दुर्गा सप्तशती का द्वितीय अध्याय महिषासुरसैन्यवध के नाम से जाना जाता है। इस अध्याय में देवताओं की पराजय, उनके तेज से देवी के दिव्य स्वरूप का प्राकट्य, देवी को विभिन्न देवताओं से दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्राप्त होना और महिषासुर की विशाल सेना के साथ देवी के भयंकर युद्ध का वर्णन मिलता है।
महिषासुर ने देवताओं को पराजित करके उनके अधिकार छीन लिए थे। पराजित देवता भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु और भगवान शिव की शरण में गए। देवताओं के शरीर से निकले दिव्य तेज एक स्थान पर एकत्र हुए और उसी तेज से देवी का प्राकट्य हुआ।
देवताओं ने देवी को अपने-अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए। इसके बाद देवी सिंह पर आरूढ़ होकर महिषासुर की विशाल सेना के सामने युद्ध के लिए उपस्थित हुईं। चिक्षुर, चामर, उदग्र, महाहनु, असिलोमा, बाष्कल और बिडाल जैसे अनेक असुर सेनानायकों ने देवी से युद्ध किया, लेकिन देवी ने उनकी विशाल सेना का संहार कर दिया।
मुख्य प्रसंग
द्वितीय अध्याय में मुख्य रूप से देवताओं की पराजय, देवी के दिव्य प्राकट्य, देवी को अस्त्र-शस्त्र प्राप्त होने और महिषासुर की सेना के विनाश का वर्णन है। देवताओं के तेज से प्रकट हुई देवी को देखकर देवताओं को आशा मिली कि अब महिषासुर के अत्याचार का अंत होगा।
देवी के हाथों में अनेक दिव्य अस्त्र-शस्त्र सुशोभित हुए। हिमवान ने उन्हें सिंह वाहन प्रदान किया। इसके बाद देवी की भयंकर गर्जना से तीनों लोकों में हलचल मच गई और महिषासुर की सेना युद्ध के लिए आगे बढ़ी।
युद्ध में अनेक असुर सेनानायक देवी के सामने आए। देवी, उनके गण और उनका सिंह मिलकर असुरों का सामना करते हैं। अंत में महिषासुर की विशाल सेना का विनाश हो जाता है और देवता प्रसन्न होकर देवी की स्तुति करते हैं।
॥ विनियोगः॥
ॐ मध्यमचरित्रस्य विष्णुर्ऋषिः, महालक्ष्मीर्देवता, उष्णिक् छन्दः,
शाकम्भरी शक्तिः, दुर्गा बीजम्, वायुस्तत्त्वम्, यजुर्वेदः स्वरूपम्,
श्रीमहालक्ष्मीप्रीत्यर्थं मध्यमचरित्रजपे विनियोगः।
हिंदी अर्थ: मध्यम चरित्र के ऋषि भगवान विष्णु हैं, इसकी देवता महालक्ष्मी हैं और छंद उष्णिक् है। शाकम्भरी शक्ति, दुर्गा बीज और वायु तत्त्व का इसमें उल्लेख है। श्रीमहालक्ष्मी की प्रसन्नता के लिए मध्यम चरित्र के जप में इसका विनियोग किया जाता है।
॥ध्यानम्॥
ॐ अक्षस्रक्परशुं गदेषुकुलिशं पद्मं धनुष्कुण्डिकां
दण्डं शक्तिमसिं च चर्म जलजं घण्टां सुराभाजनम्।
शूलं पाशसुदर्शने च दधतीं हस्तैः प्रसन्नाननां
सेवे सैरिभमर्दिनीमिह महालक्ष्मीं सरोजस्थिताम्॥
हिंदी अर्थ: मैं कमल पर विराजमान महालक्ष्मी देवी की उपासना करता हूँ। उनके हाथों में अक्षमाला, फरसा, गदा, बाण, वज्र, कमल, धनुष, कमण्डलु, दण्ड, शक्ति, तलवार, ढाल, शंख, घंटा, सुरापात्र, त्रिशूल, पाश और सुदर्शन चक्र जैसे दिव्य अस्त्र-शस्त्र हैं। वे महिषासुर का मर्दन करने वाली और प्रसन्न मुख वाली देवी हैं।
॥ द्वितीय अध्याय ॥
“ॐ ह्रीं” ऋषिरुवाच॥1॥
हिंदी अर्थ: ऋषि कहते हैं।
देवासुरमभूद्युद्धं पूर्णमब्दशतं पुरा।
महिषेऽसुराणामधिपे देवानां च पुरन्दरे॥2॥
हिंदी अर्थ: प्राचीन समय में देवताओं और असुरों के बीच पूरे 100 वर्षों तक युद्ध हुआ। असुरों के राजा महिषासुर थे और देवताओं के राजा इंद्र थे।
तत्रासुरैर्महावीर्यैर्देवसैन्यं पराजितम्।
जित्वा च सकलान् देवानिन्द्रोऽभून्महिषासुरः॥3॥
हिंदी अर्थ: अत्यंत शक्तिशाली असुरों ने देवताओं की सेना को पराजित कर दिया। सभी देवताओं को जीतने के बाद महिषासुर ने इंद्र का अधिकार भी अपने हाथ में ले लिया।
ततः पराजिता देवाः पद्मयोनिं प्रजापतिम्।
पुरस्कृत्य गतास्तत्र यत्रेशगरुडध्वजौ॥4॥
हिंदी अर्थ: पराजित देवता ब्रह्माजी को आगे करके उस स्थान पर गए, जहाँ भगवान शिव और भगवान विष्णु उपस्थित थे।
यथावृत्तं तयोस्तद्वन्महिषासुरचेष्टितम्।
त्रिदशाः कथयामासुर्देवाभिभवविस्तरम्॥5॥
हिंदी अर्थ: देवताओं ने महिषासुर द्वारा किए गए अत्याचारों और देवताओं को पराजित किए जाने की पूरी घटना भगवान शिव और भगवान विष्णु को विस्तार से बताई।
