भगवान श्रीकृष्ण के 108 नाम उनके दिव्य स्वरूप, बाल लीलाओं, गोपाल रूप, वृंदावन की मधुर लीलाओं, मथुरा और द्वारका की कथाओं तथा महाभारत में उनके मार्गदर्शक स्वरूप का स्मरण कराते हैं। श्रीकृष्ण के प्रत्येक नाम के पीछे कोई विशेष गुण, लीला या धार्मिक भाव जुड़ा हुआ है।
इन नामों में कहीं श्रीकृष्ण यशोदावत्सल बालक के रूप में दिखाई देते हैं, तो कहीं गोवर्धनधारी गोपाल, कहीं कंसारि, कहीं द्वारकानायक, तो कहीं पार्थसारथि और जगद्गुरु के रूप में। इसलिए श्रीकृष्ण के 108 नामों का पाठ केवल नामों का उच्चारण नहीं, बल्कि उनके विभिन्न स्वरूपों का स्मरण भी माना जाता है।
भक्त अपनी श्रद्धा और सुविधा के अनुसार इन नामों का पाठ पूजा, जप, ध्यान या दैनिक भक्ति के समय कर सकते हैं।
श्रीकृष्ण के 108 नाम
1 से 27 — बाल कृष्ण और दिव्य स्वरूप
1. श्रीकृष्ण
अर्थ — जो श्यामवर्ण वाले और सबको अपनी ओर आकर्षित करने वाले हैं।
2. कमलानाथ
अर्थ — देवी लक्ष्मी के स्वामी।
3. वासुदेव
अर्थ — वसुदेव जी के पुत्र तथा सर्वव्यापी परमात्मा।
4. सनातन
अर्थ — जो नित्य, शाश्वत और तीनों कालों में विद्यमान हैं।
5. वसुदेवात्मज
अर्थ — वसुदेव जी के पुत्र।
6. पुण्य
अर्थ — जो परम पवित्र और पुण्यस्वरूप हैं।
7. लीलामानुषविग्रह
अर्थ — जिन्होंने अपनी दिव्य लीलाओं के लिए मनुष्य रूप धारण किया।
8. श्रीवत्सकौस्तुभधर
अर्थ — जो श्रीवत्स चिह्न और कौस्तुभ मणि धारण करते हैं।
9. यशोदावत्सल
अर्थ — माता यशोदा के अत्यंत प्रिय पुत्र।
10. हरि
अर्थ — जो भक्तों के दुःख और बंधनों का हरण करने वाले हैं।
11. चतुर्भुजात्तचक्रासि
गदाशङ्खाम्बुजायुध
अर्थ — जो चक्र, तलवार, गदा, शंख और कमल आदि आयुध धारण करने वाले चतुर्भुज भगवान हैं।
12. देवकीनन्दन
अर्थ — माता देवकी के पुत्र।
13. श्रीश
अर्थ — श्री अर्थात देवी लक्ष्मी के स्वामी।
14. नन्दगोपप्रियात्मज
अर्थ — नन्द बाबा के प्रिय पुत्र।
15. यमुनावेगसंहारी
अर्थ — यमुना नदी के प्रबल वेग को शांत करने वाले।
16. बलभद्रप्रियानुज
अर्थ — भगवान बलराम के प्रिय छोटे भाई।
17. पूतनाजीवितहर
अर्थ — पूतना के प्राणों का हरण करने वाले।
18. शकटासुरभञ्जन
अर्थ — शकटासुर का विनाश करने वाले।
19. नन्दव्रजजनानन्दी
अर्थ — नन्द के व्रज के लोगों को आनंद देने वाले।
20. सच्चिदानन्दविग्रह
अर्थ — सत्, चित् और आनंदस्वरूप भगवान।
21. नवनीतनवाहारी
अर्थ — माखन से जुड़ी बाल लीलाएँ करने वाले और माखन का आनंद लेने वाले।
22. मुचुकुन्दप्रसादक
अर्थ — राजा मुचुकुन्द पर कृपा करने वाले।
23. षोडशस्त्रीसहस्रेश
अर्थ — सोलह हजार स्त्रियों के स्वामी।
24. त्रिभङ्ग
अर्थ — तीन स्थानों पर मनोहर ढंग से झुके हुए सुंदर स्वरूप वाले।
25. मधुराकृति
अर्थ — अत्यंत मधुर और मनोहर स्वरूप वाले।
26. शुकवागमृताब्धीन्दु
अर्थ — शुकदेव जी के मुख से प्रकट श्रीकृष्ण-कथा के अमृत-सागर के समान।
27. गोविन्द
अर्थ — जो गौओं, इंद्रियों और भक्तों को आनंद देने वाले हैं।
