दुर्गा सप्तशती पाठ – ग्यारहवाँ अध्याय
दुर्गा सप्तशती का ग्यारहवाँ अध्याय नारायणी स्तुति के नाम से प्रसिद्ध है। इस अध्याय में देवता देवी की स्तुति करते हैं और देवी उन्हें वरदान देती हैं। इसमें देवी को समस्त जगत की आधारभूत शक्ति, बुद्धि, विद्या, करुणा और विभिन्न दिव्य शक्तियों के स्वरूप के रूप में प्रणाम किया गया है। इसी अध्याय में देवी भविष्य में अपने विभिन्न रूपों में प्रकट होकर दुष्ट शक्तियों का नाश करने की बात भी कहती हैं।
श्रीदुर्गासप्तशती – एकादश अध्याय
देवताओं द्वारा देवी की स्तुति तथा देवी द्वारा देवताओं को वरदान
॥ ध्यानम् ॥
ॐ बालरविद्युतिमिन्दुकिरीटां तुङ्गकुचां नयनत्रययुक्ताम्।
स्मेरमुखीं वरदाङ्कुशपाशाभीतिकरां प्रभजे भुवनेशीम्॥
सरल हिंदी अर्थ:
मैं समस्त लोकों की स्वामिनी भुवनेश्वरी देवी का ध्यान करता हूँ। उनकी आभा उगते हुए सूर्य के समान तेजस्वी है, उनके मस्तक पर चंद्रमा का मुकुट सुशोभित है, वे तीन नेत्रों से युक्त हैं और उनके मुख पर मधुर मुस्कान है। उनके हाथों में वर देने की मुद्रा, अंकुश, पाश और अभय मुद्रा सुशोभित हैं।
ॐ ऋषिरुवाच॥१॥
सरल हिंदी अर्थ:
ऋषि कहते हैं।
देव्या हते तत्र महासुरेन्द्रे
सेन्द्राः सुरा वह्निपुरोगमास्ताम्।
कात्यायनीं तुष्टुवुरिष्टलाभाद्
विकाशिवक्त्राब्जविकाशिताशाः॥२॥
सरल हिंदी अर्थ:
जब देवी ने उस महान असुरराज का वध कर दिया, तब इन्द्र सहित सभी देवता, जिनके आगे अग्निदेव थे, अपनी मनोकामना पूरी होने से प्रसन्न हुए। उनके मुख कमल की तरह खिल उठे और उन्होंने देवी कात्यायनी की स्तुति की।
देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद
प्रसीद मातर्जगतोऽखिलस्य।
प्रसीद विश्वेश्वरि पाहि विश्वं
त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य॥३॥
सरल हिंदी अर्थ:
हे देवी! शरण में आए हुए दुखी प्राणियों के कष्ट दूर करने वाली माता, हम पर प्रसन्न हों। हे सम्पूर्ण जगत की माता और विश्व की अधीश्वरी, प्रसन्न होकर इस संसार की रक्षा करें। चर और अचर सभी की स्वामिनी आप ही हैं।
आधारभूता जगतस्त्वमेका
महीस्वरूपेण यतः स्थितासि।
अपां स्वरूपस्थितया त्वयैतदाप्यायते कृत्स्नमलङ्घ्यवीर्ये॥४॥
सरल हिंदी अर्थ:
हे देवी! आप ही इस सम्पूर्ण जगत का आधार हैं। पृथ्वी के रूप में आप ही स्थित हैं और जल के स्वरूप में भी आप ही इस पूरे संसार को पोषण और जीवन प्रदान करती हैं। आपकी शक्ति को कोई रोक नहीं सकता।
त्वं वैष्णवी शक्तिरनन्तवीर्या
विश्वस्य बीजं परमासि माया।
सम्मोहितं देवि समस्तमेतत्
त्वं वै प्रसन्ना भुवि मुक्तिहेतुः॥५॥
सरल हिंदी अर्थ:
हे देवी! आप अनंत शक्ति वाली वैष्णवी शक्ति हैं और सम्पूर्ण विश्व की मूल कारण शक्ति हैं। आपकी माया से यह सम्पूर्ण संसार मोहित रहता है। लेकिन जब आप प्रसन्न होती हैं, तब यही शक्ति मनुष्य के लिए मुक्ति का मार्ग बन जाती है।
विद्याः समस्तास्तव देवि भेदाः
स्त्रियः समस्ताः सकला जगत्सु।
त्वयैकया पूरितमम्बयैतत्
का ते स्तुतिः स्तव्यपरापरोक्तिः॥६॥
सरल हिंदी अर्थ:
हे देवी! संसार में जितनी भी विद्याएँ हैं, वे सभी आपकी ही विभिन्न शक्तियाँ हैं। जगत में जितने भी स्त्री रूप हैं, वे सब आपके ही स्वरूप हैं। जब यह पूरा संसार आपसे ही व्याप्त है, तब आपकी स्तुति करने के लिए कौन-से शब्द पर्याप्त हो सकते हैं?