सूर्येन्द्राग्न्यनिलेन्दूनां यमस्य वरुणस्य च।
अन्येषां चाधिकारान् स स्वयमेवाधितिष्ठति॥6॥
हिंदी अर्थ: महिषासुर ने सूर्य, इंद्र, अग्नि, वायु, चंद्रमा, यम और वरुण सहित अन्य देवताओं के अधिकार भी अपने अधीन कर लिए थे।
स्वर्गान्निराकृताः सर्वे तेन देवगणा भुवि।
विचरन्ति यथा मर्त्या महिषेण दुरात्मना॥7॥
हिंदी अर्थ: उस दुरात्मा महिषासुर ने सभी देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया था। देवता पृथ्वी पर सामान्य मनुष्यों की तरह रहने और भटकने के लिए विवश हो गए थे।
एतद्वः कथितं सर्वममरारिविचेष्टितम्।
शरणं वः प्रपन्नाः स्मो वधस्तस्य विचिन्त्यताम्॥8॥
हिंदी अर्थ: देवताओं ने कहा—हमने आपको देवताओं के शत्रु महिषासुर के सभी अत्याचार बता दिए हैं। अब हम आपकी शरण में आए हैं। कृपया उसके वध का उपाय कीजिए।
इत्थं निशम्य देवानां वचांसि मधुसूदनः।
चकार कोपं शम्भुश्च भ्रुकुटीकुटिलाननौ॥9॥
हिंदी अर्थ: देवताओं की बातें सुनकर भगवान विष्णु और भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हो गए। उनके क्रोध के कारण उनके मुख पर गंभीरता और भौंहों में तनाव दिखाई देने लगा।
ततोऽतिकोपपूर्णस्य चक्रिणो वदनात्ततः।
निश्चक्राम महत्तेजो ब्रह्मणः शंकरस्य च॥10॥
हिंदी अर्थ: अत्यंत क्रोधित भगवान विष्णु के मुख से तथा भगवान ब्रह्मा और भगवान शिव से महान दिव्य तेज प्रकट हुआ।
अन्येषां चैव देवानां शक्रादीनां शरीरतः।
निर्गतं सुमहत्तेजस्तच्चैक्यं समगच्छत॥11॥
हिंदी अर्थ: इंद्र आदि अन्य देवताओं के शरीर से भी अत्यंत शक्तिशाली तेज निकला और वह सभी तेज एक स्थान पर एकत्र हो गया।
अतीव तेजसः कूटं ज्वलन्तमिव पर्वतम्।
ददृशुस्ते सुरास्तत्र ज्वालाव्याप्तदिगन्तरम्॥12॥
हिंदी अर्थ: देवताओं ने उस एकत्रित तेज को जलते हुए पर्वत के समान अत्यंत प्रकाशमान देखा। उसकी ज्वाला से सभी दिशाएँ प्रकाशित हो रही थीं।
अतुलं तत्र तत्तेजः सर्वदेवशरीरजम्।
एकस्थं तदभून्नारी व्याप्तलोकत्रयं त्विषा॥13॥
हिंदी अर्थ: सभी देवताओं के शरीर से निकला वह अतुलनीय तेज एक स्थान पर एकत्र हुआ और उसी से एक दिव्य नारी का स्वरूप प्रकट हुआ, जिसका प्रकाश तीनों लोकों में फैल गया।
यदभूच्छाम्भवं तेजस्तेनाजायत तन्मुखम्।
याम्येन चाभवन् केशा बाहवो विष्णुतेजसा॥14॥
हिंदी अर्थ: भगवान शिव के तेज से देवी का मुख प्रकट हुआ। यमराज के तेज से उनके केश और भगवान विष्णु के तेज से उनकी भुजाएँ प्रकट हुईं।
सौम्येन स्तनयोर्युग्मं मध्यं चैन्द्रेण चाभवत्।
वारुणेन च जङ्घोरू नितम्बस्तेजसा भुवः॥15॥
हिंदी अर्थ: चंद्रमा के तेज से देवी के दोनों स्तन, इंद्र के तेज से मध्य भाग, वरुण के तेज से जंघाएँ और पृथ्वी के तेज से नितंब का स्वरूप प्रकट हुआ।
ब्रह्मणस्तेजसा पादौ तदङ्गुल्योऽर्कतेजसा।
वसूनां च कराङ्गुल्यः कौबेरेण च नासिका॥16॥
हिंदी अर्थ: ब्रह्माजी के तेज से देवी के दोनों चरण, सूर्य के तेज से पैरों की उंगलियाँ, वसुओं के तेज से हाथों की उंगलियाँ और कुबेर के तेज से उनकी नासिका प्रकट हुई।
तस्यास्तु दन्ताः सम्भूताः प्राजापत्येन तेजसा।
नयनत्रितयं जज्ञे तथा पावकतेजसा॥17॥
हिंदी अर्थ: प्रजापति के तेज से देवी के दाँत और अग्नि के तेज से उनके तीन नेत्र प्रकट हुए।
भ्रुवौ च संध्ययोस्तेजः श्रवणावनिलस्य च।
अन्येषां चैव देवानां सम्भवस्तेजसां शिवा॥18॥
हिंदी अर्थ: दोनों संध्याओं के तेज से देवी की भौंहें और वायु के तेज से उनके कान प्रकट हुए। अन्य देवताओं के तेज से भी देवी के शरीर के विभिन्न अंगों का दिव्य स्वरूप बना।
ततः समस्तदेवानां तेजोराशिसमुद्भवाम्।
तां विलोक्य मुदं प्रापुरमरा महिषार्दिताः॥19॥
हिंदी अर्थ: सभी देवताओं के तेज से प्रकट हुई उस देवी को देखकर महिषासुर से पीड़ित देवताओं को बहुत प्रसन्नता हुई। उन्हें विश्वास हुआ कि अब महिषासुर के अत्याचार का अंत संभव है।
शूलं शूलाद्विनिष्कृष्य ददौ तस्यै पिनाकधृक्।
चक्रं च दत्तवान् कृष्णः समुत्पाद्य स्वचक्रतः॥20॥
हिंदी अर्थ: भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से एक त्रिशूल निकालकर देवी को दिया। भगवान विष्णु ने अपने चक्र से एक चक्र उत्पन्न करके देवी को प्रदान किया।
