दुर्गा सप्तशती छठा अध्याय धूम्रलोचन-वध के नाम से जाना जाता है। पिछले अध्याय में देवी और शुम्भ के दूत के बीच हुए संवाद के बाद शुम्भ बहुत क्रोधित हो जाता है। वह धूम्रलोचन नामक असुर को एक बड़ी सेना के साथ देवी को बलपूर्वक अपने पास लाने के लिए भेजता है। धूम्रलोचन देवी को धमकाते हुए उन्हें शुम्भ के पास चलने के लिए कहता है, लेकिन देवी उसके दबाव में नहीं आतीं। जब वह देवी पर आक्रमण करने के लिए आगे बढ़ता है, तब देवी के एक हुंकार से ही वह भस्म हो जाता है। इसके बाद देवी का सिंह असुरों की विशाल सेना पर टूट पड़ता है और थोड़े ही समय में पूरी सेना का संहार कर देता है। धूम्रलोचन और उसकी सेना के मारे जाने की खबर सुनकर शुम्भ और भी क्रोधित हो जाता है और चण्ड-मुण्ड को देवी को पकड़कर लाने का आदेश देता है। यही प्रसंग आगे की कथा की भूमिका तैयार करता है।
श्रीदुर्गासप्तशती — षष्ठोऽध्यायः
धूम्रलोचन-वध
॥ ध्यानम् ॥
ॐ नागाधीश्वरविष्टरां फणिफणोत्तंसोरुरत्नावली-
भास्वद्देहलतां दिवाकरनिभां नेत्रत्रयोद्भासिताम्।
मालाकुम्भकपालनीरजकरां चन्द्रार्धचूडां परां
सर्वज्ञेश्वरभैरवाङ्कनिलयां पद्मावतीं चिन्तये॥
सरल अर्थ:
मैं उस दिव्य देवी पद्मावती का ध्यान करता हूँ, जो नागराज को अपने आसन के रूप में धारण करती हैं और जिनके शरीर पर सर्पों के फणों में जड़े सुंदर रत्नों की आभा दिखाई देती है। उनका तेज सूर्य के समान प्रकाशमान है और उनके तीन नेत्र दिव्य प्रकाश से युक्त हैं। उनके हाथों में माला, कलश और कमल आदि हैं तथा उनके मस्तक पर अर्धचंद्र सुशोभित है। वे सर्वज्ञ भगवान भैरव के अंक में विराजमान रहने वाली परम शक्ति हैं।
“ॐ” ऋषिरुवाच॥१॥
इत्याकर्ण्य वचो देव्याः स दूतोऽमर्षपूरितः।
समाचष्ट समागम्य दैत्यराजाय विस्तरात्॥२॥
सरल अर्थ:
ऋषि कहते हैं—देवी की बातें सुनकर वह दूत क्रोध और अपमान की भावना से भर गया। वह वापस दैत्यराज शुम्भ के पास पहुँचा और देवी ने जो कुछ कहा था, वह पूरी बात विस्तार से उसे बता दी।
तस्य दूतस्य तद्वाक्यमाकर्ण्यासुरराट् ततः।
सक्रोधः प्राह दैत्यानामधिपं धूम्रलोचनम्॥३॥
सरल अर्थ:
दूत की बात सुनकर असुरों का राजा शुम्भ बहुत क्रोधित हो गया। उसने दैत्यों के सेनापति धूम्रलोचन को बुलाकर देवी को अपने अधिकार में लाने का आदेश दिया।
हे धूम्रलोचनाशु त्वं स्वसैन्यपरिवारितः।
तामानय बलाद् दुष्टां केशाकर्षणविह्वलाम्॥४॥
सरल अर्थ:
शुम्भ ने कहा—हे धूम्रलोचन! तुम तुरंत अपनी सेना के साथ जाओ और उस देवी को बलपूर्वक यहाँ ले आओ। यदि वह स्वयं आने के लिए तैयार न हों, तो उन्हें उनके बाल पकड़कर भी ले आना।
तत्परित्राणदः कश्चिद्यदि वोत्तिष्ठतेऽपरः।
स हन्तव्योऽमरो वापि यक्षो गन्धर्व एव वा॥५॥
सरल अर्थ:
