दुर्गा सप्तशती पाठ – नौवाँ अध्याय
श्री दुर्गा सप्तशती के नवम अध्याय का नाम निशुम्भ-वध है। इस अध्याय में देवी चण्डिका और असुरराज शुम्भ-निशुम्भ के बीच हुए भयंकर युद्ध का वर्णन मिलता है। देवी के साथ विभिन्न मातृशक्तियाँ भी असुरों का संहार करती हैं। युद्ध के दौरान निशुम्भ बार-बार देवी पर आक्रमण करता है, लेकिन देवी उसके सभी अस्त्रों को नष्ट कर देती हैं और अंत में उसका वध करती हैं।
इस अध्याय में देवी की अद्भुत शक्ति, साहस और दुष्ट शक्तियों के विनाश का वर्णन अत्यंत प्रभावशाली ढंग से किया गया है। भक्त श्रद्धापूर्वक दुर्गा सप्तशती के नवम अध्याय का पाठ करके माँ भगवती का स्मरण और आराधना करते हैं।
श्रीदुर्गासप्तशती – नवम अध्याय
निशुम्भ-वध
॥ध्यानम्॥
ॐ बन्धूककाञ्चननिभं रुचिराक्षमालां
पाशाङ्कुशौ च वरदां निजबाहुदण्डैः।
बिभ्राणमिन्दुशकलाभरणं त्रिनेत्र-
मर्धाम्बिकेशमनिशं वपुराश्रयामि॥
हिंदी अर्थ:
मैं उस देवी के स्वरूप का निरंतर ध्यान करता हूँ, जिनका वर्ण बन्धूक पुष्प और स्वर्ण के समान आभायुक्त है, जिनकी आँखें सुंदर हैं और जिनके हाथों में अक्षरों की माला, पाश, अंकुश तथा वर देने की मुद्रा सुशोभित है। जो चन्द्रमा के अर्धचन्द्र को आभूषण के रूप में धारण करती हैं और जिनके तीन नेत्र हैं।
राजोवाच ॥1॥
विचित्रमिदमाख्यातं भगवन् भवता मम।
देव्याश्चरितमाहात्म्यं रक्तबीजवधाश्रितम्॥2॥
हिंदी अर्थ:
राजा ने कहा— हे भगवन्! आपने मुझे देवी के जिस अद्भुत चरित्र और महात्म्य का वर्णन किया, उसमें रक्तबीज के वध का प्रसंग बताया है।
भूयश्चेच्छाम्यहं श्रोतुं रक्तबीजे निपातिते।
चकार शुम्भो यत्कर्म निशुम्भश्चातिकोपनः॥3॥
हिंदी अर्थ:
रक्तबीज के मारे जाने के बाद शुम्भ ने क्या किया और अत्यंत क्रोधित हुए निशुम्भ ने कौन-सा कार्य किया, यह मैं फिर से सुनना चाहता हूँ।
ऋषिरुवाच ॥4॥
चकार कोपमतुलं रक्तबीजे निपातिते।
शुम्भासुरो निशुम्भश्च हतेष्वन्येषु चाहवे॥5॥
हिंदी अर्थ:
ऋषि ने कहा— रक्तबीज तथा युद्ध में अन्य असुरों के मारे जाने पर शुम्भ और निशुम्भ दोनों अत्यंत क्रोधित हो उठे।
हन्यमानं महासैन्यं विलोक्यामर्षमुद्वहन्।
अभ्यधावन्निशुम्भोऽथ मुख्ययासुरसेनया॥6॥
हिंदी अर्थ:
अपनी विशाल सेना का संहार होते देखकर क्रोध से भरकर निशुम्भ अपनी प्रमुख असुर सेना के साथ देवी की ओर दौड़ा।
तस्याग्रतस्तथा पृष्ठे पार्श्वयोश्च महासुराः।