शङ्खं च वरुणः शक्तिं ददौ तस्यै हुताशनः।
मारुतो दत्तवांश्चापं बाणपूर्णे तथेषुधी॥21॥
हिंदी अर्थ: वरुण देव ने देवी को शंख दिया और अग्निदेव ने शक्ति नामक अस्त्र प्रदान किया। वायुदेव ने धनुष और बाणों से भरे दो तरकश दिए।
वज्रमिन्द्रः समुत्पाद्य कुलिशादमराधिपः।
ददौ तस्यै सहस्राक्षो घण्टामैरावताद् गजात्॥22॥
हिंदी अर्थ: इंद्र ने अपने वज्र से एक वज्र उत्पन्न करके देवी को दिया और ऐरावत हाथी से एक घंटा लेकर उन्हें प्रदान किया।
कालदण्डाद्यमो दण्डं पाशं चाम्बुपतिर्ददौ।
प्रजापतिश्चाक्षमालां ददौ ब्रह्मा कमण्डलुम्॥23॥
हिंदी अर्थ: यमराज ने अपने कालदण्ड से दण्ड दिया और वरुण ने पाश प्रदान किया। प्रजापति ने अक्षमाला तथा ब्रह्माजी ने कमण्डलु दिया।
समस्तरोमकूपेषु निजरश्मीन् दिवाकरः।
कालश्च दत्तवान् खड्गं तस्याश्चर्म च निर्मलम्॥24॥
हिंदी अर्थ: सूर्यदेव ने देवी के प्रत्येक रोमकूप में अपनी किरणों का तेज भर दिया। काल ने उन्हें तलवार और निर्मल ढाल प्रदान की।
क्षीरोदश्चामलं हारमजरे च तथाम्बरे।
चूडामणिं तथा दिव्यं कुण्डले कटकानि च॥25॥
हिंदी अर्थ: क्षीरसागर ने देवी को निर्मल हार, कभी पुराने न होने वाले दिव्य वस्त्र, चूड़ामणि, कुंडल और कंगन आदि आभूषण प्रदान किए।
अर्धचन्द्रं तथा शुभ्रं केयूरान् सर्वबाहुषु।
नूपुरौ विमलौ तद्वद् ग्रैवेयकमनुत्तमम्॥26॥
हिंदी अर्थ: देवी को सुंदर अर्धचंद्राकार आभूषण, सभी भुजाओं के लिए केयूर, निर्मल नूपुर और श्रेष्ठ कंठहार प्रदान किए गए।
अङ्गुलीयकरत्नानि समस्तास्वङ्गुलीषु च।
विश्वकर्मा ददौ तस्यै परशुं चातिनिर्मलम्॥27॥
हिंदी अर्थ: विश्वकर्मा ने देवी की सभी उंगलियों के लिए रत्नजड़ित अंगूठियाँ और अत्यंत निर्मल फरसा प्रदान किया।
अस्त्राण्यनेकरूपाणि तथाभेद्यं च दंशनम्।
अम्लानपङ्कजां मालां शिरस्युरसि चापराम्॥28॥
हिंदी अर्थ: देवी को अनेक प्रकार के दिव्य अस्त्र तथा अभेद्य कवच प्रदान किए गए। उन्हें ऐसी कमल-माला भी दी गई जो कभी मुरझाती नहीं थी।
अददज्जलधिस्तस्यै पङ्कजं चातिशोभनम्।
हिमवान् वाहनं सिंहं रत्नानि विविधानि च॥29॥
हिंदी अर्थ: समुद्र ने देवी को अत्यंत सुंदर कमल प्रदान किया। हिमवान ने उन्हें सिंह को वाहन के रूप में दिया और अनेक प्रकार के बहुमूल्य रत्न अर्पित किए।
ददावशून्यं सुरया पानपात्रं धनाधिपः।
शेषश्च सर्वनागेशो महामणिविभूषितम्॥30॥
हिंदी अर्थ: धन के स्वामी कुबेर ने देवी को सुरा से भरा पानपात्र दिया। नागों के राजा शेष ने महामणियों से सुशोभित नागहार प्रदान किया।
नागहारं ददौ तस्यै धत्ते यः पृथिवीमिमाम्॥
अन्यैरपि सुरैर्देवी भूषणैरायुधैस्तथा॥31॥
हिंदी अर्थ: जो शेषनाग पृथ्वी को धारण करते हैं, उन्होंने देवी को नागहार दिया। अन्य देवताओं ने भी देवी को अनेक प्रकार के आभूषण और दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए।
सम्मानिता ननादोच्चैः साट्टहासं मुहुर्मुहुः।
तस्या नादेन घोरेण कृत्स्नमापूरितं नभः॥32॥
हिंदी अर्थ: देवताओं द्वारा सम्मानित देवी ने बार-बार जोरदार अट्टहास करते हुए भयंकर गर्जना की। उनकी उस घोर ध्वनि से पूरा आकाश गूंज उठा।
अमायतातिमहता प्रतिशब्दो महानभूत्।
चुक्षुभुः सकला लोकाः समुद्राश्च चकम्पिरे॥33॥
हिंदी अर्थ: देवी की गर्जना की बहुत बड़ी प्रतिध्वनि चारों ओर फैल गई। उससे सभी लोकों में हलचल मच गई और समुद्र भी कांप उठे।
चचाल वसुधा चेलुः सकलाश्च महीधराः।
जयेति देवाश्च मुदा तामूचुः सिंहवाहिनीम्॥34॥
हिंदी अर्थ: पृथ्वी हिलने लगी और पर्वत भी विचलित हो उठे। देवताओं ने प्रसन्न होकर सिंह पर आरूढ़ देवी की जय-जयकार की।
तुष्टुवुर्मुनयश्चैनां भक्तिनम्रात्ममूर्तयः।
दृष्ट्वा समस्तं संक्षुब्धं त्रैलोक्यममरारयः॥35॥
हिंदी अर्थ: तीनों लोकों में उत्पन्न हुई इस हलचल को देखकर देवताओं के शत्रु असुर भी चिंतित हो उठे। ऋषियों ने भक्तिभाव से झुककर देवी की स्तुति की।
सन्नद्धाखिलसैन्यास्ते समुत्तस्थुरुदायुधाः।
आः किमेतदिति क्रोधादाभाष्य महिषासुरः॥36॥
हिंदी अर्थ: असुरों की पूरी सेना अस्त्र-शस्त्रों से सजकर युद्ध के लिए तैयार हो गई। महिषासुर ने क्रोध में पूछा—यह कैसी भयंकर ध्वनि है?