सर्वभूता यदा देवी भुक्तिमुक्तिप्रदायिनी।
त्वं स्तुता स्तुतये का वा भवन्तु परमोक्तयः॥७॥
सरल हिंदी अर्थ:
हे देवी! आप सभी प्राणियों के रूप में स्थित होकर भोग और मुक्ति प्रदान करती हैं। ऐसी देवी की स्तुति करने के लिए कौन-से श्रेष्ठ शब्द पर्याप्त हो सकते हैं?
सर्वस्य बुद्धिरूपेण जनस्य हृदि संस्थिते।
स्वर्गापवर्गदे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥८॥
सरल हिंदी अर्थ:
हे देवी नारायणी! आप सभी प्राणियों के हृदय में बुद्धि के रूप में निवास करती हैं। स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करने वाली माता, आपको बार-बार प्रणाम है।
कलाकाष्ठादिरूपेण परिणामप्रदायिनि।
विश्वस्योपरतौ शक्ते नारायणि नमोऽस्तु ते॥९॥
सरल हिंदी अर्थ:
हे नारायणी! आप कला, काष्ठा आदि समय के रूपों में रहकर संसार में परिवर्तन और परिणाम उत्पन्न करती हैं। संसार की गति को रोकने या समाप्त करने वाली शक्ति के रूप में भी आप ही स्थित हैं। आपको प्रणाम है।
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥१०॥
सरल हिंदी अर्थ:
हे देवी! आप सभी मंगलों में सबसे श्रेष्ठ मंगलमयी हैं। कल्याणस्वरूपा, सभी उद्देश्यों को पूरा करने वाली, शरण देने वाली, तीन नेत्रों वाली गौरी और नारायणी देवी, आपको प्रणाम है।
सृष्टिस्थितिविनाशानां शक्तिभूते सनातनि।
गुणाश्रये गुणमये नारायणि नमोऽस्तु ते॥११॥
सरल हिंदी अर्थ:
हे सनातनी देवी! सृष्टि की रचना, पालन और विनाश की शक्ति आप ही हैं। आप ही तीनों गुणों का आधार और गुणमयी शक्ति हैं। हे नारायणी, आपको प्रणाम है।
शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे।
सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥१२॥
सरल हिंदी अर्थ:
हे देवी! जो दीन और दुखी होकर आपकी शरण में आते हैं, उनकी रक्षा करना आपका स्वभाव है। सभी प्राणियों के दुख दूर करने वाली नारायणी देवी, आपको प्रणाम है।
हंसयुक्तविमानस्थे ब्रह्माणीरूपधारिणि।
कौशाम्भःक्षरिके देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥१३॥
सरल हिंदी अर्थ:
हे देवी! हंसयुक्त विमान पर विराजमान होकर ब्रह्माणी का रूप धारण करने वाली और जल की शक्ति से संसार का पोषण करने वाली नारायणी देवी, आपको प्रणाम है।
त्रिशूलचन्द्राहिधरे महावृषभवाहिनि।
माहेश्वरीस्वरूपेण नारायणि नमोऽस्तु ते॥१४॥
सरल हिंदी अर्थ:
हे देवी! त्रिशूल धारण करने वाली, मस्तक पर चंद्रमा और सर्प धारण करने वाली तथा महान वृषभ पर सवार माहेश्वरी के रूप में स्थित नारायणी देवी, आपको प्रणाम है।
मयूरकुक्कुटवृते महाशक्तिधरेऽनघे।
कौमारीरूपसंस्थाने नारायणि नमोऽस्तु ते॥१५॥
सरल हिंदी अर्थ:
हे निष्पाप देवी! मयूर और कुक्कुट से सुशोभित, महान शक्ति धारण करने वाली और कौमारी के रूप में स्थित नारायणी देवी, आपको प्रणाम है।
शङ्खचक्रगदाशार्ङ्गगृहीतपरमायुधे।
प्रसीद वैष्णवीरूपे नारायणि नमोऽस्तु ते॥१६॥
सरल हिंदी अर्थ:
हे देवी! शंख, चक्र, गदा और शार्ङ्ग धनुष जैसे दिव्य अस्त्र धारण करने वाली वैष्णवी शक्ति, आप हम पर प्रसन्न हों। हे नारायणी, आपको प्रणाम है।
गृहीतोग्रमहाचक्रे दंष्ट्रोद्धृतवसुन्धरे।
वराहरूपिणि शिवे नारायणि नमोऽस्तु ते॥१७॥
सरल हिंदी अर्थ:
हे देवी! प्रचंड महान चक्र धारण करने वाली और अपनी दाढ़ों से पृथ्वी को ऊपर उठाने वाले वराह रूप में स्थित कल्याणमयी देवी, आपको प्रणाम है।
नृसिंहरूपेणोग्रेण हन्तुं दैत्यान् कृतोद्यमे।
त्रैलोक्यत्राणसहिते नारायणि नमोऽस्तु ते॥१८॥
सरल हिंदी अर्थ:
हे देवी! उग्र नृसिंह रूप धारण करके दैत्यों का नाश करने के लिए तत्पर रहने वाली और तीनों लोकों की रक्षा करने वाली नारायणी देवी, आपको प्रणाम है।
किरीटिनि महावज्रे सहस्रनयनोज्ज्वले।
वृत्रप्राणहरे चैन्द्रि नारायणि नमोऽस्तु ते॥१९॥
