दुर्गा सप्तशती सातवाँ अध्याय चण्ड-मुण्ड वध के नाम से जाना जाता है। पिछले अध्याय में देवी के हाथों धूम्रलोचन का अंत और उसकी सेना के संहार का प्रसंग आता है। धूम्रलोचन के मारे जाने का समाचार सुनकर शुम्भ अत्यन्त क्रोधित हो जाता है और देवी को पकड़कर लाने के लिए चण्ड और मुण्ड नामक शक्तिशाली असुरों को भेजता है।
चण्ड और मुण्ड बड़ी सेना के साथ देवी के पास पहुँचते हैं। देवी को देखकर वे उन्हें पकड़ने के लिए आगे बढ़ते हैं। यह देखकर अम्बिका को क्रोध आता है और उनके ललाट से एक भयंकर देवी प्रकट होती हैं। उनका स्वरूप अत्यन्त उग्र और तेजस्वी होता है। वे असुर सेना पर टूट पड़ती हैं और थोड़े ही समय में उसका संहार कर देती हैं।
इसके बाद चण्ड और मुण्ड स्वयं देवी का सामना करते हैं। काली दोनों का वध करके उनके सिर देवी चण्डिका के सामने प्रस्तुत करती हैं। चण्ड और मुण्ड का वध करने के कारण देवी उन्हें चामुण्डा नाम से प्रसिद्ध होने का वर देती हैं।
॥ श्रीदुर्गासप्तशती — सप्तमोऽध्यायः ॥
चण्ड-मुण्ड वध
॥ ध्यानम् ॥
ॐ ध्यायेयं रत्नपीठे शुककलपठितं शृण्वतीं श्यामलाङ्गीं
न्यस्तैकाङ्घ्रिं सरोजे शशिशकलधरां वल्लकीं वादयन्तीम्।
कह्लाराबद्धमालां नियमितविलसच्चोलिकां रक्तवस्त्रां
मातङ्गीं शङ्खपात्रां मधुरमधुमदां चित्रकोद्भासिभालाम्॥
सरल अर्थ:
मैं देवी मातंगी का ध्यान करता हूँ, जो रत्नों से बने आसन पर विराजमान हैं और तोते की मधुर वाणी सुन रही हैं। उनका शरीर श्याम वर्ण का है। उनका एक चरण कमल पर स्थित है और उनके मस्तक पर अर्धचन्द्र सुशोभित है। वे वीणा बजाती हैं, लाल वस्त्र धारण करती हैं और पुष्पमाला से अलंकृत हैं। उनका स्वरूप दिव्य आभूषणों और तेज से प्रकाशित है।
“ॐ” ऋषिरुवाच॥१॥
सरल अर्थ:
ऋषि कहते हैं—
आज्ञप्तास्ते ततो दैत्याश्चण्डमुण्डपुरोगमाः।
चतुरङ्गबलोपेता ययुरभ्युद्यतायुधाः॥२॥
सरल अर्थ:
शुम्भ की आज्ञा पाकर चण्ड और मुण्ड के नेतृत्व में असुरों की सेना देवी की ओर चल पड़ी। उनके साथ बड़ी सेना थी और सभी असुर अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र लेकर युद्ध के लिए तैयार थे।
ददृशुस्ते ततो देवीमीषद्धासां व्यवस्थिताम्।
सिंहस्योपरि शैलेन्द्रशृङ्गे महति काञ्चने॥३॥
सरल अर्थ:
उन्होंने देखा कि देवी एक विशाल और स्वर्णिम पर्वत-शिखर पर अपने सिंह के ऊपर विराजमान हैं और उनके मुख पर हल्की मुस्कान है।
ते दृष्ट्वा तां समादातुमुद्यमं चक्रुरुद्यताः।
आकृष्टचापासिधरास्तथान्ये तत्समीपगाः॥४॥
सरल अर्थ:
देवी को देखते ही असुर उन्हें पकड़ने के लिए आगे बढ़ने लगे। कुछ असुरों ने धनुष और तलवार उठा रखी थी और दूसरे असुर भी अस्त्र-शस्त्र लेकर देवी के पास पहुँचने लगे।
ततः कोपं चकारोच्चैरम्बिका तानरीन् प्रति।
कोपेन चास्या वदनं मषीवर्णमभूत्तदा॥५॥
सरल अर्थ:
असुरों को अपनी ओर बढ़ते देखकर अम्बिका को बहुत क्रोध आया। उनके क्रोध के कारण उस समय उनका मुख गहरे काले रंग का हो गया।
