दुर्गा सप्तशती पाठ – दसवाँ अध्याय
दुर्गा सप्तशती का दसवाँ अध्याय शुम्भ-वध के नाम से जाना जाता है। इस अध्याय में निशुम्भ के वध के बाद असुरराज शुम्भ और माता भगवती के बीच हुए अंतिम युद्ध का वर्णन मिलता है।
निशुम्भ के मारे जाने और अपनी सेना का विनाश देखकर शुम्भ क्रोधित हो जाता है। वह माता भगवती को युद्ध के लिए चुनौती देता है और कहता है कि वे दूसरी शक्तियों का सहारा लेकर युद्ध कर रही हैं। माता भगवती उसके इस आरोप का उत्तर देती हैं और बताती हैं कि संसार में उनकी शक्ति के अतिरिक्त कोई दूसरी स्वतंत्र शक्ति नहीं है।
इसके बाद ब्रह्माणी आदि सभी देवशक्तियाँ माता भगवती के स्वरूप में समा जाती हैं। देवी अकेली ही शुम्भ के सामने युद्ध के लिए खड़ी होती हैं। दोनों के बीच अस्त्र-शस्त्रों से लेकर मल्लयुद्ध तक भयंकर संघर्ष होता है। अंत में माता भगवती अपने त्रिशूल से शुम्भ का वध कर देती हैं।
शुम्भ के वध के बाद संसार में व्याप्त अशांति समाप्त हो जाती है। देवता प्रसन्न होते हैं, गन्धर्व गीत गाते हैं, अप्सराएँ नृत्य करती हैं और चारों दिशाओं में शांति का वातावरण बन जाता है।
श्रीदुर्गासप्तशती – दशम अध्याय
शुम्भ-वध
॥ ध्यानम् ॥
ॐ उत्तप्तहेमरुचिरां रविचन्द्रवह्नि-
नेत्रां धनुश्शरयुताङ्कुशपाशशूलम्।
रम्यैर्भुजैश्च दधतीं शिवशक्तिरूपां
कामेश्वरीं हृदि भजामि धृतेन्दुलेखाम्॥
सरल हिन्दी अर्थ:
मैं अपने हृदय में उस भगवती कामेश्वरी का ध्यान करता हूँ, जिनका स्वरूप तपे हुए सोने के समान चमकीला है। सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि उनके तीन नेत्रों के रूप में प्रकाशित होते हैं। वे अपने सुंदर हाथों में धनुष-बाण, अंकुश, पाश और त्रिशूल धारण करती हैं। वे शिवशक्ति स्वरूप हैं और उनके मस्तक पर चन्द्रमा की कला सुशोभित है।
॥ श्रीदुर्गासप्तशती दशम अध्याय का पाठ ॥
ॐ ऋषिरुवाच ॥१॥
निशुम्भं निहतं दृष्ट्वा भ्रातरं प्राणसम्मितम्।
हन्यमानं बलं चैव शुम्भः क्रुद्धोऽब्रवीद्वचः॥२॥
सरल हिन्दी अर्थ:
अपने प्राणों के समान प्रिय भाई निशुम्भ को मारा हुआ और अपनी सेना का विनाश होता देखकर शुम्भ बहुत क्रोधित हो गया और उसने देवी से कहा।
बलावलेपाद्दुष्टे त्वं मा दुर्गे गर्वमावह।
अन्यासां बलमाश्रित्य युद्ध्यसे चातिमानिनी॥३॥
सरल हिन्दी अर्थ:
शुम्भ ने कहा—हे दुर्गे! अपने बल का इतना घमंड मत करो। तुम दूसरी शक्तियों का सहारा लेकर मेरे साथ युद्ध कर रही हो और फिर भी अपने सामर्थ्य पर गर्व कर रही हो।
देव्युवाच ॥४॥
एकैवाहं जगत्यत्र द्वितीया का ममापरा।
पश्यैताः दुष्ट मय्येव विशन्त्यो मद्विभूतयः॥५॥
सरल हिन्दी अर्थ:
