दुर्गा सप्तशती का आठवाँ अध्याय – रक्तबीजवध
दुर्गा सप्तशती आठवाँ अध्याय रक्तबीजवध के नाम से प्रसिद्ध है। इस अध्याय में देवी चण्डिका और उनकी विभिन्न देवशक्तियों का असुरों के साथ भयंकर युद्ध होता है। इसी युद्ध में रक्तबीज नाम का अत्यंत शक्तिशाली असुर सामने आता है।
रक्तबीज की विशेषता यह थी कि उसके शरीर से निकलने वाली रक्त की प्रत्येक बूंद पृथ्वी पर गिरते ही उसी के समान एक नया असुर उत्पन्न कर देती थी। इस कारण देवी की शक्तियों के लिए उसका वध करना कठिन हो जाता है। अंत में देवी चण्डिका चामुण्डा को आदेश देती हैं कि रक्तबीज के शरीर से निकलने वाला रक्त पृथ्वी पर न गिरने दें। चामुण्डा उसके रक्त को ग्रहण करती जाती हैं और इस प्रकार नए असुरों का उत्पन्न होना रुक जाता है। अंत में देवी रक्तबीज का वध कर देती हैं।
॥ श्रीदुर्गासप्तशती – अष्टम अध्याय ॥
रक्तबीजवध
॥ ध्यानम्॥
ॐ अरुणां करुणातरङ्गिताक्षीं
धृतपाशाङ्कुशबाणाचापहस्ताम्।
अणिमादिभिरावृतां मयूखै-
रहमित्येव विभावये भवानीम्॥
हिन्दी अर्थ:
मैं भगवती भवानी का ध्यान करता हूँ, जिनकी आँखें करुणा की लहरों से भरी हुई हैं। जिनके हाथों में पाश, अंकुश, बाण और धनुष हैं तथा जो अणिमा आदि सिद्धियों के दिव्य प्रकाश से घिरी हुई हैं।
ॐ ऋषिरुवाच ॥१॥
चण्डे च निहते दैत्ये मुण्डे च विनिपातिते।
बहुलेषु च सैन्येषु क्षयितेष्वसुरेश्वरः ॥२॥
हिन्दी अर्थ:
ऋषि कहते हैं—जब चण्ड और मुण्ड नामक दोनों दैत्य मारे गए और असुरों की बहुत-सी सेनाएँ नष्ट हो गईं, तब असुरों का राजा शुम्भ अत्यंत क्रोधित हो गया।
ततः कोपपराधीनचेताः शुम्भः प्रतापवान्।
उद्योगं सर्वसैन्यानां दैत्यानामादिदेश ह ॥३॥
हिन्दी अर्थ:
तब अत्यंत पराक्रमी शुम्भ का मन क्रोध के वश में हो गया। उसने सभी असुर सेनाओं को युद्ध के लिए तैयार होने का आदेश दिया।
अद्य सर्वबलैर्दैत्याः षडशीतिरुदायुधाः।
कम्बूनां चतुरशीतिर्निर्यान्तु स्वबलैर्वृताः ॥४॥
हिन्दी अर्थ:
शुम्भ ने आदेश दिया कि सभी दैत्य अपनी पूरी शक्ति के साथ युद्ध के लिए निकलें। छियासी आयुधों से सुसज्जित दैत्य और चौरासी कम्बु-समूह भी अपनी सेनाओं के साथ आगे बढ़ें।
कोटिवीर्याणि पञ्चाशदसुराणां कुलानि वै।
शतं कुलानि धौम्राणां निर्गच्छन्तु ममाज्ञया ॥५॥
हिन्दी अर्थ:
पचास करोड़ वीरों वाले असुरों के समूह और धूम्र नामक असुरों के सौ समूह भी मेरी आज्ञा से युद्ध के लिए निकलें।
कालका दौर्हृदा मौर्वाः कालिकेयास्तथासुराः।
युद्धाय सज्जा निर्यान्तु आज्ञया त्वरिता मम ॥६॥
हिन्दी अर्थ:
कालका, दौर्हृदा, मौर्व और कालिकेय आदि असुर भी युद्ध के लिए तैयार होकर मेरी आज्ञा से शीघ्र निकल पड़ें।
इत्याज्ञाप्यासुरपतिः शुम्भो भैरवशासनः।
निर्जगाम महासैन्यसहस्रैर्बहुभिर्वृतः ॥७॥
हिन्दी अर्थ:
इस प्रकार आदेश देकर असुरों का राजा शुम्भ स्वयं भी अनेक बड़ी-बड़ी सेनाओं से घिरकर युद्ध के लिए निकल पड़ा।
आयान्तं चण्डिका दृष्ट्वा तत्सैन्यमतिभीषणम्।
ज्यास्वनैः पूरयामास धरणीगगनान्तरम् ॥८॥
हिन्दी अर्थ:
उस भयंकर असुर सेना को अपनी ओर आते देखकर देवी चण्डिका ने अपने धनुष की प्रत्यंचा की टंकार से पृथ्वी और आकाश के बीच का पूरा क्षेत्र गुंजा दिया।
ततः सिंहो महानादमतीव कृतवान्नृप।
घण्टास्वनेन तान्नादानम्बिका चोपबृंहयत् ॥९॥
हिन्दी अर्थ:
हे राजन्! तब देवी के सिंह ने अत्यंत भयंकर गर्जना की और अम्बिका ने अपनी घंटी की ध्वनि से उस नाद को और भी प्रबल कर दिया।
धनुर्ज्यासिंहघण्टानां नादापूरितदिङ्मुखा।
निनादैर्भीषणैः काली जिग्ये विस्तारितानना ॥१०॥
हिन्दी अर्थ:
धनुष की टंकार, सिंह की गर्जना और घंटी की ध्वनि से सभी दिशाएँ भर गईं। काली ने भी अपना मुख फैलाकर भयंकर नाद किया।
तं निनादमुपश्रुत्य दैत्यसैन्यैश्चतुर्दिशम्।
देवी सिंहस्तथा काली सरोषैः परिवारिताः ॥११॥
