श्री देवी अथर्वशीर्ष देवी उपासना का एक महत्वपूर्ण स्तोत्र है, जिसमें देवी को समस्त सृष्टि की मूल शक्ति, ब्रह्मस्वरूपिणी, महामाया और जगत की आधारभूत शक्ति के रूप में प्रणाम किया गया है। इसमें देवी स्वयं अपने स्वरूप का वर्णन करती हैं और बताती हैं कि सृष्टि में दिखाई देने वाली प्रकृति, पुरुष, ज्ञान, अज्ञान, पंचभूत और समस्त जगत उन्हीं की शक्ति से प्रकाशित है।
देवी अथर्वशीर्षम् का पाठ चंडी अथवा दुर्गा सप्तशती की उपासना परंपरा में भी किया जाता है। दुर्गा सप्तशती के मुख्य अध्यायों के पाठ से पहले किए जाने वाले पाठों में कवच, अर्गला, कीलक, रात्रिसूक्त और देव्यथर्वशीर्षम् आदि का उल्लेख मिलता है।
इस स्तोत्र में देवी के अनेक स्वरूपों की स्तुति की गई है। कहीं वे महालक्ष्मी, सरस्वती और दुर्गा के रूप में दिखाई देती हैं, तो कहीं वे समस्त देवताओं और शक्तियों में व्याप्त परम शक्ति के रूप में वर्णित हैं। अंत में इसके पाठ से जुड़े पारंपरिक फल और उपासना संबंधी बातें भी बताई गई हैं।
॥ श्रीदेव्यथर्वशीर्षम् ॥
ॐ सर्वे वै देवा देवीमुपतस्थुः कासि त्वं महादेवीति॥१॥
सरल हिंदी अर्थ:
सभी देवताओं ने देवी के पास जाकर पूछा—हे महादेवी! आप कौन हैं? आपका वास्तविक स्वरूप क्या है?
साब्रवीत् – अहं ब्रह्मस्वरूपिणी। मत्तः प्रकृतिपुरुषात्मकं जगत्। शून्यं चाशून्यं च॥२॥
सरल हिंदी अर्थ:
देवी ने कहा—मैं ब्रह्मस्वरूपिणी हूँ। प्रकृति और पुरुष से बना यह समस्त जगत मुझसे ही उत्पन्न होता है। जो शून्य है और जो अशून्य है, दोनों में मेरा ही स्वरूप विद्यमान है।
अहमानन्दानानन्दौ। अहं विज्ञानाविज्ञाने। अहं ब्रह्माब्रह्मणी वेदितव्ये। अहं पञ्चभूतान्यपञ्चभूतानि। अहमखिलं जगत्॥३॥
सरल हिंदी अर्थ:
मैं आनंद और अनानंद हूँ। मैं विज्ञान और अविज्ञान हूँ। जानने योग्य ब्रह्म और अब्रह्म भी मैं ही हूँ। पंचमहाभूत और पंचमहाभूतों से परे जो कुछ है, वह भी मेरा ही स्वरूप है। यह संपूर्ण जगत भी मैं ही हूँ।
वेदोऽहमवेदोऽहम्। विद्याहमविद्याहम्। अजाहमनजाहम्। अधश्चोर्ध्वं च तिर्यक्चाहम्॥४॥
सरल हिंदी अर्थ:
मैं वेद हूँ और अवेद भी हूँ। मैं विद्या हूँ और अविद्या भी हूँ। मैं अजन्मा हूँ और जन्म लेने वाले स्वरूप में भी मैं ही हूँ। नीचे, ऊपर और चारों दिशाओं में जो कुछ है, उसमें मेरा ही विस्तार है।
अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चरामि। अहमादित्यैरुत विश्वदेवैः। अहं मित्रावरुणावुभौ बिभर्मि। अहमिन्द्राग्नी अहमश्विनावुभौ॥५॥
सरल हिंदी अर्थ:
