नवार्ण विधि श्री दुर्गा सप्तशती के पाठ की एक महत्वपूर्ण पारंपरिक विधि है, जिसमें नवार्ण मन्त्र के विनियोग, विभिन्न न्यास, देवी के ध्यान, माला पूजन और मन्त्र जप का क्रम बताया गया है। इस विधि में “ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे” नवार्ण मन्त्र का जप किया जाता है। रात्रिसूक्त और देव्यथर्वशीर्ष के पाठ के पश्चात् नवार्ण मन्त्र के विनियोग, न्यास और ध्यान आदि करने की परंपरा बताई गई है। नीचे नवार्ण विधि का क्रम और प्रत्येक मंत्र एवं श्लोक का सरल हिंदी अर्थ दिया गया है।
॥ अथ नवार्णविधिः॥
रात्रिसूक्त और देव्यथर्वशीर्ष का पाठ करने के पश्चात् नवार्ण मन्त्र के विनियोग, न्यास और ध्यान आदि करें।
॥ विनियोगः॥
श्रीगणपतिर्जयति। ॐ अस्य श्रीनवार्णमन्त्रस्य ब्रह्मविष्णुरुद्रा ऋषयः,
गायत्र्युष्णिगनुष्टुभश्छन्दांसि, श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वत्यो
देवताः, ऐं बीजम्, ह्रीं शक्तिः, क्लीं कीलकम्,
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः।
हिंदी अर्थ:
इस नवार्ण मन्त्र के ऋषि ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र हैं। इसके छंद गायत्री, उष्णिक और अनुष्टुप् हैं। श्री महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती इसकी देवता हैं। ‘ऐं’ इसका बीज, ‘ह्रीं’ शक्ति और ‘क्लीं’ कीलक है। श्री महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती की प्रसन्नता के लिए किए जाने वाले इस जप में इस मन्त्र का विनियोग किया जाता है।
विनियोग का पाठ करके जल छोड़ें।
॥ ऋष्यादिन्यासः॥
ब्रह्मविष्णुरुद्रऋषिभ्यो नमः, शिरसि।
गायत्र्युष्णिगनुष्टुप्छन्दोभ्यो नमः, मुखे।
महाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीदेवताभ्यो नमः, हृदि।
ऐं बीजाय नमः, गुह्ये।
ह्रीं शक्तये नमः, पादयोः।
क्लीं कीलकाय नमः, नाभौ।
हिंदी अर्थ:
ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र ऋषियों को नमस्कार करते हुए सिर का स्पर्श करें। गायत्री, उष्णिक और अनुष्टुप् छंदों को नमस्कार करते हुए मुख का स्पर्श करें। महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती देवियों को नमस्कार करते हुए हृदय का स्पर्श करें। ‘ऐं’ बीज को नमस्कार करते हुए गुह्य स्थान का, ‘ह्रीं’ शक्ति को नमस्कार करते हुए पैरों का और ‘क्लीं’ कीलक को नमस्कार करते हुए नाभि का स्पर्श करें।
॥ करन्यासः॥
करन्यास में दिए गए मंत्रों का उच्चारण करते हुए संबंधित अंगुलियों तथा हथेलियों का स्पर्श करें।
ॐ ऐं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः।
ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः।
ॐ क्लीं मध्यमाभ्यां नमः।
ॐ चामुण्डायै अनामिकाभ्यां नमः।
ॐ विच्चे कनिष्ठिकाभ्यां नमः।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः।
हिंदी अर्थ:
‘ॐ ऐं’ मन्त्र से दोनों अंगूठों को, ‘ॐ ह्रीं’ से दोनों तर्जनियों को, ‘ॐ क्लीं’ से दोनों मध्यमा अंगुलियों को, ‘ॐ चामुण्डायै’ से दोनों अनामिकाओं को और ‘ॐ विच्चे’ से दोनों कनिष्ठिकाओं को नमस्कार किया जाता है। अंत में पूरे नवार्ण मन्त्र से दोनों हथेलियों और हाथों के पिछले भाग का स्पर्श किया जाता है।
॥ हृदयादिन्यासः॥
दाहिने हाथ की अंगुलियों से क्रमशः हृदय आदि अंगों का स्पर्श करते हुए निम्न मंत्रों का उच्चारण करें।
ॐ ऐं हृदयाय नमः।
ॐ ह्रीं शिरसे स्वाहा।
ॐ क्लीं शिखायै वषट्।
ॐ चामुण्डायै कवचाय हुम्।
ॐ विच्चे नेत्रत्रयाय वौषट्।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे अस्त्राय फट्।
हिंदी अर्थ:
‘ॐ ऐं’ मन्त्र से हृदय को नमस्कार किया जाता है। ‘ॐ ह्रीं’ से सिर को स्वाहा कहा जाता है। ‘ॐ क्लीं’ से शिखा का पूजन किया जाता है। ‘ॐ चामुण्डायै’ से कवच की भावना की जाती है। ‘ॐ विच्चे’ से तीनों नेत्रों का न्यास किया जाता है। अंत में पूरे नवार्ण मन्त्र से अस्त्र का न्यास किया जाता है।
॥ अक्षरन्यासः॥
निम्न मंत्रों का उच्चारण करते हुए क्रमशः बताए गए अंगों का स्पर्श करें।
ॐ ऐं नमः, शिखायाम्।
ॐ ह्रीं नमः, दक्षिणनेत्रे।
ॐ क्लीं नमः, वामनेत्रे।
ॐ चां नमः, दक्षिणकर्णे।
ॐ मुं नमः, वामकर्णे।
ॐ डां नमः, दक्षिणनासापुटे।
ॐ यैं नमः, वामनासापुटे।
ॐ विं नमः, मुखे।
ॐ च्चें नमः, गुह्ये।
हिंदी अर्थ:
‘ॐ ऐं’ का शिखा में, ‘ॐ ह्रीं’ का दाहिने नेत्र में, ‘ॐ क्लीं’ का बाएं नेत्र में, ‘ॐ चां’ का दाहिने कान में, ‘ॐ मुं’ का बाएं कान में, ‘ॐ डां’ का दाहिने नासापुट में, ‘ॐ यैं’ का बाएं नासापुट में, ‘ॐ विं’ का मुख में और ‘ॐ च्चें’ का गुह्य स्थान में न्यास किया जाता है।
अक्षरन्यास के बाद मूलमन्त्र से आठ बार व्यापक न्यास करें। इसमें दोनों हाथों से सिर से लेकर पैर तक सभी अंगों का स्पर्श किया जाता है। इसके बाद प्रत्येक दिशा में चुटकी बजाते हुए दिङ्न्यास करें।
॥ दिङ्न्यासः॥
ॐ ऐं प्राच्यै नमः।
ॐ ऐं आग्नेय्यै नमः।
ॐ ह्रीं दक्षिणायै नमः।
ॐ ह्रीं नैर्ऋत्यै नमः।
ॐ क्लीं प्रतीच्यै नमः।
ॐ क्लीं वायव्यै नमः।
ॐ चामुण्डायै उदीच्यै नमः।
ॐ चामुण्डायै ऐशान्यै नमः।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ऊर्ध्वायै नमः।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे भूम्यै नमः।
हिंदी अर्थ:
पूर्व दिशा को, आग्नेय दिशा को, दक्षिण दिशा को, नैर्ऋत्य दिशा को, पश्चिम दिशा को, वायव्य दिशा को, उत्तर दिशा को और ईशान दिशा को क्रमशः देवी के मन्त्र से नमस्कार किया जाता है। इसके बाद पूरे नवार्ण मन्त्र से ऊपर की दिशा और पृथ्वी की दिशा को नमस्कार किया जाता है। इस प्रकार साधक सभी दिशाओं में देवी की उपस्थिति का स्मरण करता है।
॥ ध्यानम्॥
खड्गं चक्रगदेषुचापपरिघाञ्छूलं भुशुण्डीं शिरः
शङ्खं संदधतीं करैस्त्रिनयनां सर्वाङ्गभूषावृताम्।
नीलाश्मद्युतिमास्यपाददशकां सेवे महाकालिकां
यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्तुं मधुं कैटभम्॥१॥
