उपसंहार – दुर्गा सप्तशती पाठ
दुर्गा सप्तशती के तेरह अध्यायों का पाठ पूरा होने के बाद दुर्गा सप्तशती उपसंहार का विशेष महत्व माना जाता है। उपसंहार में नवार्ण मंत्र के जप और उससे संबंधित न्यास तथा ध्यान की विधि बताई गई है। इसके बाद देवीसूक्त के पाठ का विधान आता है। इसलिए दुर्गा सप्तशती के संपूर्ण पाठ की परंपरागत विधि को समझने वाले साधकों के लिए उपसंहार भी महत्वपूर्ण भाग है।
यहाँ नवार्ण मंत्र की विनियोग-विधि, ऋष्यादिन्यास, करन्यास, हृदयादिन्यास, अक्षरन्यास, दिङ्न्यास, ध्यान, नवार्ण मंत्र जप की तैयारी तथा जप के बाद किए जाने वाले न्यास का पाठ दिया गया है।
॥ उपसंहारः ॥
इस प्रकार दुर्गा सप्तशती का पाठ पूरा होने के बाद पहले नवार्ण मंत्र का जप और उसके पश्चात देवीसूक्त के पाठ का विधान बताया गया है। उपसंहार में इसी नवार्ण-विधि को क्रम से प्रस्तुत किया जाता है।
॥ विनियोगः ॥
श्रीगणपतिर्जयति। ॐ अस्य श्रीनवार्णमन्त्रस्य ब्रह्मविष्णुरुद्रा ऋषयः,
गायत्र्युष्णिगनुष्टुभश्छन्दांसि, श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वत्यो देवताः,
ऐं बीजम्, ह्रीं शक्तिः, क्लीं कीलकम्,
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः।
सरल अर्थ: इस नवार्ण मंत्र के ऋषि ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र माने गए हैं। इसके छंद गायत्री, उष्णिक और अनुष्टुप हैं तथा महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती इसकी देवता हैं। ‘ऐं’ बीज, ‘ह्रीं’ शक्ति और ‘क्लीं’ कीलक माना गया है। महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती की प्रसन्नता के लिए नवार्ण मंत्र के जप का यह विनियोग किया जाता है।
॥ ऋष्यादिन्यासः ॥
ब्रह्मविष्णुरुद्रऋषिभ्यो नमः, शिरसि।
गायत्र्युष्णिगनुष्टुप्छन्दोभ्यो नमः, मुखे।
महाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीदेवताभ्यो नमः, हृदि।
ऐं बीजाय नमः, गुह्ये। ह्रीं शक्तये नमः, पादयोः।
क्लीं कीलकाय नमः, नाभौ
“ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे” – इति मूलेन करौ संशोध्य-
सरल अर्थ: इस न्यास में मंत्र के ऋषियों, छंदों, देवताओं, बीज, शक्ति और कीलक का शरीर के अलग-अलग अंगों में स्मरण और न्यास किया जाता है।
“ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे” — इस मूल नवार्ण मंत्र से हाथों की शुद्धि करके करन्यास किया जाता है।
॥ करन्यासः ॥
ॐ ऐं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः।
ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः।
ॐ क्लीं मध्यमाभ्यां नमः।
ॐ चामुण्डायै अनामिकाभ्यां नमः।
ॐ विच्चे कनिष्ठिकाभ्यां नमः।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः।
सरल अर्थ: करन्यास में नवार्ण मंत्र के अक्षरों और शब्दों का हाथों की उँगलियों, हथेलियों और हाथों के पृष्ठभाग में न्यास किया जाता है। इसका उद्देश्य साधना से पहले हाथों को मंत्रमय और पवित्र मानकर उनका संस्कार करना है।