मैं रुद्रों और वसुओं के साथ विचरण करती हूँ। मैं आदित्यों और समस्त देवताओं के साथ भी विद्यमान हूँ। मैं मित्र और वरुण दोनों को धारण करती हूँ। मैं इंद्र और अग्नि तथा दोनों अश्विनीकुमारों को भी धारण करने वाली शक्ति हूँ।
अहं सोमं त्वष्टारं पूषणं भगं दधामि। अहं विष्णुमुरुक्रमं ब्रह्माणमुत प्रजापतिं दधामि॥६॥
सरल हिंदी अर्थ:
मैं सोम, त्वष्टा, पूषा और भग देवता को धारण करती हूँ। मैं व्यापक गति वाले भगवान विष्णु, ब्रह्मा और प्रजापति को भी धारण करने वाली शक्ति हूँ।
अहं दधामि द्रविणं हविष्मते सुप्राव्ये यजमानाय सुन्वते। अहं राष्ट्री सङ्गमनी वसूनां चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम्। अहं सुवे पितरमस्य मूर्धन्मम योनिरप्स्वन्तः समुद्रे। य एवं वेद। स दैवीं सम्पदमाप्नोति॥७॥
सरल हिंदी अर्थ:
मैं यज्ञ करने वाले और आहुति देने वाले यजमान को धन और समृद्धि प्रदान करती हूँ। मैं राष्ट्र की अधिष्ठात्री शक्ति हूँ और सभी संपत्तियों को एकत्र करने वाली हूँ। मैं ज्ञानस्वरूपिणी और यज्ञ में पूजनीय शक्तियों में प्रथम हूँ। मैं इस जगत के पिता को भी जन्म देने वाली शक्ति हूँ और मेरा मूल स्वरूप जल तथा समुद्र के भीतर भी विद्यमान है। जो इस सत्य को जानता है, वह दैवी संपदा को प्राप्त करता है।
ते देवा अब्रुवन् – नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः। नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम्॥८॥
सरल हिंदी अर्थ:
तब देवताओं ने कहा—देवी को नमस्कार है, महादेवी को नमस्कार है। कल्याणस्वरूपिणी देवी को बार-बार नमस्कार है। प्रकृति और मंगलमयी भद्रा देवी को हम श्रद्धापूर्वक प्रणाम करते हैं।
तामग्निवर्णां तपसा ज्वलन्तीं वैरोचनीं कर्मफलेषु जुष्टाम्। दुर्गां देवीं शरणं प्रपद्यामहेऽसुरान्नाशयित्र्यै ते नमः॥९॥
सरल हिंदी अर्थ:
हम उस देवी की शरण लेते हैं जो अग्नि के समान तेजस्विनी हैं, तप से प्रकाशित हैं, दिव्य प्रकाश से युक्त हैं और कर्मों के फल को प्रदान करने वाली हैं। हम दुर्गा देवी की शरण लेते हैं, जो असुरों का नाश करने वाली हैं। ऐसी देवी को हमारा नमस्कार है।
देवीं वाचमजनयन्त देवास्तां विश्वरूपाः पशवो वदन्ति। सा नो मन्द्रेषमूर्जं दुहाना धेनुर्वागस्मानुप सुष्टुतैतु॥१०॥
सरल हिंदी अर्थ:
देवताओं ने देवीस्वरूप वाणी को प्रकट किया। समस्त प्राणी उसी वाणी के अनेक रूपों में बोलते हैं। वह देवी हमारे लिए मधुर वाणी, शक्ति और पोषण प्रदान करने वाली कामधेनु के समान होकर हमारे पास आए और हमें शुभ वाणी प्रदान करे।