भ्रुकुटीकुटिलात्तस्या ललाटफलकाद्द्रुतम्।
काली करालवदना विनिष्क्रान्तासिपाशिनी॥६॥
सरल अर्थ:
देवी की टेढ़ी हुई भौंहों के बीच ललाट से तुरंत एक अत्यन्त भयंकर स्वरूप वाली काली देवी प्रकट हुईं। उनके हाथों में तलवार और पाश थे तथा उनका मुख अत्यन्त उग्र दिखाई दे रहा था।
विचित्रखट्वाङ्गधरा नरमालाविभूषणा।
द्वीपिचर्मपरीधाना शुष्कमांसातिभैरवा॥७॥
सरल अर्थ:
वे विचित्र खट्वांग धारण किए हुए थीं और उनके शरीर पर मनुष्यों की माला सुशोभित थी। उन्होंने बाघ की खाल पहन रखी थी और उनका अत्यन्त भयंकर स्वरूप देखकर असुर भयभीत हो उठे।
अतिविस्तारवदना जिह्वाललनभीषणा।
निमग्नारक्तनयना नादापूरितदिङ्मुखा॥८॥
सरल अर्थ:
उनका मुख बहुत विशाल था और बाहर निकली हुई जीभ के कारण उनका स्वरूप और भी भयंकर लग रहा था। उनकी लाल आँखें गहरी दिखाई देती थीं और उनकी भयंकर गर्जना से सभी दिशाएँ गूँज उठीं।
सा वेगेनाभिपतिता घातयन्ती महासुरान्।
सैन्ये तत्र सुरारीणामभक्षयत तद्बलम्॥९॥
सरल अर्थ:
वह देवी अत्यन्त वेग से असुर सेना पर टूट पड़ीं और बड़े-बड़े असुरों का संहार करने लगीं। उन्होंने युद्धभूमि में असुरों की सेना को नष्ट करना शुरू कर दिया।
पार्ष्णिग्राहाङ्कुशग्राहियोधघण्टासमन्वितान्।
समादायैकहस्तेन मुखे चिक्षेप वारणान्॥१०॥
सरल अर्थ:
उन्होंने हाथियों को संभालने वाले योद्धाओं और उनके साथ लगे हाथियों को भी पकड़ लिया। अनेक हाथियों को उन्होंने एक हाथ से उठाकर अपने मुख में डाल दिया।
तथैव योधं तुरगै रथं सारथिना सह।
निक्षिप्य वक्त्रे दशनैश्चर्वयन्त्यतिभैरवम्॥११॥
सरल अर्थ:
इसी प्रकार उन्होंने घोड़ों सहित योद्धाओं और सारथी समेत रथों को भी पकड़कर अपने मुख में डाल लिया और अपने दाँतों से उन्हें चबाने लगीं। उनका यह रूप अत्यन्त भयंकर था।
एकं जग्राह केशेषु ग्रीवायामथ चापरम्।
पादेनाक्रम्य चैवान्यमुरसान्यमपोथयत्॥१२॥
सरल अर्थ:
उन्होंने एक असुर को उसके बालों से पकड़ लिया और दूसरे को गले से पकड़ लिया। एक अन्य असुर को पैर से दबा दिया तथा दूसरे को अपनी छाती के बल से कुचल दिया।
तैर्मुक्तानि च शस्त्राणि महास्त्राणि तथासुरैः।
मुखेन जग्राह रुषा दशनैर्मथितान्यपि॥१३॥
सरल अर्थ:
असुरों द्वारा चलाए गए अनेक अस्त्र-शस्त्र और शक्तिशाली हथियारों को भी उन्होंने क्रोधपूर्वक अपने मुख से पकड़ लिया और अपने दाँतों से नष्ट कर दिया।
बलिनां तद् बलं सर्वमसुराणां दुरात्मनाम्।
ममर्दाभक्षयच्चान्यानन्यांश्चाताडयत्तथा॥१४॥
सरल अर्थ:
इस प्रकार शक्तिशाली और दुष्ट असुरों की पूरी सेना को उन्होंने कुचलना शुरू कर दिया। अनेक असुरों को उन्होंने खा लिया और कई अन्य को प्रहार करके मार डाला।
असिना निहताः केचित्केचित्खट्वाङ्गताडिताः।
जग्मुर्विनाशमसुरा दन्ताग्राभिहतास्तथा॥१५॥
सरल अर्थ:
कुछ असुर तलवार के प्रहार से मारे गए, कुछ खट्वांग के प्रहार से नष्ट हुए और अनेक असुर देवी के दाँतों के प्रहार से मृत्यु को प्राप्त हुए।