सरल हिंदी अर्थ:
हे देवी! मुकुट धारण करने वाली, महान वज्र धारण करने वाली और हजारों नेत्रों के तेज से प्रकाशित ऐन्द्री शक्ति, जिसने वृत्रासुर का प्राण हर लिया, आपको प्रणाम है।
शिवदूतीस्वरूपेण हतदैत्यमहाबले।
घोररूपे महारावे नारायणि नमोऽस्तु ते॥२०॥
सरल हिंदी अर्थ:
हे देवी! शिवदूती का रूप धारण करके महान शक्तिशाली दैत्यों का संहार करने वाली और भयंकर गर्जना करने वाली उग्र देवी, आपको प्रणाम है।
दंष्ट्राकरालवदने शिरोमालाविभूषणे।
चामुण्डे मुण्डमथने नारायणि नमोऽस्तु ते॥२१॥
सरल हिंदी अर्थ:
हे चामुण्डे! विकराल दाँतों से युक्त मुख वाली, सिरों की माला से सुशोभित और मुण्डासुर का संहार करने वाली देवी, आपको प्रणाम है।
लक्ष्मि लज्जे महाविद्ये श्रद्धे पुष्टिस्वधे ध्रुवे।
महारात्रि महामाये नारायणि नमोऽस्तु ते॥२२॥
सरल हिंदी अर्थ:
हे देवी! आप लक्ष्मी, लज्जा, महाविद्या, श्रद्धा, पुष्टि, स्वधा और ध्रुवा के रूप में स्थित हैं। आप महारात्रि और महामाया हैं। हे नारायणी, आपको प्रणाम है।
मेधे सरस्वति वरे भूति बाभ्रवि तामसि।
नियते त्वं प्रसीदेशे नारायणि नमोऽस्तु ते॥२३॥
सरल हिंदी अर्थ:
हे देवी! आप मेधा, सरस्वती, समृद्धि, बाभ्रवी, तामसी और नियति के रूप में स्थित हैं। हे देवी, हम पर प्रसन्न हों। हे नारायणी, आपको प्रणाम है।
सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते।
भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते॥२४॥
सरल हिंदी अर्थ:
हे देवी! आप सभी रूपों में स्थित हैं और सभी की स्वामिनी हैं। आप सभी शक्तियों से संपन्न हैं। हे दुर्गे, हमें सभी प्रकार के भय से बचाइए। आपको प्रणाम है।
एतत्ते वदनं सौम्यं लोचनत्रयभूषितम्।
पातु नः सर्वभीतिभ्यः कात्यायनि नमोऽस्तु ते॥२५॥
सरल हिंदी अर्थ:
हे कात्यायनी देवी! आपका यह शांत और सुंदर तीन नेत्रों से सुशोभित मुख हमारे सभी प्रकार के भय से रक्षा करे। आपको प्रणाम है।
ज्वालाकरालमत्युग्रमशेषासुरसूदनम्।
त्रिशूलं पातु नो भीतेर्भद्रकालि नमोऽस्तु ते॥२६॥
सरल हिंदी अर्थ:
हे भद्रकाली! आपका अत्यंत उग्र और अग्निज्वाला के समान भयंकर त्रिशूल, जो सभी असुरों का नाश करने वाला है, हमें सभी भय से बचाए। आपको प्रणाम है।
हिनस्ति दैत्यतेजांसि स्वनेनापूर्य या जगत्।
सा घण्टा पातु नो देवि पापेभ्यो नः सुतानिव॥२७॥
सरल हिंदी अर्थ:
हे देवी! आपकी वह घंटा जिसकी ध्वनि से सम्पूर्ण जगत भर जाता है और जो दैत्यों के तेज को नष्ट कर देती है, उसी प्रकार हमारी रक्षा करे जैसे माता अपने बच्चों की पाप और संकट से रक्षा करती है।
असुरासृग्वसापङ्कचर्चितस्ते करोज्ज्वलः।
शुभाय खड्गो भवतु चण्डिके त्वां नता वयम्॥२८॥
सरल हिंदी अर्थ:
हे चण्डिके! असुरों के रक्त और वसा से स्पर्शित आपका चमकता हुआ खड्ग हमारे लिए मंगलकारी हो। हम आपके सामने श्रद्धापूर्वक नमन करते हैं।
रोगानशेषानपहंसि तुष्टा
रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान्।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां
त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति॥२९॥
सरल हिंदी अर्थ:
हे देवी! प्रसन्न होने पर आप सभी रोगों को दूर कर देती हैं और अप्रसन्न होने पर मनुष्य की सभी इच्छाओं में बाधा आ सकती है। जो लोग आपकी शरण लेते हैं, उनके लिए विपत्ति का भय नहीं रहता। आपकी शरण में आने वाले अंततः सुरक्षित आश्रय प्राप्त करते हैं।
एतत्कृतं यत्कदनं त्वयाद्य
धर्मद्विषां देवि महासुराणाम्।
रूपैरनेकैर्बहुधात्ममूर्तिं
कृत्वाम्बिके तत्प्रकरोति कान्या॥३०॥
सरल हिंदी अर्थ:
हे अम्बिके! आज आपने धर्म से द्वेष रखने वाले महान असुरों का जिस प्रकार संहार किया है और अनेक रूप धारण करके जो कार्य किया है, उसे आपके अतिरिक्त और कौन कर सकता है?