हिंदी अर्थ:
जिन महाकाली देवी के हाथों में खड्ग, चक्र, गदा, धनुष, परिघ, त्रिशूल, भुशुण्डी और शंख आदि हैं, जो तीन नेत्रों वाली हैं और समस्त आभूषणों से सुशोभित हैं, जिनकी आभा नीले रत्न के समान है तथा जिनके दस मुख और दस पैर हैं, उन महाकाली देवी का मैं ध्यान करता हूँ। भगवान विष्णु के योगनिद्रा में सोए रहने पर कमल से उत्पन्न ब्रह्मा ने मधु और कैटभ के वध के लिए जिनकी स्तुति की थी, उन्हीं देवी का ध्यान किया जाता है।
ॐ अक्षस्रक्परशुं गदेषुकुलिशं पद्मं धनुष्कुण्डिकां
दण्डं शक्तिमसिं च चर्म जलजं घण्टां सुराभाजनम्।
शूलं पाशसुदर्शने च दधतीं हस्तैः प्रसन्नाननां
सेवे सैरिभमर्दिनीमिह महालक्ष्मीं सरोजस्थिताम्॥२॥
हिंदी अर्थ:
जो महालक्ष्मी देवी कमल पर विराजमान हैं और अपने हाथों में अक्षमाला, परशु, गदा, बाण, वज्र, कमल, धनुष, कमण्डलु, दण्ड, शक्ति, तलवार, ढाल, शंख, घंटा, मदिरा-पात्र, त्रिशूल, पाश और सुदर्शन चक्र धारण करती हैं, जिनका मुख प्रसन्न है और जिन्होंने महिषासुर का वध किया है, उन महालक्ष्मी देवी का मैं ध्यान करता हूँ।
ॐ घण्टाशूलहलानि शङ्खमुसले चक्रं धनुः सायकं
हस्ताब्जैर्दधतीं घनान्तविलसच्छीतांशुतुल्यप्रभाम्।
गौरीदेहसमुद्भवां त्रिजगतामाधारभूतां महा-
पूर्वामत्र सरस्वतीमनुभजे शुम्भादिदैत्यार्दिनीम्॥३॥
हिंदी अर्थ:
जो महासरस्वती देवी अपने कमल के समान हाथों में घंटा, त्रिशूल, हल, शंख, मूसल, चक्र, धनुष और बाण धारण करती हैं, जिनकी प्रभा बादलों के बीच चमकते चंद्रमा के समान है, जो गौरी के शरीर से प्रकट हुई हैं, तीनों लोकों का आधार हैं और शुम्भ आदि दैत्यों का संहार करने वाली हैं, उन महासरस्वती देवी का मैं ध्यान करता हूँ।
॥ माला पूजन एवं प्रार्थना॥
माला का पूजन करके निम्न मंत्र का उच्चारण करें।
ॐ ऐं ह्रीं अक्षमालिकायै नमः।
हिंदी अर्थ:
अक्षमाला स्वरूप देवी को ‘ॐ ऐं ह्रीं’ मन्त्र से नमस्कार किया जाता है।
इसके बाद माला की प्रार्थना करें।
ॐ मां माले महामाये सर्वशक्तिस्वरूपिणि।
चतुर्वर्गस्त्वयि न्यस्तस्तस्मान्मे सिद्धिदा भव॥
हिंदी अर्थ:
हे माला! हे महामाया! आप सभी शक्तियों का स्वरूप हैं। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ये चारों पुरुषार्थ आप में स्थित हैं। इसलिए आप मेरे लिए सिद्धि प्रदान करने वाली बनें।
ॐ अविघ्नं कुरु माले त्वं गृह्णामि दक्षिणे करे।
जपकाले च सिद्ध्यर्थं प्रसीद मम सिद्धये॥
हिंदी अर्थ:
हे माला! मैं आपको अपने दाहिने हाथ में धारण करता हूँ। आप मेरे जप में किसी प्रकार की बाधा न आने दें और जप की सिद्धि के लिए मुझ पर प्रसन्न हों।
ॐ अक्षमालाधिपतये सुसिद्धिं देहि देहि सर्वमन्त्रार्थसाधिनि
साधय साधय सर्वसिद्धिं परिकल्पय परिकल्पय मे स्वाहा।
हिंदी अर्थ:
हे अक्षमाला की अधिष्ठात्री देवी! मुझे उत्तम सिद्धि प्रदान करें। सभी मन्त्रों के प्रयोजन को पूर्ण करने वाली देवी, मेरे सभी कार्यों को सिद्ध करें और मुझे सभी प्रकार की सिद्धि प्रदान करें।