28 से 54 — गोपाल और वृंदावन की लीलाएँ
28. गोविदाम्पति
अर्थ — ज्ञानीजनों और गो-समुदाय के स्वामी।
29. वत्सपालनसञ्चारी
अर्थ — बछड़ों को चराते हुए विचरण करने वाले।
30. धेनुकासुरभञ्जन
अर्थ — धेनुकासुर का विनाश करने वाले।
31. तृणीकृततृणावर्त
अर्थ — तृणावर्त जैसे शक्तिशाली असुर को तिनके के समान तुच्छ कर देने वाले।
32. यमलार्जुनभञ्जन
अर्थ — यमलार्जुन वृक्षों का उद्धार करने वाले।
33. उत्तालतालभेत्ता
अर्थ — विशाल ताल वृक्षों को गिराने वाले।
34. तमालश्यामलाकृति
अर्थ — तमाल वृक्ष के समान श्याम और मनोहर स्वरूप वाले।
35. गोपगोपीश्वर
अर्थ — गोपों और गोपियों के स्वामी।
36. योगी
अर्थ — परम योगी और योगस्वरूप भगवान।
37. सूर्यकोटिसमप्रभ
अर्थ — करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी।
38. इलापति
अर्थ — पृथ्वी के स्वामी।
39. परंज्योति
अर्थ — परम प्रकाश और सर्वोच्च तेजस्वरूप।
40. यादवेन्द्र
अर्थ — यादव कुल के श्रेष्ठ और स्वामी।
41. यदूद्वह
अर्थ — यदुवंश का नेतृत्व करने वाले।
42. वनमाली
अर्थ — वन के पुष्पों की माला धारण करने वाले।
43. पीतवासा
अर्थ — पीले वस्त्र धारण करने वाले।
44. पारिजातापहारक
अर्थ — पारिजात वृक्ष को द्वारका ले जाने वाले।
45. गोवर्धनाचलोद्धर्ता
अर्थ — गोवर्धन पर्वत को उठाने वाले।
46. गोपाल
अर्थ — गौओं के रक्षक और पालनकर्ता।
47. सर्वपालक
अर्थ — समस्त जीवों और जगत का पालन करने वाले।
48. अज
अर्थ — जो अजन्मे और जन्म से परे हैं।
49. निरञ्जन
अर्थ — जो निष्कलंक और निर्मल हैं।
50. कामजनक
अर्थ — जो आकर्षण और कामभाव के मूल कारण माने जाते हैं।
51. कञ्जलोचन
अर्थ — कमल के समान सुंदर नेत्रों वाले।
52. मधुहा
अर्थ — मधु नामक असुर का वध करने वाले।
53. मथुरानाथ
अर्थ — मथुरा के स्वामी।
54. द्वारकानायक
अर्थ — द्वारका नगरी के अधिपति।
55 से 81 — मथुरा, द्वारका और महाभारत
55. बली
अर्थ — अत्यंत शक्तिशाली और सामर्थ्यवान।
56. वृन्दावनान्तसञ्चारी
अर्थ — वृंदावन में विचरण करने वाले।
57. तुलसीदामभूषण
अर्थ — तुलसी की माला से सुशोभित होने वाले।
58. स्यमन्तकमणेर्हर्ता
अर्थ — स्यमन्तक मणि से जुड़ी कथा में उसके हरण से संबंधित भगवान।
59. नरनारायणात्मक
अर्थ — नर और नारायण के दिव्य स्वरूप से संबद्ध भगवान।
60. कुब्जाकृष्णाम्बरधर
अर्थ — कुब्जा द्वारा अर्पित चंदन और वस्त्र से सुशोभित होने वाले कृष्ण।
61. मायी
अर्थ — अपनी दिव्य माया के स्वामी।
62. परमपूरुष
अर्थ — सर्वोच्च पुरुष और परम पुरुषोत्तम।
63. मुष्टिकासुरचाणूर
महायुद्धविशारद
अर्थ — मुष्टिक और चाणूर जैसे पहलवानों के साथ युद्ध में निपुण।
64. संसारवैरी
अर्थ — संसार के बंधन और अज्ञान के विरोधी।
65. कंसारि
अर्थ — कंस के शत्रु और उसका वध करने वाले।
66. मुरारि
अर्थ — मुर नामक असुर का वध करने वाले।
67. नरकान्तक
अर्थ — नरकासुर का संहार करने वाले।
68. अनादिब्रह्मचारी
अर्थ — जो अनादि और ब्रह्मस्वरूप हैं।