विद्यासु शास्त्रेषु विवेकदीपेष्वाद्येषु वाक्येषु च का त्वदन्या।
ममत्वगर्तेऽतिमहान्धकारे
विभ्रामयत्येतदतीव विश्वम्॥३१॥
सरल हिंदी अर्थ:
हे देवी! समस्त विद्याओं, शास्त्रों और विवेक का प्रकाश देने वाले श्रेष्ठ ज्ञान में आपके अतिरिक्त कौन शक्ति है? और कौन इस संसार को ममता के गहरे अंधकार से बाहर निकाल सकती है?
रक्षांसि यत्रोग्रविषाश्च नागा
यत्रारयो दस्युबलानि यत्र।
दावानलो यत्र तथाब्धिमध्ये
तत्र स्थिता त्वं परिपासि विश्वम्॥३२॥
सरल हिंदी अर्थ:
जहाँ राक्षस हों, विषैले सर्प हों, शत्रु और डाकुओं का भय हो, जहाँ जंगल की भयंकर आग लगी हो या समुद्र के बीच संकट हो, वहाँ भी आप उपस्थित होकर संसार की रक्षा करती हैं।
विश्वेश्वरि त्वं परिपासि विश्वं
विश्वात्मिका धारयसीति विश्वम्।
विश्वेशवन्द्या भवती भवन्ति
विश्वाश्रया ये त्वयि भक्तिनम्राः॥३३॥
सरल हिंदी अर्थ:
हे विश्वेश्वरी! आप पूरे संसार की रक्षा करती हैं और विश्वात्मिका होकर इसे धारण करती हैं। जो भक्त आपके सामने श्रद्धा से झुकते हैं, वे स्वयं विश्व के लिए पूजनीय और आश्रय देने वाले बन जाते हैं।
देवि प्रसीद परिपालय नोऽरिभीतेर्नित्यं यथासुरवधादधुनैव सद्यः।
पापानि सर्वजगतां प्रशमं नयाशु
उत्पातपाकजनितांश्च महोपसर्गान्॥३४॥
सरल हिंदी अर्थ:
हे देवी! हम पर प्रसन्न हों और हमें शत्रुओं के भय से सदा बचाएँ। जिस प्रकार आपने अभी असुरों का विनाश किया है, उसी प्रकार संसार के पापों और उनसे उत्पन्न होने वाले बड़े संकटों तथा उपद्रवों को शीघ्र शांत करें।
प्रणतानां प्रसीद त्वं देवि विश्वार्तिहारिणि।
त्रैलोक्यवासिनामीड्ये लोकानां वरदा भव॥३५॥
सरल हिंदी अर्थ:
हे देवी! जो आपके सामने श्रद्धा से झुकते हैं, उन पर प्रसन्न हों। हे सम्पूर्ण संसार के दुख दूर करने वाली और तीनों लोकों के निवासियों द्वारा पूजनीय माता, सभी लोकों को वरदान प्रदान करें।
देव्युवाच॥३६॥
सरल हिंदी अर्थ:
देवी ने कहा।
वरदाहं सुरगणा वरं यन्मनसेच्छथ।
तं वृणुध्वं प्रयच्छामि जगतामुपकारकम्॥३७॥
सरल हिंदी अर्थ:
देवी बोलीं—हे देवताओं! मैं वर देने वाली हूँ। तुम अपने मन की वह इच्छा बताओ जिसे पूरा करना चाहते हो। मैं ऐसा वर प्रदान करूँगी जो सम्पूर्ण संसार के लिए कल्याणकारी हो।
देवा ऊचुः॥३८॥
सरल हिंदी अर्थ:
देवताओं ने कहा।
सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम्॥३९॥
सरल हिंदी अर्थ:
हे सम्पूर्ण तीनों लोकों की स्वामिनी! हमारी इच्छा है कि संसार के सभी कष्ट और बाधाएँ शांत हों तथा हमारे शत्रुओं का विनाश होता रहे। आप ऐसा ही कार्य करें।
देव्युवाच॥४०॥
सरल हिंदी अर्थ:
देवी ने कहा।
वैवस्वतेऽन्तरे प्राप्ते अष्टाविंशतिमे युगे।
शुम्भो निशुम्भश्चैवान्यावुत्पत्स्येते महासुरौ॥४१॥
सरल हिंदी अर्थ:
देवी ने कहा—वैवस्वत मन्वंतर के अट्ठाईसवें युग में शुम्भ और निशुम्भ नाम के दो महान असुर फिर उत्पन्न होंगे।
नन्दगोपगृहे जाता यशोदागर्भसम्भवा।
ततस्तौ नाशयिष्यामि विन्ध्याचलनिवासिनी॥४२॥
सरल हिंदी अर्थ:
तब मैं नन्द गोप के घर यशोदा के गर्भ से उत्पन्न होकर विंध्याचल में निवास करूँगी और उन दोनों असुरों का नाश करूँगी।
पुनरप्यतिरौद्रेण रूपेण पृथिवीतले।
अवतीर्य हनिष्यामि वैप्रचित्तांस्तु दानवान्॥४३॥
सरल हिंदी अर्थ:
इसके बाद मैं पृथ्वी पर अत्यंत भयंकर रूप धारण करके अवतार लूँगी और वैप्रचित्त नाम वाले दानवों का संहार करूँगी।
भक्षयन्त्याश्च तानुग्रान् वैप्रचित्तान्महासुरान्।
रक्ता दन्ता भविष्यन्ति दाडिमीकुसुमोपमाः॥४४॥
सरल हिंदी अर्थ:
उन भयंकर वैप्रचित्त नामक महासुरों को भक्षण करने के कारण मेरे दाँत अनार के फूलों के समान लाल हो जाएँगे।
