तन्त्रोक्तं देवी सूक्तम् – दुर्गा सप्तशती पाठ
तन्त्रोक्तं देवीसूक्तम् मां दुर्गा की स्तुति का अत्यंत प्रसिद्ध पाठ है। इसमें देवी को प्रकृति, शक्ति, बुद्धि, निद्रा, क्षुधा, श्रद्धा, शांति, दया, लक्ष्मी और मातृभाव सहित समस्त प्राणियों में विभिन्न रूपों से स्थित बताया गया है। इसी कारण इस स्तुति में देवी के सर्वव्यापी स्वरूप का बहुत सुंदर वर्णन मिलता है।
तन्त्रोक्तं देवीसूक्तम् के प्रारंभिक पांच श्लोकों में देवी के अनेक दिव्य स्वरूपों को नमन किया गया है। इसके बाद “या देवी सर्वभूतेषु…” से आरंभ होने वाले मंत्रों में बताया गया है कि मां भगवती प्रत्येक प्राणी के भीतर अलग-अलग शक्तियों के रूप में विद्यमान हैं। अंत के श्लोकों में देवी से मंगल, कल्याण और संकटों से रक्षा की प्रार्थना की गई है।
यह स्तुति दुर्गा सप्तशती के पांचवें अध्याय में देवताओं द्वारा की गई देवी की स्तुति का प्रसिद्ध पाठ है। मूल दुर्गा सप्तशती में यह स्तुति अध्याय 5 के 9वें श्लोक से आरंभ होकर 82वें श्लोक तक विस्तृत है, जबकि प्रचलित तन्त्रोक्त देवीसूक्तम् में इसे 30 श्लोकों के रूप में क्रमबद्ध करके पढ़ा जाता है।
॥ अथ तन्त्रोक्तं देवीसूक्तम् ॥
नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम्॥१॥
हिन्दी अर्थ: देवी को नमस्कार है, महादेवी को नमस्कार है और कल्याणमयी शिवा को बार-बार नमस्कार है। प्रकृति तथा मंगलस्वरूपा भद्रा देवी को हम नियमपूर्वक प्रणाम करते हैं।
रौद्रायै नमो नित्यायै गौर्यै धात्र्यै नमो नमः।
ज्योत्स्नायै चेन्दुरूपिण्यै सुखायै सततं नमः॥२॥
हिन्दी अर्थ: रौद्र स्वरूप वाली देवी को नमस्कार है। नित्य, गौरी और धात्री देवी को बार-बार प्रणाम है। चांदनी के समान प्रकाशमान, चंद्रमा के स्वरूप वाली और सुख प्रदान करने वाली देवी को सदा नमस्कार है।
कल्याण्यै प्रणतां वृद्ध्यै सिद्ध्यै कुर्मो नमो नमः।
नैरृत्यै भूभृतां लक्ष्म्यै शर्वाण्यै ते नमो नमः॥३॥
हिन्दी अर्थ: कल्याण करने वाली देवी को नमस्कार है। वृद्धि और सिद्धि प्रदान करने वाली देवी को बार-बार प्रणाम है। नैर्ऋति स्वरूपा, पर्वतों में स्थित लक्ष्मीस्वरूपा और शर्वाणी देवी को नमस्कार है।
दुर्गायै दुर्गपारायै सारायै सर्वकारिण्यै।
ख्यात्यै तथैव कृष्णायै धूम्रायै सततं नमः॥४॥
हिन्दी अर्थ: दुर्गा देवी को नमस्कार है, जो कठिनाइयों से पार लगाने वाली हैं। जो समस्त कार्यों का आधार और उन्हें पूर्ण करने वाली हैं, ख्याति, कृष्णा तथा धूम्रा स्वरूपा देवी को भी सदा नमस्कार है।
अतिसौम्यातिरौद्रायै नतास्तस्यै नमो नमः।
नमो जगत्प्रतिष्ठायै देव्यै कृत्यै नमो नमः॥५॥
हिन्दी अर्थ: अत्यंत सौम्य और अत्यंत रौद्र दोनों स्वरूप धारण करने वाली देवी को बार-बार नमस्कार है। जो संपूर्ण जगत की आधारस्वरूप हैं और समस्त कार्यों को संचालित करने वाली देवी हैं, उन्हें प्रणाम है।
या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥६॥
हिन्दी अर्थ: जो देवी सभी प्राणियों में विष्णुमाया के नाम से जानी जाती हैं, उन देवी को बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥७॥
हिन्दी अर्थ: जो देवी सभी प्राणियों में चेतना के रूप में विद्यमान हैं, उन देवी को बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥८॥
हिन्दी अर्थ: जो देवी सभी प्राणियों में बुद्धि के रूप में स्थित हैं, उन देवी को बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु निद्रारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥९॥
हिन्दी अर्थ: जो देवी सभी प्राणियों में निद्रा के रूप में स्थित हैं, उन देवी को बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु क्षुधारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥१०॥