हिन्दी अर्थ:
उस भयंकर नाद को सुनकर चारों दिशाओं से असुरों की सेनाएँ देवी, उनके सिंह और काली को क्रोधपूर्वक घेरने लगीं।
एतस्मिन्नन्तरे भूप विनाशाय सुरद्विषाम्।
भवायामरसिंहानामतिवीर्यबलान्विताः ॥१२॥
हिन्दी अर्थ:
उसी समय, हे राजन्, देवताओं के शत्रु असुरों के विनाश और देवताओं के कल्याण के लिए अत्यंत शक्तिशाली देवशक्तियाँ प्रकट होने लगीं।
ब्रह्मेशगुहविष्णूनां तथेन्द्रस्य च शक्तयः।
शरीरेभ्यो विनिष्क्रम्य तद्रूपैश्चण्डिकां ययुः ॥१३॥
हिन्दी अर्थ:
ब्रह्मा, शिव, गुह अर्थात् कार्तिकेय, विष्णु और इन्द्र आदि देवताओं की शक्तियाँ उनके शरीरों से निकलकर उन्हीं के समान रूप धारण करके चण्डिका के पास आ गईं।
यस्य देवस्य यद्रूपं यथा भूषणवाहनम्।
तद्वदेव हि तच्छक्तिरसुरान्योद्धुमाययौ ॥१४॥
हिन्दी अर्थ:
जिस देवता का जैसा रूप, आभूषण और वाहन था, उसी के अनुरूप उनकी शक्ति भी उसी रूप और वाहन के साथ असुरों से युद्ध करने के लिए आई।
हंसयुक्तविमानाग्रे साक्षसूत्रकमण्डलुः।
आयाता ब्रह्मणः शक्तिर्ब्रह्माणीत्यभिधीयते ॥१५॥
हिन्दी अर्थ:
हंसयुक्त विमान पर सवार, हाथ में अक्षमाला और कमण्डलु धारण किए हुए ब्रह्मा की शक्ति वहाँ आईं। उन्हें ब्रह्माणी कहा जाता है।
माहेश्वरी वृषारूढा त्रिशूलवरधारिणी।
महाहिवलया प्राप्ता चन्द्ररेखाविभूषणा ॥१६॥
हिन्दी अर्थ:
माहेश्वरी बैल पर सवार होकर, हाथ में श्रेष्ठ त्रिशूल धारण किए हुए वहाँ आईं। उनके शरीर पर बड़े सर्पों के आभूषण थे और मस्तक पर चन्द्रमा की रेखा सुशोभित थी।
कौमारी शक्तिहस्ता च मयूरवरवाहना।
योद्धुमभ्याययौ दैत्यानम्बिका गुहरूपिणी ॥१७॥
हिन्दी अर्थ:
कार्तिकेय की शक्ति कौमारी हाथ में शक्ति आयुध लेकर और श्रेष्ठ मयूर पर सवार होकर दैत्यों से युद्ध करने के लिए आईं।
तथैव वैष्णवी शक्तिर्गरुडोपरि संस्थिता।
शङ्खचक्रगदाशार्ङ्गखड्गहस्ताभ्युपाययौ ॥१८॥
हिन्दी अर्थ:
विष्णु की शक्ति वैष्णवी गरुड़ पर विराजमान होकर आईं। उनके हाथों में शंख, चक्र, गदा, शार्ङ्ग धनुष और तलवार आदि आयुध थे।
यज्ञवाराहमतुलं रूपं या बिभ्रतो हरेः।
शक्तिः साप्याययौ तत्र वाराहीं बिभ्रती तनुम् ॥१९॥
हिन्दी अर्थ:
भगवान विष्णु के अतुलनीय यज्ञ-वराह रूप की शक्ति भी वहाँ आईं और उन्होंने वाराही का रूप धारण किया।
नारसिंही नृसिंहस्य बिभ्रती सदृशं वपुः।
प्राप्ता तत्र सटाक्षेपक्षिप्तनक्षत्रसंहतिः ॥२०॥
हिन्दी अर्थ:
नृसिंह भगवान की शक्ति नारसिंही भी उनके समान रूप धारण करके वहाँ आईं। उनके अयाल के झटके से मानो आकाश के नक्षत्र भी विचलित होने लगे।
वज्रहस्ता तथैवैन्द्री गजराजोपरि स्थिता।
प्राप्ता सहस्रनयना यथा शक्रस्तथैव सा ॥२१॥
हिन्दी अर्थ:
इन्द्र की शक्ति ऐन्द्री हाथ में वज्र धारण करके श्रेष्ठ हाथी पर सवार होकर आईं। वे इन्द्र के समान सहस्र नेत्रों वाली थीं।
ततः परिवृतस्ताभिरीशानो देवशक्तिभिः।
हन्यन्तामसुराः शीघ्रं मम प्रीत्याह चण्डिकाम् ॥२२॥
हिन्दी अर्थ:
तब चण्डिका देवशक्तियों से घिर गईं और उन्होंने कहा—इन असुरों का शीघ्र वध करो। इस प्रकार देवी ने देवशक्तियों को युद्ध के लिए प्रेरित किया।
ततो देवीशरीरात्तु विनिष्क्रान्तातिभीषणा।
चण्डिका शक्तिरत्युग्रा शिवाशतनिनादिनी ॥२३॥
हिन्दी अर्थ:
तभी देवी के शरीर से एक अत्यंत भयंकर और प्रचण्ड शक्ति प्रकट हुई, जो सैकड़ों सियारों जैसी भयंकर ध्वनि करने वाली थी।
सा चाह धूम्रजटिलमीशानमपराजिता।
दूत त्वं गच्छ भगवन् पार्श्वं शुम्भनिशुम्भयोः ॥२४॥
हिन्दी अर्थ:
उस अपराजिता देवी ने जटाधारी ईशान से कहा—हे भगवन्! आप शुम्भ और निशुम्भ के पास मेरे दूत बनकर जाएँ।
ब्रूहि शुम्भं निशुम्भं च दानवावतिगर्वितौ।
ये चान्ये दानवास्तत्र युद्धाय समुपस्थिताः ॥२५॥
हिन्दी अर्थ:
शुम्भ, निशुम्भ और वहाँ युद्ध के लिए एकत्र हुए अन्य घमंडी दानवों से मेरा संदेश कहिए।