संदष्टौष्ठपुटाः क्रुद्धा हन्तुं देवीमुपाययुः॥7॥
हिंदी अर्थ:
उसके आगे, पीछे और दोनों ओर अनेक शक्तिशाली असुर क्रोध से अपने होंठ दबाए हुए देवी का वध करने के उद्देश्य से आगे बढ़े।
आजगाम महावीर्यः शुम्भोऽपि स्वबलैर्वृतः।
निहन्तुं चण्डिकां कोपात् कृत्वा युद्धं तु मातृभिः॥8॥
हिंदी अर्थ:
महान पराक्रमी शुम्भ भी अपनी सेना से घिरकर वहाँ आ पहुँचा। वह क्रोध में देवी चण्डिका का वध करने और मातृशक्तियों के साथ युद्ध करने के लिए आया।
ततो युद्धमतीवासीद्देव्या शुम्भनिशुम्भयोः।
शरवर्षमतीवोग्रं मेघयोरिव वर्षतोः॥9॥
हिंदी अर्थ:
इसके बाद देवी और शुम्भ-निशुम्भ के बीच भयंकर युद्ध होने लगा। दोनों ओर से उसी प्रकार तीव्र बाणों की वर्षा होने लगी, जैसे दो बादल वर्षा करते हैं।
चिच्छेदास्ताञ्छरांस्ताभ्यां चण्डिका स्वशरोत्करैः।
ताडयामास चाङ्गेषु शस्त्रौघैरसुरेश्वरौ॥10॥
हिंदी अर्थ:
चण्डिका ने अपने बाणों से उन दोनों द्वारा छोड़े गए बाणों को काट दिया और अनेक प्रकार के अस्त्रों से दोनों असुर राजाओं के शरीर पर प्रहार किया।
निशुम्भो निशितं खड्गं चर्म चादाय सुप्रभम्।
अताडयन्मूर्ध्नि सिंहं देव्या वाहनमुत्तमम्॥11॥
हिंदी अर्थ:
निशुम्भ ने तीक्ष्ण तलवार और चमकदार ढाल लेकर देवी के उत्तम वाहन सिंह के मस्तक पर प्रहार किया।
ताडिते वाहने देवी क्षुरप्रेणासिमुत्तमम्।
निशुम्भस्याशु चिच्छेद चर्म चाप्यष्टचन्द्रकम्॥12॥
हिंदी अर्थ:
अपने वाहन सिंह पर प्रहार होते देखकर देवी ने क्षुरप्र नामक बाण से निशुम्भ की उत्तम तलवार और आठ चन्द्राकार चिह्नों वाली उसकी ढाल को शीघ्र ही काट दिया।
छिन्ने चर्मणि खड्गे च शक्तिं चिक्षेप सोऽसुरः।
तामप्यस्य द्विधा चक्रे चक्रेणाभिमुखागताम्॥13॥
हिंदी अर्थ:
तलवार और ढाल कट जाने पर उस असुर ने देवी की ओर शक्ति अस्त्र फेंका। देवी ने सामने आती हुई उस शक्ति को भी अपने चक्र से दो टुकड़ों में काट दिया।
कोपाध्मातो निशुम्भोऽथ शूलं जग्राह दानवः।
आयातं मुष्टिपातेन देवी तच्चाप्यचूर्णयत्॥14॥
हिंदी अर्थ:
क्रोध से भरकर निशुम्भ ने फिर त्रिशूल उठा लिया। देवी ने उसकी ओर आते हुए उस त्रिशूल को अपनी मुट्ठी के प्रहार से ही चूर्ण कर दिया।
आविध्याथ गदां सोऽपि चिक्षेप चण्डिकां प्रति।
सापि देव्या त्रिशूलेन भिन्ना भस्मत्वमागता॥15॥
हिंदी अर्थ:
इसके बाद निशुम्भ ने अपनी गदा घुमाकर चण्डिका की ओर फेंकी। देवी ने अपने त्रिशूल से उस गदा को भी भेद दिया और वह नष्ट हो गई।