॥ हृदयादिन्यासः ॥
ॐ ऐं हृदयाय नमः।
ॐ ह्रीं शिरसे स्वाहा।
ॐ क्लीं शिखायै वषट्।
ॐ चामुण्डायै कवचाय हुम्।
ॐ विच्चे नेत्रत्रयाय वौषट्।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे अस्त्राय फट्।
सरल अर्थ: इस न्यास में हृदय, सिर, शिखा, कवच, तीनों नेत्र और अस्त्र के रूप में देवी का स्मरण किया जाता है। इसके माध्यम से साधक अपने शरीर को देवी की शक्ति और रक्षा से जुड़ा हुआ मानकर साधना करता है।
॥ अक्षरन्यासः ॥
ॐ ऐं नमः, शिखायाम्।
ॐ ह्रीं नमः, दक्षिणनेत्रे।
ॐ क्लीं नमः, वामनेत्रे।
ॐ चां नमः, दक्षिणकर्णे।
ॐ मुं नमः, वामकर्णे।
ॐ डां नमः, दक्षिणनासापुटे।
ॐ यैं नमः, वामनासापुटे।
ॐ विं नमः, मुखे।
ॐ च्चें नमः, गुह्ये।
“एवं विन्यस्याष्टवारं मूलेन व्यापकं कुर्यात्।”
सरल अर्थ: नवार्ण मंत्र के अक्षरों का शरीर के विभिन्न अंगों में क्रम से न्यास किया जाता है। इसके बाद मूल मंत्र से आठ बार व्यापक न्यास करने का विधान बताया गया है।
॥ दिङ्न्यासः ॥
ॐ ऐं प्राच्यै नमः।
ॐ ऐं आग्नेय्यै नमः।
ॐ ह्रीं दक्षिणायै नमः।
ॐ ह्रीं नैर्ऋत्यै नमः।
ॐ क्लीं प्रतीच्यै नमः।
ॐ क्लीं वायव्यै नमः।
ॐ चामुण्डायै उदीच्यै नमः।
ॐ चामुण्डायै ऐशान्यै नमः।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ऊर्ध्वायै नमः।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे भूम्यै नमः।
सरल अर्थ: दिङ्न्यास में पूर्व, आग्नेय, दक्षिण, नैऋत्य, पश्चिम, वायव्य, उत्तर और ईशान सहित ऊपर और नीचे की दिशाओं में देवी के मंत्र का न्यास किया जाता है। इसका भाव सभी दिशाओं में देवी की शक्ति और संरक्षण का स्मरण करना है।
॥ ध्यानम् ॥
खड्गं चक्रगदेषुचापपरिघाञ्छूलं भुशुण्डीं शिरः
शङ्खं संदधतीं करैस्त्रिनयनां सर्वाङ्गभूषावृताम्।
नीलाश्मद्युतिमास्यपाददशकां सेवे महाकालिकां
यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्तुं मधुं कैटभम्॥१॥
सरल अर्थ: साधक महाकाली देवी का ध्यान करता है, जो अनेक दिव्य अस्त्र धारण करती हैं, तीन नेत्रों वाली हैं और दिव्य आभूषणों से सुशोभित हैं। उनका स्वरूप अत्यंत तेजस्वी है और ब्रह्माजी ने भगवान विष्णु के योगनिद्रा में होने पर मधु और कैटभ के वध के लिए जिनकी स्तुति की थी, उन महाकाली का ध्यान किया जाता है।
अक्षस्रक्परशुं गदेषुकुलिशं पद्मं धनुष्कुण्डिकां
दण्डं शक्तिमसिं च चर्म जलजं घण्टां सुराभाजनम्।
शूलं पाशसुदर्शने च दधतीं हस्तैः प्रसन्नाननां
सेवे सैरिभमर्दिनीमिह महालक्ष्मीं सरोजस्थिताम्॥२॥
सरल अर्थ: यहाँ कमल पर विराजमान महालक्ष्मी देवी का ध्यान किया जाता है। वे अनेक दिव्य आयुधों और साधना से जुड़े प्रतीकों को धारण करती हैं तथा उनका मुख प्रसन्न और करुणामय है। वे महिषासुर का संहार करने वाली देवी के रूप में स्मरण की जाती हैं।
