दुर्गा सप्तशती का तृतीय अध्याय महिषासुरवध के नाम से प्रसिद्ध है। इस अध्याय में देवी भगवती और महिषासुर के बीच हुए भयंकर युद्ध का वर्णन मिलता है। देवी पहले महिषासुर के प्रमुख सेनापतियों और असुर योद्धाओं का संहार करती हैं और अंत में महिषासुर के विभिन्न रूपों का नाश करके उसका वध करती हैं।
इस अध्याय में देवी की शक्ति, पराक्रम और अधर्म पर धर्म की विजय का अत्यंत प्रभावशाली वर्णन किया गया है। यहाँ देवी को अम्बिका, चण्डिका, जगन्माता और परमेश्वरी के रूप में स्मरण किया गया है।
श्रीदुर्गासप्तशती — तृतीयोऽध्यायः
सेनापतियोंसहित महिषासुर का वध
॥ ध्यानम् ॥
ॐ उद्यद्भानुसहस्रकान्तिमरुणक्षौमां शिरोमालिकां
रक्तालिप्तपयोधरां जपवटीं विद्यामभीतिं वरम्।
हस्ताब्जैर्दधतीं त्रिनेत्रविलसद्वक्त्रारविन्दश्रियं
देवीं बद्धहिमांशुरत्नमुकुटां वन्देऽरविन्दस्थिताम्॥
ध्यान का सरल अर्थ:
मैं उन देवी को प्रणाम करता हूँ, जिनकी आभा उदय होते हुए हजारों सूर्यों के समान तेजस्वी है। उन्होंने लाल वस्त्र धारण किए हैं और उनके गले में मुण्डों की माला सुशोभित है। उनके शरीर पर रक्त का लेप है। वे अपने कमल के समान हाथों में जपमाला और विद्या धारण करती हैं तथा भक्तों को अभय और वर प्रदान करती हैं। उनके तीन नेत्र हैं और उनका मुख खिले हुए कमल के समान सुंदर है। उनके मस्तक पर चन्द्रमा और रत्नों से सुशोभित मुकुट है। वे कमल पर विराजमान हैं। ऐसी देवी को मैं श्रद्धापूर्वक नमन करता हूँ।
ऋषिरुवाच॥१॥
निहन्यमानं तत्सैन्यमवलोक्य महासुरः।
सेनानीश्चिक्षुरः कोपाद्ययौ योद्धुमथाम्बिकाम्॥२॥
अर्थ:
ऋषि कहते हैं—जब महिषासुर ने अपनी सेना को देवी के हाथों नष्ट होते देखा, तब उसका सेनापति चिक्षुर क्रोध से भर गया और देवी अम्बिका से युद्ध करने के लिए आगे बढ़ा।
स देवीं शरवर्षेण ववर्ष समरेऽसुरः।
यथा मेरुगिरेः शृङ्गं तोयवर्षेण तोयदः॥३॥
अर्थ:
उस असुर ने युद्धभूमि में देवी पर बाणों की वर्षा कर दी। उसकी बाण-वर्षा ऐसी लग रही थी, जैसे कोई बादल मेरु पर्वत के शिखर पर जल बरसा रहा हो।
तस्य च्छित्त्वा ततो देवी लीलयैव शरोत्करान्।
जघान तुरगान् बाणैर्यन्तारं चैव वाजिनाम्॥४॥
अर्थ:
देवी ने उसके बाणों के समूह को सहज ही काट दिया। इसके बाद उन्होंने अपने बाणों से उसके घोड़ों और घोड़ों को नियंत्रित करने वाले सारथी को भी मार गिराया।
चिच्छेद च धनुः सद्यो ध्वजं चातिसमुच्छ्रितम्।
विव्याध चैव गात्रेषु छिन्नधन्वानमाशुगैः॥५॥
अर्थ:
देवी ने तुरंत उसका धनुष और बहुत ऊँचा ध्वज भी काट दिया। धनुष टूट जाने के बाद उन्होंने तेज गति से चलने वाले बाणों से उसके शरीर को घायल कर दिया।
सच्छिन्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथिः।
अभ्यधावत तां देवीं खड्गचर्मधरोऽसुरः॥६॥
अर्थ:
धनुष कट जाने, रथ टूट जाने, घोड़े मारे जाने और सारथी के मारे जाने के बाद भी वह असुर पीछे नहीं हटा। उसने तलवार और ढाल हाथ में लेकर देवी पर आक्रमण कर दिया।
सिंहमाहत्य खड्गेन तीक्ष्णधारेण मूर्धनि।
आजघान भुजे सव्ये देवीमप्यतिवेगवान्॥७॥
अर्थ:
उसने अत्यंत तेज धार वाली तलवार से देवी के सिंह के सिर पर प्रहार किया और फिर बहुत तेजी से देवी की बाईं भुजा पर भी वार किया।
तस्याः खड्गो भुजं प्राप्य पफाल नृपनन्दन।
ततो जग्राह शूलं स कोपादरुणलोचनः॥८॥
अर्थ:
हे राजन्! देवी की भुजा पर पहुँचते ही उस असुर की तलवार टूट गई। तब क्रोध से उसकी आँखें लाल हो गईं और उसने हाथ में शूल उठा लिया।
चिक्षेप च ततस्तत्तु भद्रकाल्यां महासुरः।
जाज्वल्यमानं तेजोभी रविबिम्बमिवाम्बरात्॥९॥
अर्थ:
उस महादैत्य ने वह चमकता हुआ शूल देवी भद्रकाली की ओर फेंका। वह शूल आकाश में दिखाई देने वाले सूर्य के समान अत्यंत तेजस्वी दिखाई दे रहा था।
दृष्ट्वा तदापतच्छूलं देवी शूलममुञ्चत।
तच्छूलं शतधा तेन नीतं स च महासुरः॥१०॥
अर्थ:
अपनी ओर आते हुए उस शूल को देखकर देवी ने भी अपना शूल चलाया। देवी के शूल के प्रहार से वह शूल सौ टुकड़ों में बिखर गया और वह महापराक्रमी असुर भी मारा गया।
हते तस्मिन्महावीर्ये महिषस्य चमूपतौ।
आजगाम गजारूढश्चामरस्त्रिदशार्दनः॥११॥
अर्थ:
महिषासुर के उस अत्यंत शक्तिशाली सेनापति के मारे जाने के बाद देवताओं को पीड़ा देने वाला चामर नामक असुर हाथी पर सवार होकर युद्धभूमि में आ पहुँचा।
सोऽपि शक्तिं मुमोचाथ देव्यास्तामम्बिका द्रुतम्।
हुंकाराभिहतां भूमौ पातयामास निष्प्रभाम्॥१२॥
अर्थ:
चामर ने भी देवी की ओर शक्ति नामक अस्त्र चलाया। देवी अम्बिका ने हुंकार मात्र से उस अस्त्र को निष्प्रभावी करके भूमि पर गिरा दिया।
भग्नां शक्तिं निपतितां दृष्ट्वा क्रोधसमन्वितः।
चिक्षेप चामरः शूलं बाणैस्तदपि साच्छिनत्॥१३॥
अर्थ:
अपनी शक्ति को टूटकर भूमि पर गिरा हुआ देखकर चामर क्रोध से भर गया और उसने देवी पर शूल चलाया। देवी ने अपने बाणों से उस शूल को भी काट डाला।
ततः सिंहः समुत्पत्य गजकुम्भान्तरे स्थितः।
बाहुयुद्धेन युयुधे तेनोच्चैस्त्रिदशारिणा॥१४॥
अर्थ:
इसके बाद देवी का सिंह उछलकर हाथी के मस्तक के बीच जा पहुँचा और देवताओं के उस शत्रु चामर के साथ भुजाओं से भयंकर युद्ध करने लगा।
युद्ध्यमानौ ततस्तौ तु तस्मान्नागान्महीं गतौ।
युयुधातेऽतिसंरब्धौ प्रहारैरतिदारुणैः॥१५॥
अर्थ:
युद्ध करते-करते वे दोनों हाथी से नीचे भूमि पर गिर पड़े। वहाँ भी वे अत्यंत क्रोध में एक-दूसरे पर भयंकर प्रहार करते हुए लड़ते रहे।
ततो वेगात् खमुत्पत्य निपत्य च मृगारिणा।
करप्रहारेण शिरश्चामरस्य पृथक्कृतम्॥१६॥
अर्थ:
तब देवी का सिंह तेजी से आकाश में उछला और फिर नीचे आकर उसने अपने पंजे के प्रहार से चामर का सिर धड़ से अलग कर दिया।