देवी ने कहा—इस संसार में मैं ही अकेली हूँ। मेरे अतिरिक्त दूसरी कौन है? हे दुष्ट! देख, ये सभी मेरी ही शक्तियाँ हैं और अब मेरे ही स्वरूप में समा रही हैं।
ततः समस्तास्ता देव्यो ब्रह्माणीप्रमुखा लयम्।
तस्या देव्यास्तनौ जग्मुरेकैवासीत् तदाम्बिका॥६॥
सरल हिन्दी अर्थ:
इसके बाद ब्रह्माणी आदि सभी देवियाँ देवी भगवती के शरीर में समा गईं। तब वहाँ केवल अम्बिका देवी ही अकेली रह गईं।
देव्युवाच ॥७॥
अहं विभूत्या बहुभिरिह रूपैर्यदास्थिता।
तत्संहृतं मयैकैव तिष्ठाम्याजौ स्थिरो भव॥८॥
सरल हिन्दी अर्थ:
देवी ने कहा—मैं अपनी अनेक शक्तियों और रूपों के द्वारा यहाँ स्थित थी। अब मैंने उन सभी रूपों को अपने भीतर समेट लिया है। अब मैं अकेली ही युद्धभूमि में खड़ी हूँ। इसलिए स्थिर होकर युद्ध करो।
ऋषिरुवाच ॥९॥
ततः प्रववृते युद्धं देव्याः शुम्भस्य चोभयोः।
पश्यतां सर्वदेवानामसुराणां च दारुणम्॥१०॥
सरल हिन्दी अर्थ:
इसके बाद देवी और शुम्भ के बीच भयंकर युद्ध आरंभ हुआ। सभी देवता और असुर उस भयंकर युद्ध को देख रहे थे।
शरवर्षैः शितैः शस्त्रैस्तथास्त्रैश्चैव दारुणैः।
तयोर्युद्धमभूद्भूयः सर्वलोकभयङ्करम्॥११॥
सरल हिन्दी अर्थ:
दोनों के बीच तीखे बाणों, अनेक प्रकार के शस्त्रों और भयंकर अस्त्रों से युद्ध होने लगा। उनका यह युद्ध सभी लोकों में भय उत्पन्न करने वाला था।
दिव्यान्यस्त्राणि शतशो मुमुचे यान्यथाम्बिका।
बभञ्ज तानि दैत्येन्द्रस्तत्प्रतीघातकर्तृभिः॥१२॥
सरल हिन्दी अर्थ:
अम्बिका देवी ने शुम्भ पर सैकड़ों दिव्य अस्त्र छोड़े। दैत्यराज शुम्भ ने अपने अस्त्रों से उनका प्रतिकार करते हुए उन दिव्य अस्त्रों को रोक दिया।
मुक्तानि तेन चास्त्राणि दिव्यानि परमेश्वरी।
बभञ्ज लीलयैवोग्रहुङ्कारोच्चारणादिभिः॥१३॥
सरल हिन्दी अर्थ:
शुम्भ ने भी देवी पर अनेक दिव्य अस्त्र छोड़े। परमेश्वरी देवी ने प्रचंड हुंकार और अपनी शक्ति से उन अस्त्रों को सहज ही नष्ट कर दिया।
ततः शरशतैर्देवीमाच्छादयत सोऽसुरः।
सापि तत्कुपिता देवी धनुश्चिच्छेद चेषुभिः॥१४॥
सरल हिन्दी अर्थ:
इसके बाद उस असुर ने सैकड़ों बाणों से देवी को ढक दिया। देवी को क्रोध आया और उन्होंने अपने तीखे बाणों से शुम्भ का धनुष काट दिया।
छिन्ने धनुषि दैत्येन्द्रस्तथा शक्तिमथाददे।
चिच्छेद देवी चक्रेण तामप्यस्य करे स्थिताम्॥१५॥
सरल हिन्दी अर्थ:
धनुष टूट जाने पर दैत्यराज शुम्भ ने शक्ति नामक अस्त्र उठा लिया। देवी ने चक्र से उसके हाथ में स्थित उस शक्ति को भी काट दिया।
ततः खड्गमुपादाय शतचन्द्रं च भानुमत्।
अभ्यधावत्तदा देवीं दैत्यानामधिपेश्वरः॥१६॥
सरल हिन्दी अर्थ:
इसके बाद दैत्यों के स्वामी शुम्भ ने चमकती हुई तलवार और सौ चन्द्रमाओं के समान उज्ज्वल ढाल उठाई और देवी की ओर तेजी से दौड़ा।
