देवीमयी स्तुति
दुर्गा सप्तशती देवीमयी देवी के सर्वव्यापक स्वरूप का अत्यंत सुंदर स्तवन है। इसमें साधक देवी को केवल किसी एक मूर्ति या रूप तक सीमित न मानकर सम्पूर्ण शब्द, विचार, दृश्य जगत और प्रत्येक अनुभव में उनके स्वरूप का दर्शन करता है।
यह स्तुति “तव च का किल न स्तुतिरम्बिके” से आरम्भ होती है। उपलब्ध पाठ-स्रोतों में इसे महामाहेश्वर आचार्य अभिनवगुप्त से सम्बद्ध बताया गया है। इसलिए इसे दुर्गा सप्तशती के मूल 13 अध्यायों में शामिल पाठ के रूप में नहीं, बल्कि देवी-उपासना से सम्बद्ध स्वतंत्र स्तुति के रूप में समझना उचित है।
देवीमयी स्तुति का पाठ
॥ देवीमयी ॥
तव च का किल न स्तुतिरम्बिके!
सकलशब्दमयी किल ते तनुः।
निखिलमूर्तिषु मे भवदन्वयो
मनसिजासु बहिःप्रसरासु च॥
हिन्दी अर्थ:
हे अम्बिके! ऐसा कौन-सा शब्द या वाणी है जो आपकी स्तुति न हो? आपका स्वरूप सम्पूर्ण शब्दमय है। अब मुझे अपने मन में उत्पन्न होने वाले विचारों तथा बाहर दिखाई देने वाले सभी रूपों में आपका ही सम्बन्ध और स्वरूप दिखाई देता है।
इति विचिन्त्य शिवे! शमिताशिवे!
जगति जातमयत्नवशादिदम्।
स्तुतिजपार्चनचिन्तनवर्जिता
न खलु काचन कालकलास्ति मे॥
हिन्दी अर्थ:
हे शिवस्वरूपिणी देवी! हे समस्त अमंगल का शमन करने वाली कल्याणमयी माता! इस प्रकार विचार करने पर मुझे अनुभव होता है कि इस संसार में जो कुछ भी सहज रूप से घटित हो रहा है, उसमें आपकी ही उपस्थिति है। मेरे समय का कोई भी क्षण आपकी स्तुति, जप, पूजा या चिंतन से वास्तव में रहित नहीं है।
देवीमयी स्तुति का भाव
देवीमयी स्तुति का मुख्य भाव यह है कि देवी की उपासना केवल मंदिर में पूजा करने या निश्चित समय पर मंत्र-जप करने तक सीमित नहीं है। जब साधक सम्पूर्ण जगत में देवी की उपस्थिति का अनुभव करने लगता है, तब उसके लिए संसार का प्रत्येक रूप देवी के स्वरूप का स्मरण कराने लगता है।
पहले श्लोक में देवी को सकलशब्दमयी कहा गया है। इसका भाव यह है कि सम्पूर्ण शब्द और वाणी देवी की शक्ति से ही अभिव्यक्त होते हैं। इसलिए साधक के लिए प्रत्येक शब्द देवी के स्मरण का माध्यम बन सकता है।
इसी प्रकार मन में उठने वाले विचार और बाहर दिखाई देने वाले विभिन्न रूप भी देवी की व्यापक सत्ता से जुड़े हुए अनुभव किए जाते हैं। साधक की दृष्टि में संसार देवी से अलग दिखाई नहीं देता।
दूसरे श्लोक में इसी अनुभूति को आगे बढ़ाया गया है। जब देवी की सर्वव्यापकता का चिंतन दृढ़ हो जाता है, तब स्तुति, जप, पूजा और ध्यान केवल किसी विशेष समय की साधना नहीं रह जाते। जीवन का प्रत्येक क्षण देवी के स्मरण और आराधना का माध्यम बन जाता है।
देवीमयी स्तुति का महत्व
देवीमयी स्तुति साधक को देवी की व्यापक सत्ता का चिंतन करने की प्रेरणा देती है। इसका विशेष भाव यह है कि देवी को केवल बाहरी पूजा के किसी एक स्वरूप में न देखकर अपने विचारों, वाणी और संसार के प्रत्येक दृश्य रूप में अनुभव किया जाए।
इस स्तुति का पाठ करते समय इसके शब्दों के साथ-साथ इसके भाव पर ध्यान करना अधिक महत्वपूर्ण है। इससे साधक के भीतर देवी के प्रति श्रद्धा और सर्वत्र देवी-दर्शन की भावना विकसित होती है।
देवीमयी स्तुति से मिलने वाली प्रेरणा
इस स्तुति का सबसे सुंदर संदेश यह है कि ईश्वर या देवी का स्मरण केवल पूजा के समय तक सीमित नहीं होना चाहिए। यदि मन में देवी के प्रति श्रद्धा जागृत हो जाए, तो दैनिक जीवन के कार्य भी उनके स्मरण का माध्यम बन सकते हैं।
बोलते समय वाणी में संयम, विचारों में पवित्रता और व्यवहार में करुणा रखना भी देवी-उपासना की भावना को जीवन में उतारने का एक मार्ग बन सकता है।
निष्कर्ष
देवीमयी स्तुति देवी के सर्वव्यापक स्वरूप का चिंतन कराने वाली सुंदर स्तुति है। इसमें देवी को सम्पूर्ण शब्दों, विचारों और दृश्य जगत में व्याप्त शक्ति के रूप में अनुभव करने की भावना व्यक्त होती है।
इसका मूल संदेश यही है कि जब साधक की दृष्टि में सम्पूर्ण जगत देवीमय हो जाता है, तब देवी का स्मरण किसी एक समय या स्थान तक सीमित नहीं रहता। जीवन का प्रत्येक क्षण उनकी आराधना और स्मरण का अवसर बन जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
देवीमयी स्तुति क्या है?
देवीमयी स्तुति देवी के सर्वव्यापक स्वरूप का स्तवन है। इसमें देवी को सम्पूर्ण शब्द, विचार और जगत के विभिन्न रूपों में अनुभव करने की भावना व्यक्त की गई है।
देवीमयी स्तुति किससे सम्बद्ध मानी जाती है?
उपलब्ध पाठ-स्रोतों में इस स्तुति को महामाहेश्वर आचार्य अभिनवगुप्त से सम्बद्ध बताया गया है। इसे दुर्गा सप्तशती के मूल 13 अध्यायों का हिस्सा मानना उचित नहीं है।
देवीमयी स्तुति का आरम्भ किस पंक्ति से होता है?
यह स्तुति “तव च का किल न स्तुतिरम्बिके” पंक्ति से आरम्भ होती है।
देवीमयी स्तुति का मुख्य भाव क्या है?
इसका मुख्य भाव देवी की सर्वव्यापकता का चिंतन है। साधक सम्पूर्ण शब्दों, विचारों और दृश्य जगत में देवी की उपस्थिति का अनुभव करता है।
क्या देवीमयी स्तुति का पाठ किया जा सकता है?
हाँ, श्रद्धापूर्वक इसका पाठ और भावपूर्वक चिंतन किया जा सकता है। इसके साथ इसके अर्थ और देवी के सर्वव्यापक स्वरूप के भाव को समझना भी महत्वपूर्ण है।