उदग्रश्च रणे देव्या शिलावृक्षादिभिर्हतः।
दन्तमुष्टितलैश्चैव करालश्च निपातितः॥१७॥
अर्थ:
युद्धभूमि में देवी ने उदग्र नामक असुर को पत्थरों, वृक्षों आदि से मार डाला। कराल नामक असुर का भी दाँतों, मुक्कों और हथेली के प्रहारों से संहार कर दिया।
देवी क्रुद्धा गदापातैश्चूर्णयामास चोद्धतम्।
बाष्कलं भिन्दिपालेन बाणैस्ताम्रं तथान्धकम्॥१८॥
अर्थ:
क्रोधित देवी ने उद्धत नामक असुर को गदा के प्रहारों से चूर कर दिया। बाष्कल को भिन्दिपाल नामक अस्त्र से तथा ताम्र और अन्धक को बाणों से मार डाला।
उग्रास्यमुग्रवीर्यं च तथैव च महाहनुम्।
त्रिनेत्रा च त्रिशूलेन जघान परमेश्वरी॥१९॥
अर्थ:
त्रिनेत्रधारी परमेश्वरी देवी ने उग्रास्य, उग्रवीर्य और महाहनु नामक असुरों को अपने त्रिशूल से मार डाला।
बिडालस्यासिना कायात् पातयामास वै शिरः।
दुर्धरं दुर्मुखं चोभौ शरैर्निन्ये यमक्षयम्॥२०॥
अर्थ:
देवी ने तलवार से बिडालासुर का सिर उसके शरीर से अलग कर दिया। दुर्धर और दुर्मुख दोनों को अपने बाणों से यमलोक पहुँचा दिया।
एवं सङ्क्षीयमाणे तु स्वसैन्ये महिषासुरः।
माहिषेण स्वरूपेण त्रासयामास तान् गणान्॥२१॥
अर्थ:
इस प्रकार अपनी सेना को लगातार नष्ट होते देखकर महिषासुर ने स्वयं भैंसे का रूप धारण कर देवी के गणों को भयभीत करना शुरू कर दिया।
कांश्चित्तुण्डप्रहारेण खुरक्षेपैस्तथापरान्।
लाङ्गूलताडितांश्चान्याञ्छृङ्गाभ्यां च विदारितान्॥२२॥
अर्थ:
महिषासुर ने कुछ गणों को अपने मुँह के प्रहार से, कुछ को खुरों से, कुछ को पूँछ की चोट से और अन्य को अपने सींगों से घायल कर दिया।
वेगेन कांश्चिदपरान्नादेन भ्रमणेन च।
निःश्वासपवनेनान्यान् पातयामास भूतले॥२३॥
अर्थ:
उसने कुछ अन्य योद्धाओं को अपनी तेज गति और घूमने से गिरा दिया तथा कुछ को अपनी साँसों से निकलने वाली प्रचंड वायु के वेग से भूमि पर पटक दिया।
निपात्य प्रमथानीकमभ्यधावत सोऽसुरः।
सिंहं हन्तुं महादेव्याः कोपं चक्रे ततोऽम्बिका॥२४॥
अर्थ:
देवी के गणों को गिराकर वह असुर उनके सिंह को मारने के लिए दौड़ा। यह देखकर अम्बिका को अत्यंत क्रोध आया।
सोऽपि कोपान्महावीर्यः खुरक्षुण्णमहीतलः।
शृङ्गाभ्यां पर्वतानुच्चांश्चिक्षेप च ननाद च॥२५॥
अर्थ:
वह अत्यंत शक्तिशाली महिषासुर भी क्रोध से भर गया। उसके खुरों से धरती का तल उखड़ने लगा। उसने अपने सींगों से ऊँचे-ऊँचे पर्वतों को उछाल दिया और जोर-जोर से गर्जना करने लगा।
वेगभ्रमणविक्षुण्णा मही तस्य व्यशीर्यत।
लाङ्गूलेनाहतश्चाब्धिः प्लावयामास सर्वतः॥२६॥
अर्थ:
उसके तेज गति से घूमने के कारण धरती हिलने लगी और चारों ओर से विचलित हो उठी। उसकी पूँछ की चोट से समुद्र का जल भी उछलकर चारों दिशाओं में फैलने लगा।
धुतशृङ्गविभिन्नाश्च खण्डं खण्डं ययुर्घनाः।