तस्यापतत एवाशु खड्गं चिच्छेद चण्डिका।
धनुर्मुक्तैः शितैर्बाणैश्चर्म चार्ककरामलम्॥१७॥
सरल हिन्दी अर्थ:
शुम्भ के आगे बढ़ते ही चण्डिका देवी ने धनुष से छोड़े गए तीखे बाणों से उसकी तलवार और सूर्य की किरणों के समान चमकती हुई ढाल को काट दिया।
हताश्वः स तदा दैत्यश्छिन्नधन्वा विसारथिः।
जग्राह मुद्गरं घोरमम्बिकानिधनोद्यतः॥१८॥
सरल हिन्दी अर्थ:
उसके घोड़े मारे जा चुके थे, धनुष टूट चुका था और उसका सारथी भी नहीं रहा था। तब अम्बिका देवी का वध करने के उद्देश्य से उसने एक भयंकर मुद्गर उठा लिया।
चिच्छेदापततस्तस्य मुद्गरं निशितैः शरैः।
तथापि सोऽभ्यधावत्तां मुष्टिमुद्यम्य वेगवान्॥१९॥
सरल हिन्दी अर्थ:
शुम्भ के उस मुद्गर को देवी ने तीखे बाणों से काट दिया। इसके बाद भी वह अपनी मुट्ठी उठाकर बहुत तेजी से देवी की ओर दौड़ा।
स मुष्टिं पातयामास हृदये दैत्यपुङ्गवः।
देव्यास्तं चापि सा देवी तलेनोरस्यताडयत्॥२०॥
सरल हिन्दी अर्थ:
दैत्यश्रेष्ठ शुम्भ ने देवी के हृदय पर अपनी मुट्ठी से प्रहार किया। देवी ने भी अपनी हथेली से उसके वक्षस्थल पर प्रहार किया।
तलप्रहाराभिहतो निपपात महीतले।
स दैत्यराजः सहसा पुनरेव तथोत्थितः॥२१॥
सरल हिन्दी अर्थ:
देवी की हथेली के प्रहार से शुम्भ पृथ्वी पर गिर पड़ा। लेकिन वह दैत्यराज तुरंत फिर उठ खड़ा हुआ।
उत्पत्य च प्रगृह्योच्चैर्देवीं गगनमास्थितः।
तत्रापि सा निराधारा युयुधे तेन चण्डिका॥२२॥
सरल हिन्दी अर्थ:
शुम्भ ने देवी को पकड़कर ऊँचा उठाया और आकाश में पहुँच गया। वहाँ भी चण्डिका देवी बिना किसी आधार के आकाश में उसके साथ युद्ध करती रहीं।
नियुद्धं खे तदा दैत्यश्चण्डिका च परस्परम्।
चक्रतुः प्रथमं सिद्धमुनिविस्मयकारकम्॥२३॥
सरल हिन्दी अर्थ:
उस समय आकाश में शुम्भ और चण्डिका देवी के बीच मल्लयुद्ध होने लगा। यह अद्भुत युद्ध सिद्धों और मुनियों के लिए भी आश्चर्य का विषय बन गया।
ततो नियुद्धं सुचिरं कृत्वा तेनाम्बिका सह।
उत्पाट्य भ्रामयामास चिक्षेप धरणीतले॥२४॥
सरल हिन्दी अर्थ:
कुछ समय तक शुम्भ के साथ मल्लयुद्ध करने के बाद अम्बिका देवी ने उसे पकड़ लिया, घुमाया और पृथ्वी पर पटक दिया।
स क्षिप्तो धरणीं प्राप्य मुष्टिमुद्यम्य वेगितः।
अभ्यधावत दुष्टात्मा चण्डिकानिधनेच्छया॥२५॥
सरल हिन्दी अर्थ:
पृथ्वी पर गिरने के बाद भी वह दुष्ट शुम्भ तुरंत उठ खड़ा हुआ। उसने अपनी मुट्ठी उठाई और चण्डिका देवी का वध करने की इच्छा से तेजी से उनकी ओर दौड़ा।
तमायान्तं ततो देवी सर्वदैत्यजनेश्वरम्।
जगत्यां पातयामास भित्त्वा शूलेन वक्षसि॥२६॥
सरल हिन्दी अर्थ:
अपनी ओर आते हुए सभी दैत्यों के स्वामी शुम्भ को देखकर देवी ने उसके वक्षस्थल को अपने त्रिशूल से भेद दिया और उसे पृथ्वी पर गिरा दिया।