ततः परशुहस्तं तमायान्तं दैत्यपुङ्गवम्।
आहत्य देवी बाणौघैरपातयत भूतले॥16॥
हिंदी अर्थ:
इसके बाद हाथ में फरसा लिए उस श्रेष्ठ असुर को अपनी ओर आते देखकर देवी ने बाणों की वर्षा करके उसे भूमि पर गिरा दिया।
तस्मिन्निपतिते भूमौ निशुम्भे भीमविक्रमे।
भ्रातर्यतीव संक्रुद्धः प्रययौ हन्तुमम्बिकाम्॥17॥
हिंदी अर्थ:
भयंकर पराक्रमी निशुम्भ के भूमि पर गिर जाने के बाद उसका भाई शुम्भ अत्यंत क्रोधित हुआ और अम्बिका का वध करने के लिए उनकी ओर बढ़ा।
स रथस्थस्तथात्युच्चैर्गृहीतपरमायुधैः।
भुजैरष्टाभिरतुलैर्व्याप्याशेषं बभौ नभः॥18॥
हिंदी अर्थ:
रथ पर स्थित शुम्भ ने अनेक श्रेष्ठ अस्त्र धारण किए और अपने आठ विशाल एवं अतुलनीय भुजाओं से पूरे आकाश को घेरता हुआ दिखाई देने लगा।
तमायान्तं समालोक्य देवी शङ्खमवादयत्।
ज्याशब्दं चापि धनुषश्चकारातीव दुःसहम्॥19॥
हिंदी अर्थ:
उसकी ओर आते हुए शुम्भ को देखकर देवी ने शंख बजाया और अपने धनुष की प्रत्यंचा की ऐसी तीव्र ध्वनि की, जिसे सहना कठिन था।
पूरयामास ककुभो निजघण्टास्वनेन च।
समस्तदैत्यसैन्यानां तेजोवधविधायिना॥20॥
हिंदी अर्थ:
देवी ने अपनी घंटी की ऐसी ध्वनि की, जिससे चारों दिशाएँ गूँज उठीं और जिसने समस्त दैत्य सेना के तेज को दबा दिया।
ततः सिंहो महानादैस्त्याजितेभमहामदैः।
पूरयामास गगनं गां तथैव दिशो दश॥21॥
हिंदी अर्थ:
इसके बाद देवी के सिंह ने ऐसी भयंकर गर्जना की, जिससे मदोन्मत्त हाथियों का गर्व नष्ट हो गया और आकाश, पृथ्वी तथा दसों दिशाएँ उसकी ध्वनि से भर गईं।
ततः काली समुत्पत्य गगनं क्ष्मामताडयत्।
कराभ्यां तन्निनादेन प्राक्स्वनास्ते तिरोहिताः॥22॥
हिंदी अर्थ:
इसके बाद काली आकाश में उछलकर अपने हाथों से पृथ्वी पर प्रहार करने लगीं। उस प्रचंड ध्वनि के कारण पहले से हो रही सभी ध्वनियाँ दब गईं।
अट्टाट्टहासमशिवं शिवदूती चकार ह।
तैः शब्दैरसुरास्त्रेसुः शुम्भः कोपं परं ययौ॥23॥
हिंदी अर्थ:
शिवदूती ने भयंकर अट्टहास किया। उन भयंकर ध्वनियों से असुर भयभीत हो उठे और शुम्भ अत्यंत क्रोधित हो गया।
दुरात्मंस्तिष्ठ तिष्ठेति व्याजहाराम्बिका यदा।
तदा जयेत्यभिहितं देवैराकाशसंस्थितैः॥24॥
हिंदी अर्थ:
जब अम्बिका ने शुम्भ से कहा— हे दुरात्मा! ठहर, ठहर!— तब आकाश में स्थित देवताओं ने देवी की विजय की घोषणा करते हुए कहा, “जय हो!”