कालरात्रीं ब्रह्मस्तुतां वैष्णवीं स्कन्दमातरम्। सरस्वतीमदितिं दक्षदुहितरं नमामः पावनां शिवाम्॥११॥
सरल हिंदी अर्थ:
हम कालरात्रि को प्रणाम करते हैं, जिनकी ब्रह्मा स्तुति करते हैं। हम वैष्णवी, स्कंदमाता, सरस्वती और अदिति को भी नमस्कार करते हैं। दक्ष की पुत्री, पवित्र और कल्याणस्वरूपिणी देवी को हम प्रणाम करते हैं।
महालक्ष्म्यै च विद्महे सर्वशक्त्यै च धीमहि। तन्नो देवी प्रचोदयात्॥१२॥
सरल हिंदी अर्थ:
हम महालक्ष्मी को जानने का प्रयास करते हैं और सर्वशक्तिमयी देवी का ध्यान करते हैं। वह देवी हमारी बुद्धि को शुभ मार्ग की ओर प्रेरित करें।
अदितिर्ह्यजनिष्ट दक्ष या दुहिता तव। तां देवा अन्वजायन्त भद्रा अमृतबन्धवः॥१३॥
सरल हिंदी अर्थ:
हे देवी! अदिति दक्ष की पुत्री के रूप में प्रकट हुईं। देवताओं ने भी उसी शक्ति का अनुसरण किया। वे मंगलमयी और अमृतस्वरूप से जुड़े हुए माने गए हैं।
कामो योनिः कमला वज्रपाणिर्गुहा हसा मातरिश्वाभ्रमिन्द्रः। पुनर्गुहा सकला मायया च पुरूच्यैषा विश्वमातादिविद्योम्॥१४॥
सरल हिंदी अर्थ:
काम, योनि, कमला, वज्रधारी इंद्र, गुहा, हंसा, मातरिश्वा और अन्य दिव्य शक्तियों के रूप में भी वही परम देवी शक्ति प्रकट होती है। अपनी माया के द्वारा वह अनेक रूप धारण करती हुई संपूर्ण विश्व की माता के रूप में विद्यमान रहती है।
एषाऽऽत्मशक्तिः। एषा विश्वमोहिनी। पाशाङ्कुशधनुर्बाणधरा। एषा श्रीमहाविद्या। य एवं वेद स शोकं तरति॥१५॥
सरल हिंदी अर्थ:
यह देवी आत्मशक्ति हैं। यही संपूर्ण संसार को अपनी माया से मोहित करने वाली शक्ति हैं। इनके हाथों में पाश, अंकुश, धनुष और बाण हैं। यही श्रीमहाविद्या हैं। जो इनके वास्तविक स्वरूप को जानता है, वह शोक से पार हो जाता है।
नमस्ते अस्तु भगवति मातरस्मान् पाहि सर्वतः॥१६॥
सरल हिंदी अर्थ:
हे भगवती माता! आपको नमस्कार है। आप सभी दिशाओं और सभी प्रकार के संकटों से हमारी रक्षा करें।
सैषाष्टौ वसवः। सैषैकादश रुद्राः। सैषा द्वादशादित्याः। सैषा विश्वेदेवाः सोमपा असोमपाश्च। सैषा यातुधाना असुरा रक्षांसि पिशाचा यक्षाः सिद्धाः। सैषा सत्त्वरजस्तमांसि। सैषा ब्रह्मविष्णुरुद्ररूपिणी। सैषा प्रजापतीन्द्रमनवः। सैषा ग्रहनक्षत्रज्योतींषि। कलाकाष्ठादिकालरूपिणी। तामहं प्रणौमि नित्यम्। पापापहारिणीं देवीं भुक्तिमुक्तिप्रदायिनीम्। अनन्तां विजयां शुद्धां शरण्यां शिवदां शिवाम्॥१७॥
सरल हिंदी अर्थ:
वही देवी आठ वसुओं, ग्यारह रुद्रों और बारह आदित्यों के रूप में विद्यमान हैं। वही विश्वेदेवों और विभिन्न दिव्य शक्तियों में स्थित हैं। वे यक्ष, सिद्ध, पिशाच, असुर आदि में भी शक्ति के रूप में विद्यमान हैं। सत्त्व, रज और तम तीनों गुण भी उन्हीं की शक्ति से जुड़े हैं। वे ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र के रूपों में प्रकट होती हैं। प्रजापति, इंद्र, मनु, ग्रह, नक्षत्र और ज्योतियों में भी उन्हीं की शक्ति है। कला, काष्ठा आदि काल के सभी रूप उन्हीं से संबंधित हैं। ऐसी देवी को मैं नित्य प्रणाम करता हूँ। वे पापों को दूर करने वाली, भुक्ति और मुक्ति प्रदान करने वाली, अनंत, विजयी, पवित्र, शरण देने वाली और कल्याणस्वरूपिणी हैं।
वियदीकारसंयुक्तं वीतिहोत्रसमन्वितम्। अर्धेन्दुलसितं देव्या बीजं सर्वार्थसाधकम्॥१८॥
सरल हिंदी अर्थ:
देवी के बीजमंत्र का स्वरूप आकाशतत्त्व और अग्नितत्त्व से संबंधित दिव्य संकेतों तथा अर्धचंद्र के प्रकाश से युक्त बताया गया है। यह देवी का बीज समस्त उद्देश्यों की सिद्धि कराने वाला माना गया है।
एवमेकाक्षरं ब्रह्म यतयः शुद्धचेतसः। ध्यायन्ति परमानन्दमया ज्ञानाम्बुराशयः॥१९॥
सरल हिंदी अर्थ:
शुद्ध चित्त वाले यति और साधक इस एकाक्षर ब्रह्म का ध्यान करते हैं। वे ज्ञान के स्वरूप और परम आनंद में स्थित होकर उस दिव्य तत्त्व का चिंतन करते हैं।
वाङ्माया ब्रह्मसूस्तस्मात् षष्ठं वक्त्रसमन्वितम्। सूर्योऽवामश्रोत्रबिन्दुसंयुक्तष्टात्तृतीयकः। नारायणेन सम्मिश्रो वायुश्चाधरयुक् ततः। विच्चे नवार्णकोऽर्णः स्यान्महदानन्ददायकः॥२०॥
सरल हिंदी अर्थ:
इस मंत्र-विवरण में देवी के नवार्ण मंत्र के अक्षरों और उनके आध्यात्मिक स्वरूप की व्याख्या की गई है। देवी की वाणी, ब्रह्मशक्ति, सूर्य, बिंदु, नारायण और वायु आदि से संबंधित संकेतों के माध्यम से मंत्र के अक्षरों का स्वरूप बताया गया है। यह नवार्ण मंत्र महान आनंद प्रदान करने वाला कहा गया है।
हृत्पुण्डरीकमध्यस्थां प्रातःसूर्यसमप्रभाम्। पाशाङ्कुशधरां सौम्यां वरदाभयहस्तकाम्। त्रिनेत्रां रक्तवसनां भक्तकामदुघां भजे॥२१॥
सरल हिंदी अर्थ:
मैं उस देवी का ध्यान करता हूँ जो हृदय रूपी कमल के मध्य में विराजमान हैं और जिनकी प्रभा प्रातःकालीन सूर्य के समान है। वे पाश और अंकुश धारण करती हैं, सौम्य स्वरूप वाली हैं, अपने हाथों से वरदान और अभय प्रदान करती हैं। वे त्रिनेत्री, लाल वस्त्र धारण करने वाली और भक्तों की इच्छाओं को पूर्ण करने वाली हैं।
नमामि त्वां महादेवीं महाभयविनाशिनीम्। महादुर्गप्रशमनीं महाकारुण्यरूपिणीम्॥२२॥
सरल हिंदी अर्थ:
मैं महादेवी को प्रणाम करता हूँ, जो महान भय का नाश करने वाली हैं। वे बड़े से बड़े संकट को शांत करने वाली और महान करुणा की मूर्ति हैं।