त्रैलोक्यमिन्द्रो लभतां देवाः सन्तु हविर्भुजः।
यूयं प्रयात पातालं यदि जीवितुमिच्छथ ॥२६॥
हिन्दी अर्थ:
तीनों लोकों का अधिकार इन्द्र को वापस दे दो और देवताओं को यज्ञों के भाग प्राप्त करने दो। यदि तुम जीवित रहना चाहते हो तो पाताल लोक चले जाओ।
बलावलेपादथ चेद्भवन्तो युद्धकाङ्क्षिणः।
तदागच्छत तृप्यन्तु मच्छिवाः पिशितेन वः ॥२७॥
हिन्दी अर्थ:
यदि अपने बल के घमंड के कारण तुम युद्ध करना चाहते हो तो आ जाओ। तब मेरे शिवरूपी गण तुम्हारे मांस से तृप्त होंगे।
यतो नियुक्तो दौत्येन तया देव्या शिवः स्वयम्।
शिवदूतीति लोकेऽस्मिंस्ततः सा ख्यातिमागता ॥२८॥
हिन्दी अर्थ:
चूँकि स्वयं शिव को देवी ने अपना दूत बनाकर भेजा, इसलिए संसार में देवी का नाम शिवदूती प्रसिद्ध हुआ।
तेऽपि श्रुत्वा वचो देव्याः शर्वाख्यातं महासुराः।
अमर्षापूरिता जग्मुर्यत्र कात्यायनी स्थिता ॥२९॥
हिन्दी अर्थ:
शिव द्वारा सुनाए गए देवी के वचन सुनकर वे बड़े-बड़े असुर क्रोध से भर गए और जहाँ कात्यायनी देवी विराजमान थीं, वहाँ युद्ध के लिए पहुँच गए।
ततः प्रथममेवाग्रे शरशक्त्यृष्टिवृष्टिभिः।
ववर्षुरुद्धतामर्षास्तां देवीममरारयः ॥३०॥
हिन्दी अर्थ:
देवताओं के शत्रु उन असुरों ने क्रोध में आकर सबसे पहले देवी पर बाणों, शक्तियों और बरछियों की वर्षा कर दी।
सा च तान् प्रहितान् बाणाञ्छूलशक्तिपरश्वधान्।
चिच्छेद लीलयाध्मातधनुर्मुक्तैर्महेषुभिः ॥३१॥
हिन्दी अर्थ:
देवी ने अपने धनुष से छोड़े गए शक्तिशाली बाणों से असुरों के बाणों, त्रिशूलों, शक्तियों और फरसों को खेल-खेल में ही काट दिया।
तस्याग्रतस्तथा काली शूलपातविदारितान्।
खट्वाङ्गपोथितांश्चारीन्कुर्वती व्यचरत्तदा ॥३२॥
हिन्दी अर्थ:
देवी के आगे काली भी युद्ध करती हुई घूम रही थीं। वे शूल से विदीर्ण और खट्वांग के प्रहार से घायल असुरों का विनाश कर रही थीं।
कमण्डलुजलाक्षेपहतवीर्यान् हतौजसः।
ब्रह्माणी चाकरोच्छत्रून्येन येन स्म धावति ॥३३॥
हिन्दी अर्थ:
ब्रह्माणी अपने कमण्डलु के जल का छिड़काव करके असुरों की शक्ति और उत्साह को नष्ट कर देती थीं। जिस-जिस असुर की ओर वे बढ़तीं, उसकी शक्ति क्षीण हो जाती।
माहेश्वरी त्रिशूलेन तथा चक्रेण वैष्णवी।
दैत्याञ्जघान कौमारी तथा शक्त्यातिकोपना ॥३४॥
हिन्दी अर्थ:
माहेश्वरी ने त्रिशूल से, वैष्णवी ने चक्र से और अत्यंत क्रोधित कौमारी ने शक्ति आयुध से अनेक दैत्यों का वध किया।
ऐन्द्रीकुलिशपातेन शतशो दैत्यदानवाः।
पेतुर्विदारिताः पृथ्व्यां रुधिरौघप्रवर्षिणः ॥३५॥
हिन्दी अर्थ:
ऐन्द्री के वज्र के प्रहार से सैकड़ों दैत्य और दानव घायल होकर पृथ्वी पर गिर पड़े और उनके शरीर से रक्त की धाराएँ बहने लगीं।
तुण्डप्रहारविध्वस्ता दंष्ट्राग्रक्षतवक्षसः।
वाराहमूर्त्या न्यपतंश्चक्रेण च विदारिताः ॥३६॥
हिन्दी अर्थ:
वाराही ने अपनी थूथन और दाँतों के प्रहार से अनेक असुरों को नष्ट कर दिया। उनके चक्र से घायल हुए असुर भी पृथ्वी पर गिरने लगे।
नखैर्विदारितांश्चान्यान् भक्षयन्ती महासुरान्।
नारसिंही चचाराजौ नादापूर्णदिगम्बरा ॥३७॥
हिन्दी अर्थ:
नारसिंही अपने नखों से अनेक महासुरों को चीरकर उनका संहार करने लगीं। उनकी भयंकर गर्जना से सभी दिशाएँ गूँज उठीं।
चण्डाट्टहासैरसुराः शिवदूत्यभिदूषिताः।
पेतुः पृथिव्यां पतितांस्तांश्चखादाथ सा तदा ॥३८॥
हिन्दी अर्थ:
शिवदूती की भयंकर अट्टहास ध्वनि से असुर भयभीत होकर पृथ्वी पर गिरने लगे और देवी ने गिरे हुए असुरों का संहार कर दिया।
इति मातृगणं क्रुद्धं मर्दयन्तं महासुरान्।
दृष्ट्वाभ्युपायैर्विविधैर्नेशुर्देवारिसैनिकाः ॥३९॥
हिन्दी अर्थ:
इस प्रकार क्रोधित मातृशक्तियों को अनेक उपायों से महासुरों का विनाश करते देखकर देवताओं के शत्रु असुरों की सेनाएँ भयभीत होकर भागने लगीं।
