Durga Saptashati Path Vidhi: नवरात्रि और देवी उपासना के अवसर पर माँ भगवती के भक्त श्रद्धा के साथ श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं। इसे देवी माहात्म्य और चंडी पाठ के नाम से भी जाना जाता है। दुर्गा सप्तशती में कुल 13 अध्याय हैं, जिनमें माँ भगवती के विभिन्न स्वरूपों, देवी की महिमा तथा देवी और असुर शक्तियों के बीच हुए युद्धों का वर्णन मिलता है।
दुर्गा सप्तशती का पाठ श्रद्धा और अपनी पारिवारिक या गुरु-परंपरा के अनुसार करना चाहिए। विशेष अनुष्ठान में पाठ की विधि सामान्य गृह-पाठ से अधिक विस्तृत हो सकती है। अलग-अलग परंपराओं में संकल्प, न्यास, शापोद्धार, उत्कीलन, रहस्यत्रय और अन्य पाठों के क्रम में अंतर भी मिलता है।
इसलिए यदि कोई साधक सामान्य रूप से माँ दुर्गा की आराधना के लिए सप्तशती का पाठ कर रहा है, तो उसे अपनी सामर्थ्य और परंपरा के अनुसार पाठ करना चाहिए। वहीं विशेष अनुष्ठान या मंत्र-साधना के लिए गुरु अथवा योग्य आचार्य द्वारा बताई गई विधि को प्राथमिकता देना उचित है।
श्री दुर्गा सप्तशती पाठ की तैयारी
दुर्गा सप्तशती का पाठ शुरू करने से पहले साधक को अपने शरीर, वस्त्र और पूजा के स्थान की स्वच्छता का ध्यान रखना चाहिए। जिस स्थान पर पाठ किया जाए, वह शांत और साफ होना चाहिए।
पाठ के लिए माँ दुर्गा की प्रतिमा या चित्र के सामने स्वच्छ आसन बिछाकर बैठें। यदि सप्तशती की पुस्तक से पाठ किया जा रहा है, तो पुस्तक को भी स्वच्छ स्थान पर सम्मानपूर्वक रखें।
पूजा में अपनी सुविधा के अनुसार दीपक, धूप, पुष्प, अक्षत, जल, नैवेद्य आदि रखे जा सकते हैं।
दुर्गा सप्तशती पाठ की सामान्य विधि
दुर्गा सप्तशती के विस्तृत पाठ की परंपरागत विधि में कई चरण बताए जाते हैं। सामान्य रूप से साधक निम्न प्रकार से तैयारी कर सकता है—
- सबसे पहले स्नान करके स्वच्छ हो जाएँ।
- स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- पूजा के स्थान को साफ करें।
- शुद्ध आसन पर बैठें।
- ललाट पर अपनी परंपरा के अनुसार भस्म, चंदन या रोली लगा सकते हैं।
- गणेश जी, गुरु और इष्टदेव का स्मरण करें।
- प्राणायाम और आचमन आदि अपनी परंपरा के अनुसार करें।
- हाथ में पुष्प, अक्षत और जल लेकर संकल्प करें।
- माँ भगवती का ध्यान करें।
- दुर्गा सप्तशती की पुस्तक को सम्मानपूर्वक स्थापित करके उसकी पूजा करें।
- अपनी परंपरा के अनुसार कवच, अर्गला, कीलक आदि पाठ करें।
- इसके बाद सप्तशती के 13 अध्यायों का पाठ करें।
- पाठ के बाद देवी सूक्त, रहस्यत्रय, क्षमा-प्रार्थना और अन्य संबंधित पाठ अपनी परंपरा के अनुसार किए जा सकते हैं।
दुर्गा सप्तशती का अर्थ
‘दुर्गा’ नाम माँ भगवती के उस स्वरूप को दर्शाता है जो अपने भक्तों की कठिनाइयों और बाधाओं से रक्षा करती हैं। ‘सप्तशती’ शब्द का सामान्य अर्थ सात सौ से संबंधित है। दुर्गा सप्तशती को इस नाम से इसलिए जाना जाता है क्योंकि इसके मूल पाठ में लगभग सात सौ श्लोकों की परंपरा प्रसिद्ध है।
देवी माहात्म्य के रूप में यह पाठ माँ भगवती की महिमा, उनके विभिन्न स्वरूपों और देवी की शक्ति का वर्णन करता है।
दुर्गा सप्तशती में तीन चरित
दुर्गा सप्तशती के 13 अध्यायों को परंपरागत रूप से तीन चरितों में विभाजित किया जाता है।
प्रथम चरित में प्रथम अध्याय आता है।
मध्यम चरित में द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ अध्याय आते हैं।
उत्तम चरित में पंचम से तेरहवें अध्याय तक का वर्णन आता है।
इन अध्यायों में देवी की विभिन्न लीलाओं और असुर शक्तियों के विनाश की कथाएँ क्रमशः आगे बढ़ती हैं।