स गतासुः पपातोर्व्यां देवीशूलाग्रविक्षतः।
चालयन् सकलां पृथ्वीं साब्धिद्वीपां सपर्वताम्॥२७॥
सरल हिन्दी अर्थ:
देवी के त्रिशूल से घायल होकर प्राणहीन शुम्भ पृथ्वी पर गिर पड़ा। उसके गिरने से समुद्रों, द्वीपों और पर्वतों सहित पूरी पृथ्वी हिल उठी।
ततः प्रसन्नमखिलं हते तस्मिन् दुरात्मनि।
जगत्स्वास्थ्यमतीवाप निर्मलं चाभवन्नभः॥२८॥
सरल हिन्दी अर्थ:
उस दुरात्मा शुम्भ के मारे जाने के बाद पूरा संसार प्रसन्न हो गया। चारों ओर शांति और संतुलन लौट आया तथा आकाश निर्मल हो गया।
उत्पातमेघाः सोल्का ये प्रागासंस्ते शमं ययुः।
सरितो मार्गवाहिन्यस्तथासंस्तत्र पातिते॥२९॥
सरल हिन्दी अर्थ:
पहले जो अशुभ संकेत और उल्काओं वाले उत्पातकारी बादल दिखाई दे रहे थे, वे सब शांत हो गए। नदियाँ भी अपने सामान्य मार्ग से बहने लगीं।
ततो देवगणाः सर्वे हर्षनिर्भरमानसाः।
बभूवुर्निहते तस्मिन् गन्धर्वा ललितं जगुः॥३०॥
सरल हिन्दी अर्थ:
शुम्भ के मारे जाने पर सभी देवताओं के मन आनंद से भर गए। गन्धर्वों ने प्रसन्न होकर मधुर गीत गाए।
अवादयंस्तथैवान्ये ननृतुश्चाप्सरोगणाः।
ववुः पुण्यास्तथा वाताः सुप्रभोऽभूद्दिवाकरः॥३१॥
सरल हिन्दी अर्थ:
अन्य देवताओं ने वाद्य बजाए और अप्सराओं ने नृत्य किया। पवित्र और सुखद हवाएँ चलने लगीं तथा सूर्य का प्रकाश अत्यंत उज्ज्वल हो गया।
जज्वलुश्चाग्नयः शान्ताः शान्ता दिग्जनितस्वनाः॥ॐ॥३२॥
सरल हिन्दी अर्थ:
अग्नियाँ शांत और उज्ज्वल होकर प्रज्वलित होने लगीं तथा सभी दिशाओं में उत्पन्न होने वाली अशांत और भय उत्पन्न करने वाली ध्वनियाँ शांत हो गईं। चारों ओर शांति स्थापित हो गई।
।। श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये शुम्भवधो नाम दशमोऽध्यायः सम्पूर्णः ।।
दुर्गा सप्तशती पाठ – दसवाँ अध्याय हिन्दी में
शुम्भ वध
निशुम्भ के मारे जाने और अपनी सेना का विनाश देखकर शुम्भ अत्यंत क्रोधित हो उठा। उसने माता भगवती को संबोधित करते हुए कहा कि हे दुर्गे! तुम्हें अपने सामर्थ्य पर इतना अभिमान नहीं करना चाहिए। तुम अकेले अपने बल से युद्ध नहीं कर रही हो, बल्कि दूसरी शक्तियों के सहारे लड़ रही हो।
माता भगवती ने शुम्भ को उत्तर देते हुए कहा कि इस संसार में उनके अतिरिक्त कोई दूसरी स्वतंत्र शक्ति नहीं है। उनके साथ दिखाई देने वाली सभी देवशक्तियाँ उन्हीं की विभूतियाँ हैं। इतना कहकर माता ने ब्राह्मणी आदि सभी देवियों को अपने स्वरूप में समाहित कर लिया। इसके बाद युद्धभूमि में केवल देवी भगवती ही रह गईं।