शुम्भेनागत्य या शक्तिर्मुक्ता ज्वालातिभीषणा।
आयान्ती वह्निकूटाभा सा निरस्ता महोल्कया॥25॥
हिंदी अर्थ:
शुम्भ ने अत्यंत भयंकर ज्वालाओं से युक्त जो शक्ति देवी की ओर छोड़ी, उसे अग्नि के विशाल पुंज के समान आती देखकर देवी ने अपने महोल्का अस्त्र से निष्फल कर दिया।
सिंहनादेन शुम्भस्य व्याप्तं लोकत्रयान्तरम्।
निर्घातनिःस्वनो घोरो जितवानवनीपते॥26॥
हिंदी अर्थ:
शुम्भ की गर्जना से तीनों लोकों का आकाश गूँज उठा। देवी के भयंकर सिंहनाद ने उस गर्जना को भी दबा दिया।
शुम्भमुक्ताञ्छरान् देवी शुम्भस्तत्प्रहिताञ्छरान्।
चिच्छेद स्वशरैरुग्रैः शतशोऽथ सहस्रशः॥27॥
हिंदी अर्थ:
शुम्भ ने देवी पर जो बाण छोड़े और देवी ने शुम्भ पर जो बाण चलाए, दोनों ने अपने-अपने तीक्ष्ण बाणों से सामने आने वाले बाणों को सैकड़ों और हजारों की संख्या में काट दिया।
ततः सा चण्डिका क्रुद्धा शूलेनाभिजघान तम्।
स तदाभिहतो भूमौ मूर्च्छितो निपपात ह॥28॥
हिंदी अर्थ:
इसके बाद क्रोधित चण्डिका ने शूल से शुम्भ पर प्रहार किया। उस प्रहार से आहत होकर शुम्भ मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़ा।
ततो निशुम्भः सम्प्राप्य चेतनामात्तकार्मुकः।
आजघान शरैर्देवीं कालीं केसरिणं तथा॥29॥
हिंदी अर्थ:
इसी बीच निशुम्भ को चेतना प्राप्त हुई। उसने धनुष उठाकर देवी, काली और सिंह पर बाणों से प्रहार किया।
पुनश्च कृत्वा बाहूनामयुतं दनुजेश्वरः।
चक्रायुधेन दितिजश्छादयामास चण्डिकाम्॥30॥
हिंदी अर्थ:
दैत्यों के स्वामी निशुम्भ ने फिर अपनी अनेक भुजाएँ प्रकट करके चक्रों से चण्डिका को चारों ओर से ढक दिया।
ततो भगवती क्रुद्धा दुर्गा दुर्गार्तिनाशिनी।
चिच्छेद तानि चक्राणि स्वशरैः सायकांश्च तान्॥31॥
हिंदी अर्थ:
तब दुर्गार्तिनाशिनी भगवती दुर्गा क्रोधित हुईं और उन्होंने अपने बाणों से उन सभी चक्रों तथा निशुम्भ के बाणों को काट दिया।
ततो निशुम्भो वेगेन गदामादाय चण्डिकाम्।
अभ्यधावत वै हन्तुं दैत्यसेनासमावृतः॥32॥
हिंदी अर्थ:
इसके बाद निशुम्भ ने वेग से गदा उठाई और दैत्य सेना से घिरकर चण्डिका का वध करने के लिए उनकी ओर दौड़ा।
तस्यापतत एवाशु गदां चिच्छेद चण्डिका।
खड्गेन शितधारेण स च शूलं समाददे॥33॥
हिंदी अर्थ:
निशुम्भ के आते ही चण्डिका ने अपनी तीक्ष्ण धार वाली तलवार से उसकी गदा काट दी। तब उसने शूल उठा लिया।
शूलहस्तं समायान्तं निशुम्भममरार्दनम्।
हृदि विव्याध शूलेन वेगाविद्धेन चण्डिका॥34॥
हिंदी अर्थ:
हाथ में शूल लिए देवताओं को पीड़ा देने वाले निशुम्भ के सामने आने पर चण्डिका ने वेगपूर्वक अपने शूल से उसके हृदय में प्रहार किया।
भिन्नस्य तस्य शूलेन हृदयान्निःसृतोऽपरः।