दुर्गा सप्तशती के 13 अध्यायों का सही क्रम
श्री दुर्गा सप्तशती के 13 अध्यायों का क्रम इस प्रकार है—
प्रथम अध्याय — मधुकैटभ वध
पहले अध्याय में राजा सुरथ और समाधि की कथा की भूमिका तथा महामाया के प्रभाव का वर्णन आता है। भगवान विष्णु की योगनिद्रा और मधु-कैटभ से संबंधित प्रसंग इस अध्याय का मुख्य विषय है।
द्वितीय अध्याय — महिषासुर सैन्य वध
दूसरे अध्याय में देवताओं और महिषासुर की शक्तियों के बीच संघर्ष का वर्णन मिलता है। देवी के प्राकट्य और महिषासुर की विशाल सेना के साथ हुए युद्ध का विस्तार से वर्णन किया गया है।
तृतीय अध्याय — महिषासुर वध
तीसरे अध्याय में देवी और महिषासुर के बीच हुए युद्ध का वर्णन है। अंत में देवी द्वारा महिषासुर का वध किया जाता है।
चतुर्थ अध्याय — शक्रादि स्तुति
महिषासुर के वध के बाद देवताओं द्वारा देवी की स्तुति की जाती है। इन्द्र आदि देवताओं द्वारा की गई इस स्तुति के कारण इस अध्याय को शक्रादि स्तुति के नाम से भी जाना जाता है।
पंचम अध्याय — देवीदूत संवाद
पाँचवें अध्याय में शुम्भ और निशुम्भ के प्रसंग तथा देवी के पास दूत भेजे जाने का वर्णन है। इसी क्रम में देवी की स्तुति भी आती है।
षष्ठ अध्याय — धूम्रलोचन वध
छठे अध्याय में धूम्रलोचन को देवी के पास भेजे जाने और देवी द्वारा उसका वध किए जाने का वर्णन मिलता है।
सप्तम अध्याय — चण्ड-मुण्ड वध
सातवें अध्याय में चण्ड और मुण्ड के साथ देवी के युद्ध का वर्णन है। इसी प्रसंग में चामुण्डा स्वरूप की प्रसिद्ध कथा आती है।
अष्टम अध्याय — रक्तबीज वध
आठवें अध्याय में रक्तबीज के साथ हुए युद्ध का वर्णन है। रक्तबीज की विशेष शक्ति के कारण युद्ध कठिन हो जाता है और देवी के विभिन्न स्वरूप मिलकर उसका अंत करते हैं।
नवम अध्याय — निशुम्भ वध
नौवें अध्याय में देवी और निशुम्भ के बीच हुए युद्ध का विस्तार मिलता है। अंत में देवी निशुम्भ का वध करती हैं।
दशम अध्याय — शुम्भ वध
दसवें अध्याय में शुम्भ और देवी के बीच अंतिम युद्ध का वर्णन मिलता है। देवी शुम्भ का वध करके देवताओं को भय और संकट से मुक्त करती हैं।
एकादश अध्याय — नारायणी स्तुति
ग्यारहवें अध्याय में देवताओं द्वारा देवी की स्तुति की जाती है। यह अध्याय देवी की महिमा और उनके विभिन्न स्वरूपों की स्तुति के कारण विशेष रूप से प्रसिद्ध है।
द्वादश अध्याय — भगवती माहात्म्य
बारहवें अध्याय में देवी के माहात्म्य, देवी की कृपा और देवी की उपासना से संबंधित फल का वर्णन मिलता है। इस अध्याय में देवी अपने भक्तों के प्रति अपनी कृपा और संरक्षण का भाव प्रकट करती हैं।
त्रयोदश अध्याय — सुरथ-वैश्य वरप्रदान
तेरहवें अध्याय में राजा सुरथ और वैश्य समाधि की देवी-आराधना तथा माँ भगवती द्वारा दोनों को वरदान दिए जाने का वर्णन मिलता है। इसी कारण इस अध्याय को सुरथ और वैश्य को वरदान प्रदान करने वाले अध्याय के रूप में भी जाना जाता है।
दुर्गा सप्तशती पाठ में चार नवरात्रि
हिंदू परंपरा में वर्ष के अलग-अलग समय पर चार नवरात्रि का उल्लेख मिलता है। इनमें—
- चैत्र नवरात्रि
- आषाढ़ नवरात्रि
- आश्विन नवरात्रि
- माघ नवरात्रि
शामिल हैं।
चैत्र और आश्विन नवरात्रि में देवी उपासना विशेष रूप से व्यापक रूप से की जाती है। अन्य नवरात्रियों में भी साधक अपनी परंपरा के अनुसार देवी की पूजा और पाठ करते हैं।
दुर्गा सप्तशती पाठ की विस्तृत विधि
साधक सबसे पहले स्नान करके पवित्र हो, आसन-शुद्धि की क्रिया पूरी करके स्वच्छ आसन पर बैठे। अपने पास शुद्ध जल, पूजन-सामग्री और श्री दुर्गा सप्तशती की पुस्तक रखें। पुस्तक को अपने सामने काष्ठ आदि के स्वच्छ आसन पर सम्मानपूर्वक स्थापित करें।