अभ्यधावत तं शब्दमशेषैरसुरैर्वृतः।
स ददर्श ततो देवीं व्याप्तलोकत्रयां त्विषा॥37॥
हिंदी अर्थ: महिषासुर अपनी पूरी सेना के साथ उस ध्वनि की ओर तेजी से बढ़ा। वहाँ उसने ऐसी देवी को देखा जिनका दिव्य तेज तीनों लोकों में फैला हुआ था।
पादाक्रान्त्या नतभुवं किरीटोल्लिखिताम्बराम्।
क्षोभिताशेषपातालां धनुर्ज्यानिःस्वनेन ताम्॥38॥
हिंदी अर्थ: देवी के चरणों के दबाव से पृथ्वी झुक रही थी, उनके मुकुट से आकाश मानो स्पर्श हो रहा था और उनके धनुष की टंकार से पाताल तक में हलचल उत्पन्न हो रही थी।
दिशो भुजसहस्रेण समन्ताद् व्याप्य संस्थिताम्।
ततः प्रववृते युद्धं तया देव्या सुरद्विषाम्॥39॥
हिंदी अर्थ: देवी अपनी असंख्य भुजाओं से सभी दिशाओं को व्याप्त किए हुए थीं। इसके बाद देवी और देवताओं के शत्रु असुरों के बीच भयंकर युद्ध आरंभ हो गया।
शस्त्रास्त्रैर्बहुधा मुक्तैरादीपितदिगन्तरम्।
महिषासुरसेनानीश्चिक्षुराख्यो महासुरः॥40॥
हिंदी अर्थ: अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र चलाए जाने से युद्धभूमि की सभी दिशाएँ प्रकाशमान हो उठीं। महिषासुर का सेनापति चिक्षुर नामक महान असुर था।
युयुधे चामरश्चान्यैश्चतुरङ्गबलान्वितः।
रथानामयुतैः षड्भिरुदग्राख्यो महासुरः॥41॥
हिंदी अर्थ: चामर नामक असुर भी अपनी चतुरंगिणी सेना के साथ युद्ध करने लगा। उदग्र नामक महान असुर 6 हजार रथों के साथ युद्ध में उतरा।
अयुध्यतायुतानां च सहस्रेण महाहनुः।
पञ्चाशद्भिश्च नियुतैरसिलोमा महासुरः॥42॥
हिंदी अर्थ: महाहनु नामक असुर 10 हजार रथों के साथ युद्ध करने लगा। असिलोमा नामक महान असुर भी बड़ी संख्या में सेना लेकर युद्धभूमि में आया।
अयुतानां शतैः षड्भिर्बाष्कलो युयुधे रणे।
गजवाजिसहस्रौघैरनेकैः परिवारितः॥43॥
हिंदी अर्थ: बाष्कल नामक असुर 6 सौ समूहों वाली विशाल सेना के साथ युद्ध करने लगा। उसके साथ अनेक हजार हाथी और घोड़े भी थे।
वृतो रथानां कोट्या च युद्धे तस्मिन्नयुध्यत।
बिडालाख्योऽयुतानां च पञ्चाशद्भिरथायुतैः॥44॥
हिंदी अर्थ: उस युद्ध में एक असुर करोड़ों रथों से घिरकर लड़ रहा था। बिडाल नामक असुर भी 50 हजार रथों के साथ युद्ध करने लगा।
युयुधे संयुगे तत्र रथानां परिवारितः।
अन्ये च तत्रायुतशो रथनागहयैर्वृताः॥45॥
हिंदी अर्थ: वह असुर अनेक रथों से घिरकर युद्ध कर रहा था। अन्य अनेक महाअसुर भी हजारों रथों, हाथियों और घोड़ों से घिरे हुए युद्धभूमि में उपस्थित थे।
युयुधुः संयुगे देव्या सह तत्र महासुराः
कोटिकोटिसहस्रैस्तु रथानां दन्तिनां तथा॥46॥
हिंदी अर्थ: वहाँ अनेक महाअसुर देवी के साथ युद्ध करने लगे। उनके पास करोड़ों की संख्या में रथ और हाथियों की विशाल सेनाएँ थीं।
हयानां च वृतो युद्धे तत्राभून्महिषासुरः।
तोमरैर्भिन्दिपालैश्च शक्तिभिर्मुसलैस्तथा॥47॥
हिंदी अर्थ: महिषासुर भी उस युद्ध में असंख्य घोड़ों और विशाल सैन्य बल से घिरा हुआ था। असुर तोमर, भिन्दिपाल, शक्ति और मूसल जैसे अस्त्रों से युद्ध कर रहे थे।
युयुधुः संयुगे देव्या खड्गैः परशुपट्टिशैः।
केचिच्च चिक्षिपुः शक्तीः केचित्पाशांस्तथापरे॥48॥
हिंदी अर्थ: असुर तलवार, फरसा और पट्टिश जैसे अस्त्रों से देवी के साथ युद्ध करने लगे। कुछ असुर शक्तियाँ फेंक रहे थे और कुछ पाशों का प्रयोग कर रहे थे।
देवीं खड्गप्रहारैस्तु ते तां हन्तुं प्रचक्रमुः।
सापि देवी ततस्तानि शस्त्राण्यस्त्राणि चण्डिका॥49॥
हिंदी अर्थ: असुरों ने तलवार के प्रहारों से देवी को मारने का प्रयास किया। तब चण्डिका देवी ने उनके अस्त्र-शस्त्रों का सामना किया।
लीलयैव प्रचिच्छेद निजशस्त्रास्त्रवर्षिणी।
अनायस्तानना देवी स्तूयमाना सुरर्षिभिः॥50॥
हिंदी अर्थ: देवी ने बिना किसी कठिनाई के अपने अस्त्र-शस्त्रों से असुरों द्वारा छोड़े गए अस्त्रों को काट दिया। वे बिना थके युद्ध करती रहीं और देवर्षियों द्वारा उनकी स्तुति की जाती रही।
मुमोचासुरदेहेषु शस्त्राण्यस्त्राणि चेश्वरी।
सोऽपि क्रुद्धो धुतसटो देव्या वाहनकेशरी॥51॥
हिंदी अर्थ: देवी ने असुरों के शरीरों पर अपने अस्त्र-शस्त्र चलाए। देवी का वाहन सिंह भी क्रोधित होकर अपनी अयाल झटकते हुए युद्ध में उतर पड़ा।
चचारासुरसैन्येषु वनेष्विव हुताशनः।
निःश्वासान् मुमुचे यांश्च युध्यमाना रणेऽम्बिका॥52॥
हिंदी अर्थ: देवी का सिंह असुरों की सेना में उसी प्रकार विचरण करने लगा जैसे जंगल में अग्नि फैलती है। युद्ध करती हुई अम्बिका ने जो श्वास छोड़े, उनसे भी दिव्य गण प्रकट होने लगे।
त एव सद्यः सम्भूता गणाः शतसहस्रशः।
युयुधुस्ते परशुभिर्भिन्दिपालासिपट्टिशैः॥53॥
हिंदी अर्थ: देवी के श्वास से उसी समय हजारों की संख्या में गण उत्पन्न हुए। वे फरसे, भिन्दिपाल, तलवार और पट्टिश जैसे अस्त्रों से असुरों के साथ युद्ध करने लगे।
नाशयन्तोऽसुरगणान् देवीशक्त्युपबृंहिताः।
अवादयन्त पटहान् गणाः शङ्खांस्तथापरे॥54॥
हिंदी अर्थ: देवी की शक्ति से समर्थ वे गण असुरों का विनाश करते हुए नगाड़े और शंख आदि बजाने लगे।
मृदङ्गांश्च तथैवान्ये तस्मिन् युद्धमहोत्सवे।
