सप्तशतीन्यास में देवी दुर्गा का दिव्य स्वरूप

श्री दुर्गा सप्तशती—सप्तशतीन्यास (Shri Durga Saptashati—Saptashatinyas)

श्री दुर्गा सप्तशती—सप्तशतीन्यास दुर्गा सप्तशती के पाठ की एक महत्वपूर्ण प्रारम्भिक विधि मानी जाती है। इसमें देवी के विभिन्न स्वरूपों, शक्तियों और आयुधों का स्मरण करते हुए मंत्रों के द्वारा शरीर के विभिन्न अंगों पर न्यास किया जाता है। इसका उद्देश्य साधक के मन को एकाग्र करना और देवी की उपासना के लिए स्वयं को तैयार करना है।

सप्तशतीन्यास में मुख्य रूप से विनियोग, करन्यास, हृदयादिन्यास और ध्यान का विधान मिलता है। इसके बाद साधक दुर्गा सप्तशती के पाठ का आरम्भ करता है। परंपरागत पाठ-विधि में न्यास के बाद प्रथम अध्याय का पाठ किया जाता है।

॥ सप्तशतीन्यासः ॥

तदनन्तर सप्तशती के विनियोग, न्यास और ध्यान करने चाहिये। न्यास की प्रणाली पूर्ववत् है।

विनियोग

प्रथममध्यमोत्तरचरित्राणां ब्रह्मविष्णुरुद्रा ऋषयः, श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वत्यो देवताः,
गायत्र्युष्णिगनुष्टुभश्छन्दांसि, नन्दाशाकम्भरीभीमाः शक्तयः, रक्तदन्तिकादुर्गाभ्रामर्यो बीजानि, अग्निवायुसूर्यास्तत्त्वानि, ऋग्यजुःसामवेदा ध्यानानि, सकलकामनासिद्धये
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीदेवताप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः।

सरल हिंदी अर्थ

दुर्गा सप्तशती के प्रथम, मध्यम और उत्तर चरित्र के ऋषि क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र हैं। इन तीनों चरित्रों की देवियाँ क्रमशः श्रीमहाकाली, श्रीमहालक्ष्मी और श्रीमहासरस्वती हैं।

इनके छंद क्रमशः गायत्री, उष्णिक् और अनुष्टुप् माने गए हैं। नन्दा, शाकम्भरी और भीमा इनकी शक्तियाँ हैं। रक्तदन्तिका, दुर्गा और भ्रामरी इनके बीज माने गए हैं। अग्नि, वायु और सूर्य इनके तत्त्व हैं तथा ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद इनके ध्यान से संबंधित हैं।

श्रीमहाकाली, श्रीमहालक्ष्मी और श्रीमहासरस्वती देवी की प्रसन्नता तथा साधक की समस्त कामनाओं की सिद्धि के उद्देश्य से इस जप का विनियोग किया जाता है।

करन्यास

करन्यास में हाथों की अंगुलियों और हथेलियों पर मंत्रों का न्यास किया जाता है।

1. अंगूठों पर न्यास

ॐ खड्गिनी शूलिनी घोरा गदिनी चक्रिणी तथा।
शङ्खिनी चापिनी बाणभुशुण्डीपरिघायुधा॥
अङ्गुष्ठाभ्यां नमः।

सरल हिंदी अर्थ

हे देवी! आप खड्ग, त्रिशूल, गदा, चक्र, शंख, धनुष, बाण, भुशुण्डी और परिघ जैसे अनेक आयुध धारण करने वाली हैं। हे देवी, आपको नमस्कार है।

2. तर्जनी अंगुलियों पर न्यास

ॐ शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके।
घण्टास्वनेन नः पाहि चापज्यानिःस्वनेन च॥
तर्जनीभ्यां नमः।

सरल हिंदी अर्थ

हे देवी! आप अपने त्रिशूल से हमारी रक्षा करें और हे अम्बिके, अपने खड्ग से हमारी रक्षा करें। अपनी घंटी की ध्वनि तथा धनुष की प्रत्यंचा की टंकार से भी हमारी रक्षा करें।

