देवी अपराध क्षमापना स्तोत्रम् का परिचय
देवी अपराध क्षमापना स्तोत्रम् माता भगवती से अपने जाने-अनजाने अपराधों, पूजा में हुई त्रुटियों और साधना की कमियों के लिए क्षमा मांगने वाला अत्यंत भावपूर्ण स्तोत्र है। इसमें भक्त माता के सामने अपनी असमर्थता स्वीकार करते हुए कहता है कि उसे पूजा की विधि, मंत्र, यंत्र, ध्यान और उपासना की सभी विधियां ठीक प्रकार से ज्ञात नहीं हैं, फिर भी वह माता की शरण को ही अपना सबसे बड़ा सहारा मानता है।
इस स्तोत्र में भक्त का भाव अत्यंत विनम्र है। वह माता से कहता है कि पुत्र से भूल हो सकती है, लेकिन माता कभी कुमाता नहीं होती। इसी कारण यह स्तोत्र देवी के प्रति शरणागति, आत्मसमर्पण और क्षमायाचना का सुंदर उदाहरण माना जाता है।
॥ अथ देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम् ॥
न मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो
न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथाः।
न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं
परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम्॥१॥
हिन्दी अर्थ: हे माता! मुझे न तो मंत्र का ज्ञान है, न यंत्र का और न ही आपकी स्तुति करने की पूरी विधि आती है। मुझे आवाहन, ध्यान और स्तुति की विधियां भी ठीक से ज्ञात नहीं हैं। आपकी मुद्राओं और अपनी व्यथा व्यक्त करने की विधि से भी मैं अनजान हूं। मैं केवल इतना जानता हूं कि आपकी शरण में आना ही मेरे सभी क्लेशों को दूर करने वाला है।
विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया
विधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्या च्युतिरभूत्।
तदेतत् क्षन्तव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति॥२॥
हिन्दी अर्थ: हे सबका उद्धार करने वाली जननी! पूजा की विधि न जानने, साधनों के अभाव, आलस्य अथवा अपनी असमर्थता के कारण आपके चरणों की सेवा में जो भी कमी रह गई है, उसे क्षमा करें। पुत्र कभी कुपुत्र हो सकता है, लेकिन माता कभी कुमाता नहीं होती।
पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः सन्ति सरलाः
परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं तव सुतः।
मदीयोऽयं त्यागः समुचितमिदं नो तव शिवे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति॥३॥
हिन्दी अर्थ: हे माता! इस पृथ्वी पर आपके अनेक सरल और सदाचारी पुत्र हैं, लेकिन मैं उन सबके बीच अत्यंत चंचल और अस्थिर हूं। हे शिवे! मेरा इस प्रकार आपकी उपासना से दूर रहना आपके लिए उचित नहीं है। क्योंकि पुत्र कुपुत्र हो सकता है, पर माता कभी कुमाता नहीं होती।
जगन्मातर्मातस्तव चरणसेवा न रचिता
न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया।
तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति॥४॥
हिन्दी अर्थ: हे जगन्माता! मैंने आपके चरणों की उचित सेवा नहीं की और न ही आपको पर्याप्त धन या पूजा-सामग्री अर्पित की। फिर भी आप मुझ पर अनुपम स्नेह रखती हैं। यही माता के वात्सल्य की विशेषता है कि पुत्र कुपुत्र हो सकता है, लेकिन माता कभी कुमाता नहीं होती।
परित्यक्ता देवा विविधविधसेवाकुलतया
मया पञ्चाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि।
इदानीं चेन्मातस्तव यदि कृपा नापि भविता
निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम्॥५॥
हिन्दी अर्थ: हे गणेशजी की माता! विभिन्न देवताओं की अनेक प्रकार की सेवाओं में लगा रहने के कारण मैंने अपनी आयु का बड़ा भाग व्यतीत कर दिया। अब यदि इस समय भी आपकी कृपा मुझे प्राप्त न हो, तो निराश्रित होकर मैं किसकी शरण में जाऊं?
श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा
निरातङ्को रङ्को विहरति चिरं कोटिकनकैः।
तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं
जनः को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ॥६॥
हिन्दी अर्थ: हे अपर्णे! आपके मंत्र के अक्षर जब भक्त के कानों में प्रवेश करते हैं, तो उसका प्रभाव अद्भुत होता है। साधारण वाणी वाला भी मधुर वाणी प्राप्त कर सकता है और निर्धन व्यक्ति भी समृद्धि का अनुभव कर सकता है। आपके मंत्र-जप की वास्तविक महिमा को कौन पूरी तरह जान सकता है?
चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पटधरो
जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपतिः।
कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं
भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम्॥७॥
हिन्दी अर्थ: भगवान शिव शरीर पर चिताभस्म लगाते हैं, विष को धारण करते हैं, दिशाओं को ही वस्त्र के रूप में धारण करने वाले हैं, जटाधारी हैं और गले में सर्प धारण करते हैं। वे कपाल धारण करने वाले तथा भूतों के स्वामी हैं, फिर भी जगत के ईश्वर के पद को प्राप्त हैं। हे भवानी! यह सब आपके साथ उनके विवाह और आपके पाणिग्रहण का दिव्य फल माना गया है।
न मोक्षस्याकाङ्क्षा भवविभववाञ्छापि च न मे
न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुनः।
अतस्त्वां संयाचे जननि जननं यातु मम वै
मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपतः॥८॥
हिन्दी अर्थ: हे चंद्रमुखी माता! मुझे मोक्ष की इच्छा नहीं है, संसार के वैभव की भी कामना नहीं है। मुझे विशेष ज्ञान अथवा सांसारिक सुख की भी इच्छा नहीं है। मेरी केवल यही प्रार्थना है कि मेरा जीवन आपका नाम—“मृडानी, रुद्राणी, शिव, भवानी”—जपते हुए बीते।
नाराधितासि विधिना विविधोपचारैः
किं रुक्षचिन्तनपरैर्न कृतं वचोभिः।
श्यामे त्वमेव यदि किञ्चन मय्यनाथे
धत्से कृपामुचितमम्ब परं तवैव॥९॥
हिन्दी अर्थ: हे श्यामवर्णा माता! मैंने विधिपूर्वक आपकी आराधना नहीं की और विविध पूजा-उपचारों से भी आपकी सेवा नहीं कर सका। मेरे कठोर और असावधान शब्दों से भी अनेक भूलें हुई होंगी। फिर भी यदि आप जैसे अनाथ और असमर्थ भक्त पर थोड़ी-सी कृपा करती हैं, तो यह केवल आपकी ही करुणा है।
आपत्सु मग्नः स्मरणं त्वदीयं
करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि।
नैतच्छठत्वं मम भावयेथाः
क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति॥१०॥
हिन्दी अर्थ: हे दुर्गे, करुणा के अथाह सागर की अधीश्वरी! संकट में पड़कर ही मैं आपका स्मरण करता हूं। मेरे इस व्यवहार को छल या कपट न समझें। जिस प्रकार भूख और प्यास से व्याकुल बालक अपनी माता को याद करता है, उसी प्रकार संकट से घिरकर मैं आपको पुकारता हूं।
जगदम्ब विचित्रमत्र किं परिपूर्णा करुणास्ति चेन्मयि।
अपराधपरम्परावृतं न हि माता समुपेक्षते सुतम्॥११॥
हिन्दी अर्थ: हे जगदम्बे! इसमें आश्चर्य ही क्या है? यदि आपके हृदय में मेरे लिए पूर्ण करुणा है, तो मेरे अनेक अपराधों के बावजूद आप मुझे कैसे छोड़ सकती हैं? माता अपने पुत्र की अनेक भूलों के कारण भी उसे उपेक्षित नहीं करती।
मत्समः पातकी नास्ति पापघ्नी त्वत्समा न हि।
एवं ज्ञात्वा महादेवि यथायोग्यं तथा कुरु॥१२॥
हिन्दी अर्थ: मेरे समान बड़ा पापी कोई नहीं है और आपके समान पापों का नाश करने वाली भी कोई नहीं है। हे महादेवी! इस सत्य को जानकर अब आप मेरे लिए जो उचित समझें, वही करें।
।इति श्रीशङ्कराचार्यविरचितं देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रं सम्पूर्णम्।
देवी अपराध क्षमापना स्तोत्रम् का महत्व
देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम् का मुख्य भाव क्षमा-याचना और आत्मसमर्पण है। इसमें भक्त अपनी कमियों को छिपाने के बजाय उन्हें माता के सामने स्वीकार करता है और उनसे कृपा की प्रार्थना करता है।
इस स्तोत्र की विशेषता यह है कि इसमें केवल बाहरी पूजा-विधि की चर्चा नहीं है, बल्कि भक्त के मन की विनम्रता और माता के प्रति विश्वास को प्रमुखता दी गई है। “कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति” की भावना पूरे स्तोत्र में माता के वात्सल्य और करुणा को विशेष रूप से सामने लाती है।
दुर्गा सप्तशती पाठ में देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम्
देवी उपासना की विभिन्न परंपराओं में देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम् का पाठ माता से पूजा-पाठ में हुई त्रुटियों के लिए क्षमा मांगने के भाव से किया जाता है। इसलिए दुर्गा सप्तशती की उपासना के संदर्भ में भी इसका पाठ प्रचलित है।
हालांकि इसे दुर्गा सप्तशती के मूल 13 अध्यायों का हिस्सा समझना उचित नहीं है। यह एक स्वतंत्र देवी-स्तोत्र है, जिसका प्रयोग देवी-उपासना में क्षमायाचना के लिए किया जाता है।
देवी अपराध क्षमापना स्तोत्रम् का पाठ कब करें?