ततो मां देवताः स्वर्गे मर्त्यलोके च मानवाः।
स्तुवन्तो व्याहरिष्यन्ति सततं रक्तदन्तिकाम्॥४५॥
सरल हिंदी अर्थ:
तब स्वर्ग में देवता और पृथ्वी पर मनुष्य मेरी स्तुति करते हुए मुझे निरंतर रक्तदन्तिका नाम से पुकारेंगे।
भूयश्च शतवार्षिक्यामनावृष्ट्यामनम्भसि।
मुनिभिः संस्तुता भूमौ सम्भविष्याम्ययोनिजा॥४६॥
सरल हिंदी अर्थ:
इसके बाद जब सौ वर्षों तक वर्षा नहीं होगी और पृथ्वी पर जल का अभाव हो जाएगा, तब मुनियों द्वारा स्तुति किए जाने पर मैं पृथ्वी पर बिना किसी गर्भ से उत्पन्न हुए प्रकट होऊँगी।
ततः शतेन नेत्राणां निरीक्षिष्याम्यहं मुनीन्।
कीर्तयिष्यन्ति मनुजाः शताक्षीमिति मां ततः॥४७॥
सरल हिंदी अर्थ:
तब मैं अपने सौ नेत्रों से मुनियों की ओर देखूँगी। उस समय मनुष्य मुझे शताक्षी नाम से प्रसिद्ध करेंगे।
ततोऽहमखिलं लोकमात्मदेहसमुद्भवैः।
भरिष्यामि सुराः शाकैरावृष्टेः प्राणधारकैः॥४८॥
सरल हिंदी अर्थ:
हे देवताओं! तब मैं अपने शरीर से उत्पन्न होने वाली विभिन्न शाक-सब्जियों के द्वारा वर्षा के अभाव से पीड़ित समस्त संसार के प्राणियों का पालन करूँगी।
शाकम्भरीति विख्यातिं तदा यास्याम्यहं भुवि।
तत्रैव च वधिष्यामि दुर्गमाख्यं महासुरम्॥४९॥
सरल हिंदी अर्थ:
उस समय पृथ्वी पर मेरा नाम शाकम्भरी के रूप में प्रसिद्ध होगा और वहीं मैं दुर्गम नामक महासुर का वध करूँगी।
दुर्गा देवीति विख्यातं तन्मे नाम भविष्यति।
पुनश्चाहं यदा भीमं रूपं कृत्वा हिमाचले॥५०॥
सरल हिंदी अर्थ:
दुर्गम नामक असुर का वध करने के कारण पृथ्वी पर मेरा नाम दुर्गा देवी के रूप में प्रसिद्ध होगा। इसके बाद जब मैं हिमालय में भयंकर रूप धारण करूँगी—
रक्षांसि भक्षयिष्यामि मुनीनां त्राणकारणात्।
तदा मां मुनयः सर्वे स्तोष्यन्त्यानम्रमूर्तयः॥५१॥
सरल हिंदी अर्थ:
तब मैं मुनियों की रक्षा के लिए राक्षसों का संहार करूँगी। उस समय सभी मुनि विनम्र होकर मेरी स्तुति करेंगे।
भीमा देवीति विख्यातं तन्मे नाम भविष्यति।
यदारुणाख्यस्त्रैलोक्ये महाबाधां करिष्यति॥५२॥
सरल हिंदी अर्थ:
तब पृथ्वी पर मेरा नाम भीमा देवी के रूप में प्रसिद्ध होगा। और जब अरुण नामक असुर तीनों लोकों के लिए बहुत बड़ा संकट उत्पन्न करेगा—
तदाहं भ्रामरं रूपं कृत्वाऽसङ्ख्येयषट्पदम्।
त्रैलोक्यस्य हितार्थाय वधिष्यामि महासुरम्॥५३॥
सरल हिंदी अर्थ:
तब मैं असंख्य भौंरों से युक्त भ्रामरी का रूप धारण करके तीनों लोकों के कल्याण के लिए उस महासुर का वध करूँगी।
भ्रामरीति च मां लोकास्तदा स्तोष्यन्ति सर्वतः।
इत्थं यदा यदा बाधा दानवोत्था भविष्यति॥५४॥
सरल हिंदी अर्थ:
उस समय संसार के सभी लोग मेरी स्तुति भ्रामरी नाम से करेंगे। इस प्रकार जब-जब दानवों से उत्पन्न कोई बड़ी बाधा संसार को परेशान करेगी—
तदा तदावतीर्याहं करिष्याम्यरिसंक्षयम्॥ॐ॥५५॥
सरल हिंदी अर्थ:
तब-तब मैं स्वयं अवतार लेकर उन शत्रु शक्तियों का नाश करूँगी और संसार की रक्षा करूँगी।
॥ श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये नारायणीस्तुतिः सम्पूर्णा ॥
नारायणी स्तुति का महत्व
दुर्गा सप्तशती का यह अध्याय देवी की व्यापक शक्ति का वर्णन करता है। इसमें देवी को केवल एक विशेष रूप में नहीं, बल्कि संसार में विद्यमान अनेक शक्तियों के आधार के रूप में देखा गया है। देवता देवी से संसार की बाधाओं को दूर करने और दुष्ट शक्तियों का नाश करने का वर माँगते हैं।
नारायणी स्तुति में देवी के अनेक रूपों का स्मरण किया गया है। ब्रह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, नृसिंही, ऐन्द्री, शिवदूती और चामुण्डा जैसे स्वरूपों के माध्यम से देवी की विभिन्न शक्तियों का वर्णन मिलता है।