3. मध्यमा अंगुलियों पर न्यास

ॐ प्राच्यां रक्ष प्रतीच्यां च चण्डिके रक्ष दक्षिणे।
भ्रामणेनात्मशूलस्य उत्तरस्यां तथेश्वरि॥
मध्यमाभ्यां नमः।

सरल हिंदी अर्थ

हे चण्डिके! पूर्व दिशा में हमारी रक्षा करें, पश्चिम दिशा में हमारी रक्षा करें और दक्षिण दिशा में भी हमारी रक्षा करें। हे ईश्वरी! अपने त्रिशूल के प्रभाव से उत्तर दिशा की भी रक्षा करें।

4. अनामिका अंगुलियों पर न्यास

ॐ सौम्यानि यानि रूपाणि त्रैलोक्ये विचरन्ति ते।
यानि चात्यर्थघोराणि तै रक्षास्मांस्तथा भुवम्॥
अनामिकाभ्यां नमः।

सरल हिंदी अर्थ

हे देवी! आपके जो शांत और सौम्य स्वरूप तीनों लोकों में विद्यमान हैं और आपके जो अत्यंत भयंकर स्वरूप हैं, उन सभी स्वरूपों की शक्ति से हमारी तथा इस संसार की रक्षा करें।

5. कनिष्ठिका अंगुलियों पर न्यास

ॐ खड्गशूलगदादीनि यानि चास्त्राणि तेऽम्बिके।
करपल्लवसङ्गीनि तैरस्मान् रक्ष सर्वतः॥
कनिष्ठिकाभ्यां नमः।

सरल हिंदी अर्थ

हे अम्बिके! आपके हाथों में सुशोभित खड्ग, त्रिशूल, गदा और अन्य सभी अस्त्र-शस्त्र हैं। उन्हीं दिव्य आयुधों के द्वारा हमारी चारों ओर से रक्षा करें।

6. हथेलियों और हाथों के पिछले भाग पर न्यास

ॐ सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते।
भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते॥
करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः।

सरल हिंदी अर्थ

हे देवी! आप सभी स्वरूपों वाली, सभी की अधीश्वरी और समस्त शक्तियों से युक्त हैं। हे दुर्गे! हमें सभी प्रकार के भय से बचाइए। हे देवी, आपको बार-बार नमस्कार है।

हृदयादिन्यास

करन्यास के बाद इन्हीं मंत्रों के द्वारा शरीर के प्रमुख अंगों पर हृदयादिन्यास किया जाता है।

1. हृदय पर न्यास

ॐ खड्गिनी शूलिनी घोरा गदिनी चक्रिणी तथा।
शङ्खिनी चापिनी बाणभुशुण्डीपरिघायुधा॥
हृदयाय नमः।

सरल हिंदी अर्थ

हे देवी! आप अनेक दिव्य आयुध धारण करने वाली और सभी प्रकार की शक्ति से संपन्न हैं। आपके इस शक्तिशाली स्वरूप को हृदय में स्मरण करते हुए आपको नमस्कार है।

2. सिर पर न्यास

ॐ शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके।
घण्टास्वनेन नः पाहि चापज्यानिःस्वनेन च॥
शिरसे स्वाहा।

सरल हिंदी अर्थ

हे देवी! त्रिशूल और खड्ग से हमारी रक्षा करें। अपनी घंटी की पवित्र ध्वनि और धनुष की टंकार से भी हमारी रक्षा करें।

3. शिखा पर न्यास

ॐ प्राच्यां रक्ष प्रतीच्यां च चण्डिके रक्ष दक्षिणे।
भ्रामणेनात्मशूलस्य उत्तरस्यां तथेश्वरि॥
शिखायै वषट्।

सरल हिंदी अर्थ

हे चण्डिके! पूर्व, पश्चिम और दक्षिण दिशा में हमारी रक्षा करें। हे ईश्वरी! अपने त्रिशूल की शक्ति से उत्तर दिशा की भी रक्षा करें।

4. कवच के रूप में न्यास

ॐ सौम्यानि यानि रूपाणि त्रैलोक्ये विचरन्ति ते।
यानि चात्यर्थघोराणि तै रक्षास्मांस्तथा भुवम्॥
कवचाय हुम्।