पलायनपरान्दृष्ट्वा दैत्यान्मातृगणार्दितान्।
योद्धुमभ्याययौ क्रुद्धो रक्तबीजो महासुरः ॥४०॥
हिन्दी अर्थ:
मातृशक्तियों से पीड़ित होकर असुरों को भागते देखकर महासुर रक्तबीज अत्यंत क्रोधित हुआ और स्वयं युद्ध करने के लिए आगे आया।
रक्तबिन्दुर्यदा भूमौ पतत्यस्य शरीरतः।
समुत्पतति मेदिन्यां तत्प्रमाणो महासुरः ॥४१॥
हिन्दी अर्थ:
रक्तबीज के शरीर से जब भी रक्त की एक बूंद पृथ्वी पर गिरती, उसी के समान आकार वाला एक नया महासुर तुरंत उत्पन्न हो जाता था।
युयुधे स गदापाणिरिन्द्रशक्त्या महासुरः।
ततश्चैन्द्री स्ववज्रेण रक्तबीजमताडयत् ॥४२॥
हिन्दी अर्थ:
वह महासुर हाथ में गदा लेकर इन्द्र की शक्ति ऐन्द्री से युद्ध करने लगा। तब ऐन्द्री ने अपने वज्र से रक्तबीज पर प्रहार किया।
कुलिशेनाहतस्याशु बहु सुस्राव शोणितम्।
समुत्तस्थुस्ततो योधास्तद्रूपास्तत्पराक्रमाः ॥४३॥
हिन्दी अर्थ:
वज्र से घायल होने पर रक्तबीज के शरीर से बहुत-सा रक्त बह निकला। उसके रक्त से तुरंत उसी के समान रूप और पराक्रम वाले अनेक योद्धा उत्पन्न हो गए।
यावन्तः पतितास्तस्य शरीराद्रक्तबिन्दवः।
तावन्तः पुरुषा जातास्तद्वीर्यबलविक्रमाः ॥४४॥
हिन्दी अर्थ:
रक्तबीज के शरीर से जितनी रक्त की बूंदें पृथ्वी पर गिरतीं, उतने ही नए पुरुष उत्पन्न हो जाते और उनमें भी रक्तबीज के समान शक्ति और पराक्रम होता।
ते चापि युयुधुस्तत्र पुरुषा रक्तसम्भवाः।
समं मातृभिरत्युग्रशस्त्रपातातिभीषणम् ॥४५॥
हिन्दी अर्थ:
रक्त से उत्पन्न हुए वे सभी नए असुर भी मातृशक्तियों से भयंकर युद्ध करने लगे। इस प्रकार युद्ध और भी उग्र हो गया।
पुनश्च वज्रपातेन क्षतमस्य शिरो यदा।
ववाह रक्तं पुरुषास्ततो जाताः सहस्रशः ॥४६॥
हिन्दी अर्थ:
जब ऐन्द्री के वज्र के प्रहार से रक्तबीज का सिर घायल हुआ, तब उसके शरीर से बहने वाले रक्त से हजारों नए असुर उत्पन्न हो गए।
वैष्णवी समरे चैनं चक्रेणाभिजघान ह।
गदया ताडयामास ऐन्द्री तमसुरेश्वरम् ॥४७॥
हिन्दी अर्थ:
युद्ध के बीच वैष्णवी ने रक्तबीज पर अपने चक्र से प्रहार किया और ऐन्द्री ने गदा से उस असुरराज को चोट पहुँचाई।
वैष्णवीचक्रभिन्नस्य रुधिरस्रावसम्भवैः।
सहस्रशो जगद्व्याप्तं तत्प्रमाणैर्महासुरैः ॥४८॥
हिन्दी अर्थ:
वैष्णवी के चक्र से घायल रक्तबीज के शरीर से निकले रक्त के कारण उसके समान आकार वाले हजारों महासुर उत्पन्न हो गए और चारों ओर फैल गए।
शक्त्या जघान कौमारी वाराही च तथासिना।
माहेश्वरी त्रिशूलेन रक्तबीजं महासुरम् ॥४९॥
हिन्दी अर्थ:
कौमारी ने शक्ति आयुध से, वाराही ने तलवार से और माहेश्वरी ने त्रिशूल से महासुर रक्तबीज पर प्रहार किया।
स चापि गदया दैत्यः सर्वा एवाहनत् पृथक्।
मातॄः कोपसमाविष्टो रक्तबीजो महासुरः ॥५०॥
हिन्दी अर्थ:
क्रोध से भरा हुआ रक्तबीज अपनी गदा से एक-एक करके सभी मातृशक्तियों पर प्रहार करने लगा।
तस्याहतस्य बहुधा शक्तिशूलादिभिर्भुवि।
पपात यो वै रक्तौघस्तेनासञ्छतशोऽसुराः ॥५१॥
हिन्दी अर्थ:
जब मातृशक्तियों ने उसे बार-बार शक्ति, त्रिशूल और अन्य आयुधों से घायल किया, तब उसके शरीर से पृथ्वी पर गिरने वाली रक्तधारा से सैकड़ों असुर उत्पन्न हो गए।
तैश्चासुरासृक्सम्भूतैरसुरैः सकलं जगत्।
व्याप्तमासीत्ततो देवा भयमाजग्मुरुत्तमम् ॥५२॥
हिन्दी अर्थ:
उसके रक्त से उत्पन्न हुए असंख्य असुरों ने पूरा संसार घेर लिया। यह देखकर देवताओं के मन में अत्यंत भय उत्पन्न हो गया।
तान् विषण्णान् सुरान् दृष्ट्वा चण्डिका प्राह सत्वरम्।
उवाच कालीं चामुण्डे विस्तीर्णं वदनं कुरु ॥५३॥
हिन्दी अर्थ:
देवताओं को इस प्रकार चिंतित देखकर चण्डिका ने तुरंत काली से कहा—हे चामुण्डे! अपना मुख बहुत बड़ा कर लो।
मच्छस्त्रपातसम्भूतान् रक्तबिन्दून् महासुरान्।
रक्तबिन्दोः प्रतीच्छ त्वं वक्त्रेणानेन वेगिना ॥५४॥