इस स्तोत्र का पाठ नवरात्रि, दुर्गा पूजा, देवी उपासना अथवा दुर्गा सप्तशती के पाठ के बाद क्षमायाचना के भाव से किया जा सकता है। नियमित साधना करने वाले भक्त भी श्रद्धा के अनुसार इसका पाठ कर सकते हैं।
पाठ करते समय मन में माता के प्रति श्रद्धा और विनम्रता रखना अधिक महत्वपूर्ण है। अपनी पूजा में हुई भूलों को स्वीकार करके माता से क्षमा मांगना इस स्तोत्र का मूल भाव है।
देवी अपराध क्षमापना स्तोत्रम् का मुख्य भाव
इस स्तोत्र में भक्त माता से यह नहीं कहता कि उसने पूर्ण विधि से पूजा की है। इसके विपरीत वह अपनी अज्ञानता, असमर्थता, आलस्य और पूजा में हुई कमियों को स्वीकार करता है। वह माता से केवल कृपा और शरण मांगता है।
यही कारण है कि यह स्तोत्र भक्त और देवी के बीच माता-पुत्र के आत्मीय संबंध को बहुत सुंदर ढंग से व्यक्त करता है।
निष्कर्ष
देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम् माता भगवती के चरणों में की गई विनम्र क्षमायाचना है। इसके 12 श्लोकों में भक्त अपनी पूजा की कमियों को स्वीकार करते हुए माता से करुणा और शरण की प्रार्थना करता है।
इस स्तोत्र का सबसे सुंदर संदेश यही है कि भक्त अपनी भूलों को छिपाने के बजाय उन्हें स्वीकार करके माता के सामने समर्पित करे। श्रद्धा, विनम्रता और आत्मसमर्पण के साथ किया गया देवी-स्मरण भक्त के लिए आध्यात्मिक रूप से महत्वपूर्ण साधना बन सकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
देवी अपराध क्षमापना स्तोत्रम् क्या है?
देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम् माता भगवती से पूजा और साधना में हुई भूलों के लिए क्षमा मांगने वाला 12 श्लोकों का स्तोत्र है।
देवी अपराध क्षमापना स्तोत्रम् में कितने श्लोक हैं?
इस स्तोत्र में 12 श्लोक हैं।
देवी अपराध क्षमापना स्तोत्रम्का पाठ क्यों किया जाता है?
इसका पाठ देवी से पूजा-पद्धति की कमियों, अज्ञानता और जाने-अनजाने हुए अपराधों के लिए क्षमा मांगने तथा माता की शरण ग्रहण करने के भाव से किया जाता है।
क्या इसे दुर्गा सप्तशती के साथ पढ़ सकते हैं?
हाँ, देवी-उपासना की प्रचलित परंपराओं में इसका पाठ दुर्गा सप्तशती की साधना के संदर्भ में किया जाता है। लेकिन इसे दुर्गा सप्तशती के 13 मूल अध्यायों में शामिल श्लोक नहीं समझना चाहिए।
देवी अपराध क्षमापना स्तोत्रम् के रचयिता कौन माने जाते हैं?
आपके दिए पाठ के समापन में इसे श्रीशङ्कराचार्यविरचित कहा गया है। विभिन्न स्रोतों में समापन-पंक्ति के पाठ में थोड़ा अंतर मिलता है, इसलिए इसे परंपरागत रूप से आदि शंकराचार्य से संबद्ध स्तोत्र के रूप में प्रस्तुत करना अधिक उचित है।