69. कृष्णाव्यसनकर्षक
अर्थ — संकट और विपत्ति में पड़े भक्तों का दुःख दूर करने वाले।
70. शिशुपालशिरच्छेत्ता
अर्थ — शिशुपाल का वध करने वाले।
71. दुर्योधनकुलान्तकृत्
अर्थ — दुर्योधन के कुल के विनाश का कारण बनने वाले।
72. विदुराक्रूरवरद
अर्थ — विदुर और अक्रूर पर कृपा करने वाले।
73. विश्वरूपप्रदर्शक
अर्थ — अपना विराट विश्वरूप प्रकट करने वाले।
74. सत्यवाक्
अर्थ — सत्य बोलने वाले।
75. सत्यसङ्कल्प
अर्थ — जिनका संकल्प सत्य होकर पूर्ण होता है।
76. सत्यभामारत
अर्थ — सत्यभामा के प्रिय भगवान।
77. जयी
अर्थ — विजय प्राप्त करने वाले।
78. सुभद्रापूर्वज
अर्थ — सुभद्रा के बड़े भाई।
79. विष्णु
अर्थ — जो सर्वव्यापी हैं और समस्त जगत में व्याप्त हैं।
80. भीष्ममुक्तिप्रदायक
अर्थ — भीष्म को मुक्ति प्रदान करने वाले।
81. जगद्गुरु
अर्थ — संपूर्ण जगत के गुरु।
82 से 108 — जगन्नाथ, पार्थसारथि और परमात्मा स्वरूप
82. जगन्नाथ
अर्थ — संपूर्ण जगत के स्वामी।
83. वेणुवाद्यविशारद
अर्थ — मधुर बाँसुरी वादन में निपुण।
84. वृषभासुरविध्वंसी
अर्थ — वृषभासुर का संहार करने वाले।
85. बकासुरारि
अर्थ — बकासुर के शत्रु और उसका विनाश करने वाले।
86. बाणबाहुकृत्
अर्थ — बाणासुर की अनेक भुजाओं का छेदन करने वाले।
87. युधिष्ठिरप्रतिष्ठाता
अर्थ — युधिष्ठिर को राज्य और प्रतिष्ठा दिलाने वाले।
88. बर्हिबर्हावतंसक
अर्थ — मोरपंख को अपने मस्तक का आभूषण बनाने वाले।
89. पार्थसारथि
अर्थ — अर्जुन के सारथी बनने वाले।
90. अव्यक्त
अर्थ — जो इंद्रियों से परे और अव्यक्त स्वरूप वाले हैं।
91. गीतामृतमहोदधि
अर्थ — भगवद्गीता के अमृतमय ज्ञान के महासागर।
92. कालीयफणिमाणिक्य
रञ्जितश्रीपदाम्बुज
अर्थ — कालिय नाग के फन की मणियों से जिनके चरण कमल सुशोभित हुए।
93. दामोदर
अर्थ — जिनके उदर पर माता यशोदा ने रस्सी बाँधी; यह नाम उनकी बाल लीला का स्मरण कराता है।
94. यज्ञभोक्ता
अर्थ — यज्ञ में अर्पित आहुति को स्वीकार करने वाले।
95. दानवेन्द्रविनाशन
अर्थ — दानवों के प्रमुखों और अधर्म का विनाश करने वाले।
96. नारायण
अर्थ — समस्त जीवों के आश्रय और परमात्मा स्वरूप।
97. परम्ब्रह्म
अर्थ — सर्वोच्च परम सत्य और परम ब्रह्म।
98. पन्नगाशनवाहन
अर्थ — गरुड़ को अपना वाहन बनाने वाले।
99. जलक्रीडासमासक्त
गोपीवस्त्रापहारक
अर्थ — गोपियों की जलक्रीड़ा से जुड़ी लीला करने वाले।
100. पुण्यश्लोक
अर्थ — जिनकी स्तुति और स्मरण को पवित्र माना जाता है।
101. तीर्थकर
अर्थ — जिनके चरण और स्मरण को तीर्थस्वरूप माना जाता है।
102. वेदवेद्य
अर्थ — जिन्हें वेदों के माध्यम से जाना जाता है।
103. दयार्णिधि
अर्थ — जो दया और करुणा के अथाह सागर हैं।
104. सर्वतीर्थात्मक
अर्थ — जिनमें सभी तीर्थों का पवित्र भाव समाहित माना जाता है।
105. सर्वग्रहरूपी
अर्थ — जो पूर्ण और समस्त स्वरूपों में व्याप्त हैं।
106. परात्पर
अर्थ — जो सबसे परे और सर्वोच्च परम सत्ता हैं।
107. सर्वात्मा