महाबलो महावीर्यस्तिष्ठेति पुरुषो वदन्॥35॥
हिंदी अर्थ:
शूल से हृदय विदीर्ण होने पर उसके शरीर से एक अन्य अत्यंत बलवान और महान पराक्रमी पुरुष प्रकट हुआ, जो देवी से “ठहरो, ठहरो” कह रहा था।
तस्य निष्क्रामतो देवी प्रहस्य स्वनवत्ततः।
शिरश्चिच्छेद खड्गेन ततोऽसावपतद्भुवि॥36॥
हिंदी अर्थ:
उस पुरुष के शरीर से बाहर निकलते ही देवी ने हँसते हुए अपनी तलवार से उसका सिर काट दिया और वह भूमि पर गिर पड़ा।
ततः सिंहश्चखादोग्रं दंष्ट्राक्षुण्णशिरोधरान्।
असुरांस्तांस्तथा काली शिवदूती तथापरान्॥37॥
हिंदी अर्थ:
इसके बाद देवी के सिंह ने अपनी दाढ़ों से कुचले हुए सिर और गर्दन वाले भयंकर असुरों को खा लिया। काली और शिवदूती ने भी अन्य असुरों का संहार किया।
कौमारीशक्तिनिर्भिन्नाः केचिन्नेशुर्महासुराः।
ब्रह्माणीमन्त्रपूतेन तोयेनान्ये निराकृताः॥38॥
हिंदी अर्थ:
कुछ महाअसुर कौमारी की शक्ति से विदीर्ण होकर नष्ट हो गए और कुछ ब्रह्माणी द्वारा मंत्र से पवित्र किए गए जल से निष्प्रभावी होकर नष्ट हो गए।
माहेश्वरीत्रिशूलेन भिन्नाः पेतुस्तथापरे।
वाराहीतुण्डघातेन केचिच्चूर्णीकृता भुवि॥39॥
हिंदी अर्थ:
कुछ असुर माहेश्वरी के त्रिशूल से विदीर्ण होकर गिर पड़े और कुछ वाराही के मुख के प्रहार से भूमि पर चूर्ण हो गए।
खण्डं खण्डं च चक्रेण वैष्णव्या दानवाः कृताः।
वज्रेण चैन्द्रीहस्ताग्रविमुक्तेन तथापरे॥40॥
हिंदी अर्थ:
वैष्णवी के चक्र ने अनेक दानवों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए और कुछ अन्य असुर ऐन्द्री के हाथ से छोड़े गए वज्र के प्रहार से नष्ट हो गए।
केचिद्विनेशुरसुराः केचिन्नष्टा महाहवात्।
भक्षिताश्चापरे कालीशिवदूतीमृगाधिपैः॥41॥
हिंदी अर्थ:
कुछ असुर वहीं नष्ट हो गए और कुछ उस महान युद्ध में मारे गए। अन्य असुरों को काली, शिवदूती और देवी के सिंह ने भक्षण कर लिया।
॥ ॐ ॥
इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये निशुम्भवधो नाम नवमोऽध्यायः ॥ 9 ॥
दुर्गा सप्तशती पाठ – नवाँ अध्याय हिंदी में
निशुम्भ वध
रक्तबीज के वध के बाद शुम्भ और निशुम्भ अत्यंत क्रोधित हो गए। अपनी विशाल सेना का विनाश देखकर निशुम्भ अनेक असुरों के साथ देवी चण्डिका पर आक्रमण करने दौड़ा। शुम्भ भी अपनी सेना लेकर युद्धभूमि में आ पहुँचा।
दोनों असुरों ने देवी पर बाणों की वर्षा कर दी, लेकिन माता ने अपने बाणों से उनके सभी बाणों को काट दिया। निशुम्भ ने तलवार और ढाल लेकर देवी के सिंह पर प्रहार किया। माता ने क्षुरप्र बाण से उसकी तलवार और ढाल दोनों काट दिए।
इसके बाद निशुम्भ ने शक्ति, शूल, गदा और फरसे से देवी पर आक्रमण किया, लेकिन माता ने एक-एक करके उसके सभी अस्त्रों को नष्ट कर दिया। अंत में वह देवी के प्रहार से घायल होकर भूमि पर गिर पड़ा।