घण्टाशूलहलानि शङ्खमुसले चक्रं धनुः सायकं
हस्ताब्जैर्दधतीं घनान्तविलसच्छीतांशुतुल्यप्रभाम्।
गौरीदेहसमुद्भवां त्रिजगतामाधारभूतां महा-
पूर्वामत्र सरस्वतीमनुभजे शुम्भादिदैत्यार्दिनीम्॥३॥
सरल अर्थ: इस ध्यान में महासरस्वती देवी का स्मरण किया जाता है, जिनकी आभा शरद ऋतु के निर्मल चंद्रमा के समान मानी गई है। वे गौरी के शरीर से प्रकट हुई शक्ति के रूप में वर्णित हैं, तीनों लोकों का आधार हैं और शुम्भ आदि दैत्यों का संहार करने वाली हैं।
इस प्रकार न्यास और ध्यान के बाद मानसिक रूप से देवी की पूजा करने का विधान बताया गया है। इसके पश्चात नवार्ण मंत्र का १०८ या १००८ बार जप किया जाता है।
जप शुरू करने से पहले माला की पूजा की जाती है। इसके लिए “ऐं ह्रीं अक्षमालिकायै नमः” मंत्र का स्मरण करके माला से प्रार्थना की जाती है।
॥ माला प्रार्थना ॥
ॐ मां माले महामाये सर्वशक्तिस्वरूपिणि।
चतुर्वर्गस्त्वयि न्यस्तस्तस्मान्मे सिद्धिदा भव॥
सरल अर्थ: हे माला स्वरूप महामाया! आप सभी शक्तियों का स्वरूप हैं। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जैसे चारों पुरुषार्थ आपमें प्रतिष्ठित हैं। इसलिए मुझे साधना में सिद्धि प्रदान करने वाली बनें।
ॐ अविघ्नं कुरु माले त्वं गृह्णामि दक्षिणे करे।
जपकाले च सिद्ध्यर्थं प्रसीद मम सिद्धये॥
सरल अर्थ: हे माला! मैं आपको अपने दाहिने हाथ में ग्रहण करता हूँ। मेरे जप में किसी प्रकार का विघ्न न हो और साधना की सिद्धि के लिए आप मुझ पर प्रसन्न रहें।
ॐ अक्षमालाधिपतये सुसिद्धिं देहि देहि सर्वमन्त्रार्थसाधिनि
साधय साधय सर्वसिद्धिं परिकल्पय परिकल्पय मे स्वाहा।
सरल अर्थ: हे अक्षमाला के अधिपति! मुझे उत्तम सिद्धि प्रदान करें। सभी मंत्रों के उद्देश्य को पूरा करने वाली शक्ति मेरे लिए साधना को सफल बनाए और मुझे सिद्धि प्राप्त हो।
इस प्रकार प्रार्थना करने के बाद नवार्ण मंत्र का जप किया जाता है। जप पूरा होने पर उसे देवी को समर्पित करते हुए निम्न मंत्र का पाठ किया जाता है।
गुह्यातिगुह्यगोप्त्री त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपम्।
सिद्धिर्भवतु मे देवि त्वत्प्रसादान्महेश्वरि॥
सरल अर्थ: हे देवी महेश्वरी! आप अत्यंत गोपनीय से भी गोपनीय साधना की रक्षा करने वाली हैं। मेरे द्वारा किया गया यह जप स्वीकार करें और आपकी कृपा से मुझे सिद्धि प्राप्त हो।
इसके बाद पुनः न्यास करने का विधान बताया गया है।
॥ करन्यासः ॥
ॐ ह्रीं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः।
ॐ चं तर्जनीभ्यां नमः।
ॐ डिं मध्यमाभ्यां नमः।
ॐ कां अनामिकाभ्यां नमः।
ॐ यैं कनिष्ठिकाभ्यां नमः।
ॐ ह्रीं चण्डिकायै करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः।
सरल अर्थ: इस करन्यास में चण्डिका देवी के मंत्र का हाथों की उँगलियों, हथेलियों और हाथों के पृष्ठभाग में न्यास किया जाता है।
॥ हृदयादिन्यासः ॥
ॐ खड्गिनी शूलिनी घोरा गदिनी चक्रिणी तथा।