अर्थ — जो सभी प्राणियों के भीतर आत्मस्वरूप से स्थित हैं।
108. परमात्मा
अर्थ — समस्त जीवों के परम आधार और सर्वोच्च आत्मस्वरूप भगवान।
श्रीकृष्ण के 108 नामों का महत्व
श्रीकृष्ण के 108 नामों में भगवान के जीवन और दिव्य स्वरूप के अनेक पक्ष एक साथ दिखाई देते हैं। यशोदावत्सल, नवनीतनवाहारी और दामोदर जैसे नाम बाल कृष्ण की मधुर लीलाओं का स्मरण कराते हैं।
गोपाल, गोविन्द, वनमाली, वेणुवाद्यविशारद और गोवर्धनाचलोद्धर्ता जैसे नाम वृंदावन और गोप-गोपियों से जुड़ी कृष्ण की लीलाओं का स्मरण कराते हैं।
वहीं कंसारि, मुरारि, नरकान्तक, बकासुरारि और दानवेन्द्रविनाशन जैसे नाम भगवान श्रीकृष्ण के उस स्वरूप को सामने रखते हैं जो अधर्म और अत्याचार का अंत करता है।
महाभारत से जुड़े नामों में पार्थसारथि, विश्वरूपप्रदर्शक, युधिष्ठिरप्रतिष्ठाता और जगद्गुरु विशेष महत्व रखते हैं। ये नाम श्रीकृष्ण के उस स्वरूप का स्मरण कराते हैं जिसमें वे अर्जुन के सारथी, मार्गदर्शक और धर्म का ज्ञान देने वाले गुरु के रूप में दिखाई देते हैं।
अंतिम नामों में नारायण, परम्ब्रह्म, वेदवेद्य, सर्वतीर्थात्मक और परात्पर जैसे नाम श्रीकृष्ण के परम दिव्य स्वरूप की ओर संकेत करते हैं।
श्रीकृष्ण के 108 नामों का जाप कैसे करें?
भक्त अपनी श्रद्धा और सुविधा के अनुसार श्रीकृष्ण के 108 नामों का पाठ कर सकते हैं। पूजा के समय भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करके प्रत्येक नाम का उच्चारण किया जा सकता है।
यदि कोई भक्त चाहे तो प्रत्येक नाम के साथ पुष्प या तुलसी दल अर्पित कर सकता है। अपनी पारिवारिक या धार्मिक परंपरा के अनुसार नामावली का पाठ करने की विधि अलग हो सकती है।
सबसे महत्वपूर्ण बात श्रद्धा और भक्तिभाव है। नामों का अर्थ समझकर उनका स्मरण करना पाठ को और अधिक भावपूर्ण बना सकता है।
श्रीकृष्ण के 108 नाम कब पढ़ें?
श्रीकृष्ण के नामों का स्मरण किसी भी समय श्रद्धा से किया जा सकता है। प्रातःकाल पूजा के समय, संध्या के समय, भगवान श्रीकृष्ण की आराधना के दौरान अथवा जन्माष्टमी जैसे विशेष अवसरों पर इन नामों का पाठ किया जा सकता है।
भक्त अपनी सुविधा के अनुसार प्रतिदिन भी इन नामों का पाठ कर सकते हैं।
श्रीकृष्ण के 108 नामों का आध्यात्मिक भाव
श्रीकृष्ण की नामावली का विशेष भाव यह है कि इसमें भगवान के अनेक रूपों का स्मरण एक साथ होता है।
कहीं वे माता यशोदा के बालक हैं, कहीं गौओं के रक्षक गोपाल, कहीं गोवर्धनधारी, कहीं मथुरानाथ और द्वारकानायक, तो कहीं अर्जुन के सारथी पार्थसारथि।
इसी प्रकार जगद्गुरु, नारायण और परम्ब्रह्म जैसे नाम श्रीकृष्ण के व्यापक आध्यात्मिक स्वरूप का स्मरण कराते हैं।
इसलिए इन नामों का पाठ करते समय केवल उच्चारण पर ध्यान देने के बजाय नाम के अर्थ और उससे जुड़े श्रीकृष्ण के स्वरूप का ध्यान करना भी भक्तिभाव को गहरा कर सकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवान श्रीकृष्ण के 108 नाम क्या हैं?