हिन्दी अर्थ:
मेरे आयुधों के प्रहार से रक्तबीज के शरीर से जो रक्त की बूंदें निकलें, उन्हें तुम अपने इस विस्तृत मुख से शीघ्र ग्रहण कर लेना।
भक्षयन्ती चर रणे तदुत्पन्नान्महासुरान्।
एवमेष क्षयं दैत्यः क्षेणरक्तो गमिष्यति ॥५५॥
हिन्दी अर्थ:
युद्धभूमि में रक्त की बूंदों से जो नए महासुर उत्पन्न हों, उन्हें भी तुम खा जाओ। इस प्रकार रक्त समाप्त हो जाने पर यह दैत्य स्वयं भी नष्ट हो जाएगा।
भक्ष्यमाणास्त्वया चोग्रा न चोत्पत्स्यन्ति चापरे।
इत्युक्त्वा तां ततो देवी शूलेनाभिजघान तम् ॥५६॥
हिन्दी अर्थ:
जब तुम उन भयंकर असुरों को खा जाओगी, तब उनसे नए असुर उत्पन्न नहीं होंगे। ऐसा कहकर देवी ने रक्तबीज पर त्रिशूल से प्रहार किया।
मुखेन काली जगृहे रक्तबीजस्य शोणितम्।
ततोऽसावाजघानाथ गदया तत्र चण्डिकाम् ॥५७॥
हिन्दी अर्थ:
काली ने रक्तबीज के शरीर से निकलने वाले रक्त को अपने मुख में ग्रहण करना शुरू कर दिया। तब रक्तबीज ने गदा से चण्डिका पर प्रहार किया।
न चास्या वेदनां चक्रे गदापातोऽल्पिकामपि।
तस्याहतस्य देहात्तु बहु सुस्राव शोणितम् ॥५८॥
हिन्दी अर्थ:
रक्तबीज की गदा का प्रहार देवी को तनिक भी विचलित नहीं कर सका। इसके विपरीत उसके घायल शरीर से बहुत-सा रक्त बहने लगा।
यतस्ततस्तद्वक्त्रेण चामुण्डा सम्प्रतीच्छति।
मुखे समुद्गता येऽस्या रक्तपातान्महासुराः ॥५९॥
हिन्दी अर्थ:
रक्तबीज के शरीर से जहाँ-जहाँ रक्त बहता, चामुण्डा तुरंत उसे अपने मुख में ग्रहण कर लेतीं। उस रक्त से जो नए महासुर उत्पन्न होते, उन्हें भी वे अपने मुख में ले लेतीं।
तांश्चखादाथ चामुण्डा पपौ तस्य च शोणितम्।
देवी शूलेन वज्रेण बाणैरसिभिरृष्टिभिः ॥६०॥
हिन्दी अर्थ:
चामुण्डा ने उन सभी नए असुरों को खा लिया और रक्तबीज का रक्त भी पी लिया। इसी बीच देवी ने त्रिशूल, वज्र, बाण, तलवार और बरछियों आदि से उस पर लगातार प्रहार किया।
जघान रक्तबीजं तं चामुण्डापीतशोणितम्।
स पपात महीपृष्ठे शस्त्रसङ्घसमाहतः ॥६१॥
हिन्दी अर्थ:
चामुण्डा द्वारा उसका रक्त पी लिए जाने के बाद देवी ने रक्तबीज का वध कर दिया। अनेक आयुधों से घायल होकर वह पृथ्वी पर गिर पड़ा।
नीरक्तश्च महीपाल रक्तबीजो महासुरः।
ततस्ते हर्षमतुलमवापुस्त्रिदशा नृप ॥६२॥
हिन्दी अर्थ:
हे राजन्! रक्तहीन होकर महासुर रक्तबीज पृथ्वी पर गिर पड़ा। उसके मारे जाने पर सभी देवताओं को अत्यंत आनंद और प्रसन्नता हुई।
तेषां मातृगणो जातो ननर्तासृङ्मदोद्धतः ॥६३॥
हिन्दी अर्थ:
तब वे सभी मातृशक्तियाँ रक्तबीज के वध से प्राप्त विजय के आनंद में भरकर नृत्य करने लगीं।
॥ श्रीदुर्गासप्तशती अष्टम अध्याय सम्पूर्ण ॥
रक्तबीजवध का सरल सार
दुर्गा सप्तशती के इस अध्याय में रक्तबीज नामक असुर की अद्भुत शक्ति का वर्णन मिलता है। उसके शरीर से गिरने वाली प्रत्येक रक्त-बूंद से उसी के समान एक नया असुर उत्पन्न हो जाता था। इसलिए उसे जितना घायल किया जाता, उसकी संख्या उतनी ही बढ़ती जाती थी।
जब इस कारण देवशक्तियाँ चिंतित हो गईं, तब देवी चण्डिका ने चामुण्डा को आदेश दिया कि रक्तबीज के शरीर से निकलने वाला रक्त पृथ्वी पर न गिरने पाए। चामुण्डा ने रक्त की प्रत्येक बूंद को अपने मुख में ग्रहण करना शुरू कर दिया और उससे उत्पन्न होने वाले असुरों को भी नष्ट करने लगीं।
इस उपाय से रक्तबीज की शक्ति समाप्त होने लगी। अंत में देवी ने उसका वध कर दिया और देवताओं को अत्यंत प्रसन्नता हुई।
दुर्गा सप्तशती पाठ- आठवाँ अध्याय सरल हिन्दी में
रक्तबीज वध कथा
दुर्गा सप्तशती के आठवें अध्याय में देवी और असुरों के बीच हुए भयंकर युद्ध का वर्णन मिलता है। इस अध्याय में देवी की अनेक शक्तियों का प्राकट्य, असुरों के साथ उनका युद्ध और अंत में अत्यंत शक्तिशाली राक्षस रक्तबीज का वध प्रमुख रूप से वर्णित है। रक्तबीज की विशेषता यह थी कि उसके शरीर से गिरने वाली प्रत्येक रक्त-बूंद से उसके जैसा ही एक नया और बलवान असुर उत्पन्न हो जाता था। इसी कारण उसका सामना करना देवताओं और देवी की शक्तियों के लिए भी अत्यंत कठिन हो गया था।