श्वासानिलास्ताः शतशो निपेतुर्नभसोऽचलाः॥२७॥
अर्थ:
उसके हिलते हुए सींगों के आघात से बादल टुकड़े-टुकड़े होकर बिखरने लगे और उसकी साँसों से उत्पन्न प्रचंड वायु के कारण सैकड़ों पर्वत आकाश से गिरने लगे।
इति क्रोधसमाध्मातमापतन्तं महासुरम्।
दृष्ट्वा सा चण्डिका कोपं तद्वधाय तदाकरोत्॥२८॥
अर्थ:
इस प्रकार क्रोध से उन्मत्त होकर अपनी ओर दौड़ते हुए उस महादैत्य को देखकर चण्डिका ने उसके वध का निश्चय किया और स्वयं भी क्रोधित हो उठीं।
सा क्षिप्त्वा तस्य वै पाशं तं बबन्ध महासुरम्।
तत्याज माहिषं रूपं सोऽपि बद्धो महामृधे॥२९॥
अर्थ:
देवी ने उस महिषासुर पर पाश फेंककर उसे बाँध लिया। बँध जाने पर उस असुर ने भैंसे का रूप छोड़ दिया।
ततः सिंहोऽभवत्सद्यो यावत्तस्याम्बिका शिरः।
छिनत्ति तावत्पुरुषः खड्गपाणिरदृश्यत॥३०॥
अर्थ:
इसके बाद वह तुरंत सिंह का रूप धारण कर बैठा। देवी उसका सिर काटने ही वाली थीं कि उसके भीतर से तलवार हाथ में लिए एक पुरुष का रूप दिखाई देने लगा।
तत एवाशु पुरुषं देवी चिच्छेद सायकैः।
तं खड्गचर्मणा सार्धं ततः सोऽभून्महागजः॥३१॥
अर्थ:
देवी ने तुरंत उस पुरुष रूप को अपने बाणों से काट डाला। इसके बाद वह तलवार और ढाल सहित एक विशाल हाथी का रूप धारण कर बैठा।
करेण च महासिंहं तं चकर्ष जगर्ज च।
कर्षतस्तु करं देवी खड्गेन निरकृन्तत॥३२॥
अर्थ:
उस महागज ने अपनी सूँड़ से देवी के महान सिंह को पकड़कर खींचा और जोर से गर्जना की। जब वह सिंह को खींच रहा था, तब देवी ने तलवार से उसकी सूँड़ काट दी।
ततो महासुरो भूयो माहिषं वपुरास्थितः।
तथैव क्षोभयामास त्रैलोक्यं सचराचरम्॥३३॥
अर्थ:
इसके बाद वह महादैत्य फिर से भैंसे का रूप धारण कर बैठा और चर-अचर सहित तीनों लोकों में भय और अशांति उत्पन्न करने लगा।
ततः क्रुद्धा जगन्माता चण्डिका पानमुत्तमम्।
पपौ पुनः पुनश्चैव जहासारुणलोचना॥३४॥
अर्थ:
तब जगन्माता चण्डिका क्रोधित होकर उत्तम मधु का पान करने लगीं। उनकी आँखें लाल हो गईं और वे बार-बार हँसने लगीं।
ननर्द चासुरः सोऽपि बलवीर्यमदोद्धतः।
विषाणाभ्यां च चिक्षेप चण्डिकां प्रति भूधरान्॥३५॥
अर्थ:
अपनी शक्ति और पराक्रम के अहंकार में डूबा हुआ वह असुर भी जोर-जोर से गर्जने लगा और अपने सींगों से बड़े-बड़े पर्वत उखाड़कर चण्डिका की ओर फेंकने लगा।
सा च तान् प्रहितांस्तेन चूर्णयन्ती शरोत्करैः।
उवाच तं मदोद्धूतमुखरागाकुलाक्षरम्॥३६॥
अर्थ:
देवी ने उसके द्वारा फेंके गए उन पर्वतों को अपने बाणों के समूह से चूर-चूर कर दिया। इसके बाद उन्होंने मदिरा के प्रभाव से लाल हुए मुख से उस असुर से कहा।
देव्युवाच॥३७॥
गर्ज गर्ज क्षणं मूढ मधु यावत्पिबाम्यहम्।
मया त्वयि हतेऽत्रैव गर्जिष्यन्त्याशु देवताः॥३८॥
अर्थ:
देवी बोलीं—हे मूर्ख! जब तक मैं यह मधु पी रही हूँ, तब तक कुछ क्षण और गरज ले। जब मैं इसी स्थान पर तुम्हारा वध कर दूँगी, तब शीघ्र ही देवता विजय की गर्जना करेंगे।
ऋषिरुवाच॥३९॥
एवमुक्त्वा समुत्पत्य साऽऽरूढा तं महासुरम्।
पादेनाक्रम्य कण्ठे च शूलेनैनमताडयत्॥४०॥
अर्थ:
ऋषि कहते हैं—ऐसा कहकर देवी उछलकर उस महादैत्य के ऊपर चढ़ गईं। उन्होंने अपने पैर से उसकी गर्दन दबा दी और त्रिशूल से उस पर प्रहार किया।
ततः सोऽपि पदाऽऽक्रान्तस्तया निजमुखात्ततः।
अर्धनिष्क्रान्त एवासीद्देव्या वीर्येण संवृतः॥४१॥
अर्थ:
देवी के पैर से दबाए जाने पर महिषासुर अपने भैंसे के मुख से अपना वास्तविक रूप लेकर बाहर निकलने लगा। वह आधा ही बाहर निकल पाया था कि देवी की शक्ति ने उसे वहीं रोक दिया।
अर्धनिष्क्रान्त एवासौ युध्यमानो महासुरः।
तया महासिना देव्या शिरश्छित्त्वा निपातितः॥४२॥
अर्थ:
वह महादैत्य आधा बाहर निकला हुआ ही देवी से युद्ध करने लगा। उसी अवस्था में देवी ने अपनी बड़ी तलवार से उसका सिर काटकर उसे भूमि पर गिरा दिया।
ततो हाहाकृतं सर्वं दैत्यसैन्यं ननाश तत्।
प्रहर्षं च परं जग्मुः सकला देवतागणाः॥४३॥
अर्थ:
महिषासुर के मारे जाते ही पूरी दैत्य सेना में हाहाकार मच गया और उसका विनाश हो गया। दूसरी ओर सभी देवता अत्यंत प्रसन्न हो उठे।
तुष्टुवुस्तां सुरा देवीं सह दिव्यैर्महर्षिभिः।
जगुर्गन्धर्वपतयो ननृतुश्चाप्सरोगणाः॥४४॥
अर्थ:
देवताओं ने दिव्य महर्षियों के साथ मिलकर देवी की स्तुति की। गन्धर्वराज मधुर गीत गाने लगे और अप्सराओं के समूह आनंद से नृत्य करने लगे।
॥ इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये महिषासुरवधो नाम तृतीयोऽध्यायः ॥
तृतीय अध्याय का सार
दुर्गा सप्तशती के तृतीय अध्याय में देवी भगवती के द्वारा महिषासुर और उसके प्रमुख सेनापतियों के वध का वर्णन मिलता है। महिषासुर की सेना के अनेक शक्तिशाली योद्धा देवी से युद्ध करते हैं, लेकिन देवी एक-एक करके उनका संहार करती हैं।
जब महिषासुर स्वयं युद्ध में उतरता है, तो वह भैंसे का रूप धारण करके देवी के गणों में भय उत्पन्न करता है। देवी उसे पाश से बाँधती हैं। इसके बाद वह बार-बार अपने रूप बदलता है। कभी सिंह, कभी तलवारधारी पुरुष और कभी विशाल हाथी का रूप धारण करता है, लेकिन देवी उसके प्रत्येक रूप को नष्ट कर देती हैं।
अंत में महिषासुर फिर से भैंसे का रूप धारण करता है। देवी उसके ऊपर चढ़कर उसकी गर्दन दबाती हैं और जब वह अपना वास्तविक रूप लेकर बाहर निकलने का प्रयास करता है, उसी समय देवी अपनी तलवार से उसका सिर काट देती हैं। महिषासुर के वध के साथ देवताओं को विजय प्राप्त होती है और वे देवी की स्तुति करते हैं।
दुर्गा सप्तशती तृतीय अध्याय: महिषासुरवध हिंदी में