यस्याः स्वरूपं ब्रह्मादयो न जानन्ति तस्मादुच्यते अज्ञेया। यस्या अन्तो न लभ्यते तस्मादुच्यते अनन्ता। यस्या लक्ष्यं नोपलक्ष्यते तस्मादुच्यते अलक्ष्या। यस्या जननं नोपलभ्यते तस्मादुच्यते अजा। एकैव सर्वत्र वर्तते तस्मादुच्यते एका। एकैव विश्वरूपिणी तस्मादुच्यते नैका। अत एवोच्यते अज्ञेयानन्तालक्ष्याजैका नैकेति॥२३॥
सरल हिंदी अर्थ:
जिन देवी के वास्तविक स्वरूप को ब्रह्मा आदि देवता भी पूरी तरह नहीं जान सकते, इसलिए उन्हें अज्ञेया कहा जाता है। जिनका कोई अंत नहीं है, इसलिए वे अनंता हैं। जिनका निश्चित रूप से लक्ष्य नहीं किया जा सकता, इसलिए वे अलक्ष्या हैं। जिनका कोई जन्म नहीं है, इसलिए वे अजा हैं। जो एक होकर भी सब जगह विद्यमान हैं, इसलिए वे एका हैं। जो अकेली होकर भी संपूर्ण विश्व के अनेक रूपों में दिखाई देती हैं, इसलिए वे नैका कही जाती हैं। इस प्रकार देवी को अज्ञेया, अनंता, अलक्ष्या, अजा, एका और नैका कहा गया है।
मन्त्राणां मातृका देवी शब्दानां ज्ञानरूपिणी। ज्ञानानां चिन्मयातीता शून्यानां शून्यसाक्षिणी। यस्याः परतरं नास्ति सैषा दुर्गा प्रकीर्तिता॥२४॥
सरल हिंदी अर्थ:
देवी मंत्रों की मातृका अर्थात मूल शक्ति हैं। वे शब्दों में ज्ञान के रूप में विद्यमान हैं। वे ज्ञान से भी परे स्थित चेतनस्वरूप हैं और शून्य की भी साक्षी हैं। उनसे श्रेष्ठ और कोई नहीं है। इसलिए वही देवी दुर्गा के नाम से प्रसिद्ध हैं।
तां दुर्गां दुर्गमां देवीं दुराचारविघातिनीम्। नमामि भवभीतोऽहं संसारार्णवतारिणीम्॥२५॥
सरल हिंदी अर्थ:
मैं उस दुर्गा देवी को प्रणाम करता हूँ जो कठिन से कठिन संकटों को दूर करने वाली हैं, बुरे आचरण का नाश करने वाली हैं और संसार रूपी समुद्र से पार लगाने वाली हैं। संसार के भय से व्याकुल होकर मैं उनकी शरण में जाता हूँ।
इदमथर्वशीर्षं योऽधीते स पञ्चाथर्वशीर्षजपफलमाप्नोति। इदमथर्वशीर्षमज्ञात्वा योऽर्चां स्थापयति – शतलक्षं प्रजप्त्वापि सोऽर्चासिद्धिं न विन्दति। शतमष्टोत्तरं चास्य पुरश्चर्याविधिः स्मृतः। दशवारं पठेद् यस्तु सद्यः पापैः प्रमुच्यते। महादुर्गाणि तरति महादेव्याः प्रसादतः॥२६॥
सरल हिंदी अर्थ:
जो व्यक्ति इस अथर्वशीर्ष का अध्ययन करता है, वह पाँच अथर्वशीर्षों के जप के समान फल प्राप्त करता है, ऐसा इस पाठ की फलश्रुति में कहा गया है। इसमें देवी की आराधना और पुरश्चरण से संबंधित पारंपरिक विधान का वर्णन भी मिलता है। दस बार इसका पाठ करने वाले के पापों से मुक्त होने और महादेवी की कृपा से बड़े-बड़े संकटों को पार करने की बात कही गई है।
सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति। प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति। सायं प्रातः प्रयुञ्जानो अपापो भवति। निशीथे तुरीयसन्ध्यायां जप्त्वा वाक्सिद्धिर्भवति। नूतनायां प्रतिमायां जप्त्वा देवतासांनिध्यं भवति। प्राणप्रतिष्ठायां जप्त्वा प्राणानां प्रतिष्ठा भवति। भौमाश्विन्यां महादेवीसंनिधौ जप्त्वा महामृत्युं तरति। स महामृत्युं तरति य एवं वेद। इत्युपनिषत्॥२७॥
सरल हिंदी अर्थ:
इस फलश्रुति में कहा गया है कि संध्या समय इसका पाठ करने से दिन में किए गए पापों के नाश की बात कही गई है और प्रातः पाठ करने से रात्रि में किए गए पापों के नाश का फल बताया गया है। प्रातः और सायं दोनों समय पाठ करने वाले के पापों से मुक्त होने की बात कही गई है। मध्यरात्रि अथवा तुरीय संध्या में जप करने से वाक्सिद्धि प्राप्त होने की परंपरागत मान्यता बताई गई है। नई प्रतिमा में इसका जप करने से देवता की उपस्थिति तथा प्राणप्रतिष्ठा के समय जप करने से प्राणों की प्रतिष्ठा होने का उल्लेख है। मंगलवार और अश्विनी नक्षत्र के संयोग में महादेवी की उपस्थिति में इसका जप करने से महामृत्यु को पार करने की फलश्रुति कही गई है। अंत में कहा गया है कि जो इस रहस्य को जानता है, वह महामृत्यु को पार करता है। यही उपनिषद् है।
।इति श्रीदेव्यथर्वशीर्षम् सम्पूर्णम्।
श्रीदेव्यथर्वशीर्षम् का धार्मिक महत्व
श्रीदेव्यथर्वशीर्षम् में देवी को केवल किसी एक देवी के रूप में सीमित नहीं किया गया है। इसमें देवी को समस्त सृष्टि में व्याप्त परम शक्ति के रूप में देखा गया है। वे प्रकृति भी हैं और पुरुष से संबंधित परम शक्ति भी, वे ज्ञान और अविद्या दोनों के आधार में स्थित हैं तथा पंचमहाभूतों और समस्त जगत में व्याप्त हैं।
इस स्तोत्र का एक विशेष पक्ष यह है कि इसमें देवी के अनेक रूपों को एक ही परम शक्ति के रूप में देखा गया है। महालक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा, कालरात्रि, वैष्णवी और स्कंदमाता आदि रूपों की स्तुति इसी व्यापक देवी-तत्त्व की ओर संकेत करती है।
देवी को ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र के रूपों में भी व्याप्त बताया गया है। ग्रह, नक्षत्र, काल और प्रकृति के तीनों गुणों में भी देवी की शक्ति का वर्णन किया गया है। इस कारण यह स्तोत्र देवी को संपूर्ण ब्रह्मांड की मूल शक्ति के रूप में समझने में सहायता करता है।
श्रीदेव्यथर्वशीर्षम् का पाठ कब किया जाता है?