इस अध्याय में देवी की विभिन्न शक्तियाँ एक साथ होकर असुरों का संहार करती हैं। अंत में माता चण्डिका की आज्ञा से काली देवी रक्त की एक भी बूंद धरती पर गिरने नहीं देतीं और इसी उपाय से रक्तबीज का अंत संभव होता है।
असुरों की विशाल सेना युद्ध के लिए तैयार होती है
चण्ड और मुण्ड के मारे जाने तथा असुरों की बड़ी सेना के नष्ट हो जाने से शुम्भ अत्यंत क्रोधित हो गया। उसने अपने प्रमुख सेनापतियों और विशाल असुर सेना को युद्ध के लिए तैयार होने का आदेश दिया।
अनेक शक्तिशाली असुर सेनापति अपनी-अपनी सेनाओं के साथ युद्धभूमि की ओर बढ़े। उनके साथ बड़ी संख्या में रथ, हाथी, घोड़े और अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित योद्धा भी थे। असुरों की विशाल सेना को अपनी ओर बढ़ते देखकर देवी चण्डिका युद्ध के लिए तैयार हो गईं।
देवी ने अपने धनुष की टंकार से दिशाओं को गुंजा दिया। देवी के सिंह ने भी जोरदार गर्जना की। अम्बिका के दिव्य घंटे की ध्वनि से यह भयंकर नाद और भी अधिक प्रभावशाली हो उठा। धनुष की टंकार, सिंह की गर्जना और घंटे की ध्वनि से आकाश तथा पृथ्वी के बीच का पूरा क्षेत्र गूंजने लगा।
इस भयंकर ध्वनि से असुर सेना विचलित हो उठी और उसने चारों ओर से देवी तथा उनके सिंह को घेर लिया।
देवताओं की शक्तियों का देवी के पास प्रकट होना
असुरों के बढ़ते प्रभाव को देखकर देवताओं की शक्तियाँ अपने-अपने मूल देवताओं से प्रकट होकर देवी चण्डिका की सहायता के लिए युद्धभूमि में पहुंचीं।
जिस देवता का जैसा स्वरूप, वाहन और आयुध था, उसी के अनुरूप उनकी शक्ति भी उसी प्रकार के स्वरूप और साधनों से युक्त होकर प्रकट हुई।
ब्रह्माजी की शक्ति ब्राह्मणी हंसयुक्त विमान पर विराजमान होकर आईं। उनके हाथ में कमण्डलु और रुद्राक्ष की माला थी। वे अपने दिव्य तेज से प्रकाशित हो रही थीं।
भगवान शिव की शक्ति माहेश्वरी वृषभ पर आरूढ़ होकर प्रकट हुईं। उनके हाथ में त्रिशूल था और वे शिव के समान दिव्य स्वरूप से सुशोभित थीं।
कार्तिकेय की शक्ति कौमारी मोर पर सवार होकर युद्धभूमि में आईं। उनके हाथ में शक्ति नामक आयुध था और उनका स्वरूप अत्यंत तेजस्वी था।
भगवान विष्णु की शक्ति वैष्णवी गरुड़ पर आरूढ़ होकर प्रकट हुईं। वे शंख, चक्र, गदा, धनुष और अन्य दिव्य आयुधों से सुसज्जित थीं।
इसी प्रकार भगवान वराह की शक्ति वाराही के रूप में तथा भगवान नृसिंह की शक्ति नारसिंही के रूप में प्रकट हुईं। नारसिंही की भयंकर गर्जना से दिशाएँ कांप उठीं और उनके प्रचंड स्वरूप से असुर सेना भयभीत होने लगी।
देवराज इन्द्र की शक्ति ऐन्द्री भी ऐरावत पर सवार होकर युद्धभूमि में आईं। उनके हाथ में वज्र था और वे अत्यंत शक्तिशाली दिखाई दे रही थीं।
इस प्रकार अनेक देवशक्तियाँ देवी चण्डिका के चारों ओर एकत्र हो गईं और असुरों का सामना करने के लिए तैयार हो गईं।
शिवदूती का प्राकट्य
इसके बाद देवी के शरीर से एक अत्यंत उग्र और भयंकर शक्ति प्रकट हुई। उसका स्वरूप इतना प्रचंड था कि उसकी आवाज दूर-दूर तक गूंजने लगी।
उस देवी ने भगवान शिव को अपना दूत बनाकर शुम्भ और निशुम्भ के पास भेजने का निर्णय किया। इसी कारण वह शक्ति आगे चलकर शिवदूती के नाम से प्रसिद्ध हुई।
भगवान शिव को देवी ने असुरों के पास संदेश लेकर जाने के लिए कहा। संदेश में असुरों को समझाया गया कि यदि वे अपने प्राणों की रक्षा चाहते हैं तो देवताओं के अधिकार उन्हें वापस कर दें, इन्द्र को त्रिलोकी का राज्य सौंप दें और पाताल में चले जाएँ।