क्षणेन तद् बलं सर्वमसुराणां निपातितम्।
दृष्ट्वा चण्डोऽभिदुद्राव तां कालीमतिभीषणाम्॥१६॥
सरल अर्थ:
कुछ ही समय में असुरों की पूरी सेना नष्ट हो गई। यह देखकर चण्ड उस अत्यन्त भयंकर काली देवी की ओर तेजी से दौड़ा।
शरवर्षैर्महाभीमैर्भीमाक्षीं तां महासुरः।
छादयामास चक्रैश्च मुण्डः क्षिप्तैः सहस्रशः॥१७॥
सरल अर्थ:
महासुर चण्ड ने भयंकर बाणों की वर्षा करके उन उग्र नेत्रों वाली देवी को ढकने का प्रयास किया। मुण्ड ने भी हजारों चक्र उनकी ओर फेंके।
तानि चक्राण्यनेकानि विशमानानि तन्मुखम्।
बभुर्यथार्कबिम्बानि सुबहूनि घनोदरम्॥१८॥
सरल अर्थ:
वे अनेक चक्र देवी के मुख की ओर बढ़ रहे थे। उनके मुख में प्रवेश करते हुए वे ऐसे दिखाई दे रहे थे, जैसे घने बादलों के बीच बहुत से सूर्य दिखाई दे रहे हों।
ततो जहासातिरुषा भीमं भैरवनादिनी।
कालीकरालवक्त्रान्तर्दुर्दर्शदशनोज्ज्वला॥१९॥
सरल अर्थ:
तब भयंकर गर्जना करने वाली देवी ने अत्यन्त क्रोध से जोर से हँसना शुरू किया। उनके भयंकर मुख के भीतर चमकते हुए दाँत और भी डरावने दिखाई दे रहे थे।
उत्थाय च महासिंहं देवी चण्डमधावत।
गृहीत्वा चास्य केशेषु शिरस्तेनासिनाच्छिनत्॥२०॥
सरल अर्थ:
इसके बाद देवी अपने सिंह से उठकर चण्ड की ओर तेजी से बढ़ीं। उन्होंने चण्ड के बाल पकड़ लिए और तलवार से उसका सिर काट दिया।
अथ मुण्डोऽभ्यधावत्तां दृष्ट्वा चण्डं निपातितम्।
तमप्यपातयद्भूमौ सा खड्गाभिहतं रुषा॥२१॥
सरल अर्थ:
चण्ड को मारा हुआ देखकर मुण्ड भी देवी की ओर दौड़ा। देवी ने क्रोधपूर्वक अपनी तलवार के प्रहार से मुण्ड को भी धरती पर गिराकर उसका वध कर दिया।
हतशेषं ततः सैन्यं दृष्ट्वा चण्डं निपातितम्।
मुण्डं च सुमहावीर्यं दिशो भेजे भयातुरम्॥२२॥
सरल अर्थ:
चण्ड और अत्यन्त शक्तिशाली मुण्ड के मारे जाने के बाद बची हुई असुर सेना भय से व्याकुल हो गई और चारों दिशाओं में भागने लगी।
शिरश्चण्डस्य काली च गृहीत्वा मुण्डमेव च।
प्राह प्रचण्डाट्टहासमिश्रमभ्येत्य चण्डिकाम्॥२३॥
सरल अर्थ:
काली ने चण्ड और मुण्ड दोनों के सिर अपने हाथों में उठा लिए और प्रचण्ड अट्टहास करती हुई देवी चण्डिका के पास पहुँचीं।
मया तवात्रोपहृतौ चण्डमुण्डौ महापशू।
युद्धयज्ञे स्वयं शुम्भं निशुम्भं च हनिष्यसि॥२४॥
सरल अर्थ:
काली ने देवी से कहा—मैं चण्ड और मुण्ड नाम के इन दोनों दुष्ट असुरों को आपके सामने ले आई हूँ। अब इस युद्धरूपी यज्ञ में आप स्वयं शुम्भ और निशुम्भ का वध करेंगी।
ऋषिरुवाच॥२५॥
सरल अर्थ:
ऋषि कहते हैं—
तावानीतौ ततो दृष्ट्वा चण्डमुण्डौ महासुरौ।
उवाच कालीं कल्याणी ललितं चण्डिका वचः॥२६॥
सरल अर्थ:
चण्डिका ने अपने सामने लाए गए उन दोनों महाबलशाली असुरों, चण्ड और मुण्ड, को देखकर काली से प्रसन्न होकर मधुर वचन कहे।
यस्माच्चण्डं च मुण्डं च गृहीत्वा त्वमुपागता।
चामुण्डेति ततो लोके ख्याता देवि भविष्यसि॥ॐ॥२७॥