अपने भाई की यह दशा देखकर शुम्भ क्रोध से भर उठा और रथ पर सवार होकर देवी की ओर बढ़ा। माता चण्डिका ने शंख बजाया, धनुष की टंकार की और घंटे का प्रचंड नाद किया। उनके सिंह ने भी भयंकर गर्जना की। काली और शिवदूती के प्रचंड नाद से असुर सेना भयभीत हो उठी।
शुम्भ ने ज्वालाओं से युक्त शक्ति देवी की ओर छोड़ी, जिसे माता ने अपनी शक्ति से नष्ट कर दिया। इसके बाद दोनों के बीच घोर युद्ध हुआ। शुम्भ और देवी ने एक-दूसरे के बाणों को काट दिया। माता ने त्रिशूल से प्रहार किया, जिससे शुम्भ मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। चेतना आने पर उसने फिर युद्ध किया और अनेक अस्त्रों से देवी पर आक्रमण किया, लेकिन माता ने उसके सभी अस्त्रों को नष्ट कर दिया।
उधर निशुम्भ फिर गदा और त्रिशूल लेकर देवी की ओर बढ़ा। माता ने उसकी गदा काट दी और उसके त्रिशूल का भी सामना किया। फिर देवी ने शूल से उसकी छाती पर प्रहार किया। उसकी छाती से उसी के समान दिखाई देने वाला एक और अत्यंत शक्तिशाली दैत्य बाहर निकला। वह देवी को चुनौती देने ही वाला था कि माता ने अपनी तलवार से उसका सिर काट दिया।
इसके बाद देवी ने निशुम्भ का भी संहार कर दिया। उसके गिरते ही सिंह, काली, शिवदूती और अन्य मातृशक्तियाँ असुरों का विनाश करने लगीं। कौमारी, ब्रह्माणी, माहेश्वरी, वाराही, वैष्णवी और ऐन्द्री की दिव्य शक्तियों ने भी अनेक महादैत्यों का संहार किया।
इस प्रकार माता भगवती की दिव्य शक्तियों ने युद्धभूमि में असुर सेना का नाश कर दिया। अनेक दैत्य मारे गए और अनेक भयभीत होकर भाग गए। माँ भगवती की शक्ति के सामने अधर्म, अहंकार और अत्याचार का अंत निश्चित है।
नवम अध्याय का महत्व
दुर्गा सप्तशती का नवम अध्याय देवी की उस शक्ति का वर्णन करता है, जो अधर्म और आसुरी शक्तियों के सामने कभी पीछे नहीं हटती। निशुम्भ बार-बार अलग-अलग अस्त्रों से देवी पर आक्रमण करता है, लेकिन देवी उसके प्रत्येक अस्त्र का सामना करती हैं और अंत में उसका वध कर देती हैं।
इस अध्याय में देवी के अनेक रूपों और मातृशक्तियों की सामूहिक शक्ति का भी प्रभावशाली वर्णन मिलता है। कौमारी, ब्रह्माणी, माहेश्वरी, वाराही, वैष्णवी और ऐन्द्री जैसी शक्तियाँ असुरों के विनाश में अपना योगदान देती हैं।
आध्यात्मिक दृष्टि से यह अध्याय इस भाव की ओर संकेत करता है कि अहंकार, आसुरी प्रवृत्ति और अधर्म चाहे कितने ही शक्तिशाली क्यों न दिखाई दें, अंततः देवी शक्ति और धर्म की विजय होती है।
दुर्गा सप्तशती नवम अध्याय का पाठ क्यों पढ़ें?