शङ्खिनी चापिनी बाणभुशुण्डीपरिघायुधा॥ हृदयाय नमः।
सरल अर्थ: देवी को खड्ग, शूल, गदा, चक्र, शंख, धनुष, बाण, भुशुण्डी और परिघ जैसे आयुध धारण करने वाली शक्ति के रूप में स्मरण करते हुए हृदय में उनका न्यास किया जाता है।
ॐ शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके।
घण्टास्वनेन नः पाहि चापज्यानिःस्वनेन च॥ शिरसे स्वाहा।
सरल अर्थ: हे देवी! अपने शूल और खड्ग से हमारी रक्षा करें। घंटी की ध्वनि और धनुष की टंकार से भी हमारी रक्षा करें।
ॐ प्राच्यां रक्ष प्रतीच्यां च चण्डिके रक्ष दक्षिणे।
भ्रामणेनात्मशूलस्य उत्तरस्यां तथेश्वरि॥ शिखायै वषट्।
सरल अर्थ: हे चण्डिके! पूर्व, पश्चिम और दक्षिण दिशा में हमारी रक्षा करें तथा अपने त्रिशूल की शक्ति से उत्तर दिशा में भी हमारी रक्षा करें।
ॐ सौम्यानि यानि रूपाणि त्रैलोक्ये विचरन्ति ते।
यानि चात्यर्थघोराणि तै रक्षास्मांस्तथा भुवम्॥ कवचाय हुम्।
सरल अर्थ: हे देवी! आपके जो सौम्य और जो अत्यंत उग्र रूप तीनों लोकों में माने जाते हैं, उन सभी रूपों के द्वारा हमारी और इस पृथ्वी की रक्षा करें।
ॐ खड्गशूलगदादीनि यानि चास्त्राणि तेऽम्बिके।
करपल्लवसङ्गीनि तैरस्मान् रक्ष सर्वतः॥ नेत्रत्रयाय वौषट्।
सरल अर्थ: हे अम्बिके! आपके करकमलों में शोभित खड्ग, शूल, गदा और अन्य सभी दिव्य अस्त्रों से हमारी चारों ओर से रक्षा करें।
ॐ सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते।
भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते॥ अस्त्राय फट्।
सरल अर्थ: हे दुर्गे देवी! आप सभी रूपों वाली, सभी की अधीश्वरी और समस्त शक्तियों से युक्त हैं। हमें सभी प्रकार के भय से बचाएँ। आपको नमस्कार है।
॥ ध्यानम् ॥
ॐ विद्युद्दामसमप्रभां मृगपतिस्कन्धस्थितां भीषणां
कन्याभिः करवालखेटविलसद्धस्ताभिरासेविताम्।
हस्तैश्चक्रगदासिखेटविशिखांश्चापं गुणं तर्जनीं
बिभ्राणामनलात्मिकां शशिधरां दुर्गां त्रिनेत्रां भजे॥
सरल अर्थ: मैं तीन नेत्रों वाली मां दुर्गा का ध्यान करता हूँ, जिनकी प्रभा बिजली के समान तेजस्वी है और जो सिंह के कंधे पर विराजमान हैं। उनके आसपास शस्त्र धारण करने वाली कन्याएँ सेवा में उपस्थित हैं। देवी अपने हाथों में चक्र, गदा, तलवार, ढाल, बाण, धनुष, पाश और तर्जनी मुद्रा धारण करती हैं। उनका स्वरूप अग्निमय है और मस्तक पर चंद्रमा सुशोभित है।
दुर्गा सप्तशती के उपसंहार का महत्व
दुर्गा सप्तशती के तेरह अध्यायों का पाठ पूरा होने के बाद उपसंहार साधना के समापन पक्ष को दर्शाता है। इसमें नवार्ण मंत्र, न्यास और देवी के विभिन्न स्वरूपों के ध्यान के माध्यम से साधना को पूर्ण करने की परंपरा दिखाई देती है।
उपसंहार का मुख्य भाव देवी के प्रति समर्पण, साधना की पूर्णता और उनकी कृपा की प्रार्थना है। इसमें साधक देवी को सभी दिशाओं में रक्षा करने वाली शक्ति के रूप में स्मरण करता है और अंत में जप तथा ध्यान को देवी के चरणों में समर्पित करता है।