दुर्गा सप्तशती के तृतीय अध्याय में देवी भगवती और महिषासुर के बीच हुए भयंकर युद्ध तथा महिषासुर के वध का वर्णन मिलता है। इसी कारण इस अध्याय को महिषासुरवध कहा जाता है। पिछले अध्याय में देवी के प्रकट होने और देवताओं द्वारा उनकी स्तुति करने के बाद महिषासुर और उसकी विशाल सेना देवी से युद्ध करने के लिए आगे बढ़ती है।
महिषासुर को अपनी शक्ति और अपनी सेना पर बहुत घमंड था। उसके अनेक पराक्रमी सेनापति और योद्धा युद्धभूमि में देवी का सामना करने के लिए भेजे गए। देवी भगवती सिंह पर विराजमान होकर युद्ध कर रही थीं। उनके हाथों में विभिन्न देवताओं से प्राप्त दिव्य अस्त्र-शस्त्र थे।
देवी और चिक्षुर का युद्ध
महिषासुर की सेना के नष्ट होते हुए सैनिकों को देखकर उसका सेनापति चिक्षुर अत्यंत क्रोधित हो गया। वह देवी को रोकने के लिए युद्धभूमि में पहुँचा। उसने देवी पर लगातार बाणों की वर्षा शुरू कर दी।
देवी ने उसके बाणों का सामना करते हुए बड़ी सहजता से उन्हें काट दिया। इसके बाद उन्होंने चिक्षुर के घोड़ों को अपने बाणों से घायल कर दिया और उसके सारथी को भी मार गिराया। देवी ने उसका धनुष और ऊँचा ध्वज भी काट डाला।
धनुष टूट जाने और रथ नष्ट हो जाने के बाद चिक्षुर तलवार और ढाल लेकर देवी की ओर दौड़ा। उसने देवी के सिंह पर प्रहार किया और फिर देवी पर भी आक्रमण किया। देवी ने उसके आक्रमण का उत्तर देते हुए उसके हाथ को काट दिया। इसके बाद क्रोध से भरे चिक्षुर ने देवी पर अपना त्रिशूल फेंका, लेकिन देवी ने उसे भी अपने अस्त्र से नष्ट कर दिया।
अंत में देवी के प्रहार से चिक्षुर युद्धभूमि में मारा गया।
चामर का वध
चिक्षुर के मारे जाने के बाद महिषासुर का एक अन्य शक्तिशाली सेनापति चामर हाथी पर सवार होकर युद्धभूमि में आया। उसने देवी पर अपना अस्त्र चलाया।
देवी ने उसके अस्त्र को निष्फल कर दिया। चामर ने फिर देवी पर त्रिशूल से प्रहार करने का प्रयास किया, लेकिन देवी ने उसके त्रिशूल को भी बाणों से काट दिया।
इसके बाद देवी का सिंह चामर के हाथी पर जा पहुँचा। सिंह और चामर के बीच भयंकर युद्ध हुआ। दोनों युद्ध करते हुए हाथी से नीचे गिर पड़े। कुछ समय तक धरती पर भी उनका संघर्ष चलता रहा। अंत में देवी के सिंह ने चामर का सिर काटकर उसका वध कर दिया।
अन्य असुर सेनापतियों का अंत
इसके बाद महिषासुर की सेना के अनेक प्रमुख योद्धा देवी के सामने आए। उदग्र नामक असुर को देवी ने पत्थरों, वृक्षों और अपने अन्य अस्त्रों से मार गिराया। कराल का भी अंत हुआ।
देवी ने बाष्कल को भिन्दिपाल नामक अस्त्र से और ताम्र तथा अन्धक जैसे असुरों को अपने बाणों से पराजित किया। उग्रास्य, उग्रवीर्य और महाहनु जैसे शक्तिशाली दैत्यों का भी देवी ने संहार कर दिया।
बिडाल नामक असुर का सिर देवी ने तलवार से काट दिया। दुर्धर और दुर्मुख भी देवी के बाणों से मारे गए।