ललाट पर अपनी रुचि और परंपरा के अनुसार भस्म, चन्दन अथवा रोली लगा सकते हैं। शिखा रखने की परंपरा हो तो शिखा बाँधें। इसके बाद पूर्वाभिमुख होकर आचमन और अन्य शुद्धिकरण की क्रियाएँ अपनी परंपरा के अनुसार करें।
तत्पश्चात प्राणायाम करके गणेश आदि देवताओं एवं गुरुजनों को प्रणाम करें।
इसके बाद अपनी परंपरा के अनुसार पवित्री धारण करके हाथ में लाल पुष्प, अक्षत और जल लेकर संकल्प किया जाता है।
यदि विस्तृत संकल्प का प्रयोग किया जा रहा है, तो उसमें साधक का नाम, गोत्र, स्थान, तिथि और पाठ का उद्देश्य आदि अपनी वास्तविक जानकारी के अनुसार रखा जाता है।
आपके दिए हुए पाठ में संकल्प इस प्रकार है—
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः।
ॐ नमः परमात्मने, श्रीपुराणपुरुषोत्तमस्य श्रीविष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्याद्य श्रीब्रह्मणो द्वितीयपरार्द्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरेऽष्टाविंशतितमे कलियुगे प्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे भरतखण्डे आर्यावर्तान्तर्गतब्रह्मावर्तैकदेशे पुण्यप्रदेशे बौद्धावतारे वर्तमाने यथानामसंवत्सरे अमुकायने महामाङ्गल्यप्रदे मासानाम् उत्तमे अमुकमासे अमुकपक्षे अमुकतिथौ अमुकवासरान्वितायाम् अमुकनक्षत्रे अमुकराशिस्थिते सूर्ये अमुकामुकराशिस्थितेषु चन्द्रभौमबुधगुरुशुक्रशनिषु सत्सु शुभे योगे शुभकरणे एवंगुणविशेषणविशिष्टायां शुभपुण्यतिथौ सकलशास्त्रश्रुतिस्मृति-पुराणोक्तफलप्राप्तिकामः अमुकगोत्रोत्पन्नः अमुकनाम अहं ममात्मनः सपुत्रस्त्रीबान्धवस्य श्रीनवदुर्गानुग्रहतो ग्रहकृतराजकृतसर्वविधपीडा- निवृत्तिपूर्वकं नैरुज्यदीर्घायुःपुष्टिधनधान्यसमृद्ध्यर्थं श्रीनवदुर्गाप्रसादेन सर्वापन्निवृत्तिसर्वाभीष्ट-फलावाप्तिधर्मार्थकाममोक्षचतुर्विधपुरुषार्थसिद्धिद्वारा श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीदेवताप्रीत्यर्थं शापोद्धारपुरस्सरं कवचार्गलाकीलकपाठवेदतन्त्रोक्त-रात्रिसूक्तपादेव्यथर्वशीर्षपाठन्यास-विधिसहितनवार्णजपसप्तशतीन्यासध्यानसहित-चरित्रसम्बन्धिविनियोगन्यासध्यानपूर्वकं च “मार्कण्डेय उवाच॥ सावर्णिः सूर्यतनयो यो मनुः कथ्यतेऽष्टमः।” इत्याद्यारभ्य “सावर्णिर्भविता मनुः” इत्यन्तं दुर्गासप्तशतीपाठं तदन्ते न्यासविधिसहितनवार्णमन्त्रजपं वेदतन्त्रोक्तदेवीसूक्तपाठं रहस्यत्रयपठनं शापोद्धारादिकं च करिष्ये।
इस प्रकार संकल्प करने के बाद देवी का ध्यान करके पंचोपचार विधि से पुस्तक की पूजा की जाती है। इसके बाद अपनी परंपरा के अनुसार आगे की पाठ-विधि शुरू की जाती है।
तत्त्व-शुद्धि और आचमन
आपके दिए हुए मूल पाठ में तत्त्व-शुद्धि के लिए निम्न मंत्र दिए गए हैं। इन्हें यहाँ बिना किसी बदलाव के रखा जा रहा है—
ॐ ऐं आत्मतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा।
ॐ ह्रीं विद्यातत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा॥
ॐ क्लीं शिवतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं सर्वतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा॥
इसके बाद प्राणायाम और देवता तथा गुरु का स्मरण किया जाता है।
कुश की पवित्री धारण करने के लिए आपके दिए हुए पाठ में यह मंत्र है—
ॐ पवित्रेस्थो वैष्णव्यौ सवितुर्वः प्रसवः
उत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः।
तस्यते पवित्रपते पवित्रपूतस्य यत्कामः पुने तच्छकेयम्॥
इसके बाद पुष्प, अक्षत और जल लेकर संकल्प किया जाता है।
पुस्तक की पूजा और नवार्ण मंत्र