सरल अर्थ:
देवी ने कहा—क्योंकि तुम चण्ड और मुण्ड दोनों को पराजित करके मेरे पास लाई हो, इसलिए संसार में तुम चामुण्डा नाम से प्रसिद्ध होगी।
॥ श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये चण्डमुण्डवधो नाम सप्तमोऽध्यायः सम्पूर्णम् ॥
चण्ड-मुण्ड वध की मुख्य बातें
- शुम्भ के आदेश पर चण्ड और मुण्ड बड़ी असुर सेना के साथ देवी के पास पहुँचे।
- देवी को पकड़ने के लिए असुरों ने चारों ओर से आगे बढ़ना शुरू किया।
- असुरों को अपनी ओर आते देखकर अम्बिका को क्रोध आया।
- देवी के ललाट से काली का भयंकर स्वरूप प्रकट हुआ।
- काली ने असुर सेना का भयंकर संहार किया।
- चण्ड और मुण्ड ने देवी पर बाण और चक्र चलाए, लेकिन वे देवी को रोक नहीं सके।
- काली ने चण्ड और मुण्ड दोनों का वध कर दिया।
- चण्ड और मुण्ड के सिर देवी चण्डिका के सामने प्रस्तुत किए गए।
- चण्ड और मुण्ड का वध करने के कारण काली देवी को चामुण्डा नाम से प्रसिद्ध होने का वर मिला।
दुर्गा सप्तशती पाठ — सातवाँ अध्याय हिंदी में
चण्ड-मुण्ड वध की कथा
महर्षि मेधा ने कहा—दैत्यराज शुम्भ की आज्ञा पाकर चण्ड और मुण्ड एक बड़ी सेना के साथ देवी से युद्ध करने के लिए निकल पड़े। उनके सैनिक तरह-तरह के अस्त्र-शस्त्र लेकर युद्ध के लिए तैयार थे। हिमालय पर्वत पर पहुँचकर उन्होंने देवी को सिंह पर विराजमान देखा। देवी के मुख पर उस समय हल्की मुस्कान थी।
असुरों ने देवी को पकड़ने के उद्देश्य से उनकी ओर बढ़ना शुरू किया। उन्हें अपनी ओर आते देखकर अम्बिका को बहुत क्रोध आया। क्रोध के कारण उनका मुख गहरा काला हो गया और उनकी भौंहें तन गईं। उसी समय उनके ललाट से एक अत्यन्त भयंकर देवी प्रकट हुईं। उनका मुख बहुत विशाल था, आँखें लाल थीं और हाथों में तलवार तथा पाश थे। उन्होंने विचित्र अस्त्र धारण किए हुए थे और शरीर पर बाघ की खाल तथा नरमुंडों की माला सुशोभित थी। उनका उग्र स्वरूप देखकर असुर भयभीत हो उठे।
उनकी भयंकर गर्जना से चारों दिशाएँ गूँजने लगीं। इसके बाद वे तेजी से असुर सेना पर टूट पड़ीं और उनका संहार करने लगीं।
काली देवी ने हाथियों, उनके महावतों और हाथियों पर बैठे योद्धाओं को पकड़कर अपने मुख में डाल दिया। उन्होंने घोड़ों, रथों, सारथियों और रथों पर सवार सैनिकों को भी पकड़कर उनका संहार किया। किसी असुर को उन्होंने उसके बालों से पकड़ लिया, किसी को पैरों से दबा दिया और किसी को अपने प्रहार से कुचल दिया।
असुरों ने देवी पर अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र चलाए, लेकिन देवी ने उनमें से कई हथियारों को अपने मुख में ही पकड़ लिया और दाँतों से चूर कर दिया। उन्होंने अनेक शक्तिशाली असुरों को मार डाला और बहुत से असुर उनके प्रहार से भयभीत होकर युद्धभूमि से भागने लगे। इस प्रकार थोड़े ही समय में देवी ने असुरों की पूरी सेना को नष्ट कर दिया।