लेकिन यदि वे अपनी शक्ति के अहंकार में युद्ध करना चाहते हैं, तो वे युद्धभूमि में आ जाएँ। देवी की योगिनियाँ उनके मांस से अपना आहार प्राप्त करेंगी।
जब शुम्भ और निशुम्भ ने यह संदेश सुना तो वे अत्यंत क्रोधित हो गए। उन्होंने देवी के विरुद्ध युद्ध करने के लिए अपनी सेना को आगे बढ़ा दिया।
देवियों और असुरों के बीच भयंकर युद्ध
असुरों ने देवी पर बाण, शक्ति, त्रिशूल और अन्य अस्त्रों से आक्रमण शुरू कर दिया। देवी ने अपने बाणों से उनके अनेक अस्त्रों को बीच में ही काट दिया।
काली देवी भी युद्धभूमि में देवी के साथ खड़ी होकर असुरों पर प्रहार करने लगीं। वे अपने त्रिशूल और अन्य आयुधों से असुरों का संहार कर रही थीं।
ब्राह्मणी अपने कमण्डलु के जल का प्रयोग करके असुरों की शक्ति और पराक्रम को कमजोर कर रही थीं। माहेश्वरी त्रिशूल से असुरों को मार रही थीं। वैष्णवी अपने चक्र से शत्रुओं का नाश कर रही थीं और कौमारी अपनी शक्ति के प्रहार से असुरों को धराशायी कर रही थीं।
ऐन्द्री ने अपने वज्र के प्रहार से अनेक दैत्यों को मार गिराया। उनके प्रहार से असुरों के शरीर घायल हो गए और युद्धभूमि में रक्त की धाराएँ बहने लगीं।
वाराही ने अपने भयंकर स्वरूप और दाँतों से अनेक असुरों का संहार किया। उन्होंने कई राक्षसों को अपने प्रहार से धरती पर गिरा दिया।
नारसिंही ने भी अपने नखों से शक्तिशाली असुरों को विदीर्ण कर दिया। उनकी गर्जना से युद्धभूमि और चारों दिशाएँ गूंज उठीं।
शिवदूती के भयंकर अट्टहास से अनेक असुर भयभीत होकर धरती पर गिर पड़े। इस प्रकार देवी की विभिन्न शक्तियाँ मिलकर असुर सेना का भारी विनाश करने लगीं।
रक्तबीज का युद्धभूमि में प्रवेश
जब असुर सेना के बड़े-बड़े योद्धा मारे जाने लगे और शेष सैनिक भय के कारण पीछे हटने लगे, तब रक्तबीज नामक एक अत्यंत शक्तिशाली असुर युद्धभूमि में आया।
रक्तबीज साधारण असुर नहीं था। उसे ऐसा वरदान प्राप्त था कि उसके शरीर से रक्त की जो भी बूंद धरती पर गिरती, उसी से उसके समान शक्ति वाला एक नया असुर उत्पन्न हो जाता।
इस कारण उसे घायल करना भी उसके विरोधियों के लिए समस्या बन जाता था। जितना अधिक उसका रक्त धरती पर गिरता, उतने ही अधिक नए असुर पैदा होते जाते।
रक्तबीज ने युद्धभूमि में पहुंचकर देवी की शक्तियों को चुनौती दी और भयंकर युद्ध आरंभ कर दिया।
रक्त की प्रत्येक बूंद से उत्पन्न होने लगे नए असुर
ऐन्द्री ने रक्तबीज पर अपने वज्र से प्रहार किया। उसके शरीर से रक्त बह निकला। लेकिन जैसे ही रक्त की बूंदें पृथ्वी पर गिरीं, उसी क्षण उन बूंदों से रक्तबीज के समान ही बलवान अनेक असुर उत्पन्न हो गए।
जो भी नया असुर पैदा होता, वह अस्त्र-शस्त्र लेकर युद्ध में उतर जाता। देखते ही देखते युद्धभूमि में असुरों की संख्या बहुत बढ़ गई।
देवियों ने रक्तबीज पर जितने अधिक प्रहार किए, उतना ही अधिक रक्त बहा और उतने ही नए असुर पैदा होते गए। इस कारण देवी की शक्तियों के लिए युद्ध और कठिन होता चला गया।
वैष्णवी ने अपने चक्र से रक्तबीज को घायल किया। ऐन्द्री ने भी उस पर प्रहार किया। कौमारी, वाराही और माहेश्वरी ने भी अपने-अपने आयुधों से उसे चोट पहुंचाई।
लेकिन प्रत्येक चोट के साथ उसके शरीर से रक्त निकलता और रक्त की प्रत्येक बूंद से नया असुर जन्म लेने लगता।
इस प्रकार कुछ ही समय में रक्तबीज से उत्पन्न हुए असुरों की संख्या इतनी अधिक हो गई कि पूरा युद्धक्षेत्र उनके कारण भर गया।
रक्तबीज की शक्ति से देवता चिंतित हो गए
रक्तबीज से उत्पन्न होते जा रहे असुरों की संख्या लगातार बढ़ रही थी। देवी की शक्तियाँ जितने असुरों का वध करतीं, उनके स्थान पर उससे भी अधिक नए असुर उत्पन्न हो जाते।
इस स्थिति को देखकर देवता भी चिंतित हो उठे। उन्हें समझ में आने लगा कि यदि रक्तबीज के रक्त को धरती पर गिरने से नहीं रोका गया, तो उसके समान असुरों की संख्या लगातार बढ़ती जाएगी।