संकल्प के बाद देवी का ध्यान करते हुए पंचोपचार विधि से दुर्गा सप्तशती की पुस्तक की पूजा की जाती है। पुस्तक को देवी के स्वरूप के रूप में सम्मान देकर उसके सामने दीपक और अन्य पूजा सामग्री अर्पित की जाती है।
इसके बाद अपनी परंपरा के अनुसार नवार्ण मंत्र से पीठ आदि में आधारशक्ति की स्थापना करके पुस्तक को उसके ऊपर स्थापित किया जाता है।
शापोद्धार और उत्कीलन की परंपरा
दुर्गा सप्तशती की कुछ विस्तृत और विशेष पाठ-पद्धतियों में शापोद्धार, उत्कीलन और मृतसंजीवनी आदि मंत्र-विधियों का उल्लेख मिलता है। इन विधियों के क्रम और आवश्यकता को लेकर विभिन्न परंपराओं में अंतर मिलता है। इसलिए इन्हें सभी साधकों के लिए एक समान अनिवार्य नियम मानना उचित नहीं है।
आपके द्वारा दिए गए मूल पाठ में शापोद्धार मंत्र इस प्रकार है—
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं क्रां क्रीं चण्डिकादेव्यै शापनाशानुग्रहं कुरु कुरु स्वाहा।
इसके बाद मूल पाठ में उत्कीलन मंत्र दिया गया है—
ॐ श्रीं क्लीं ह्रीं सप्तशति चण्डिके उत्कीलनं कुरु कुरु स्वाहा।
इसके बाद मूल पाठ में मृतसंजीवनी विद्या का मंत्र दिया गया है—
ॐ ह्रीं ह्रीं वं वं ऐं ऐं मृतसंजीवनि विद्ये मृतमुत्थापयोत्थापय क्रीं ह्रीं ह्रीं वं स्वाहा।
इन मंत्रों को यहाँ आपके दिए हुए पाठ के अनुसार ही रखा गया है। विशेष मंत्र-साधना करने वाले साधक को इनका प्रयोग अपनी गुरु-परंपरा के निर्देश के अनुसार करना चाहिए।
मारीचकल्प के अनुसार शापविमोचन
आपके दिए हुए मूल पाठ में मारीचकल्प के अनुसार सप्तशती शापविमोचन मंत्र इस प्रकार दिया गया है—
ॐ श्रीं श्रीं क्लीं हूं ॐ ऐं क्षोभय मोहय उत्कीलय उत्कीलय उत्कीलय ठं ठं।
इसके बाद मूल पाठ में रुद्रयामल महातन्त्र के अन्तर्गत दुर्गाकल्प से संबंधित शाप-विमोचन मंत्रों का उल्लेख किया गया है।
यह ध्यान रखना चाहिए कि शापोद्धार और शापविमोचन की ये विधियाँ सभी पाठ-परंपराओं में एक जैसी नहीं मिलतीं। विस्तृत तांत्रिक विधि अपनाने वाले साधक को अपनी परंपरा के आचार्य से विधि समझकर ही इसका प्रयोग करना चाहिए।
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापविमोचन
आपके दिए हुए मूल पाठ में इस विधि के अंतर्गत निम्न विनियोग और मंत्र दिए गए हैं। इन्हें बिना परिवर्तन के रखा जा रहा है।
ॐ अस्य श्रीचण्डिकाया ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापविमोचनमन्त्रस्य वसिष्ठ-नारदसंवादसामवेदाधिपतिब्रह्माण ऋषयः सर्वैश्वर्यकारिणी श्रीदुर्गा देवता चरित्रत्रयं बीजं ह्री शक्तिः त्रिगुणात्मस्वरूपचण्डिकाशापविमुक्तौ मम संकल्पितकार्यसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः।
ॐ (ह्रीं) रीं रेतःस्वरूपिण्यै मधुकैटभमर्दिन्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥१॥
ॐ श्रीं बुद्धिस्वरूपिण्यै महिषासुरसैन्यनाशिन्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥२॥
ॐ रं रक्तस्वरूपिण्यै महिषासुरमर्दिन्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥३॥
ॐ क्षुं क्षुधास्वरूपिण्यै देववन्दितायै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥४॥
ॐ छां छायास्वरूपिण्यै दूतसंवादिन्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥५॥
ॐ शं शक्तिस्वरूपिण्यै धूम्रलोचनघातिन्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥६॥
ॐ तृं तृषास्वरूपिण्यै चण्डमुण्डवधकारिण्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥७॥
ॐ क्षां क्षान्तिस्वरूपिण्यै रक्तबीजवधकारिण्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥८॥
