रकट होना।
- पार्वती के कालिका स्वरूप में प्रसिद्ध होने का वर्णन।
- चण्ड और मुण्ड द्वारा अम्बिका देवी को देखना।
- शुम्भ के ऐश्वर्य और उसके अधिकार में आए दिव्य रत्नों का वर्णन।
- सुग्रीव को शुम्भ का दूत बनाकर देवी के पास भेजना।
- शुम्भ की ओर से देवी को विवाह का प्रस्ताव देना।
- देवी द्वारा अपनी प्रतिज्ञा स्पष्ट करना।
- दूत द्वारा देवी को डराने का प्रयास।
- देवी का अपनी प्रतिज्ञा पर अडिग रहना।
पाँचवें अध्याय से मिलने वाली सीख
इस अध्याय का सबसे महत्वपूर्ण भाव यह है कि शक्ति केवल बाहरी सामर्थ्य का नाम नहीं है। देवी को संसार के प्रत्येक प्राणी में चेतना, बुद्धि, शांति, श्रद्धा, दया, संतोष और मातृभाव के रूप में देखा गया है।
देवी का शुम्भ के दूत को दिया गया उत्तर यह भी बताता है कि किसी व्यक्ति को अपने सिद्धांत और प्रतिज्ञा केवल इसलिए नहीं छोड़नी चाहिए कि सामने वाला अधिक शक्तिशाली या संपन्न है।
देवी के सामने शुम्भ का ऐश्वर्य, उसके पास मौजूद दिव्य वस्तुएँ और उसकी शक्ति किसी प्रकार का प्रभाव नहीं डालतीं। देवी अपने निर्णय पर दृढ़ रहती हैं और शुम्भ को अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार स्वयं सामने आने का संदेश देती हैं।
निष्कर्ष
दुर्गा सप्तशती का पाँचवाँ अध्याय देवी की महिमा, उनकी सर्वव्यापकता और उनके अडिग स्वरूप को सामने लाता है। देवताओं की स्तुति से शुरू होने वाली यह कथा कौशिकी देवी के प्रकट होने और शुम्भ के दूत के साथ उनके संवाद तक पहुँचती है।
“या देवी सर्वभूतेषु…” की स्तुति इस अध्याय का विशेष भाग है, जिसमें देवी को चेतना से लेकर बुद्धि, शक्ति, शांति, श्रद्धा, दया और मातृभाव तक अनेक रूपों में प्रणाम किया गया है।
अध्याय के अंत में देवी अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ़ रहती हैं और शुम्भ को स्पष्ट संदेश भेजती हैं कि उन्हें युद्ध में पराजित किए बिना कोई उन्हें अपना नहीं बना सकता। आगे छठे अध्याय में शुम्भ की ओर से भेजे गए धूम्रलोचन और देवी के बीच संघर्ष की कथा आती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती का पाँचवाँ अध्याय किस नाम से जाना जाता है?
दुर्गा सप्तशती के पाँचवें अध्याय का नाम “देव्या दूतसंवाद” है। इसमें देवी और शुम्भ के दूत के बीच संवाद का वर्णन है।
पाँचवें अध्याय में किसकी स्तुति की गई है?
इस अध्याय में देवताओं ने देवी भगवती की स्तुति की है। इसमें देवी को अनेक रूपों में सभी प्राणियों के भीतर स्थित बताया गया है।
“या देवी सर्वभूतेषु” किस अध्याय में आता है?
“या देवी सर्वभूतेषु…” की प्रसिद्ध स्तुति दुर्गा सप्तशती के पाँचवें अध्याय में आती है।
कौशिकी देवी कैसे प्रकट हुईं?
पाँचवें अध्याय के अनुसार पार्वती के शरीर के आवरण से एक देवी प्रकट हुईं। उन्हें कौशिकी नाम से प्रसिद्ध बताया गया है।
कौशिकी देवी के प्रकट होने के बाद पार्वती का क्या स्वरूप हुआ?
कौशिकी देवी के प्रकट होने के बाद पार्वती का स्वरूप कृष्णवर्ण हो गया और उन्हें कालिका नाम से प्रसिद्ध बताया गया है।
शुम्भ ने देवी के पास किसे दूत बनाकर भेजा था?
शुम्भ ने सुग्रीव नामक असुर को अपना दूत बनाकर देवी के पास भेजा था।
शुम्भ का दूत देवी के पास क्यों गया था?
शुम्भ का दूत देवी को शुम्भ और निशुम्भ की शक्ति तथा ऐश्वर्य का वर्णन करके उनमें से किसी एक को पति के रूप में स्वीकार करने के लिए मनाने गया था।
देवी ने शुम्भ के प्रस्ताव का क्या उत्तर दिया?
देवी ने कहा कि उन्होंने पहले ही प्रतिज्ञा की है कि जो उन्हें युद्ध में पराजित करेगा और उनके समान शक्तिशाली सिद्ध होगा, वही उनका पति बनेगा।
पाँचवें अध्याय में कितने श्लोक हैं?
दुर्गा सप्तशती के मानक पाठ में पाँचवें अध्याय में १२९ श्लोक हैं।
पाँचवें अध्याय का पाठ क्यों महत्वपूर्ण माना जाता है?
इस अध्याय में देवी की प्रसिद्ध स्तुति, देवी के अनेक रूपों का वर्णन, कौशिकी देवी के प्रकट होने की कथा और शुम्भ के दूत के साथ देवी का संवाद आता है। इसलिए यह दुर्गा सप्तशती की कथा का महत्वपूर्ण अध्याय है।