हिन्दी अर्थ: जो देवी सभी प्राणियों में भूख के रूप में स्थित हैं, उन देवी को बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु छायारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥११॥
हिन्दी अर्थ: जो देवी सभी प्राणियों में छाया के रूप में स्थित हैं, उन देवी को बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥१२॥
हिन्दी अर्थ: जो देवी सभी प्राणियों में शक्ति के रूप में विद्यमान हैं, उन देवी को बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु तृष्णारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥१३॥
हिन्दी अर्थ: जो देवी सभी प्राणियों में इच्छा और तृष्णा के रूप में स्थित हैं, उन देवी को बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु क्षान्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥१४॥
हिन्दी अर्थ: जो देवी सभी प्राणियों में क्षमा और सहनशीलता के रूप में स्थित हैं, उन देवी को बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु जातिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥१५॥
हिन्दी अर्थ: जो देवी सभी प्राणियों में जाति और जन्म के स्वरूप में स्थित हैं, उन देवी को बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु लज्जारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥१६॥
हिन्दी अर्थ: जो देवी सभी प्राणियों में लज्जा और मर्यादा के रूप में स्थित हैं, उन देवी को बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु शान्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥१७॥
हिन्दी अर्थ: जो देवी सभी प्राणियों में शांति के रूप में स्थित हैं, उन देवी को बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥१८॥
हिन्दी अर्थ: जो देवी सभी प्राणियों में श्रद्धा के रूप में विद्यमान हैं, उन देवी को बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु कान्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥१९॥
हिन्दी अर्थ: जो देवी सभी प्राणियों में कांति और तेज के रूप में स्थित हैं, उन देवी को बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥२०॥
हिन्दी अर्थ: जो देवी सभी प्राणियों में लक्ष्मी अर्थात समृद्धि के रूप में स्थित हैं, उन देवी को बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु वृत्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥२१॥
हिन्दी अर्थ: जो देवी सभी प्राणियों में जीवन-निर्वाह की वृत्ति के रूप में स्थित हैं, उन देवी को बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु स्मृतिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥२२॥
हिन्दी अर्थ: जो देवी सभी प्राणियों में स्मृति के रूप में स्थित हैं, उन देवी को बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥२३॥
हिन्दी अर्थ: जो देवी सभी प्राणियों में दया और करुणा के रूप में स्थित हैं, उन देवी को बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु तुष्टिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥२४॥
हिन्दी अर्थ: जो देवी सभी प्राणियों में संतोष के रूप में स्थित हैं, उन देवी को बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥२५॥
हिन्दी अर्थ: जो देवी सभी प्राणियों में माता के रूप में स्थित हैं, उन देवी को बार-बार नमस्कार है।
या देवी सर्वभूतेषु भ्रान्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥२६॥