इसी अध्याय में देवी भविष्य में रक्तदन्तिका, शताक्षी, शाकम्भरी, दुर्गा, भीमा और भ्रामरी जैसे रूपों में प्रकट होकर संसार की रक्षा करने की बात कहती हैं। इसलिए यह अध्याय देवी की करुणा, शक्ति और रक्षक स्वरूप को समझने के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है।
दुर्गा सप्तशती पाठ – ग्यारहवाँ अध्याय हिन्दी में
देवताओं द्वारा देवी की स्तुति और देवी का वरदान
महिषासुर आदि दैत्यों के संहार के बाद इन्द्र सहित सभी देवता देवी कात्यायनी की स्तुति करने लगे। असुरों के विनाश और अपनी मनोकामना पूरी होने से देवताओं के चेहरे प्रसन्नता से खिल उठे। उन्होंने देवी से प्रार्थना की कि हे शरण में आने वाले भक्तों के कष्ट दूर करने वाली माता, हम पर कृपा करें। हे सम्पूर्ण जगत की जननी, आप प्रसन्न होकर संसार की रक्षा करें। चर और अचर सभी प्राणियों की स्वामिनी आप ही हैं।
देवताओं ने कहा कि हे देवी, आप सम्पूर्ण सृष्टि का आधार हैं। पृथ्वी के रूप में आप ही इस संसार को धारण करती हैं और आपकी शक्ति असीम है। आप भगवान विष्णु की शक्ति तथा सम्पूर्ण विश्व की मूल कारण शक्ति हैं। आपकी महामाया से यह पूरा संसार प्रभावित और मोहित रहता है। जब आप प्रसन्न होती हैं, तब जीवों के लिए मुक्ति का मार्ग भी खुल जाता है।
देवताओं ने देवी की महिमा बताते हुए कहा कि संसार में दिखाई देने वाली सभी विद्याएँ आपकी ही अलग-अलग शक्तियाँ हैं। इस जगत में जितने भी स्त्री स्वरूप हैं, वे सभी देवी की ही अभिव्यक्तियाँ हैं। जब पूरा संसार आपकी शक्ति से व्याप्त है, तब आपकी स्तुति के लिए शब्द भी कम पड़ जाते हैं। आप सभी प्राणियों में बुद्धि के रूप में निवास करती हैं और स्वर्ग तथा मोक्ष प्रदान करने वाली नारायणी हैं। इसलिए देवताओं ने उन्हें श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया।
देवताओं ने आगे कहा कि समय के विभिन्न रूपों के माध्यम से संसार में होने वाले परिवर्तन भी आपकी ही शक्ति से संचालित होते हैं। आप समस्त मंगलों में श्रेष्ठ मंगलस्वरूपा हैं, कल्याण प्रदान करने वाली हैं और भक्तों की सभी उचित इच्छाओं को पूरा करने वाली हैं। तीन नेत्रों वाली गौरी के रूप में आप शरणागतों को आश्रय देती हैं। सृष्टि की रचना, पालन और संहार में कार्य करने वाली सनातन शक्ति भी आप ही हैं।
जो लोग दुखी होकर आपकी शरण में आते हैं, उनकी रक्षा करना आपका स्वभाव है। आप सभी प्रकार के कष्टों को दूर करने वाली हैं। ब्रह्माणी के रूप में आप हंसयुक्त विमान पर विराजमान होती हैं और पवित्र जल से संसार का कल्याण करती हैं। माहेश्वरी के रूप में त्रिशूल धारण करती हैं, चंद्रमा और सर्पों से सुशोभित रहती हैं तथा वृषभ पर सवार होती हैं।
कौमारी रूप में आप मयूर आदि से घिरी हुई और महान शक्ति धारण करने वाली देवी हैं। वैष्णवी रूप में आप शंख, चक्र, गदा और शार्ङ्ग धनुष जैसे दिव्य अस्त्र धारण करती हैं। वराह रूप में आपने पृथ्वी को अपनी शक्ति से धारण किया और नृसिंह रूप में अत्यंत उग्र होकर दैत्यों का संहार किया। इस प्रकार देवी के विभिन्न स्वरूप संसार की रक्षा करने वाली उनकी अलग-अलग शक्तियों को प्रकट करते हैं।
इन्द्राणी अथवा ऐन्द्री रूप में देवी मुकुट और वज्र धारण करती हैं तथा अपने तेज से प्रकाशित रहती हैं। इसी शक्ति ने वृत्रासुर का संहार किया। शिवदूती के रूप में देवी ने शक्तिशाली दैत्यों का अभिमान नष्ट किया और भयंकर रूप धारण करके उनका सामना किया। चामुण्डा रूप में वे विकराल स्वरूप धारण करती हैं और दुष्ट शक्तियों का विनाश करती हैं।