यदि कोई दूसरा व्यक्ति देवी की रक्षा करने के लिए तुम्हारे सामने खड़ा हो, तो उसे भी मार देना। चाहे वह देवता हो, यक्ष हो या गंधर्व—जो भी उनके पक्ष में खड़ा हो, उसे नहीं छोड़ना।
ऋषिरुवाच॥६॥
तेनाज्ञप्तस्ततः शीघ्रं स दैत्यो धूम्रलोचनः।
वृतः षष्ट्या सहस्राणामसुराणां द्रुतं ययौ॥७॥
सरल अर्थ:
ऋषि कहते हैं—शुम्भ का आदेश पाकर धूम्रलोचन तुरंत वहाँ से चल पड़ा। उसके साथ साठ हजार असुरों की विशाल सेना थी।
स दृष्ट्वा तां ततो देवीं तुहिनाचलसंस्थिताम्।
जगादोच्चैः प्रयाहीति मूलं शुम्भनिशुम्भयोः॥८॥
सरल अर्थ:
धूम्रलोचन ने हिमालय पर्वत पर विराजमान देवी को देखा। उसने ऊँची आवाज में कहा—तुम शुम्भ और निशुम्भ के पास चलो। यही तुम्हारे लिए उचित है।
न चेत्प्रीत्याद्य भवती मद्भर्तारमुपैष्यति।
ततो बलान्नयाम्येष केशाकर्षणविह्वलाम्॥९॥
सरल अर्थ:
धूम्रलोचन ने देवी से कहा—यदि तुम अपनी इच्छा से मेरे स्वामी शुम्भ के पास नहीं चलोगी, तो मैं तुम्हें बलपूर्वक ले जाऊँगा और तुम्हारे बाल पकड़कर भी ले जाने में पीछे नहीं हटूँगा।
देव्युवाच॥१०॥
दैत्येश्वरेण प्रहितो बलवान् बलसंवृतः।
बलान्नयसि मामेवं ततः किं ते करोम्यहम्॥११॥
सरल अर्थ:
देवी ने कहा—तुम दैत्यराज के आदेश से यहाँ आए हो और तुम्हारे साथ बहुत बड़ी सेना भी है। यदि तुम मुझे बलपूर्वक ले जाने का प्रयास करोगे, तो फिर मैं भी अपनी ओर से जो उचित होगा, वही करूँगी।
ऋषिरुवाच॥१२॥
इत्युक्तः सोऽभ्यधावत्तामसुरो धूम्रलोचनः।
हुंकारेणैव तं भस्म सा चकाराम्बिका ततः॥१३॥
सरल अर्थ:
ऋषि कहते हैं—देवी की बात सुनकर धूम्रलोचन क्रोध में उनकी ओर दौड़ा। तब अम्बिका देवी ने केवल एक हुंकार किया और उसी हुंकार से धूम्रलोचन तुरंत भस्म हो गया।
अथ क्रुद्धं महासैन्यमसुराणां तथाम्बिका।
ववर्ष सायकैस्तीक्ष्णैस्तथा शक्तिपरश्वधैः॥१४॥
सरल अर्थ:
धूम्रलोचन के मारे जाने के बाद असुरों की विशाल सेना देवी पर क्रोधित होकर टूट पड़ी। तब अम्बिका देवी ने तीखे बाणों तथा शक्ति और परशु जैसे अनेक अस्त्रों से उस सेना पर प्रहार करना शुरू कर दिया।
ततो धुतसटः कोपात्कृत्वा नादं सुभैरवम्।
पपातासुरसेनायां सिंहो देव्याः स्ववाहनः॥१५॥
सरल अर्थ:
इसके बाद देवी का सिंह भी क्रोध से अपनी अयाल झटकते हुए भयंकर गर्जना करने लगा और असुरों की सेना पर टूट पड़ा।
कांश्चित् करप्रहारेण दैत्यानास्येन चापरान्।
आक्रम्य चाधरेणान्यान् स जघान महासुरान्॥१६॥
सरल अर्थ:
देवी के सिंह ने कुछ दैत्यों को अपने पंजों के प्रहार से मार डाला और कुछ को अपने मुख से पकड़कर समाप्त कर दिया। उसने कई अन्य असुरों पर झपटकर उनका भी संहार कर दिया।
केषाञ्चित्पाटयामास नखैः कोष्ठानि केसरी।
तथा तलप्रहारेण शिरांसि कृतवान् पृथक्॥१७॥
सरल अर्थ:
सिंह ने कई असुरों के शरीर को अपने नुकीले नखों से चीर डाला और अपने पंजों के प्रहार से अनेक असुरों के सिर अलग कर दिए।
विच्छिन्नबाहुशिरसः कृतास्तेन तथापरे।
पपौ च रुधिरं कोष्ठादन्येषां धुतकेसरः॥१८॥
सरल अर्थ:
उस सिंह ने अनेक असुरों के हाथ और सिर अलग कर दिए। क्रोध से अपनी अयाल झटकता हुआ वह सिंह घायल असुरों का रक्त भी पीने लगा।
क्षणेन तद्बलं सर्वं क्षयं नीतं महात्मना।
तेन केसरिणा देव्या वाहनेनातिकोपिना॥१९॥
सरल अर्थ:
देवी के अत्यंत क्रोधित सिंह ने थोड़े ही समय में धूम्रलोचन की पूरी सेना का विनाश कर दिया। देखते ही देखते विशाल असुर सेना समाप्त हो गई।
श्रुत्वा तमसुरं देव्या निहतं धूम्रलोचनम्।
बलं च क्षयितं कृत्स्नं देवीकेसरिणा ततः॥२०॥
सरल अर्थ:
जब शुम्भ को यह समाचार मिला कि धूम्रलोचन मारा गया है और देवी के सिंह ने उसकी पूरी सेना का नाश कर दिया है, तो वह बहुत क्रोधित हो उठा।
चुकोप दैत्याधिपतिः शुम्भः प्रस्फुरिताधरः।
आज्ञापयामास च तौ चण्डमुण्डौ महासुरौ॥२१॥
सरल अर्थ:
दैत्यराज शुम्भ का क्रोध और बढ़ गया। उसके होंठ क्रोध से काँपने लगे। तब उसने चण्ड और मुण्ड नामक दो शक्तिशाली असुरों को बुलाकर आदेश दिया।
हे चण्ड हे मुण्ड बलैर्बहुभिः परिवारितौ।
तत्र गच्छत गत्वा च सा समानीयतां लघु॥२२॥
सरल अर्थ:
शुम्भ ने कहा—हे चण्ड और मुण्ड! तुम दोनों बहुत बड़ी सेना के साथ वहाँ जाओ और उस देवी को शीघ्र मेरे पास लेकर आओ।
केशेष्वाकृष्य बद्ध्वा वा यदि वः संशयो युधि।
तदाशेषायुधैः सर्वैरसुरैर्विनिहन्यताम्॥२३॥
सरल अर्थ:
यदि देवी को पकड़कर लाने में तुम्हें किसी प्रकार की कठिनाई हो, तो उन्हें बाल पकड़कर बाँध देना। यदि युद्ध की स्थिति बन जाए, तो सभी असुर मिलकर अपने सभी अस्त्र-शस्त्रों से उनका वध कर दें।
तस्यां हतायां दुष्टायां सिंहे च विनिपातिते।
शीघ्रमागम्यतां बद्ध्वा गृहीत्वा तामथाम्बिकाम्॥ॐ॥२४॥
सरल अर्थ:
शुम्भ ने आगे आदेश दिया कि यदि देवी का वध हो जाए और उनका सिंह भी मार दिया जाए, तो देवी अम्बिका को बाँधकर तुरंत मेरे सामने ले आना।
छठे अध्याय की मुख्य बातें
दुर्गा सप्तशती के छठे अध्याय में देवी की शक्ति के सामने असुरों के अहंकार और बल का अंत दिखाया गया है।
- शुम्भ धूम्रलोचन को देवी को बलपूर्वक लाने के लिए भेजता है।
- धूम्रलोचन साठ हजार असुरों के साथ देवी के पास पहुँचता है।
- धूम्रलोचन देवी को धमकाता है।
- देवी के हुंकार से धूम्रलोचन भस्म हो जाता है।
- देवी का सिंह असुरों की पूरी सेना का संहार कर देता है।
- शुम्भ क्रोधित होकर चण्ड और मुण्ड को देवी को पकड़कर लाने का आदेश देता है।
- आगे की कथा में चण्ड और मुण्ड के साथ देवी का युद्ध आता है।
दुर्गा सप्तशती पाठ — छठा अध्याय हिंदी में
धूम्रलोचन वध