इस प्रकार महिषासुर की विशाल सेना धीरे-धीरे समाप्त होने लगी। उसके बड़े-बड़े योद्धा देवी के सामने टिक नहीं पा रहे थे।
महिषासुर का भैंसे का रूप
जब महिषासुर ने देखा कि उसके प्रमुख सेनापति और सैनिक लगातार मारे जा रहे हैं, तब वह स्वयं युद्धभूमि में उतरा। उसने एक विशाल भैंसे का रूप धारण कर लिया।
महिषासुर ने अपने सींगों, खुरों और पूँछ से देवी की सेना में भारी तबाही मचानी शुरू कर दी। वह कभी अपने सींगों से सैनिकों को दूर फेंक देता, कभी खुरों से उन्हें कुचल देता और कभी अपनी पूँछ के प्रहार से उन्हें गिरा देता।
उसकी गर्जना से युद्धभूमि गूँज उठी। उसके वेग से धरती काँपने लगी। वह पर्वतों के बड़े-बड़े टुकड़ों को अपने सींगों से उखाड़कर देवी की ओर फेंकने लगा। उसके घूमने से धरती पर धूल और पत्थरों का बवंडर उठने लगा।
महिषासुर की साँसों से निकलने वाली तेज हवा भी इतनी शक्तिशाली थी कि उससे अनेक सैनिक धरती पर गिर जाते थे। समुद्र का जल तक उसके प्रचंड वेग से प्रभावित होने लगा।
देवी ने महिषासुर को चुनौती दी
महिषासुर का यह भयंकर रूप देखकर देवी चण्डिका ने उसके वध का निश्चय किया। उन्होंने महिषासुर पर अपना पाश फेंककर उसे बाँध लिया।
देवी के पाश में बँधते ही महिषासुर ने अपना भैंसे का रूप छोड़ दिया। लेकिन वह एक ही रूप में नहीं रहा। वह लगातार अलग-अलग रूप धारण करके देवी से युद्ध करता रहा।
सबसे पहले वह मनुष्य के रूप में दिखाई दिया। उसके हाथ में तलवार और ढाल थी। देवी ने बाण चलाकर उस रूप को भी नष्ट कर दिया।
इसके बाद उसने हाथी का रूप धारण कर लिया। विशाल हाथी बनकर उसने देवी के सिंह को अपनी सूँड़ से पकड़ लिया और उसे अपनी ओर खींचने लगा। देवी ने तुरंत तलवार से उसकी सूँड़ काट दी।
महिषासुर फिर भैंसे के रूप में आया
हाथी का रूप नष्ट होने के बाद महिषासुर फिर से भैंसे का रूप धारण कर बैठा। इस बार वह पहले से भी अधिक क्रोधित था। वह अपनी शक्ति के बल पर पूरे संसार को भयभीत करने लगा।
देवी ने उसके इस प्रचंड रूप को देखकर मधु का पान किया और फिर उसकी ओर देखकर हँसीं। देवी का यह रूप उनके आत्मविश्वास और असुर पर निश्चित विजय का संकेत था।
महिषासुर ने क्रोध में देवी पर पर्वतों के टुकड़े फेंकने शुरू कर दिए। देवी ने अपने बाणों से उन सभी को चूर-चूर कर दिया।
तब देवी ने महिषासुर से कहा कि थोड़ी देर तक वह अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर ले, क्योंकि शीघ्र ही उसके मारे जाने के बाद देवता उसकी विजय का उत्सव मनाएँगे।
महिषासुर का अंतिम युद्ध
देवी के वचन सुनकर महिषासुर और भी अधिक क्रोधित हो गया। उसने पूरी शक्ति लगाकर देवी पर आक्रमण किया।
देवी ने अवसर देखकर महिषासुर को अपने पैरों से दबा दिया। इसके बाद उन्होंने अपने त्रिशूल से उस पर प्रहार किया।