देवताओं ने देवी को लक्ष्मी, लज्जा, महाविद्या, श्रद्धा, पुष्टि, स्वधा, ध्रुवा, महारात्रि और महामाया जैसे अनेक स्वरूपों में प्रणाम किया। उन्होंने कहा कि देवी मेधा, सरस्वती, ऐश्वर्य और नियति जैसी शक्तियों के रूप में भी संसार में विद्यमान हैं। हे सर्वस्वरूपा देवी, आप सभी शक्तियों से युक्त हैं। इसलिए हम आपकी शरण में आकर सभी प्रकार के भय से अपनी रक्षा की प्रार्थना करते हैं।
देवताओं ने देवी से यह भी प्रार्थना की कि उनका शांत और सुंदर मुख भक्तों को सभी प्रकार के भय से बचाए। भद्रकाली के रूप में देवी का त्रिशूल असुरों का नाश करने वाला है, इसलिए वह भक्तों की रक्षा करे। देवी की घंटा-ध्वनि दैत्यों के तेज को कमजोर करने वाली मानी गई है, इसलिए देवताओं ने उससे भी अपनी रक्षा की प्रार्थना की। उन्होंने देवी से कहा कि असुरों के रक्त से रंजित उनकी तलवार भी भक्तों के लिए मंगलकारी बने।
देवताओं ने कहा कि देवी के प्रसन्न होने पर मनुष्य के अनेक रोग और कष्ट दूर हो जाते हैं। देवी की कृपा से भक्तों को संकटों से रक्षा मिलती है। जो लोग सच्चे भाव से देवी की शरण लेते हैं, वे स्वयं दूसरों को सहारा देने योग्य बन जाते हैं। देवी ने अनेक रूप धारण करके धर्म के विरोधी असुरों का विनाश किया है। देवताओं ने स्वीकार किया कि ऐसा कार्य देवी के अतिरिक्त कोई और नहीं कर सकता।
देवताओं ने यह भी कहा कि सभी विद्याओं और शास्त्रों में ज्ञान का प्रकाश देवी की शक्ति से ही दिखाई देता है। जहाँ राक्षसों, विषैले सर्पों, शत्रुओं या डाकुओं का भय हो, जहाँ जंगल की आग लगी हो अथवा समुद्र के बीच संकट उत्पन्न हो, वहाँ भी देवी अपने भक्तों की रक्षा करती हैं।
इसके बाद देवताओं ने देवी को विश्वेश्वरी कहकर संबोधित किया। उन्होंने कहा कि देवी ही सम्पूर्ण विश्व का पालन और धारण करती हैं। इसी कारण वे सभी देवताओं द्वारा पूजनीय हैं। जो भक्त श्रद्धा और भक्ति के साथ देवी को प्रणाम करते हैं, वे स्वयं दूसरों के लिए आश्रय का कारण बनते हैं।
देवताओं ने देवी से प्रार्थना की कि जिस प्रकार उन्होंने असुरों का विनाश करके देवताओं की रक्षा की है, उसी प्रकार आगे भी उन्हें शत्रुओं से सुरक्षित रखें। वे संसार के पापों को समाप्त करें और पापों के कारण उत्पन्न होने वाले बड़े संकटों, रोगों तथा उपद्रवों को शीघ्र शांत करें। उन्होंने जगत के सभी दुखों को दूर करने वाली देवी से प्रसन्न होकर वरदान देने का निवेदन किया।
तब देवी ने देवताओं से कहा कि वे प्रसन्न हैं और उन्हें वर देने के लिए तैयार हैं। देवी ने देवताओं से अपनी इच्छा बताने को कहा और आश्वासन दिया कि वे ऐसा वर प्रदान करेंगी जिससे संसार का कल्याण हो।
देवताओं ने देवी से प्रार्थना की कि वे तीनों लोकों के प्राणियों की सभी बाधाओं और पीड़ाओं को इसी प्रकार दूर करती रहें तथा उनके शत्रुओं का नाश करती रहें।
देवी ने देवताओं को भविष्य की घटनाओं के विषय में बताते हुए कहा कि वैवस्वत मन्वंतर के अट्ठाईसवें युग में शुम्भ और निशुम्भ नाम के दो शक्तिशाली असुर उत्पन्न होंगे। उस समय देवी नन्द गोप के घर यशोदा के गर्भ से प्रकट होकर विंध्याचल में निवास करेंगी और उन दोनों असुरों का संहार करेंगी।
इसके बाद देवी ने बताया कि वे अत्यंत भयंकर रूप धारण करके पृथ्वी पर प्रकट होंगी और वैप्रचित्त नाम वाले दानवों का विनाश करेंगी। उन असुरों का संहार करने के कारण उनके दाँत अनार के फूलों के समान लाल हो जाएंगे। तब देवता और मनुष्य उनकी स्तुति करते हुए उन्हें रक्तदन्तिका नाम से पुकारेंगे।