हिन्दी अर्थ: जो देवी सभी प्राणियों में भ्रम या मोह के रूप में भी स्थित हैं, उन देवी को बार-बार नमस्कार है।
इन्द्रियाणामधिष्ठात्री भूतानां चाखिलेषु या।
भूतेषु सततं तस्यै व्याप्त्यै देव्यै नमो नमः॥२७॥
हिन्दी अर्थ: जो देवी सभी प्राणियों की इन्द्रियों की अधिष्ठात्री हैं और समस्त प्राणियों में निरंतर व्याप्त हैं, उन सर्वव्यापिनी देवी को बार-बार नमस्कार है।
चितिरूपेण या कृत्स्नमेतद् व्याप्य स्थिता जगत्।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥२८॥
हिन्दी अर्थ: जो देवी चेतना के रूप में इस संपूर्ण जगत को व्याप्त करके स्थित हैं, उन देवी को बार-बार नमस्कार है।
स्तुता सुरैः पूर्वमभीष्टसंश्रयात्तथा सुरेन्द्रेण दिनेषु सेविता।
करोतु सा नः शुभहेतुरीश्वरी शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापदः॥२९॥
हिन्दी अर्थ: जिन देवी की देवताओं ने पहले अपने अभीष्ट की प्राप्ति के लिए स्तुति की और देवराज इन्द्र ने भी उनकी सेवा की, वे जगदम्बा हमारी शुभता का कारण बनें और हमारे सभी मंगलों को बढ़ाएं तथा विपत्तियों को दूर करें।
या साम्प्रतं चोद्धतदैत्यतापितैरस्माभिरीशा च सुरैर्नमस्यते।
या च स्मृता तत्क्षणमेव हन्ति नः सर्वापदो भक्तिविनम्रमूर्तिभिः॥३०॥
हिन्दी अर्थ: जिन देवी को इस समय अत्याचारी दैत्यों से पीड़ित हम देवता और अन्य सुर भक्तिपूर्वक प्रणाम कर रहे हैं, वे देवी जब भी श्रद्धा और भक्ति से स्मरण की जाती हैं, उसी क्षण हमारे सभी संकटों को दूर करने वाली हैं।
॥ इति तन्त्रोक्तं देवीसूक्तम् समाप्तम् ॥
तन्त्रोक्तं देवीसूक्तम् का महत्व
तन्त्रोक्तं देवीसूक्तम् में मां भगवती के स्वरूप को केवल किसी एक रूप तक सीमित नहीं माना गया है। इसमें देवी को संसार के प्रत्येक प्राणी में अलग-अलग शक्तियों के रूप में विद्यमान बताया गया है।
मनुष्य के भीतर जो चेतना है, बुद्धि है, स्मृति है, श्रद्धा है, शांति है, दया है और संतोष है, उन सभी में देवी की शक्ति का दर्शन किया गया है। इसी प्रकार निद्रा, क्षुधा और तृष्णा जैसे जीवन के स्वाभाविक अनुभवों में भी देवी की उपस्थिति स्वीकार की गई है।
इस स्तुति की सबसे महत्वपूर्ण भावना यही है कि देवी को केवल मंदिर में विराजमान शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि संपूर्ण जीव-जगत में व्याप्त दिव्य शक्ति के रूप में देखा जाए। “या देवी सर्वभूतेषु…” की आवृत्ति इसी व्यापक देवी-तत्व को सामने लाती है।
तन्त्रोक्तं देवीसूक्तम् और दुर्गा सप्तशती
तन्त्रोक्तं देवीसूक्तम् का मूल पाठ दुर्गा सप्तशती के पांचवें अध्याय में देवताओं द्वारा देवी की स्तुति के रूप में आता है। पांचवें अध्याय में शुम्भ और निशुम्भ द्वारा देवताओं के अधिकार छीन लिए जाने के बाद देवता हिमालय की ओर जाकर देवी की स्तुति करते हैं। इसी स्तुति में देवी के अनेक स्वरूपों का वर्णन मिलता है।
बाद की पाठ-परंपरा में इस स्तुति को स्वतंत्र रूप से “तन्त्रोक्तं देवीसूक्तम्” के नाम से भी पढ़ा जाता है। इसलिए दुर्गा सप्तशती के पाठ से जुड़े संकलनों और उपासना-पद्धतियों में इसका विशेष स्थान दिखाई देता है।
तन्त्रोक्तं देवीसूक्तम् में देवी के प्रमुख स्वरूप
इस सूक्त में मां देवी को अनेक रूपों में प्रणाम किया गया है। इनमें प्रमुख रूप हैं—
- चेतना
- बुद्धि
- निद्रा
- क्षुधा
- छाया
- शक्ति
- तृष्णा
- क्षान्ति
- जाति
- लज्जा
- शांति
- श्रद्धा
- कांति
- लक्ष्मी
- वृत्ति
- स्मृति
- दया
- तुष्टि
- मातृभाव
- भ्रांति
इस प्रकार यह स्तुति जीवन के भीतर दिखाई देने वाली विभिन्न शक्तियों को देवी के व्यापक स्वरूप से जोड़ती है।
तन्त्रोक्तं देवीसूक्तम् का पाठ कब करें?