अपनी सेना की यह स्थिति देखकर महापराक्रमी चण्ड क्रोधित होकर काली देवी की ओर बढ़ा। मुण्ड ने भी देवी पर भयंकर बाणों की वर्षा शुरू कर दी और बड़ी संख्या में चक्र उनकी ओर फेंके।
वे बाण और चक्र देवी के मुख में प्रवेश करते हुए ऐसे दिखाई दे रहे थे, जैसे घने बादलों के बीच अनेक सूर्य चमक रहे हों। इसके बाद काली देवी ने अत्यन्त भयंकर अट्टहास किया। उनका विशाल और उग्र मुख तथा चमकते हुए दाँत असुरों के लिए भय का कारण बन गए।
काली देवी ने तलवार उठाई और चण्ड पर आक्रमण कर दिया। उन्होंने चण्ड के बाल पकड़कर अपनी तलवार से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। चण्ड को मारा हुआ देखकर मुण्ड भी देवी की ओर दौड़ा, लेकिन काली देवी ने क्रोधपूर्वक अपनी तलवार से उसका भी वध कर दिया।
चण्ड और मुण्ड के मारे जाने के बाद उनकी बची हुई सेना भयभीत होकर वहाँ से भाग गई। इसके बाद काली देवी चण्ड और मुण्ड के कटे हुए सिर लेकर चण्डिका के पास पहुँचीं। उन्होंने प्रसन्न होकर प्रचण्ड अट्टहास किया और देवी से कहा कि चण्ड और मुण्ड दोनों का वध करके उनके सिर वे देवी के सामने ले आई हैं। अब शुम्भ और निशुम्भ का वध करना बाकी है।
निष्कर्ष
दुर्गा सप्तशती के सातवें अध्याय में देवी के उग्र और शक्तिशाली स्वरूप का वर्णन मिलता है। शुम्भ के आदेश पर चण्ड और मुण्ड देवी को पकड़ने के लिए विशाल सेना के साथ आते हैं, लेकिन देवी की शक्ति के सामने उनकी पूरी सेना टिक नहीं पाती।
देवी के ललाट से प्रकट हुई काली असुरों का संहार करती हैं और अंत में चण्ड तथा मुण्ड का भी वध कर देती हैं। उनके इस पराक्रम के कारण उन्हें चामुण्डा नाम प्राप्त होता है। यह प्रसंग देवी की शक्ति और अधर्म पर धर्म की विजय का प्रभावशाली वर्णन करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती के सातवें अध्याय का नाम क्या है?
दुर्गा सप्तशती के सातवें अध्याय का नाम चण्ड-मुण्ड वध है।
सातवें अध्याय में किन असुरों का वध हुआ?
इस अध्याय में चण्ड और मुण्ड नामक दो प्रमुख असुरों का वध होता है। उनके साथ आई असुर सेना का भी संहार किया जाता है।
चण्ड और मुण्ड का वध किसने किया?
चण्ड और मुण्ड का वध देवी के उग्र स्वरूप काली ने किया।
चामुण्डा नाम कैसे पड़ा?
जब काली देवी चण्ड और मुण्ड का वध करके उनके सिर लेकर देवी चण्डिका के पास पहुँचीं, तब चण्डिका ने कहा कि चण्ड और मुण्ड को लाने के कारण वे संसार में चामुण्डा नाम से प्रसिद्ध होंगी।
सातवें अध्याय में काली का प्राकट्य कैसे हुआ?
चण्ड और मुण्ड की सेना को अपनी ओर बढ़ते देखकर अम्बिका को क्रोध आया। उनके ललाट से काली का भयंकर स्वरूप प्रकट हुआ, जिसने असुर सेना का संहार किया।
दुर्गा सप्तशती के सातवें अध्याय का मुख्य प्रसंग क्या है?
इस अध्याय का मुख्य प्रसंग चण्ड और मुण्ड का वध है। इसी प्रसंग के कारण देवी के काली स्वरूप को चामुण्डा नाम प्राप्त होता है।