सरल हिंदी अर्थ

हे देवी! आपके सभी शांत, कल्याणकारी और उग्र स्वरूपों की शक्ति हमारे चारों ओर सुरक्षा का कवच बनाए। हमारी और इस संसार की रक्षा करें।

5. तीनों नेत्रों पर न्यास

ॐ खड्गशूलगदादीनि यानि चास्त्राणि तेऽम्बिके।
करपल्लवसङ्गीनि तैरस्मान् रक्ष सर्वतः॥
नेत्रत्रयाय वौषट्।

सरल हिंदी अर्थ

हे अम्बिके! आपके हाथों में धारण किए हुए खड्ग, त्रिशूल, गदा और अन्य सभी दिव्य अस्त्र हमारी चारों दिशाओं से रक्षा करें और हमारे भीतर दिव्य दृष्टि तथा सजगता बनाए रखें।

6. अस्त्र के रूप में न्यास

ॐ सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते।
भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते॥
अस्त्राय फट्।

सरल हिंदी अर्थ

हे सभी स्वरूपों वाली देवी! आप समस्त शक्तियों से संपन्न हैं। हमें हर प्रकार के भय से बचाइए। हे दुर्गे, आपको नमस्कार है। आपकी शक्ति हमारे चारों ओर रक्षा का साधन बने।

ध्यान

न्यास के बाद देवी के स्वरूप का ध्यान किया जाता है।

ॐ विद्युद्दामसमप्रभां मृगपतिस्कन्धस्थितां भीषणां
कन्याभिः करवालखेटविलसद्धस्ताभिरासेविताम्।
हस्तैश्चक्रगदासिखेटविशिखांश्चापं गुणं तर्जनीं
बिभ्राणामनलात्मिकां शशिधरां दुर्गां त्रिनेत्रां भजे॥

सरल हिंदी अर्थ

मैं उन त्रिनेत्र वाली देवी दुर्गा का ध्यान करता हूँ, जिनका तेज बिजली के समान चमकता है और जो सिंह के कंधे पर विराजमान हैं। उनका स्वरूप तेजस्वी और प्रभावशाली है।

वे ऐसी कन्याओं से सेवित हैं जिनके हाथों में तलवार और ढाल सुशोभित हैं। देवी अपने हाथों में चक्र, गदा, तलवार, ढाल, बाण, धनुष और उसकी प्रत्यंचा धारण करती हैं। वे अग्नि के समान तेजस्विनी हैं और उनके मस्तक पर चंद्रमा सुशोभित है।

सप्तशतीन्यास के बाद क्या करें?

सप्तशतीन्यास पूरा करने के बाद साधक दुर्गा सप्तशती के पाठ की ओर आगे बढ़ता है। परंपरागत पाठ-विधि में इसके बाद प्रथम अध्याय से पाठ आरम्भ किया जाता है।

दुर्गा सप्तशती का पाठ करते समय मंत्रों और श्लोकों का उच्चारण यथासंभव स्पष्ट और शुद्ध रखना चाहिए। पाठ को बहुत जल्दी-जल्दी पढ़ने के बजाय शांत भाव से देवी का स्मरण करते हुए करना अधिक उचित माना जाता है।

यदि कोई व्यक्ति संपूर्ण दुर्गा सप्तशती का पाठ कर रहा है, तो अपने परिवार या परंपरा में चली आ रही पाठ-विधि का पालन करना अच्छा रहता है। अलग-अलग परंपराओं में न्यास और पाठ के क्रम में कुछ छोटे अंतर मिल सकते हैं, इसलिए किसी विशेष अनुष्ठान या पुरश्चरण के लिए गुरु अथवा अपनी परंपरा की विधि को प्राथमिकता देनी चाहिए।

सप्तशतीन्यास का सरल क्रम

सप्तशतीन्यास को समझने के लिए इसका सामान्य क्रम इस प्रकार रखा जा सकता है—

  1. विनियोग
  2. करन्यास
  3. हृदयादिन्यास
  4. देवी का ध्यान
  5. इसके बाद दुर्गा सप्तशती के पाठ का आरम्भ