तन्त्रोक्तं देवीसूक्तम् का पाठ श्रद्धा और शुद्ध भाव से किया जा सकता है। विशेष रूप से नवरात्रि, दुर्गा पूजा और देवी उपासना के अवसर पर भक्त इसे श्रद्धापूर्वक पढ़ते हैं।
यदि इसे दुर्गा सप्तशती के पाठ के साथ पढ़ा जा रहा हो, तो अपने परिवार या गुरु-परंपरा में प्रचलित पाठ-विधि का पालन करना उचित है। मंत्र और स्तोत्र के उच्चारण में शुद्धता के साथ श्रद्धा और एकाग्रता भी महत्वपूर्ण मानी जाती है।
तन्त्रोक्तं देवीसूक्तम् का सरल संदेश
इस सूक्त का संदेश केवल देवी की स्तुति करना ही नहीं, बल्कि प्रत्येक जीव में देवी की शक्ति को पहचानना भी है।
जब मनुष्य बुद्धि में देवी को देखता है तो ज्ञान का सम्मान करता है। जब वह दया में देवी को देखता है तो दूसरों के प्रति करुणा रखता है। जब वह श्रद्धा और शांति को देवी का स्वरूप मानता है तो अपने जीवन में इन गुणों को विकसित करने का प्रयास करता है।
इसी कारण तन्त्रोक्तं देवीसूक्तम् देवी उपासना के साथ-साथ जीवन को देखने की एक भक्तिपूर्ण दृष्टि भी प्रदान करता है।
निष्कर्ष
तन्त्रोक्तं देवीसूक्तम् मां दुर्गा के सर्वव्यापी स्वरूप की अत्यंत सुंदर स्तुति है। इसमें देवी को प्रकृति, शक्ति, चेतना, बुद्धि, श्रद्धा, शांति, दया, लक्ष्मी और मातृभाव सहित अनेक रूपों में नमन किया गया है।
“या देवी सर्वभूतेषु…” से आरंभ होने वाले मंत्र इस बात की याद दिलाते हैं कि देवी की शक्ति केवल किसी एक स्थान या रूप तक सीमित नहीं है, बल्कि समस्त जीव-जगत में व्याप्त मानी गई है। श्रद्धा और भक्ति के साथ इस स्तुति का पाठ मन में देवी के प्रति समर्पण और आदर की भावना को गहरा कर सकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
तन्त्रोक्तं देवीसूक्तम् क्या है?
तन्त्रोक्तं देवीसूक्तम् मां भगवती की प्रसिद्ध स्तुति है, जिसमें देवी को प्रकृति, चेतना, बुद्धि, शक्ति, श्रद्धा, शांति, दया, लक्ष्मी और अन्य अनेक रूपों में प्रणाम किया गया है।
तन्त्रोक्तं देवीसूक्तम् दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय में है?
इसका मूल पाठ दुर्गा सप्तशती के पांचवें अध्याय में देवताओं की स्तुति के रूप में आता है। मूल अध्याय में यह स्तुति 5.9 से 5.82 तक विस्तृत है।
तन्त्रोक्तं देवीसूक्तम् में कितने श्लोक हैं?
प्रचलित स्वतंत्र पाठ में तन्त्रोक्तं देवीसूक्तम् को 30 श्लोकों के रूप में पढ़ा जाता है। मूल दुर्गा सप्तशती में इन्हीं ऋचाओं का क्रम अध्याय 5 के अंतर्गत अलग श्लोक-संख्या में दिया गया है।
“या देवी सर्वभूतेषु” का क्या अर्थ है?
“या देवी सर्वभूतेषु” का भाव है कि जो देवी सभी प्राणियों में विभिन्न रूपों में स्थित हैं, उन देवी को बार-बार नमस्कार है। इसके आगे प्रत्येक मंत्र में देवी के किसी विशेष स्वरूप, जैसे बुद्धि, निद्रा, शक्ति, श्रद्धा, दया या मातृभाव का वर्णन किया गया है।
तन्त्रोक्तं देवीसूक्तम् कब पढ़ना चाहिए?
इसे देवी उपासना, नवरात्रि और दुर्गा पूजा जैसे अवसरों पर श्रद्धापूर्वक पढ़ा जाता है। दुर्गा सप्तशती के साथ पाठ करते समय अपनी परंपरा या गुरु से प्राप्त पाठ-विधि का पालन करना उचित है।
क्या तन्त्रोक्तं देवीसूक्तम् और ऋग्वेदोक्त देवीसूक्तम् एक ही हैं?
नहीं। दोनों अलग स्तुतियां हैं। ऋग्वेदोक्त देवीसूक्तम् ऋग्वेद के दशम मंडल के 125वें सूक्त से संबंधित है, जबकि तन्त्रोक्तं देवीसूक्तम् दुर्गा सप्तशती के पांचवें अध्याय में देवताओं द्वारा की गई देवी-स्तुति से संबंधित है।