देवी के प्रहार से महिषासुर का भैंसे का रूप कमजोर पड़ने लगा। वह अपने वास्तविक रूप से बाहर निकलने का प्रयास करने लगा। उसके शरीर का कुछ भाग भैंसे के रूप में था और वह कुछ भाग मनुष्य के रूप में बाहर निकाल चुका था।
इसी समय देवी ने अपने महान अस्त्र से उसके सिर को काट दिया।
महिषासुर का वध होते ही उसकी सेना में भगदड़ मच गई। जो दैत्य बचे थे, वे युद्धभूमि छोड़कर भागने लगे। देवताओं और ऋषियों के मन में अत्यंत प्रसन्नता हुई।
देवताओं ने देवी की स्तुति की
महिषासुर के मारे जाने के बाद देवताओं ने देवी भगवती की स्तुति की। उनके लिए यह केवल एक असुर की हार नहीं थी, बल्कि अधर्म और अत्याचार पर धर्म तथा शक्ति की विजय थी।
देवताओं और महर्षियों ने देवी की महिमा का गुणगान किया। गन्धर्वों ने मधुर गीत गाए और अप्सराओं ने आनंद से नृत्य किया।
इस प्रकार देवी भगवती ने महिषासुर और उसकी विशाल सेना का संहार करके तीनों लोकों को उसके अत्याचार से मुक्त किया।
निष्कर्ष
दुर्गा सप्तशती का तृतीय अध्याय महिषासुरवध देवी शक्ति की विजय का अत्यंत महत्वपूर्ण प्रसंग है। इसमें महिषासुर के अहंकार, अत्याचार और शक्ति के सामने देवी के अदम्य पराक्रम का वर्णन मिलता है।
यह अध्याय भक्तों को यह संदेश देता है कि अधर्म और अहंकार चाहे कितने भी शक्तिशाली दिखाई दें, अंततः धर्म और दिव्य शक्ति की विजय होती है। देवी भगवती संसार की रक्षा के लिए अधर्म का नाश करती हैं और देवताओं को भय से मुक्त करती हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती के तृतीय अध्याय का नाम क्या है?
दुर्गा सप्तशती के तृतीय अध्याय का नाम महिषासुरवध है। इसमें देवी भगवती द्वारा महिषासुर के वध का वर्णन किया गया है।
दुर्गा सप्तशती के तीसरे अध्याय में किसका वध होता है?
इस अध्याय में देवी चण्डिका महिषासुर का वध करती हैं। इससे पहले देवी उसके अनेक सेनापतियों और असुर योद्धाओं का भी संहार करती हैं।
महिषासुर ने देवी से किस रूप में युद्ध किया था?
महिषासुर ने मुख्य रूप से भैंसे का रूप धारण करके देवी से युद्ध किया। युद्ध के दौरान उसने सिंह, पुरुष और विशाल हाथी सहित कई रूप धारण किए।
महिषासुर का वध किस देवी ने किया?
महिषासुर का वध देवी चण्डिका ने किया। इस प्रसंग में देवी को अम्बिका, जगन्माता और परमेश्वरी आदि नामों से भी संबोधित किया गया है।
दुर्गा सप्तशती के तीसरे अध्याय का मुख्य संदेश क्या है?
इस अध्याय का मुख्य संदेश अधर्म और अहंकार पर धर्म तथा दिव्य शक्ति की विजय है। महिषासुर के वध के माध्यम से देवी की शक्ति और धर्म की रक्षा का वर्णन किया गया है।
अध्याय का समापन
॥ इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये महिषासुरवधो नाम तृतीयोऽध्यायः ॥३॥