देवी ने आगे कहा कि जब पृथ्वी पर लगातार सौ वर्षों तक वर्षा नहीं होगी और जल का भारी अभाव उत्पन्न हो जाएगा, तब ऋषियों की प्रार्थना पर वे बिना किसी सामान्य जन्म प्रक्रिया के प्रकट होंगी। अपने अनेक नेत्रों से वे ऋषियों की ओर देखेंगी। इसी कारण उस समय मनुष्य उन्हें शताक्षी नाम से स्मरण करेंगे।
उस समय देवी अपने शरीर से उत्पन्न होने वाले विभिन्न शाकों और वनस्पतियों के माध्यम से संसार के प्राणियों का पालन करेंगी। वर्षा के अभाव में जीवन को बनाए रखने वाली इन वनस्पतियों के कारण वे पृथ्वी पर शाकम्भरी नाम से प्रसिद्ध होंगी। इसी रूप में वे दुर्गम नामक महान असुर का वध करेंगी और उसके कारण उनका नाम दुर्गा देवी के रूप में प्रसिद्ध होगा।
इसके बाद देवी ने कहा कि जब वे हिमालय में अत्यंत भयंकर रूप धारण करके ऋषियों और मुनियों की रक्षा करेंगी, तब उनका नाम भीमा देवी के रूप में प्रसिद्ध होगा। वे राक्षसी शक्तियों का नाश करके साधु और मुनियों की रक्षा करेंगी।
आगे देवी ने बताया कि जब अरुण नामक असुर तीनों लोकों के लिए बड़ा संकट उत्पन्न करेगा, तब वे असंख्य भ्रमरों का रूप धारण करेंगी और उस महादैत्य का विनाश करेंगी। उस समय देवता और मनुष्य उनकी स्तुति भ्रामरी देवी के नाम से करेंगे।
अंत में देवी ने आश्वासन दिया कि जब-जब संसार में दानवों और राक्षसी शक्तियों के कारण बड़ी बाधा उत्पन्न होगी, तब-तब वे किसी न किसी रूप में प्रकट होकर अधर्म और दुष्ट शक्तियों का नाश करेंगी तथा संसार की रक्षा करेंगी।
निष्कर्ष
दुर्गा सप्तशती का ग्यारहवाँ अध्याय भक्त को यह भाव देता है कि देवी शक्ति संसार के प्रत्येक रूप में विद्यमान है। देवताओं की स्तुति में देवी को बुद्धि, विद्या, श्रद्धा, पुष्टि, शक्ति और मुक्ति प्रदान करने वाली माता के रूप में प्रणाम किया गया है।
नारायणी स्तुति का पाठ श्रद्धा और एकाग्रता के साथ करने से साधक के मन में देवी के प्रति भक्ति और समर्पण का भाव मजबूत होता है। इस अध्याय का मुख्य संदेश यही है कि जब भी संसार में अधर्म और दानवी शक्तियों का प्रभाव बढ़ता है, तब देवी शक्ति धर्म और जीवों की रक्षा के लिए प्रकट होती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती का ग्यारहवाँ अध्याय किस नाम से जाना जाता है?
दुर्गा सप्तशती का ग्यारहवाँ अध्याय नारायणी स्तुति के नाम से प्रसिद्ध है।
दुर्गा सप्तशती के ग्यारहवें अध्याय में क्या वर्णन है?
इस अध्याय में देवताओं द्वारा देवी की स्तुति, देवी के विभिन्न स्वरूपों की महिमा और देवी द्वारा देवताओं को दिए गए वरदान का वर्णन है।
नारायणी स्तुति में देवी के किन रूपों का वर्णन मिलता है?
इसमें ब्रह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, नृसिंही, ऐन्द्री, शिवदूती, चामुण्डा सहित देवी के अनेक शक्तिस्वरूपों का वर्णन मिलता है।
ग्यारहवें अध्याय में देवी ने किन भविष्य के रूपों का वर्णन किया है?
देवी ने रक्तदन्तिका, शताक्षी, शाकम्भरी, दुर्गा, भीमा और भ्रामरी जैसे भविष्य के स्वरूपों में प्रकट होने की बात कही है।
नारायणी स्तुति का मुख्य भाव क्या है?
इस स्तुति का मुख्य भाव देवी को सम्पूर्ण जगत की आधारभूत शक्ति मानकर उनकी शरण लेना और संसार के भय, बाधाओं तथा अधर्म से रक्षा की प्रार्थना करना है।
क्या ग्यारहवें अध्याय का पाठ हिंदी अर्थ सहित किया जा सकता है?
हाँ। संस्कृत पाठ के साथ सरल हिंदी अर्थ पढ़ने से श्लोकों के भाव और देवी की स्तुति का संदेश समझना आसान हो जाता है।