ततो देवी त्रिशूलेन गदया शक्तिवृष्टिभिः॥55॥
हिंदी अर्थ: उस युद्धरूपी महोत्सव में कुछ गण मृदंग बजा रहे थे। तब देवी ने त्रिशूल, गदा और शक्तियों की वर्षा से असुरों पर प्रहार किया।
खड्गादिभिश्च शतशो निजघान महासुरान्।
पातयामास चैवान्यान् घण्टास्वनविमोहितान्॥56॥
हिंदी अर्थ: देवी ने तलवार आदि अस्त्रों से सैकड़ों महाअसुरों का वध कर दिया। उन्होंने अपनी घंटा की ध्वनि से मोहित हुए अनेक अन्य असुरों को भी धरती पर गिरा दिया।
असुरान् भुवि पाशेन बद्ध्वा चान्यानकर्षयत्।
केचिद् द्विधा कृतास्तीक्ष्णैः खड्गपातैस्तथापरे॥57॥
हिंदी अर्थ: देवी ने कुछ असुरों को पाश से बाँधकर धरती पर खींच लिया और कुछ असुरों को तेज तलवार के प्रहार से दो भागों में काट दिया।
विपोथिता निपातेन गदया भुवि शेरते।
वेमुश्च केचिद्रुधिरं मुसलेन भृशं हताः॥58॥
हिंदी अर्थ: कुछ असुर गदा की चोट से घायल होकर धरती पर गिर पड़े। कुछ अन्य मूसल की मार से बुरी तरह घायल होकर रक्त बहाने लगे।
केचिन्निपतिता भूमौ भिन्नाः शूलेन वक्षसि।
निरन्तराः शरौघेण कृताः केचिद्रणाजिरे॥59॥
हिंदी अर्थ: कुछ असुर त्रिशूल से छाती में विद्ध होकर धरती पर गिर पड़े और कुछ रणभूमि में लगातार छोड़े गए बाणों से घायल हो गए।
श्येनानुकारिणः प्राणान् मुमुचुस्त्रिदशार्दनाः।
केषांचिद् बाहवश्छिन्नाश्छिन्नग्रीवास्तथापरे॥60॥
हिंदी अर्थ: देवताओं को पीड़ा देने वाले वे असुर अपने प्राण छोड़ने लगे। कुछ असुरों की भुजाएँ कट गईं और कुछ की गर्दनें कट गईं।
शिरांसि पेतुरन्येषामन्ये मध्ये विदारिताः।
विच्छिन्नजङ्घास्त्वपरे पेतुरुर्व्यां महासुराः॥61॥
हिंदी अर्थ: कुछ असुरों के सिर कटकर गिर पड़े और कुछ के शरीर बीच से विदीर्ण हो गए। अन्य कई महाअसुरों की जंघाएँ कट गईं और वे धरती पर गिर पड़े।
एकबाह्वक्षिचरणाः केचिद्देव्या द्विधा कृताः।
छिन्नेऽपि चान्ये शिरसि पतिताः पुनरुत्थिताः॥62॥
हिंदी अर्थ: देवी के प्रहार से कुछ असुरों के एक-एक हाथ, आँख या पैर ही शेष रह गए और कुछ दो भागों में कट गए। कुछ असुरों के सिर कट जाने के बाद भी उनके धड़ फिर उठकर युद्ध करने लगे।
कबन्धा युयुधुर्देव्या गृहीतपरमायुधाः।
ननृतुश्चापरे तत्र युद्धे तूर्यलयाश्रिताः॥63॥
हिंदी अर्थ: सिर कट जाने के बाद भी कुछ कबन्ध रूपी असुर दिव्य अस्त्र उठाकर देवी से युद्ध करते रहे। कुछ अन्य असुर युद्धभूमि में वाद्ययंत्रों की ताल के साथ नृत्य करने लगे।
कबन्धाश्छिन्नशिरसः खड्गशक्त्यृष्टिपाणयः।
तिष्ठ तिष्ठेति भाषन्तो देवीमन्ये महासुराः॥64॥
हिंदी अर्थ: सिर कट जाने के बाद भी कुछ असुरों के धड़ तलवार, शक्ति और ऋष्टि जैसे अस्त्र हाथ में लिए हुए युद्ध करते रहे और देवी को ललकारते हुए कहने लगे—ठहरो, ठहरो!
पातितै रथनागाश्वैरसुरैश्च वसुन्धरा।
अगम्या साभवत्तत्र यत्राभूत्स महारणः॥65॥
हिंदी अर्थ: जिस स्थान पर यह भयंकर युद्ध हुआ, वहाँ गिरे हुए रथों, हाथियों, घोड़ों और असुरों के शरीरों से धरती इतनी भर गई कि वहाँ से होकर गुजरना कठिन हो गया।
शोणितौघा महानद्यः सद्यस्तत्र प्रसुस्रुवुः।
मध्ये चासुरसैन्यस्य वारणासुरवाजिनाम्॥66॥
हिंदी अर्थ: युद्धभूमि में असुरों के रक्त की बड़ी-बड़ी धाराएँ बहने लगीं। हाथियों, घोड़ों और असुरों की विशाल सेना के बीच रक्त की धाराएँ मानो बड़ी नदियों के समान बहने लगीं।
क्षणेन तन्महासैन्यमसुराणां तथाम्बिका।
निन्ये क्षयं यथा वह्निस्तृणदारुमहाचयम्॥67॥
हिंदी अर्थ: अम्बिका देवी ने असुरों की उस विशाल सेना का थोड़े ही समय में उसी प्रकार विनाश कर दिया, जैसे अग्नि घास और लकड़ियों के बड़े ढेर को जला देती है।
स च सिंहो महानादमुत्सृजन्धुतकेसरः।
शरीरेभ्योऽमरारीणामसूनिव विचिन्वति॥68॥
हिंदी अर्थ: देवी का सिंह अपनी अयाल को झटकते हुए जोरदार गर्जना करता था और देवताओं के शत्रु असुरों के शरीरों से मानो उनके प्राण चुन लेता था।
देव्या गणैश्च तैस्तत्र कृतं युद्धं महासुरैः।
यथैषां तुतुषुर्देवाः पुष्पवृष्टिमुचो दिवि॥ॐ॥69॥
हिंदी अर्थ: वहाँ देवी और उनके गणों ने महाअसुरों के साथ ऐसा भयंकर युद्ध किया कि देवता अत्यंत प्रसन्न हुए और आकाश से पुष्पों की वर्षा करने लगे।
दुर्गा सप्तशती का द्वितीय अध्याय: हिंदी में विस्तृत पाठ
देवताओं और असुरों के बीच भयंकर युद्ध
दुर्गा सप्तशती के द्वितीय अध्याय में देवी के प्राकट्य और महिषासुर की विशाल सेना के संहार का वर्णन मिलता है। इस प्रसंग की शुरुआत देवताओं और असुरों के बीच हुए एक लंबे और भयंकर युद्ध से होती है।
प्राचीन समय में देवताओं और असुरों के बीच लगातार युद्ध हुआ। देवताओं का नेतृत्व देवराज इन्द्र कर रहे थे, जबकि असुरों की ओर से महिषासुर अत्यंत शक्तिशाली होकर युद्ध कर रहा था। लंबे समय तक चले इस संघर्ष में महिषासुर और उसकी असुर सेना ने देवताओं को पराजित कर दिया।
देवताओं की हार के बाद महिषासुर ने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। देवताओं के अधिकार और उनके पद छीन लिए गए। जिन स्थानों पर पहले देवताओं का अधिकार था, वहाँ महिषासुर और उसके असुरों का प्रभाव स्थापित हो गया। देवता अपने ही स्थानों से वंचित होकर अत्यंत दुखी हो गए।