नवार्ण मंत्र
दुर्गा सप्तशती की साधना परंपरा में नवार्ण मंत्र का विशेष स्थान है:
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे।
इस मंत्र का जप पारंपरिक रूप से गुरु से प्राप्त विधि और उचित मार्गदर्शन के अनुसार करना अधिक उचित माना जाता है। विशेष रूप से न्यास, संकल्प और विस्तृत अनुष्ठान करते समय किसी योग्य आचार्य या गुरु से विधि समझ लेना चाहिए।
उपसंहार से मिलने वाली आध्यात्मिक प्रेरणा
दुर्गा सप्तशती का उपसंहार साधक को यह भाव देता है कि केवल पाठ पूरा करना ही साधना का अंतिम उद्देश्य नहीं है, बल्कि मन, वाणी और कर्म को देवी के प्रति समर्पित करना भी महत्वपूर्ण है। नवार्ण मंत्र, देवी के ध्यान और रक्षा की प्रार्थना के माध्यम से साधक अपने भीतर श्रद्धा, अनुशासन और आत्मसमर्पण की भावना को मजबूत करता है।
मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों का ध्यान हमें यह स्मरण कराता है कि देवी शक्ति सौम्य भी है और आवश्यकता पड़ने पर उग्र रूप धारण करके अधर्म और भय का नाश करने वाली भी है।
निष्कर्ष
दुर्गा सप्तशती का उपसंहार संपूर्ण पाठ की साधना को पूर्णता की ओर ले जाने वाला महत्वपूर्ण भाग है। इसमें नवार्ण मंत्र का विनियोग, विभिन्न न्यास, देवी के स्वरूपों का ध्यान, मंत्र-जप और जप-समर्पण की विधि दी गई है।
जो साधक दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं, उनके लिए उपसंहार का पाठ देवी के प्रति श्रद्धा और समर्पण के साथ साधना को पूर्ण करने का अवसर देता है। विस्तृत नवार्ण-विधि और न्यास आदि का अभ्यास परंपरागत रूप से योग्य गुरु या आचार्य के मार्गदर्शन में करना उचित है।
॥ श्रीदुर्गासप्तशती उपसंहारः सम्पूर्णः ॥
॥ श्रीमातायै नमः ॥
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती का उपसंहार क्या है?
दुर्गा सप्तशती के तेरह अध्यायों के पाठ के बाद आने वाला भाग उपसंहार कहलाता है। इसमें नवार्ण मंत्र के जप, न्यास और देवी के ध्यान से संबंधित विधि दी गई है।
उपसंहार में किस मंत्र का जप किया जाता है?
उपसंहार में नवार्ण मंत्र का जप बताया गया है— ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे।
नवार्ण मंत्र का कितनी बार जप किया जाता है?
उपसंहार की परंपरागत विधि में १०८ या १००८ बार नवार्ण मंत्र के जप का विधान बताया गया है।
क्या नवार्ण मंत्र का जप बिना गुरु के किया जा सकता है?
सामान्य श्रद्धापूर्वक मंत्र-स्मरण और विस्तृत तांत्रिक विधि अलग विषय हैं। न्यास, संकल्प और पूर्ण अनुष्ठान जैसी विधियों के लिए योग्य गुरु या आचार्य से मार्गदर्शन लेना उचित है।
क्या उपसंहार दुर्गा सप्तशती के पाठ का हिस्सा है?
उपसंहार दुर्गा सप्तशती के तेरह अध्यायों के बाद की पारंपरिक समापन-विधि से संबंधित है। इसमें नवार्ण जप और आगे देवीसूक्त पाठ का विधान बताया जाता है।