इस क्रम में पहले साधक अपने संकल्प और उपासना के उद्देश्य का स्मरण करता है। इसके बाद हाथों और शरीर के प्रमुख अंगों पर देवी के मंत्रों का न्यास किया जाता है। अंत में देवी के स्वरूप का ध्यान करके सप्तशती पाठ की ओर बढ़ा जाता है।

सप्तशतीन्यास का महत्व

न्यास का भाव केवल मंत्र बोलने तक सीमित नहीं है। इसमें साधक देवी की शक्ति को अपने शरीर, मन और चेतना से जोड़ने का भाव रखता है। करन्यास में हाथों को देवी के कार्यों के लिए पवित्र करने का भाव है, जबकि हृदयादिन्यास में शरीर के प्रमुख अंगों पर देवी की शक्ति का स्मरण किया जाता है।

सप्तशतीन्यास में देवी के शांत और उग्र दोनों स्वरूपों का स्मरण मिलता है। इससे साधक के भीतर यह भाव जागृत होता है कि देवी की शक्ति केवल कल्याण और शांति की ही नहीं, बल्कि संकट और भय से रक्षा करने वाली भी है।

इसलिए दुर्गा सप्तशती के पाठ से पहले किया जाने वाला न्यास साधना की तैयारी के रूप में महत्वपूर्ण माना जाता है।

निष्कर्ष

श्री दुर्गा सप्तशती—सप्तशतीन्यास दुर्गा सप्तशती की पाठ-विधि का एक महत्वपूर्ण अंग है। इसमें विनियोग के माध्यम से उपासना का उद्देश्य और देवता आदि का स्मरण किया जाता है। करन्यास और हृदयादिन्यास में देवी के मंत्रों द्वारा हाथों तथा शरीर के प्रमुख अंगों का स्मरण किया जाता है और अंत में देवी के दिव्य स्वरूप का ध्यान किया जाता है।

न्यास के बाद श्रद्धा और एकाग्रता के साथ दुर्गा सप्तशती का पाठ किया जा सकता है। साधना में शुद्ध उच्चारण के साथ श्रद्धा, संयम और नियमितता का भी विशेष महत्व है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सप्तशतीन्यास क्या है?

सप्तशतीन्यास दुर्गा सप्तशती के पाठ से पहले की जाने वाली एक पारंपरिक विधि है, जिसमें देवी के मंत्रों का विनियोग करके हाथों और शरीर के विभिन्न अंगों पर न्यास किया जाता है।

सप्तशतीन्यास कब किया जाता है?

सामान्य पाठ-विधि में दुर्गा सप्तशती का पाठ आरम्भ करने से पहले सप्तशतीन्यास किया जाता है। इसके बाद देवी का ध्यान करके सप्तशती के पाठ की शुरुआत की जाती है।

सप्तशतीन्यास में कौन-कौन से भाग होते हैं?

इसमें मुख्य रूप से विनियोग, करन्यास, हृदयादिन्यास और देवी का ध्यान शामिल हैं।

करन्यास में क्या किया जाता है?

करन्यास में देवी के मंत्रों का उच्चारण करते हुए अंगूठे, तर्जनी, मध्यमा, अनामिका, कनिष्ठिका तथा हथेलियों और हाथों के पिछले भाग पर न्यास किया जाता है।

हृदयादिन्यास में क्या किया जाता है?

हृदयादिन्यास में देवी के मंत्रों का प्रयोग हृदय, सिर, शिखा, कवच, तीनों नेत्रों और अस्त्र के रूप में किया जाता है।

क्या सप्तशतीन्यास के बाद दुर्गा सप्तशती का पाठ किया जाता है?

हाँ। पारंपरिक पाठ-विधि में सप्तशतीन्यास के बाद देवी का ध्यान करके दुर्गा सप्तशती के पाठ का आरम्भ किया जाता है।

क्या सप्तशतीन्यास हर व्यक्ति स्वयं कर सकता है?