महिषासुर ने केवल स्वर्ग पर अधिकार करके ही संतोष नहीं किया, बल्कि उसने देवताओं के अधिकारों को भी अपने नियंत्रण में ले लिया। सूर्य, चंद्रमा, इन्द्र, अग्नि, वायु, यम, वरुण और अन्य देवताओं से संबंधित अधिकार भी उसके अधीन हो गए। देवताओं के सामने ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई जिसमें वे स्वयं अपने स्थान और सम्मान से वंचित हो चुके थे।
देवताओं का भगवान विष्णु और भगवान शिव की शरण में जाना
अपनी पराजय और महिषासुर के अत्याचार से दुखी देवता एक साथ एकत्र हुए। वे प्रजापति ब्रह्मा को साथ लेकर भगवान विष्णु और भगवान शिव के पास पहुँचे।
देवताओं ने उन्हें अपनी पूरी स्थिति बताई। उन्होंने कहा कि महिषासुर ने उन्हें उनके अधिकारों से वंचित कर दिया है। स्वर्ग पर उसका अधिकार हो चुका है और देवताओं को वहाँ से बाहर कर दिया गया है। देवताओं ने भगवान विष्णु और भगवान शिव से इस संकट का समाधान करने तथा महिषासुर के अत्याचार से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की।
देवताओं की यह दशा सुनकर भगवान विष्णु और भगवान शिव सहित अन्य देवताओं के भीतर भी अत्यंत क्रोध उत्पन्न हुआ। उनके मुखमंडल पर क्रोध के भाव दिखाई देने लगे और उनके शरीर से अद्भुत दिव्य तेज निकलने लगा।
देवताओं के तेज से देवी का दिव्य प्राकट्य
भगवान विष्णु के मुख से एक अत्यंत प्रचंड तेज प्रकट हुआ। इसी प्रकार भगवान शिव, ब्रह्मा, इन्द्र और अन्य देवताओं के शरीर से भी दिव्य प्रकाश निकलने लगा। यह सभी तेज अलग-अलग न रहकर एक स्थान पर एकत्र होने लगे।
धीरे-धीरे वह दिव्य प्रकाश इतना विशाल और प्रचंड हो गया कि वह एक अग्निमय पर्वत के समान दिखाई देने लगा। उसकी चमक इतनी अधिक थी कि उसके सामने किसी दूसरे प्रकाश की कोई तुलना नहीं की जा सकती थी।
देवताओं ने देखा कि उनके शरीर से निकला हुआ समस्त तेज एक ही स्थान पर एकत्र होकर धीरे-धीरे एक दिव्य स्त्री के स्वरूप में बदल रहा है। यही देवी का प्राकट्य था।
देवी का यह स्वरूप अत्यंत तेजस्वी और दिव्य था। उनके प्रकाश से तीनों लोक प्रकाशित होने लगे। देवी के शरीर का प्रत्येक अंग अलग-अलग देवताओं के तेज से प्रकट हुआ। इस प्रकार देवी केवल किसी एक देवता की शक्ति का स्वरूप नहीं थीं, बल्कि सभी देवताओं की संयुक्त शक्ति का दिव्य रूप थीं।
भगवान शिव के तेज से देवी का मुख प्रकट हुआ। यमराज के तेज से उनके केश बने। भगवान विष्णु के तेज से उनकी भुजाएँ प्रकट हुईं। चंद्रमा के तेज से उनके स्तनों का प्राकट्य हुआ। इन्द्र के तेज से उनके शरीर के अन्य अंग और पृथ्वी के तेज से नितंब भाग का निर्माण हुआ।
ब्रह्मा के तेज से उनके चरण तथा सूर्य के तेज से उनके पैरों की अंगुलियाँ प्रकट हुईं। वसुओं के तेज से हाथों की अंगुलियाँ बनीं। कुबेर के तेज से उनकी नासिका, प्रजापति के तेज से दाँत, अग्नि के तेज से नेत्र, संध्या के तेज से भौंहें और वायु के तेज से कान प्रकट हुए।
इस प्रकार देवताओं के तेज से देवी का पूर्ण दिव्य स्वरूप प्रकट हुआ। देवी के प्रकट होते ही देवताओं के भीतर फिर से आशा और उत्साह का संचार हुआ।
देवताओं द्वारा देवी को दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्रदान करना
जब देवी प्रकट हुईं तो देवताओं ने उन्हें देखकर अत्यंत प्रसन्नता अनुभव की। सभी देवताओं ने समझ लिया कि यही वह शक्ति हैं जो महिषासुर के अत्याचार का अंत कर सकती हैं।
देवताओं ने अपनी-अपनी दिव्य शक्तियों और अस्त्र-शस्त्रों को देवी को अर्पित किया।
भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से एक त्रिशूल देवी को प्रदान किया। भगवान विष्णु ने अपना चक्र दिया। वरुण ने शंख और पाश प्रदान किए। अग्निदेव ने शक्ति दी और वायु ने धनुष तथा बाण दिए।
देवराज इन्द्र ने अपना वज्र देवी को प्रदान किया। ऐरावत हाथी की घंटा भी देवी को दी गई। यमराज ने अपना दंड प्रदान किया। प्रजापति ने माला दी और ब्रह्मा ने कमंडलु अर्पित किया।
सूर्य ने देवी के शरीर के प्रत्येक रोम में अपना तेज भर दिया। काल ने उन्हें तलवार और ढाल प्रदान की। देवी को दिव्य वस्त्र, आभूषण, मुकुट, कुंडल, कंकण, बाजूबंद, नूपुर, हार और अंगूठियाँ भी अर्पित की गईं।
विश्वकर्मा ने उन्हें फरसा तथा अन्य दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए। साथ ही अभेद्य कवच और सुंदर कमलों की मालाएँ भी दी गईं। समुद्र ने कमल का फूल अर्पित किया।
हिमालय ने देवी को सिंह की सवारी और अनेक बहुमूल्य रत्न प्रदान किए। कुबेर ने मधु से भरा पात्र दिया और शेषनाग ने मणियों से सुशोभित नागहार अर्पित किया।
इस प्रकार देवी का दिव्य स्वरूप अनेक अस्त्र-शस्त्रों और आभूषणों से सुशोभित हो गया। प्रत्येक अस्त्र किसी न किसी देवशक्ति का प्रतीक था और देवी उस समस्त शक्ति को अपने भीतर धारण किए हुए थीं।
देवी की प्रचंड गर्जना