देवी ने शुम्भ से कहा कि वे अनेक रूपों में अपनी ही शक्ति के कारण यहाँ प्रकट हुई थीं। अब उन्होंने उन सभी रूपों को अपने भीतर समेट लिया है और वे अकेली ही उसके सामने खड़ी हैं। इसलिए अब वह बिना किसी भ्रम के उनके साथ युद्ध करे।
इसके बाद देवताओं और असुरों के सामने माता भगवती तथा शुम्भ के बीच अत्यंत भयंकर युद्ध आरंभ हो गया। दोनों ओर से अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा होने लगी। माता ने अनेक दिव्य अस्त्र छोड़े और शुम्भ ने भी उनका सामना करने के लिए अपने अस्त्र चलाए। देवी द्वारा छोड़े गए अस्त्रों को शुम्भ ने अपने अस्त्रों से रोक दिया। दूसरी ओर शुम्भ के द्वारा चलाए गए दिव्य अस्त्रों को देवी ने अपनी प्रचंड शक्ति और हुंकार से नष्ट कर दिया।
इसके बाद शुम्भ ने बड़ी संख्या में बाण चलाकर देवी को चारों ओर से ढक दिया। देवी ने क्रोधित होकर अपने तीखे बाणों से उसका धनुष काट दिया। धनुष नष्ट हो जाने पर शुम्भ ने शक्ति नामक अस्त्र उठाकर देवी पर प्रहार किया, लेकिन देवी ने उस अस्त्र को भी काट दिया।
इसके बाद शुम्भ तलवार और चमकती हुई ढाल लेकर देवी की ओर तेजी से बढ़ा। जैसे ही वह देवी के निकट पहुँचा, माता ने तीखे बाणों से उसकी ढाल और तलवार दोनों को नष्ट कर दिया।
युद्ध में शुम्भ का घोड़ा मारा गया, उसका रथ नष्ट हो गया और उसका सारथी भी मारा गया। इसके बाद उसने एक भयंकर मुद्गर उठाया और देवी पर आक्रमण करने के लिए आगे बढ़ा। देवी ने अपने तीखे बाणों से उसके मुद्गर को भी काट डाला।
अपने अस्त्रों के नष्ट हो जाने पर शुम्भ अत्यंत क्रोधित हो गया। उसने आगे बढ़कर देवी के वक्षस्थल पर अपनी मुट्ठी से जोरदार प्रहार किया। देवी ने भी उसके वक्षस्थल पर अपनी हथेली से प्रहार किया। देवी के प्रहार से शुम्भ पृथ्वी पर गिर पड़ा, लेकिन वह तुरंत उठकर फिर युद्ध करने लगा।
इसके बाद शुम्भ ने देवी को पकड़ लिया और उन्हें लेकर आकाश में जा पहुँचा। आकाश में भी दोनों के बीच भयंकर युद्ध चलता रहा। यह अद्भुत युद्ध देवताओं और ऋषियों के लिए भी आश्चर्य का विषय बन गया।
काफी समय तक आकाश में युद्ध करने के बाद माता भगवती ने शुम्भ को पकड़कर घुमाया और पृथ्वी पर पटक दिया। पृथ्वी पर गिरने के बाद भी वह दैत्य फिर उठ खड़ा हुआ और देवी का वध करने के उद्देश्य से उनकी ओर तेजी से दौड़ा।
शुम्भ को अपनी ओर आते देखकर माता भगवती ने अपने त्रिशूल से उसके वक्षस्थल को भेद दिया और उसे पृथ्वी पर गिरा दिया। देवी के त्रिशूल से गंभीर रूप से घायल होकर शुम्भ के प्राण निकल गए।
शुम्भ के पृथ्वी पर गिरते ही समुद्र, द्वीप, पर्वत और पूरी धरती कंप उठी। उसके विनाश के साथ ही संसार में व्याप्त अशांति समाप्त हो गई। वातावरण फिर से शांत और सुखद होने लगा तथा आकाश निर्मल दिखाई देने लगा।