सामान्य श्रद्धापूर्वक पाठ के लिए लोग अपनी परंपरा के अनुसार न्यास करते हैं। लेकिन विशेष अनुष्ठान, पुरश्चरण या किसी विशिष्ट साधना में गुरु अथवा अपनी पारंपरिक विधि का मार्गदर्शन लेना उचित है।

भगवान / God

साईं बाबा मंत्र जाप करते हुए शिरडी साईं बाबा का दिव्य स्वरूप

श्री शिरडी साईं बाबा (Shri Shirdi Sai Baba)​

भगवान और गुरु पर सच्चा विश्वास मनुष्य के जीवन को बदल सकता है। श्री शिरडी साईं बाबा (Shri Shirdi Sai Baba) की शिक्षाएं भी इसी सत्य को दर्शाती हैं। उनका संदेश था कि जीवन में

भगवान श्री हनुमान (Lord Shree Hanuman)​

भगवान श्री हनुमान (Lord Shree Hanuman) सनातन धर्म में भक्ति, निष्ठा और अपार शक्ति के सबसे महान प्रतीकों में माने जाते हैं। Bhakti Margdarshan के अनुसार जब कोई भक्त बिना किसी स्वार्थ और अपेक्षा के

भगवान श्री राम (Lord Shri Ram)​

भगवान श्रीराम (Lord Shri Ram) हिंदू धर्म के सबसे पूजनीय देवताओं में से एक माने जाते हैं। उन्हें धर्म, सत्य, साहस और आदर्श जीवन का प्रतीक माना जाता है। वैष्णव परंपरा में श्रीराम को भगवान

भगवान श्री गणेश जी (Lord Shri Ganesha)

भगवान श्री गणेश (Lord Shree Ganesha) – प्रथम पूज्य विघ्नहर्ता की सम्पूर्ण कथा और महिमा भगवान श्री गणेश (Lord Shree Ganesha) हिंदू धर्म के सबसे प्रिय और प्रथम पूज्य देवताओं…

मंदिर (Temple)

वृंदावन का बांके बिहारी मंदिर

बांके बिहारी मंदिर वृंदावन: इतिहास, कथा, दर्शन समय और महत्व (Banke Bihari Mandir Vrindavan)

वृंदावन के प्रसिद्ध बांके बिहारी मंदिर का इतिहास, श्री बांके बिहारी जी के प्राकट्य की परंपरा, स्वामी हरिदास जी से संबंध, दर्शन समय और मंदिर की विशेष सेवा-पद्धति विस्तार से जानें।
वृंदावन का प्रेम मंदिर राधा कृष्ण मंदिर

प्रेम मंदिर, वृंदावन: इतिहास, दर्शन समय, राधा-कृष्ण की झांकियां और यात्रा की पूरी जानकारी (Prem Mandir Vrindavan)

प्रेम मंदिर वृंदावन भगवान श्रीराधा-कृष्ण और श्रीसीताराम को समर्पित भव्य मंदिर है। जानिए इसका इतिहास, वास्तुकला, दर्शन समय, कृष्ण लीला की झांकियां और म्यूजिकल एवं डिजिटल फाउंटेन की पूरी जानकारी।
घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर महाराष्ट्र

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर की अद्भुत कथा: घुश्मा की भक्ति से कैसे प्रकट हुए भगवान शिव? जानिए मंदिर का इतिहास और रहस्य (Grishneshwar Jyotirlinga Mandir)

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में 12वां और अंतिम ज्योतिर्लिंग माना जाता है। जानिए घुश्मा की अद्भुत शिवभक्ति से जुड़ी पौराणिक कथा, मंदिर का इतिहास, अहिल्याबाई होलकर का योगदान, शानदार वास्तुकला, पूजा-पद्धति, दर्शन
भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग मंदिर महाराष्ट्र

भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग मंदिर: भगवान शिव ने क्यों धारण किया भीमाशंकर रूप? जानिए कथा, इतिहास और मंदिर का रहस्य (Bhimashankar Jyotirlinga Mandir)

भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के 12 पवित्र ज्योतिर्लिंगों में से एक है। महाराष्ट्र के सह्याद्री पर्वतों में स्थित इस पवित्र मंदिर से भीमासुर की कथा, प्राचीन इतिहास, सुंदर नागर स्थापत्य, भीमा नदी और प्राकृतिक सौंदर्य

ब्लॉग / Blog

0%
लिंक कॉपी हो गया ✓
Scroll to Top