दुर्गा सप्तशती का छठा अध्याय धूम्रलोचन-वध के नाम से जाना जाता है। पिछले अध्याय में देवी और शुम्भ के दूत के बीच हुए संवाद के बाद शुम्भ बहुत क्रोधित हो जाता है। वह धूम्रलोचन नामक असुर को एक बड़ी सेना के साथ देवी को बलपूर्वक अपने पास लाने के लिए भेजता है।
धूम्रलोचन देवी के पास पहुँचकर उन्हें शुम्भ और निशुम्भ के पास चलने के लिए कहता है। देवी उसके दबाव में नहीं आतीं। जब धूम्रलोचन बलपूर्वक देवी को ले जाने के लिए आगे बढ़ता है, तब देवी के एक हुंकार से ही वह भस्म हो जाता है। इसके बाद देवी का सिंह असुरों की विशाल सेना पर टूट पड़ता है और थोड़े ही समय में पूरी सेना का संहार कर देता है।
धूम्रलोचन का देवी के पास पहुँचना
शुम्भ के दूत ने देवी का उत्तर जाकर असुरराज शुम्भ को बता दिया। यह सुनकर शुम्भ का क्रोध और बढ़ गया। उसने अपने सेनापति धूम्रलोचन को आदेश दिया कि वह अपनी सेना लेकर देवी के पास जाए और उन्हें किसी भी प्रकार अपने साथ लेकर आए।
शुम्भ ने यह भी कह दिया कि यदि देवी की रक्षा करने के लिए कोई देवता, यक्ष, गन्धर्व या दूसरा शक्तिशाली व्यक्ति सामने आए, तो उसे भी युद्ध में पराजित कर दिया जाए।
शुम्भ की आज्ञा पाकर धूम्रलोचन बड़ी असुर सेना के साथ देवी के पास पहुँचा। उसने देवी को देखकर उन्हें अपने साथ शुम्भ और निशुम्भ के पास चलने के लिए कहा। उसने धमकी दी कि यदि देवी अपनी इच्छा से नहीं चलेंगी, तो वह उन्हें बलपूर्वक ले जाएगा।
देवी ने शांत भाव से उत्तर दिया कि यदि शुम्भ का भेजा हुआ बलवान असुर उन्हें बलपूर्वक ले जाने का प्रयास करेगा, तो ऐसी स्थिति में वह क्या कर सकती हैं।
देवी के हुंकार से धूम्रलोचन का अंत
देवी का उत्तर सुनकर धूम्रलोचन क्रोधित हो उठा और वह देवी की ओर आक्रमण करने के लिए दौड़ा। तभी देवी ने एक प्रचण्ड हुंकार किया। देवी के उस हुंकार से धूम्रलोचन उसी क्षण भस्म हो गया।
धूम्रलोचन का इस प्रकार अंत होते देखकर उसकी पूरी सेना क्रोधित हो गई। असुरों ने देवी पर आक्रमण करने का प्रयास किया। तब अम्बिका ने अपने अस्त्र-शस्त्रों से उनका सामना किया और तीखे बाणों, शक्तियों तथा फरसों से असुर सेना पर प्रहार किया।
देवी के सिंह का असुर सेना पर आक्रमण
देवी का सिंह भी युद्ध में उतर पड़ा। वह अपनी अयाल झटकते हुए भयंकर गर्जना के साथ असुर सेना के बीच जा पहुँचा। उसने अनेक असुरों को अपने पंजों और जबड़ों से मार गिराया। कई असुरों को उसने धरती पर पटककर समाप्त कर दिया।
सिंह ने अपने नखों से अनेक असुरों को घायल किया और कई असुरों को अपने प्रचण्ड प्रहार से मार डाला। युद्ध इतना भयंकर था कि थोड़े ही समय में असुर सेना बुरी तरह नष्ट हो गई।