ॐ जां जातिस्वरूपिण्यै निशुम्भवधकारिण्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥९॥
ॐ लं लज्जास्वरूपिण्यै शुम्भवधकारिण्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥१०॥
ॐ शां शान्तिस्वरूपिण्यै देवस्तुत्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥११॥
ॐ श्रं श्रद्धास्वरूपिण्यै सकलफलदात्र्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥१२॥
ॐ कां कान्तिस्वरूपिण्यै राजवरप्रदायै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥१३॥
ॐ मां मातृस्वरूपिण्यै अनर्गलमहिमसहितायै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥१४॥
ॐ ह्रीं श्रीं दुं दुर्गायै सं सर्वैश्वर्यकारिण्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥१५॥
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नमः शिवायै अभेद्यकवचस्वरूपिण्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥१६॥
ॐ क्रीं काल्यै कालि ह्रीं फट् स्वाहायै ऋग्वेदस्वरूपिण्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥१७॥
ॐ ऐं ह्री क्लीं महाकालीमहालक्ष्मी-
महासरस्वतीस्वरूपिण्यै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गादेव्यै नमः॥१८॥
इत्येवं हि महामन्त्रान् पठित्वा परमेश्वर।
चण्डीपाठं दिवा रात्रौ कुर्यादेव न संशयः॥१९॥
एवं मन्त्रं न जानाति चण्डीपाठं करोति यः।
आत्मानं चैव दातारं क्षीणं कुर्यान्न संशयः॥२०॥
दुर्गा सप्तशती के छह अंग
कुछ पारंपरिक पाठ-पद्धतियों में दुर्गा सप्तशती के साथ कवच, अर्गला, कीलक तथा तीनों रहस्यों को मिलाकर छह अंगों की संज्ञा दी जाती है। इनके पाठ-क्रम में विभिन्न परंपराओं में अंतर मिलता है।
देवी माहात्म्य से संबंधित परंपरागत सामग्री में देवी कवच, अर्गला स्तोत्र, कीलक स्तोत्र, देवी सूक्त आदि के स्वतंत्र पाठ भी मिलते हैं।
इसलिए किसी एक क्रम को सभी साधकों के लिए एकमात्र अनिवार्य क्रम मानने के बजाय अपनी गुरु या पारिवारिक परंपरा को प्राथमिकता देना उचित है।
देवी माहात्म्य का ध्यान
आपके दिए हुए मूल पाठ में देवी के ध्यान के लिए निम्न श्लोक है। इसे जैसा दिया गया है वैसा ही रखा गया है—
ॐ
बन्धूककुसुमाभासां पञ्चमुण्डाधिवासिनीम्।
स्फुरच्चन्द्रकलारत्नमुकुटां मुण्डमालिनीम्॥
त्रिनेत्रां रक्तवसनां पीनोन्नतघटस्तनीम्।
पुस्तकं चाक्षमालां च वरं चाभयकं क्रमात्॥
दधतीं संस्मरेन्नित्यमुत्तराम्नायमानिताम्।
अथवा
या चण्डी मधुकैटभादिदैत्यदलनी या माहिषोन्मूलिनी या धूम्रेक्षणचण्डमुण्डमथनी या रक्तबीजाशनी।
शक्तिः शुम्भनिशुम्भदैत्यदलनी या सिद्धिदात्री परा सा देवी नवकोटिमूर्तिसहिता मां पातु विश्वेश्वरी॥
इसके बाद सप्तशती के मुख्य पाठ की ओर आगे बढ़ा जाता है।
दुर्गा सप्तशती के पाठ का मुख्य क्रम
विस्तृत परंपरागत पाठ में साधक अपनी परंपरा के अनुसार पहले देवी कवच, अर्गला स्तोत्र, कीलक स्तोत्र तथा अन्य संबंधित पाठ करता है। इसके बाद देवी का ध्यान करके दुर्गा सप्तशती के 13 अध्यायों का पाठ किया जाता है।
दुर्गा सप्तशती का मुख्य पाठ प्रथम अध्याय से शुरू होकर तेरहवें अध्याय तक क्रम से किया जाता है। प्रत्येक अध्याय देवी की अलग कथा और महिमा को सामने रखता है।
दुर्गा सप्तशती के अध्यायों से संबंधित पारंपरिक मान्यताएँ
अलग-अलग साधना-पद्धतियों और परंपराओं में सप्तशती के अध्यायों को विभिन्न कामनाओं और उपासना-विधियों से जोड़ा गया है। इन्हें सार्वभौमिक नियम के रूप में नहीं लेना चाहिए।
कुछ परंपराओं में—