देवी उपासना और चंडी पाठ की परंपरा में श्रीदेव्यथर्वशीर्षम् का पाठ किया जाता है। विशेष रूप से दुर्गा सप्तशती के पाठ से पहले किए जाने वाले पाठों के क्रम में इसका उल्लेख मिलता है।
नवरात्रि, देवी उपासना, चंडी पाठ तथा अन्य अवसरों पर श्रद्धालु अपनी परंपरा और गुरु से प्राप्त विधि के अनुसार इसका पाठ कर सकते हैं।
श्रीदेव्यथर्वशीर्षम् से मिलने वाली फलश्रुति
इस स्तोत्र के अंतिम भाग में इसके पाठ से जुड़े अनेक पारंपरिक फल बताए गए हैं। इनमें पापों से मुक्ति, संकटों से पार होने, वाक्सिद्धि, देवी की उपस्थिति और प्राणप्रतिष्ठा से संबंधित फल का वर्णन मिलता है।
इन फलों को स्त्रोत में वर्णित पारंपरिक फलश्रुति के रूप में समझना चाहिए। धार्मिक साधना में श्रद्धा, शुद्ध आचरण और अपनी परंपरा के अनुसार पाठ करना महत्वपूर्ण माना जाता है।
श्रीदेव्यथर्वशीर्षम् का मुख्य संदेश
श्रीदेव्यथर्वशीर्षम् का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि देवी की शक्ति संपूर्ण सृष्टि में व्याप्त है। संसार में दिखाई देने वाली विभिन्न शक्तियाँ उसी एक परम शक्ति के अनेक रूप हैं।
देवी को जानना केवल किसी एक रूप की पूजा करना नहीं, बल्कि उस परम शक्ति को पहचानना है जो ज्ञान, प्रकृति, चेतना, शक्ति और समस्त जगत में व्याप्त है। इसी कारण स्तोत्र में देवी को अज्ञेया, अनंता, अलक्ष्या, अजा, एका और नैका जैसे नामों से संबोधित किया गया है।
निष्कर्ष
श्रीदेव्यथर्वशीर्षम् देवी की महिमा, शक्ति और व्यापक स्वरूप का गहन स्तोत्र है। इसमें देवी को ब्रह्मस्वरूपिणी, प्रकृति, ज्ञान, महाविद्या, दुर्गा और समस्त जगत की आधारभूत शक्ति के रूप में नमन किया गया है।
इसका पाठ भक्त को देवी के विभिन्न रूपों को एक ही परम शक्ति के रूप में समझने की प्रेरणा देता है। नवरात्रि, चंडी पाठ और देवी उपासना के अवसरों पर श्रद्धा के साथ इसका पाठ किया जा सकता है।
श्रीदेव्यथर्वशीर्षम् से जुड़े सामान्य प्रश्न
श्रीदेव्यथर्वशीर्षम् क्या है?
श्रीदेव्यथर्वशीर्षम् देवी की महिमा और परम शक्ति के स्वरूप का वर्णन करने वाला महत्वपूर्ण संस्कृत स्तोत्र है। इसमें देवी को संपूर्ण सृष्टि में व्याप्त शक्ति के रूप में बताया गया है।
क्या श्रीदेव्यथर्वशीर्षम् दुर्गा सप्तशती का एक अध्याय है?
नहीं। इसे दुर्गा सप्तशती के मुख्य १३ अध्यायों में से एक नहीं माना जाता। चंडी या दुर्गा सप्तशती पाठ की परंपरा में इसे मुख्य अध्यायों के पाठ से पहले किए जाने वाले महत्वपूर्ण पाठों में शामिल किया जाता है।
श्रीदेव्यथर्वशीर्षम् में देवी का क्या स्वरूप बताया गया है?
इसमें देवी को ब्रह्मस्वरूपिणी, प्रकृति, महाविद्या, दुर्गा, ज्ञान और संपूर्ण जगत की मूल शक्ति के रूप में वर्णित किया गया है।
श्रीदेव्यथर्वशीर्षम् का पाठ कब किया जा सकता है?
इसका पाठ देवी उपासना, नवरात्रि और चंडी पाठ आदि अवसरों पर किया जाता है। पाठ की विशेष विधि के लिए अपनी परंपरा या गुरु से प्राप्त निर्देशों का पालन करना उचित है।
श्रीदेव्यथर्वशीर्षम् में कितने श्लोक हैं?
प्रचलित पाठ में श्रीदेव्यथर्वशीर्षम् का क्रम १ से २७ तक मिलता है। अंतिम भाग फलश्रुति के रूप में आता है।
क्या श्रीदेव्यथर्वशीर्षम् का पाठ दुर्गा सप्तशती से पहले किया जाता है?
हाँ। चंडी पाठ की प्रचलित पाठ-विधि में देव्यथर्वशीर्षम् को दुर्गा सप्तशती के मुख्य अध्यायों से पहले किए जाने वाले पाठों में शामिल किया जाता है।
॥ जय माता दी ॥