पहले दिखाई देने वाले अशुभ संकेत, उत्पातकारी बादल और उल्कापात शांत हो गए। नदियाँ अपने निर्धारित मार्ग से बहने लगीं। शुम्भ के वध से सभी देवताओं के मन में अत्यंत प्रसन्नता छा गई।
गन्धर्वों ने प्रसन्न होकर मधुर गीत गाए और देवताओं ने वाद्य बजाए। अप्सराओं ने आनंदपूर्वक नृत्य किया। वातावरण में पवित्र और सुखद वायु बहने लगी तथा सूर्य का प्रकाश भी स्वच्छ और उज्ज्वल हो गया।
यज्ञशालाओं में शांत पड़ी अग्नियाँ फिर से प्रज्वलित हो उठीं और चारों दिशाओं में व्याप्त अशांति समाप्त होकर शांति का वातावरण स्थापित हो गया। इस प्रकार माता भगवती ने शुम्भ का वध करके संसार को उसके अत्याचार से मुक्त किया और देवताओं सहित समस्त जगत में फिर से प्रसन्नता और शांति स्थापित हो गई।
दशम अध्याय का सार
दुर्गा सप्तशती के दशम अध्याय में शुम्भ और माता भगवती के बीच हुए अंतिम युद्ध का वर्णन किया गया है। निशुम्भ के वध के बाद शुम्भ क्रोधित होकर देवी को चुनौती देता है। वह देवी पर दूसरी शक्तियों का सहारा लेने का आरोप लगाता है।
देवी उसे बताती हैं कि सभी शक्तियाँ उन्हीं की विभूतियाँ हैं। इसके बाद ब्रह्माणी आदि सभी शक्तियाँ देवी के स्वरूप में समा जाती हैं और माता भगवती अकेली ही शुम्भ के सामने खड़ी होती हैं।
शुम्भ और देवी के बीच पहले अस्त्र-शस्त्रों से और फिर मल्लयुद्ध से भयंकर संघर्ष होता है। शुम्भ बार-बार पराजित होने के बाद भी युद्ध करता रहता है। अंत में माता भगवती उसके वक्षस्थल को त्रिशूल से भेद देती हैं और शुम्भ का वध हो जाता है।
शुम्भ के धरती पर गिरते ही संसार में व्याप्त अशांति समाप्त हो जाती है। देवता प्रसन्न होते हैं और चारों ओर शांति का वातावरण बन जाता है।
दशम अध्याय का महत्व
दशम अध्याय में माता भगवती की परम शक्ति और उनके एकत्व स्वरूप का विशेष वर्णन मिलता है। देवी स्पष्ट करती हैं कि अलग-अलग दिखाई देने वाली सभी शक्तियाँ उन्हीं की विभूतियाँ हैं।
शुम्भ का वध अहंकार और अधर्म के अंत का प्रतीक माना जाता है। इस अध्याय में यह संदेश मिलता है कि अत्याचार और अहंकार चाहे कितने ही शक्तिशाली दिखाई दें, अंततः उनका विनाश होता है और धर्म की विजय होती है।
दशम अध्याय से मिलने वाली सीख
इस अध्याय की कथा हमें अपनी शक्ति और उपलब्धियों पर अहंकार न करने की प्रेरणा देती है। शुम्भ के पास बहुत सामर्थ्य था, लेकिन उसका अहंकार उसके विनाश का कारण बना।
माता भगवती का स्वरूप हमें यह भी सिखाता है कि सभी शक्तियों का मूल एक ही है। मनुष्य को अपनी शक्ति का उपयोग धर्म, सत्य और अच्छे कार्यों के लिए करना चाहिए।
दुर्गा सप्तशती के दशम अध्याय का पाठ कैसे करें?