दिव्य अस्त्र-शस्त्रों से सुशोभित होने के बाद देवी ने ऐसी प्रचंड गर्जना की कि उसकी आवाज तीनों लोकों में फैल गई। देवी के इस नाद से आकाश गूँज उठा और पृथ्वी, समुद्र तथा पर्वतों तक में हलचल उत्पन्न हो गई।
देवी के साथ उनका सिंह भी गर्जना करने लगा। देवी की शक्ति और उनके सिंह की गर्जना से वातावरण अत्यंत भयंकर और प्रभावशाली हो गया।
देवताओं ने देवी की जय-जयकार की और उनकी स्तुति की। उन्हें विश्वास हो गया कि अब महिषासुर के अत्याचार का अंत संभव है।
दूसरी ओर देवी की भयंकर गर्जना सुनकर असुरों में भी हलचल मच गई। महिषासुर को जब इस अद्भुत शक्ति के प्रकट होने का समाचार मिला तो वह क्रोध से भर उठा। उसने अपनी विशाल सेना को युद्ध के लिए तैयार किया।
महिषासुर की विशाल सेना देवी के सामने पहुँची
महिषासुर अपनी विशाल असुर सेना के साथ देवी की ओर बढ़ा। जब वह युद्धभूमि के निकट पहुँचा तो उसने देवी का विराट और तेजस्वी स्वरूप देखा।
देवी का शरीर अपने दिव्य प्रकाश से तीनों लोकों को प्रकाशित कर रहा था। उनके चरणों के प्रभाव से पृथ्वी दबती हुई प्रतीत होती थी। उनका मुकुट आकाश तक फैला हुआ दिखाई देता था। उनके धनुष की टंकार से चारों दिशाओं में कंपन उत्पन्न हो रहा था।
देवी अपनी अनेक भुजाओं में विभिन्न दिव्य अस्त्र धारण किए हुए थीं। उनका यह विराट स्वरूप देखकर भी महिषासुर पीछे नहीं हटा। उसने अपनी सेना को देवी पर आक्रमण करने का आदेश दिया।
महिषासुर की ओर से अनेक शक्तिशाली असुर सेनापति युद्ध के लिए आगे आए। चिक्षुर नामक असुर ने सेना का नेतृत्व किया। चामर भी अपनी सेना के साथ युद्ध में उतरा। उदग्र, महाहनु, असिलोमा, वाष्कल और विडाल जैसे असुर भी बड़ी संख्या में सैनिकों, रथों, हाथियों और घोड़ों के साथ युद्धभूमि में पहुँचे।
महिषासुर की सेना इतनी विशाल थी कि चारों दिशाएँ सैनिकों और युद्ध के साधनों से भर गईं। असुरों के हाथों में तरह-तरह के अस्त्र-शस्त्र थे।
देवी और असुरों के बीच भीषण युद्ध
युद्ध आरंभ होते ही असुरों ने देवी पर चारों ओर से आक्रमण कर दिया। किसी ने शक्ति चलाई, किसी ने भिंदिपाल और तोमर का प्रयोग किया, तो किसी ने तलवार, फरसा, मुसल और अन्य अस्त्र उठाए।
असुरों की ओर से लगातार अस्त्रों की वर्षा होने लगी। चारों दिशाएँ युद्ध के शोर से भर गईं। रथों की गति, हाथियों की चिंघाड़, घोड़ों की दौड़ और सैनिकों की गर्जना से पूरी रणभूमि भयंकर दिखाई देने लगी।
लेकिन देवी ने असुरों के किसी भी आक्रमण से भय नहीं खाया। वे अत्यंत शांत और दृढ़ भाव से युद्ध करती रहीं। उन्होंने अपने दिव्य अस्त्रों से असुरों के अस्त्रों को काटना शुरू कर दिया।
देवी का प्रत्येक प्रहार अत्यंत शक्तिशाली था। असुरों के हाथों से उनके अस्त्र गिरने लगे और अनेक असुर युद्धभूमि में धराशायी होने लगे।
देवी के गणों का प्रकट होना
युद्ध के दौरान देवी की शक्ति का एक और अद्भुत रूप दिखाई दिया। देवी के श्वास से अनेक गण उत्पन्न हुए। ये गण भी अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित होकर असुरों के विरुद्ध युद्ध करने लगे।
उनके हाथों में फरसे, भिंदिपाल, खड्ग और पट्टिश जैसे अस्त्र थे। वे असुरों पर आक्रमण करते हुए युद्धभूमि में आगे बढ़ रहे थे। उनके युद्ध के साथ ढोल, शंख और मृदंग आदि की ध्वनियाँ भी सुनाई दे रही थीं।
इससे युद्ध का दृश्य और भी प्रचंड हो गया। देवी की शक्ति से उत्पन्न ये गण असुर सेना पर लगातार प्रहार करते रहे।
देवी और सिंह ने असुरों का संहार किया
देवी ने त्रिशूल, गदा, शक्ति, तलवार और अन्य दिव्य अस्त्रों से असंख्य असुरों का वध किया। उनके प्रहार से असुरों की विशाल सेना में भगदड़ मचने लगी।
कई असुर देवी की घंटा की भयंकर ध्वनि से ही विचलित होकर भूमि पर गिर पड़े। कई असुर पाश में बाँध दिए गए। अनेक असुर तलवार और अन्य अस्त्रों के प्रहार से मारे गए।
देवी का सिंह भी असुर सेना के बीच भयंकर रूप से विचरण कर रहा था। वह असुरों पर झपटता, उन्हें परास्त करता और अपनी गर्जना से युद्धभूमि में भय उत्पन्न करता था।
देवी के गण भी लगातार असुरों से युद्ध कर रहे थे। इस प्रकार एक ओर देवी और उनका सिंह तथा दूसरी ओर देवी के गण, सभी मिलकर असुर सेना का सामना कर रहे थे।
असुर सेना में मची तबाही
युद्ध लगातार भयंकर होता गया। देवी के अस्त्रों और उनके गणों के प्रहार से असुरों के शरीर घायल होने लगे। अनेक असुरों के सिर, भुजाएँ और अन्य अंग कटकर भूमि पर गिरने लगे।
कुछ असुर ऐसे भी थे जो गंभीर रूप से घायल होने के बाद भी युद्धभूमि से पीछे नहीं हटे। वे बार-बार देवी को चुनौती देते हुए फिर से युद्ध करने के लिए आगे बढ़ते रहे।
कहीं टूटे हुए रथ पड़े थे, कहीं घायल और मृत हाथी तथा घोड़े दिखाई दे रहे थे और चारों ओर असुर सैनिकों के शव बिखरे हुए थे। युद्धभूमि का दृश्य अत्यंत भयंकर हो गया था।
असुरों की विशाल सेना धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही थी। देवी जिस दिशा में प्रहार करतीं, उसी दिशा में असुर सेना को भारी क्षति पहुँचती।