- प्रथम अध्याय को चिंता और मानसिक बाधाओं से संबंधित माना जाता है।
- द्वितीय अध्याय को संघर्ष और विरोध की स्थितियों से जोड़ा जाता है।
- तृतीय अध्याय को शत्रु-बाधा से संबंधित माना जाता है।
- चतुर्थ और पंचम अध्याय देवी-स्तुति और भक्ति-भाव से जुड़े हैं।
- षष्ठ अध्याय को भय और बाधाओं से मुक्ति की भावना से पढ़ा जाता है।
- सप्तम और अष्टम अध्याय देवी की उग्र शक्ति और असुर-विनाश के प्रसंगों से जुड़े हैं।
- नवम और दशम अध्याय निशुम्भ और शुम्भ के वध से संबंधित हैं।
- एकादश अध्याय देवी की स्तुति के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है।
- द्वादश अध्याय देवी के माहात्म्य और फलश्रुति से संबंधित है।
- तेरहवाँ अध्याय राजा सुरथ और वैश्य समाधि की देवी-आराधना तथा वरदान से संबंधित है।
इन अध्यायों के संबंध में अलग-अलग पुस्तकों और साधना-परंपराओं में विशेष प्रयोग बताए जा सकते हैं, इसलिए उन्हें निश्चित फल की गारंटी के रूप में प्रस्तुत नहीं करना चाहिए।
दुर्गा सप्तशती पाठ में आसन और वस्त्र
सामान्य देवी उपासना में साधक स्वच्छ आसन और स्वच्छ वस्त्र धारण करके पाठ करता है। विशेष साधना में अलग-अलग रंग के आसन और वस्त्रों का उल्लेख कुछ परंपराओं में मिलता है।
मूल स्रोत में विभिन्न कामनाओं के लिए पीले, लाल, काले और कुश के आसन का उल्लेख किया गया है। ऐसी विशेष साधना-विधि को सामान्य गृह-पाठ से अलग समझना चाहिए।
यदि साधक केवल श्रद्धापूर्वक दुर्गा सप्तशती का पाठ कर रहा है, तो सबसे महत्वपूर्ण बात स्वच्छता, एकाग्रता और श्रद्धा है।
दुर्गा सप्तशती पाठ में हवन
दुर्गा सप्तशती के साथ हवन की भी अलग-अलग परंपराएँ हैं। विशेष अनुष्ठान में हवन की सामग्री और आहुति की संख्या संकल्प तथा पाठ-पद्धति के अनुसार निर्धारित की जा सकती है।
मूल परंपरागत सामग्री में घी, तिल, जौ, नारियल, फल, पुष्प, खांड आदि अनेक वस्तुओं का उल्लेख मिलता है। इनके प्रयोग को किसी निश्चित सांसारिक फल की गारंटी के रूप में नहीं समझना चाहिए।
विशेष हवन में आहुति की सामग्री, मंत्र और संख्या का निर्धारण योग्य आचार्य की देखरेख में करना अधिक उचित है।
अध्याय के अनुसार आहुति सामग्री
विस्तृत अनुष्ठान-पद्धतियों में अलग-अलग अध्याय और मंत्र के अनुसार विशेष आहुति सामग्री का उल्लेख मिलता है। इनमें कमलगट्टा, सुपारी, लौंग, इलायची, गुग्गुल, शहद, मिश्री, खीर, कपूर, पुष्प, भोजपत्र, जायफल, चंदन, बेलफल, गन्ना, नारियल, तिल, जौ आदि का प्रयोग बताया जाता है।
लेकिन यह सामग्री सभी साधकों के लिए सामान्य गृह-पाठ में अनिवार्य नहीं है। अध्याय-विशेष हवन एक अलग विस्तृत अनुष्ठान है और इसे उसी परंपरा के अनुसार करना चाहिए जिसमें यह विधि प्राप्त हुई हो।
आरती की विधि
दुर्गा सप्तशती पाठ के बाद माँ भगवती की आरती श्रद्धापूर्वक की जाती है। आरती की विधि और दीपक की संख्या भी अलग-अलग पूजा-परंपराओं में अलग हो सकती है।
इसलिए किसी एक संख्या को सभी मंदिरों और सभी गृह-पूजा के लिए अनिवार्य नियम नहीं मानना चाहिए। अपनी पारिवारिक या गुरु-परंपरा के अनुसार आरती करना उचित है।
दुर्गा सप्तशती का पाठ कितने दिनों में करें?
दुर्गा सप्तशती का पाठ एक दिन में भी किया जा सकता है और आवश्यकता के अनुसार कई दिनों में विभाजित भी किया जा सकता है। नवरात्रि के दौरान बहुत से भक्त इसे नौ दिनों में विभाजित करके पढ़ते हैं।
विशेष अनुष्ठान में पाठ का दिन, अध्याय-विभाजन और पाठ की संख्या पहले से निर्धारित की जाती है। ऐसी स्थिति में संकल्प के अनुसार ही पाठ करना चाहिए।
क्या दुर्गा सप्तशती का पाठ रोज किया जा सकता है?