दशम अध्याय का पाठ श्रद्धा और एकाग्रता के साथ करना चाहिए। पाठ से पहले स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा के स्थान को साफ रखें। माता भगवती के सामने दीपक जलाकर उनका ध्यान करके पाठ आरंभ किया जा सकता है।
यदि आप संपूर्ण दुर्गा सप्तशती का पाठ कर रहे हैं, तो दशम अध्याय को निर्धारित क्रम में पढ़ें। केवल इस अध्याय का पाठ करने वाले भक्त भी श्रद्धापूर्वक माता भगवती का स्मरण करके पाठ कर सकते हैं।
पाठ के दौरान संस्कृत शब्दों का उच्चारण यथासंभव शुद्ध रखने का प्रयास करना चाहिए। श्रद्धा और एकाग्रता के साथ माता का स्मरण करना महत्वपूर्ण है।
निष्कर्ष
दुर्गा सप्तशती का दसवाँ अध्याय शुम्भ-वध की कथा के माध्यम से माता भगवती की परम शक्ति का वर्णन करता है। निशुम्भ के वध के बाद शुम्भ देवी को चुनौती देता है, लेकिन माता भगवती उसके सामने अकेली खड़ी होती हैं और अंत में उसका वध कर देती हैं।
शुम्भ का अंत केवल एक असुर के वध की कथा नहीं है, बल्कि यह अहंकार, अत्याचार और अधर्म के अंत का भी प्रतीक है। शुम्भ के मारे जाने के बाद संसार में शांति लौट आती है और देवता आनंदित होते हैं।
माता भगवती की कृपा सभी भक्तों पर बनी रहे और उनके जीवन में शक्ति, साहस, शांति और सद्बुद्धि का प्रकाश बना रहे।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती का दसवाँ अध्याय किस नाम से जाना जाता है?
दुर्गा सप्तशती का दसवाँ अध्याय शुम्भ-वध के नाम से जाना जाता है।
दुर्गा सप्तशती के दसवें अध्याय में किसका वध होता है?
दसवें अध्याय में माता भगवती द्वारा असुरराज शुम्भ का वध किया जाता है।
दसवें अध्याय में देवी और शुम्भ के बीच क्या हुआ?
शुम्भ ने देवी पर दूसरी शक्तियों के सहारे युद्ध करने का आरोप लगाया। देवी ने बताया कि सभी शक्तियाँ उन्हीं की विभूतियाँ हैं। इसके बाद दोनों के बीच भयंकर युद्ध हुआ।
शुम्भ का वध कैसे हुआ?
लंबे युद्ध और मल्लयुद्ध के बाद माता भगवती ने अपने त्रिशूल से शुम्भ के वक्षस्थल को भेद दिया। शुम्भ प्राणहीन होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा।
दुर्गा सप्तशती के दसवें अध्याय में कितने श्लोक हैं?
दशम अध्याय में ध्यान सहित ३२ क्रमांक दिए गए हैं।
दशम अध्याय का मुख्य संदेश क्या है?
इस अध्याय का मुख्य संदेश है कि अहंकार और अधर्म का अंत निश्चित है तथा धर्म और सत्य की विजय होती है।