॥ नवार्ण मन्त्र जप॥
इसके बाद नवार्ण मन्त्र का 108 बार जप करें।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे।
हिंदी अर्थ:
यह श्री देवी का नवार्ण मन्त्र है। इसमें ‘ऐं’, ‘ह्रीं’ और ‘क्लीं’ बीजाक्षरों के साथ चामुण्डा देवी का स्मरण किया जाता है। मन्त्र के प्रत्येक बीजाक्षर और पद का अपना पारंपरिक मन्त्रार्थ है, इसलिए इसका जप गुरु-परंपरा और प्रचलित साधना-विधि के अनुसार किया जाता है।
जप पूर्ण होने के बाद देवी को जप निवेदन करें।
॥ जप निवेदन॥
गुह्यातिगुह्यगोप्त्री त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपम्।
सिद्धिर्भवतु मे देवि त्वत्प्रसादान्महेश्वरि॥
हिंदी अर्थ:
हे देवी! आप अत्यंत गुप्त रहस्यों की भी रक्षा करने वाली हैं। मेरे द्वारा किए गए इस जप को स्वीकार करें। हे महेश्वरी! आपकी कृपा से मुझे सिद्धि प्राप्त हो।
इस श्लोक का पाठ करके देवी के वामहस्त में जप निवेदन करें।
॥ नवार्ण विधि का संक्षिप्त क्रम॥
नवार्ण विधि में पहले विनियोग किया जाता है। इसके बाद ऋष्यादिन्यास, करन्यास, हृदयादिन्यास, अक्षरन्यास और दिङ्न्यास किया जाता है। इसके पश्चात् देवी के तीन ध्यान श्लोकों का पाठ करके माला का पूजन और प्रार्थना की जाती है। अंत में नवार्ण मन्त्र “ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे” का 108 बार जप करके जप का देवी को निवेदन किया जाता है।
॥ निष्कर्ष॥
श्री दुर्गा सप्तशती की नवार्ण विधि में विनियोग, विभिन्न न्यास, देवी का ध्यान, माला पूजन और नवार्ण मन्त्र का जप क्रमपूर्वक किया जाता है। इस विधि में दिए गए मंत्रों और न्यासों का पाठ पारंपरिक क्रम के अनुसार किया जाता है। संस्कृत मंत्रों के साथ दिए गए सरल हिंदी अर्थ से पाठक इस विधि में किए जाने वाले प्रत्येक चरण का सामान्य भाव भी समझ सकता है।
॥ नवार्ण विधि से जुड़े सामान्य प्रश्न॥
नवार्ण मन्त्र क्या है?
नवार्ण मन्त्र है:
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे।
नवार्ण मन्त्र का कितनी बार जप किया जाता है?
इस विधि में नवार्ण मन्त्र का 108 बार जप करने का निर्देश दिया गया है।
नवार्ण विधि में किन न्यासों का पाठ होता है?
इस विधि में ऋष्यादिन्यास, करन्यास, हृदयादिन्यास, अक्षरन्यास और दिङ्न्यास किए जाते हैं।
नवार्ण विधि में कितने ध्यान श्लोक हैं?
इस विधि में देवी के 3 ध्यान श्लोक दिए गए हैं, जिनमें महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती के ध्यान का वर्णन है।
नवार्ण मन्त्र का जप कब किया जाता है?
इस विधि में विनियोग, विभिन्न न्यास, दिङ्न्यास, देवी के ध्यान और माला पूजन के बाद नवार्ण मन्त्र का जप किया जाता है।
क्या नवार्ण विधि में माला पूजन भी किया जाता है?
हाँ। नवार्ण मन्त्र के जप से पहले माला का पूजन और माला से संबंधित प्रार्थनाओं का पाठ किया जाता है।