हाँ, भक्त अपनी श्रद्धा और परंपरा के अनुसार दुर्गा सप्तशती का नियमित पाठ कर सकते हैं। यदि प्रतिदिन संपूर्ण सप्तशती पढ़ना संभव न हो, तो अपनी परंपरा के अनुसार देवी स्तुति, कवच या अन्य संबंधित पाठ किया जा सकता है।
विशेष संकल्प लेकर किया गया अनुष्ठान हो तो उसके नियमों का पालन करना चाहिए।
क्या दुर्गा सप्तशती केवल नवरात्रि में पढ़ी जाती है?
नहीं। नवरात्रि में दुर्गा सप्तशती का पाठ विशेष रूप से प्रचलित है, लेकिन देवी उपासना की परंपरा में इसका पाठ अन्य दिनों में भी किया जाता है।
नवरात्रि के अलावा साधक अपनी श्रद्धा, परिवार की परंपरा और गुरु से प्राप्त विधि के अनुसार देवी माहात्म्य का पाठ कर सकता है।
दुर्गा सप्तशती पाठ करते समय किन बातों का ध्यान रखें?
दुर्गा सप्तशती का पाठ करते समय निम्न बातों का ध्यान रखना उपयोगी है—
- पाठ के लिए स्वच्छ और शांत स्थान रखें।
- स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें।
- पूजा की पुस्तक को स्वच्छ स्थान पर रखें।
- पाठ के समय जल्दबाजी न करें।
- संस्कृत शब्दों और मंत्रों का उच्चारण यथासंभव शुद्ध रखें।
- यदि किसी पाठ में संदेह हो तो प्रमाणित पाठ से मिलान करें।
- विशेष अनुष्ठान में गुरु या योग्य आचार्य के निर्देश का पालन करें।
- अलग-अलग परंपराओं में मिलने वाली विधियों को बिना समझे एक साथ न मिलाएँ।
- शापोद्धार, उत्कीलन, न्यास आदि विशेष विधियों को अपनी परंपरा के अनुसार ही करें।
- हवन में अग्नि और सामग्री का प्रयोग सावधानी से करें।
- पाठ को केवल किसी निश्चित सांसारिक परिणाम की गारंटी मानकर न करें।
दुर्गा सप्तशती के साथ पढ़े जाने वाले प्रमुख पाठ
दुर्गा सप्तशती की विस्तृत पाठ-परंपरा में कई संबंधित पाठों का उल्लेख मिलता है। इनमें प्रमुख हैं—
देवी कवच: माँ भगवती से रक्षा की प्रार्थना करने वाला प्रसिद्ध पाठ।
अर्गला स्तोत्र: देवी की स्तुति और प्रार्थना से संबंधित महत्वपूर्ण पाठ।
कीलक स्तोत्र: दुर्गा सप्तशती की पारंपरिक पाठ-पद्धति में प्रसिद्ध प्रारंभिक स्तोत्र।
देवी सूक्त: देवी की स्तुति से संबंधित महत्वपूर्ण पाठ।
रहस्यत्रय: विस्तृत सप्तशती पाठ की कुछ परंपराओं में इसका पाठ किया जाता है।
अपराध क्षमापण स्तोत्र: पाठ के बाद देवी से हुई भूलों के लिए क्षमा माँगने की भावना से पढ़ा जाने वाला स्तोत्र।
देवी माहात्म्य से संबंधित पारंपरिक पाठ-सूचियों में देवी कवच, अर्गला, कीलक, देवी सूक्त और अपराधक्षमापण स्तोत्र आदि अलग-अलग संबंधित पाठों के रूप में उपलब्ध हैं।
दुर्गा सप्तशती पाठ का भाव
दुर्गा सप्तशती का पाठ केवल किसी इच्छा की पूर्ति के लिए ही नहीं, बल्कि माँ भगवती के प्रति श्रद्धा, भक्ति और शरणागति के भाव से भी किया जाता है।
देवी माहात्म्य में देवताओं द्वारा देवी की स्तुति, देवी की शक्ति और असुर शक्तियों के विनाश की अनेक कथाएँ आती हैं। इन कथाओं का मूल भाव देवी की शक्ति और भक्तों के प्रति उनकी कृपा से जुड़ा हुआ है।
पाठ करते समय मन को शांत रखकर माँ दुर्गा का ध्यान करना और श्रद्धा के साथ देवी की आराधना करना सबसे महत्वपूर्ण है।
दुर्गा सप्तशती पाठ के बाद
सप्तशती के 13 अध्याय पूरे होने के बाद अपनी परंपरा के अनुसार देवी सूक्त, रहस्यत्रय, क्षमा-प्रार्थना तथा अन्य समापन पाठ किए जा सकते हैं।
इसके बाद माँ भगवती की आरती करके प्रसाद अर्पित किया जाता है। अंत में देवी से पाठ के दौरान हुई किसी भी भूल के लिए क्षमा माँगकर पूजा पूर्ण की जाती है।
दुर्गा सप्तशती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न
दुर्गा सप्तशती में कितने अध्याय हैं?