महिषासुर की सेना का विनाश
देवी ने जिस प्रकार थोड़े ही समय में असुरों की विशाल सेना को नष्ट किया, उसका वर्णन अत्यंत प्रभावशाली रूपक के साथ किया गया है। जैसे प्रचंड अग्नि सूखी घास और लकड़ियों के बड़े समूह को देखते ही देखते जला देती है, उसी प्रकार देवी ने महिषासुर की विशाल सेना को नष्ट कर दिया।
रणभूमि में असुरों का प्रभाव समाप्त होने लगा। देवी और उनके गणों की शक्ति के सामने महिषासुर के बड़े-बड़े योद्धा भी टिक नहीं सके।
देवी का सिंह असुर सेना के बीच उसी प्रकार घूम रहा था जैसे अग्नि किसी वन में फैलती हुई आगे बढ़ती है। उसकी गर्जना और देवी के अस्त्रों की चमक से पूरा युद्धक्षेत्र भयावह और दिव्य दोनों प्रतीत हो रहा था।
देवताओं ने देवी की विजय पर पुष्पवर्षा की
जब देवी और उनके गणों ने असुर सेना को भारी रूप से पराजित कर दिया, तब देवताओं का आनंद बढ़ गया। जो देवता पहले महिषासुर की शक्ति से भयभीत और अपने अधिकारों से वंचित थे, उन्हें अब देवी के रूप में अपनी रक्षा की आशा दिखाई देने लगी।
देवताओं ने देवी की स्तुति की और उनकी विजय पर प्रसन्न होकर आकाश से पुष्पों की वर्षा की। ऋषियों ने भी श्रद्धा और भक्ति के साथ देवी की आराधना की।
द्वितीय अध्याय का यह पूरा प्रसंग देवी की उस महाशक्ति को सामने रखता है जो देवताओं की संयुक्त शक्ति से प्रकट होती है। इसमें यह भी दिखाया गया है कि जब देवताओं की व्यक्तिगत शक्तियाँ असुरों का सामना करने में असफल हो जाती हैं, तब वही शक्तियाँ एकत्र होकर आदिशक्ति के रूप में प्रकट होती हैं।
महिषासुर की सेना का विनाश इसी दैवी शक्ति की पहली बड़ी विजय के रूप में सामने आता है। आगे के प्रसंगों में देवी और महिषासुर के बीच होने वाले निर्णायक युद्ध की भूमिका इसी अध्याय में तैयार होती है।
द्वितीय अध्याय का आध्यात्मिक संदेश
दुर्गा सप्तशती का यह अध्याय देवी की शक्ति और अधर्म के बीच संघर्ष का प्रभावशाली वर्णन करता है। महिषासुर ने देवताओं के अधिकार छीनकर व्यवस्था को चुनौती दी थी। जब देवता उसके अत्याचारों से पीड़ित हुए, तब सभी देवताओं का तेज एकत्र होकर देवी के रूप में प्रकट हुआ।
देवी को दिए गए विभिन्न अस्त्र-शस्त्र यह भाव भी सामने रखते हैं कि अनेक शक्तियाँ जब एक उद्देश्य के लिए एकजुट होती हैं, तो बड़ी से बड़ी चुनौती का सामना किया जा सकता है।
देवी का सिंह साहस और निर्भयता का प्रतीक दिखाई देता है। महिषासुर की विशाल सेना उसके बल और अहंकार को दर्शाती है, जबकि देवी की विजय धर्म और शक्ति की विजय का संदेश देती है।
दुर्गा सप्तशती द्वितीय अध्याय का पाठ
दुर्गा सप्तशती के द्वितीय अध्याय का पाठ श्रद्धा और एकाग्रता के साथ किया जाता है। संपूर्ण दुर्गा सप्तशती का पाठ करने वाले साधक अपनी परंपरा और गुरु से प्राप्त नियमों का पालन कर सकते हैं।
यदि कोई साधक केवल द्वितीय अध्याय का पाठ करना चाहता है, तो ऊपर दिया गया विनियोग, ध्यान और 1 से 69 तक का पूरा पाठ पढ़ सकता है।
निष्कर्ष
दुर्गा सप्तशती का द्वितीय अध्याय देवी के दिव्य प्राकट्य और महिषासुर की विशाल सेना के विनाश का विस्तृत वर्णन करता है। देवताओं के तेज से देवी का प्रकट होना और उन्हें विभिन्न दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्राप्त होना इस अध्याय का प्रमुख प्रसंग है।
इसके बाद देवी सिंह पर आरूढ़ होकर महिषासुर की विशाल सेना से युद्ध करती हैं। अनेक शक्तिशाली असुर सेनानायक उनके सामने आते हैं, लेकिन देवी और उनके गणों के सामने उनकी सेना टिक नहीं पाती। अंत में असुर सेना का विनाश होता है और देवता प्रसन्न होकर देवी की विजय का उत्सव मनाते हैं।
इस प्रकार यह अध्याय देवी की शक्ति, साहस और अधर्म के विनाश की कथा को अत्यंत प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती का द्वितीय अध्याय किस नाम से जाना जाता है?
दुर्गा सप्तशती का द्वितीय अध्याय महिषासुरसैन्यवध के नाम से जाना जाता है।
दुर्गा सप्तशती के द्वितीय अध्याय में क्या वर्णन है?
इस अध्याय में देवताओं की पराजय, देवताओं के तेज से देवी के प्राकट्य, देवी को दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्राप्त होने और महिषासुर की विशाल सेना के साथ देवी के युद्ध का वर्णन है।
देवी का प्राकट्य कैसे हुआ?
देवताओं के शरीर से निकले दिव्य तेज एक स्थान पर एकत्र हुए और उसी तेज से देवी का दिव्य स्वरूप प्रकट हुआ।
देवी को अस्त्र-शस्त्र किसने दिए?
इस अध्याय में भगवान शिव, भगवान विष्णु, वरुण, अग्नि, वायु, इंद्र, यम, ब्रह्मा, विश्वकर्मा, हिमवान, क्षीरसागर और अन्य देवताओं द्वारा देवी को विभिन्न अस्त्र-शस्त्र और आभूषण दिए जाने का वर्णन मिलता है।
द्वितीय अध्याय में किन असुरों का उल्लेख है?
इस अध्याय में चिक्षुर, चामर, उदग्र, महाहनु, असिलोमा, बाष्कल और बिडाल आदि असुर सेनानायकों का उल्लेख मिलता है।
द्वितीय अध्याय में कितने श्लोक हैं?
दुर्गा सप्तशती के द्वितीय अध्याय में 69 श्लोक हैं और इसका नाम महिषासुरसैन्यवध है।