दुर्गा सप्तशती का पाठ श्रद्धा और भक्ति के साथ देवी भगवती के स्मरण का एक महत्वपूर्ण माध्यम माना जाता है। नवम अध्याय में निशुम्भ-वध का प्रसंग होने के कारण इसका पाठ देवी की शक्ति और विजय का स्मरण कराता है।
पाठ करते समय मन को शांत रखकर माँ भगवती का ध्यान करना और श्रद्धापूर्वक शुद्ध उच्चारण के साथ पाठ करना उचित माना जाता है। दुर्गा सप्तशती का पाठ परंपरागत रूप से देवी की आराधना और उपासना से जुड़ा हुआ है।
नवम अध्याय से मिलने वाला संदेश
निशुम्भ-वध का प्रसंग हमें यह संदेश देता है कि विपरीत परिस्थितियों में धैर्य और साहस नहीं छोड़ना चाहिए। आसुरी शक्तियाँ बार-बार अपना रूप और साधन बदल सकती हैं, लेकिन धर्म और सत्य की शक्ति अंततः उनका सामना करती है।
देवी का प्रत्येक अस्त्र-विनाश और अंततः निशुम्भ का वध इस बात का प्रतीक माना जा सकता है कि अहंकार और अधर्म का अंत निश्चित है। भक्त के लिए यह अध्याय माँ भगवती की शक्ति, निर्भयता और धर्म की विजय का स्मरण कराता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती के नवम अध्याय का नाम क्या है?
दुर्गा सप्तशती के नवम अध्याय का नाम निशुम्भ-वध है।
नवम अध्याय में किसका वध होता है?
इस अध्याय में देवी चण्डिका द्वारा असुरराज निशुम्भ के वध का वर्णन है। इसके साथ युद्ध में अनेक अन्य असुरों के संहार का भी वर्णन मिलता है।
दुर्गा सप्तशती के नवम अध्याय में कितने श्लोक हैं?
नवम अध्याय में 41 श्लोक हैं। इसके आरंभ में ध्यान और अंत में अध्याय का समापन-वाक्य आता है।
नवम अध्याय में किन मातृशक्तियों का वर्णन मिलता है?
इस अध्याय में कौमारी, ब्रह्माणी, माहेश्वरी, वाराही, वैष्णवी और ऐन्द्री आदि शक्तियों द्वारा असुरों के संहार का वर्णन मिलता है।
क्या नवम अध्याय का पाठ अकेले किया जा सकता है?
दुर्गा सप्तशती के पाठ की अलग-अलग परंपराएँ हैं। नवम अध्याय को देवी के चरित्र के एक स्वतंत्र अध्याय के रूप में पढ़ा जा सकता है, जबकि संपूर्ण सप्तशती पाठ अपनी निर्धारित विधि और परंपरा के अनुसार किया जाता है।
निष्कर्ष
दुर्गा सप्तशती का नवम अध्याय निशुम्भ-वध देवी भगवती की अद्भुत शक्ति और असुरों पर धर्म की विजय का प्रभावशाली वर्णन करता है। इसमें देवी चण्डिका और निशुम्भ के बीच हुए भयंकर युद्ध के साथ विभिन्न मातृशक्तियों के पराक्रम का भी वर्णन मिलता है।
श्रद्धा और भक्ति के साथ इस अध्याय का पाठ माँ भगवती के स्मरण का माध्यम बनता है। नवम अध्याय का संदेश है कि अहंकार, अधर्म और आसुरी प्रवृत्तियाँ कितनी भी शक्तिशाली क्यों न दिखाई दें, अंततः धर्म और देवी शक्ति की विजय होती है।