श्री दुर्गा सप्तशती में कुल 13 अध्याय हैं। इसे देवी माहात्म्य और चंडी पाठ के नाम से भी जाना जाता है।
दुर्गा सप्तशती के 13 अध्यायों का क्रम क्या है?
क्रम इस प्रकार है—मधुकैटभ वध, महिषासुर सैन्य वध, महिषासुर वध, शक्रादि स्तुति, देवीदूत संवाद, धूम्रलोचन वध, चण्ड-मुण्ड वध, रक्तबीज वध, निशुम्भ वध, शुम्भ वध, नारायणी स्तुति, भगवती माहात्म्य और सुरथ-वैश्य वरप्रदान।
दुर्गा सप्तशती का पाठ कब करना चाहिए?
नवरात्रि में इसका पाठ विशेष रूप से किया जाता है। इसके अतिरिक्त भक्त अपनी श्रद्धा और परंपरा के अनुसार अन्य दिनों में भी इसका पाठ कर सकते हैं।
क्या दुर्गा सप्तशती का पूरा पाठ एक दिन में किया जा सकता है?
हाँ, कुछ परंपराओं में संपूर्ण पाठ एक दिन में किया जाता है। अन्य परंपराओं में इसे कई दिनों में विभाजित किया जाता है। विशेष अनुष्ठान में संकल्प के अनुसार पाठ करना उचित है।
क्या दुर्गा सप्तशती रोज पढ़ी जा सकती है?
हाँ, भक्त अपनी श्रद्धा और परंपरा के अनुसार नियमित रूप से पाठ कर सकते हैं।
दुर्गा सप्तशती के पाठ में कौन-कौन से पाठ किए जाते हैं?
विस्तृत पाठ-पद्धति में देवी कवच, अर्गला स्तोत्र, कीलक स्तोत्र, नवार्ण मंत्र, 13 अध्याय, देवी सूक्त, रहस्यत्रय और अन्य संबंधित पाठों का उल्लेख मिलता है। अलग-अलग परंपराओं में इनका क्रम अलग हो सकता है।
क्या शापोद्धार और उत्कीलन करना जरूरी है?
इन विधियों का उल्लेख कुछ विशेष और पारंपरिक पाठ-पद्धतियों में मिलता है, लेकिन इनके प्रयोग और आवश्यकता को लेकर सभी परंपराएँ एक जैसी नहीं हैं। विशेष अनुष्ठान करने वाले साधक को अपनी गुरु-परंपरा का निर्देश मानना चाहिए।
क्या दुर्गा सप्तशती पढ़ने के लिए गुरु आवश्यक है?
सामान्य श्रद्धापूर्वक पाठ और विशेष मंत्र-साधना में अंतर है। सामान्य पाठ भक्त अपनी परंपरा के अनुसार कर सकते हैं। विशेष मंत्र, न्यास, तांत्रिक साधना या विस्तृत अनुष्ठान के लिए योग्य गुरु या आचार्य का मार्गदर्शन लेना उचित है।
क्या दुर्गा सप्तशती और देवी माहात्म्य अलग हैं?
दुर्गा सप्तशती को ही देवी माहात्म्य के नाम से भी जाना जाता है। चंडी पाठ नाम से भी इसकी प्रसिद्धि है।
दुर्गा सप्तशती के 13वें अध्याय में क्या है?
तेरहवें अध्याय में राजा सुरथ और वैश्य समाधि की देवी-आराधना तथा माँ भगवती द्वारा उन्हें वरदान दिए जाने का वर्णन है।
निष्कर्ष
श्री दुर्गा सप्तशती माँ भगवती की महिमा, शक्ति और उपासना से जुड़ा महत्वपूर्ण पाठ है। इसमें 13 अध्यायों के माध्यम से देवी के विभिन्न स्वरूपों, असुर शक्तियों के विनाश, देवताओं की स्तुति तथा भक्तों पर देवी की कृपा का वर्णन मिलता है।
दुर्गा सप्तशती का पाठ श्रद्धा, एकाग्रता और अपनी परंपरा के अनुसार करना चाहिए। सामान्य पाठ और विशेष अनुष्ठान की विधि को अलग-अलग समझना भी आवश्यक है।
कवच, अर्गला, कीलक, शापोद्धार, उत्कीलन, न्यास, रहस्यत्रय और अन्य विस्तृत विधियाँ अलग-अलग पाठ-परंपराओं में अलग क्रम से मिल सकती हैं। इसलिए विशेष साधना करते समय अपनी गुरु-परंपरा या योग्य आचार्य के निर्देश को प्राथमिकता देना उचित है।
माँ दुर्गा की उपासना में श्रद्धा, भक्ति और शरणागति का भाव सबसे महत्वपूर्ण है। माँ भगवती सभी भक्तों पर अपनी कृपा बनाए रखें और उनके जीवन में सुख, शांति तथा मंगल प्रदान करें।