तब देवी चण्डिका ने इस समस्या का उपाय सोचा।
उन्होंने काली देवी को अपने पास बुलाया और उन्हें आदेश दिया कि वे अपना मुख विस्तृत करें तथा रक्तबीज के शरीर से निकलने वाले रक्त को पृथ्वी पर गिरने से पहले ही पी लें।
देवी ने काली से कहा कि युद्धभूमि में जो नए असुर रक्त की बूंदों से उत्पन्न हों, उन्हें भी तुरंत भक्षण कर लिया जाए। इस प्रकार रक्त की एक भी बूंद धरती तक नहीं पहुंचनी चाहिए।
देवी को विश्वास था कि यदि रक्तबीज का रक्त धरती पर नहीं गिरेगा, तो उसके जैसे नए असुर पैदा नहीं होंगे और अंततः उसका विनाश किया जा सकेगा।
काली देवी ने रक्त की बूंदें धरती पर नहीं गिरने दीं
चण्डिका की आज्ञा पाकर काली देवी युद्धभूमि में पूरी तरह सक्रिय हो गईं।
चण्डिका ने रक्तबीज पर अपने त्रिशूल से प्रहार किया। रक्तबीज के शरीर से रक्त निकलने लगा, लेकिन इस बार रक्त की बूंदें धरती पर नहीं गिर सकीं।
काली देवी ने अपना विशाल मुख खोलकर रक्त की प्रत्येक बूंद को ग्रहण करना शुरू कर दिया।
जहाँ कहीं रक्तबीज के शरीर से रक्त निकलता, काली देवी उसे तुरंत अपने मुख में ले लेतीं। रक्त से कोई नया असुर उत्पन्न होने का अवसर ही नहीं मिल पाया।
यदि कहीं रक्त की बूंद से कोई असुर प्रकट भी होता, तो काली देवी उसे तुरंत पकड़कर भक्षण कर लेतीं।
इस प्रकार रक्तबीज से उत्पन्न होने वाली असुरों की संख्या बढ़ना बंद हो गई।
रक्तबीज का अंत
अब चण्डिका देवी लगातार रक्तबीज पर प्रहार करने लगीं। दूसरी ओर काली देवी उसके शरीर से निकलने वाले रक्त को धरती पर नहीं गिरने दे रही थीं।
देवी के शस्त्रों के प्रहार से रक्तबीज लगातार कमजोर होता गया। उसके शरीर से निकलने वाला रक्त काली देवी पीती जा रही थीं और रक्त से उत्पन्न होने वाले असुरों को भी वे नष्ट करती जा रही थीं।
इस प्रकार रक्तबीज की वह शक्ति, जिसके कारण उसका वध असंभव जैसा दिखाई दे रहा था, समाप्त हो गई।
अंततः चण्डिका देवी ने अनेक प्रकार के दिव्य अस्त्र-शस्त्रों से उस महादैत्य पर प्रहार किया। रक्तहीन और पूरी तरह पराजित होकर रक्तबीज युद्धभूमि में गिर पड़ा।
रक्तबीज के धरती पर गिरते ही देवताओं के मन में अत्यंत प्रसन्नता हुई। देवताओं ने देवी की विजय का अनुभव किया और उनकी स्तुति करने लगे।
वहीं देवी की शक्तियाँ भी युद्ध की समाप्ति के बाद विजय के उल्लास में नृत्य करने लगीं।
रक्तबीजवध से मिलने वाली सीख
रक्तबीज की कथा केवल देवी और असुर के युद्ध का वर्णन नहीं करती, बल्कि यह भी बताती है कि किसी कठिन समस्या का सामना करते समय केवल बल प्रयोग पर्याप्त नहीं होता। समस्या की प्रकृति को समझकर उसके मूल कारण को रोकना भी आवश्यक होता है।
देवी चण्डिका ने रक्तबीज की शक्ति को समझकर ऐसा उपाय किया जिससे उसकी रक्त की एक भी बूंद नए असुर को जन्म न दे सके। इस प्रकार देवी की शक्ति के साथ उनकी बुद्धिमत्ता और उचित समय पर सही निर्णय लेने की क्षमता भी सामने आती है।
निष्कर्ष
दुर्गा सप्तशती का अष्टम अध्याय रक्तबीजवध देवी चण्डिका की अद्भुत शक्ति और बुद्धिमत्ता का प्रभावशाली वर्णन करता है। इस अध्याय में ब्रह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, नारसिंही और ऐन्द्री जैसी देवशक्तियों के प्राकट्य का वर्णन भी मिलता है।
रक्तबीज का वध इस अध्याय का मुख्य प्रसंग है। उसकी प्रत्येक रक्त-बूंद से नए असुर उत्पन्न होने के कारण युद्ध लगातार कठिन होता गया, लेकिन चामुण्डा ने उसके रक्त को पृथ्वी पर गिरने से रोक दिया। इसके बाद देवी ने उसका संहार कर दिया।
इस प्रकार अष्टम अध्याय में अधर्म पर धर्म की विजय और देवी की शक्ति के साथ उनकी विवेकपूर्ण रणनीति का सुंदर वर्णन मिलता है।