भगवान श्रीकृष्ण के 108 नामों में उनके बाल स्वरूप, गोपाल रूप, वृंदावन की लीलाओं, मथुरा और द्वारका के स्वरूप तथा महाभारत में उनके मार्गदर्शक रूप से जुड़े नाम शामिल हैं।
श्रीकृष्ण के 108 नामों का पाठ क्यों किया जाता है?
भक्ति परंपरा में भगवान के नाम का स्मरण आराधना और ध्यान का सरल माध्यम माना जाता है। श्रीकृष्ण के नामों का पाठ करते समय भक्त उनके विभिन्न स्वरूपों और लीलाओं का स्मरण कर सकता है।
क्या श्रीकृष्ण के 108 नाम रोज पढ़ सकते हैं?
हाँ। भक्त अपनी श्रद्धा और सुविधा के अनुसार प्रतिदिन श्रीकृष्ण के 108 नामों का पाठ कर सकते हैं।
श्रीकृष्ण के 108 नाम कब पढ़ना चाहिए?
प्रातःकाल, संध्या, पूजा के समय, जन्माष्टमी के अवसर पर या अपनी दैनिक भक्ति के दौरान इन नामों का पाठ किया जा सकता है।
क्या श्रीकृष्ण के 108 नामों का जाप माला से किया जा सकता है?
हाँ। भक्त अपनी परंपरा और सुविधा के अनुसार माला से भी नाम-जप कर सकते हैं। केवल नामावली का पाठ करना भी भक्ति-स्मरण का एक माध्यम है।
क्या श्रीकृष्ण के 108 नामों में उनकी लीलाओं का वर्णन मिलता है?
हाँ। पूतना वध, शकटासुर वध, धेनुकासुर वध, गोवर्धन धारण, कंस वध, कालिय दमन और महाभारत से जुड़े अनेक प्रसंगों की ओर इन नामों के माध्यम से संकेत मिलता है।
पाठांतर के बारे में जरूरी जानकारी
श्रीकृष्ण के 108 नामों के पाठ में अलग-अलग पुस्तकों और स्रोतों में कुछ पाठांतर मिल सकते हैं। विशेष रूप से उपलब्ध प्रकाशित पाठ में “सर्वग्रहरूपी” के बाद “परात्पर” भी दिया गया है, जिससे एक ही पृष्ठ पर 108 नामों के साथ 109वाँ नाम दिखाई देता है। वहीं उसी स्रोत के श्रीकृष्ण अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र में भी अंतिम क्रम में सर्वतीर्थात्मक, सर्वग्रहरूपी और परात्पर लगातार आते हैं।
इसलिए पाठ करते समय किसी प्रमाणित पुस्तक या अपनी पारिवारिक/गुरु-परंपरा में प्रचलित पाठ का अनुसरण करना उचित है। अलग पाठ मिलने पर उसे तुरंत गलत मानने के बजाय पाठांतर के रूप में समझना चाहिए।
निष्कर्ष
भगवान श्रीकृष्ण के 108 नाम उनके बाल स्वरूप, गोपाल रूप, वृंदावन की मधुर लीलाओं, मथुरा और द्वारका के जीवन तथा महाभारत में उनके दिव्य मार्गदर्शक स्वरूप का सुंदर स्मरण कराते हैं।
यशोदावत्सल बाल कृष्ण से लेकर गोविन्द, गोवर्धनधारी, द्वारकानायक, पार्थसारथि और जगद्गुरु तक, श्रीकृष्ण के अनेक रूप इन नामों में दिखाई देते हैं।
श्रद्धा और भक्तिभाव से इन नामों का पाठ करते हुए प्रत्येक नाम के अर्थ पर मनन करना भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति और उनके स्वरूप का स्मरण करने का एक सुंदर माध्यम हो सकता है।
ॐ श्रीकृष्णाय नमः।
जय श्रीकृष्ण।