देवी का सिंह लगातार असुरों पर टूट पड़ता रहा। उसने अनेक असुरों की भुजाएँ और सिर अलग कर दिए तथा अनेक असुरों का संहार कर दिया। इस प्रकार देवी के अत्यन्त शक्तिशाली सिंह ने कुछ ही समय में धूम्रलोचन के साथ आई पूरी असुर सेना को समाप्त कर दिया।
शुम्भ का क्रोधित होना
जब शुम्भ को यह समाचार मिला कि धूम्रलोचन देवी के हाथों मारा गया है और उसकी पूरी सेना का भी अंत हो गया है, तो वह अत्यन्त क्रोधित हुआ। उसके क्रोध की सीमा नहीं रही।
इसके बाद शुम्भ ने चण्ड और मुण्ड नामक दो शक्तिशाली असुरों को बुलाया। उसने उन्हें बड़ी सेना के साथ देवी के पास जाने का आदेश दिया।
शुम्भ ने कहा कि वे देवी को किसी भी प्रकार पकड़कर उसके सामने लेकर आएँ। यदि देवी को पकड़ना आसान न हो और युद्ध की स्थिति बन जाए, तो पूरी शक्ति से युद्ध किया जाए। उसने यह भी आदेश दिया कि यदि देवी और उनका सिंह युद्ध में मारे जाएँ, तब भी देवी को बाँधकर उसके सामने लाया जाए।
यहीं से दुर्गा सप्तशती के अगले प्रसंग की भूमिका तैयार होती है, जिसमें चण्ड और मुण्ड देवी के सामने पहुँचते हैं।
निष्कर्ष
दुर्गा सप्तशती का छठा अध्याय धूम्रलोचन-वध देवी भगवती की अपार शक्ति का प्रभावशाली वर्णन करता है। धूम्रलोचन अपनी विशाल सेना और बल के घमंड में देवी को बलपूर्वक ले जाने का प्रयास करता है, लेकिन देवी के एक हुंकार से ही उसका अंत हो जाता है। इसके बाद देवी का सिंह पूरी असुर सेना का संहार कर देता है।
यह अध्याय यह संदेश देता है कि केवल बाहरी शक्ति और अहंकार के बल पर सत्य और धर्म को दबाया नहीं जा सकता। देवी के सामने अधर्म और अहंकार का अंत निश्चित है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
दुर्गा सप्तशती का छठा अध्याय किस नाम से जाना जाता है?
दुर्गा सप्तशती के छठे अध्याय का नाम धूम्रलोचन-वध है।
छठे अध्याय में किस असुर का वध होता है?
इस अध्याय में देवी भगवती धूम्रलोचन का वध करती हैं।
धूम्रलोचन का वध कैसे हुआ?
धूम्रलोचन देवी को बलपूर्वक ले जाने के लिए उनकी ओर बढ़ा। तब अम्बिका देवी ने अपने हुंकार से उसे भस्म कर दिया।
धूम्रलोचन कितनी सेना लेकर आया था?
धूम्रलोचन साठ हजार असुरों की सेना के साथ देवी के पास गया था।
धूम्रलोचन के बाद शुम्भ ने किसे भेजा?
धूम्रलोचन के मारे जाने के बाद शुम्भ ने चण्ड और मुण्ड को बड़ी सेना के साथ देवी को पकड़कर लाने का आदेश दिया।
छठे अध्याय में देवी के सिंह ने क्या किया?
देवी के सिंह ने असुर सेना पर आक्रमण करके अनेक असुरों का संहार किया और अंत में पूरी सेना का विनाश कर दिया।
दुर्गा सप्तशती के छठे अध्याय का मुख्य संदेश क्या है?
इस अध्याय का मुख्य संदेश यह है कि अहंकार, अन्याय और अत्याचार चाहे कितने भी शक्तिशाली दिखाई दें, देवी की शक्ति के सामने उनका अंत निश्चित है।
