विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र (Vishnu Sahasranamam)

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शेषनाग पर विराजमान भगवान विष्णु के दिव्य स्वरूप के साथ विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र

विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र (Vishnu Sahasranamam)

विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र (Vishnu Sahasranamam) – संपूर्ण पाठ, अर्थ, महत्व, लाभ एवं पाठ विधि

विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र क्या है?

विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र भगवान श्रीहरि विष्णु के एक हजार दिव्य नामों का पवित्र स्तोत्र है, जिसका वर्णन महाभारत के अनुशासन पर्व में मिलता है। भीष्म पितामह ने धर्मराज युधिष्ठिर को इस स्तोत्र का उपदेश देते हुए बताया कि भगवान विष्णु के नामों का श्रद्धापूर्वक स्मरण करने से मनुष्य को आध्यात्मिक शांति, धर्म, यश, भय से मुक्ति तथा भगवान की कृपा प्राप्त होती है।


परिचय

सनातन धर्म में भगवान विष्णु को सृष्टि का पालनकर्ता, धर्म का रक्षक तथा समस्त प्राणियों का हितैषी माना गया है। जब भी पृथ्वी पर अधर्म बढ़ता है और धर्म की हानि होने लगती है, तब भगवान विष्णु विभिन्न अवतार धारण करके धर्म की पुनः स्थापना करते हैं। श्रीराम, श्रीकृष्ण, वामन, नरसिंह और मत्स्य जैसे दिव्य अवतार भगवान विष्णु की इसी करुणा और लोककल्याण की भावना के प्रतीक हैं।

भगवान विष्णु की उपासना के अनेक साधन बताए गए हैं, जिनमें मंत्र-जप, नाम-स्मरण, पूजा, ध्यान, व्रत तथा स्तोत्र-पाठ प्रमुख हैं। इन सभी में विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र का स्थान अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है। यह केवल एक स्तोत्र नहीं, बल्कि भगवान विष्णु के अनंत गुणों, शक्तियों और दिव्य स्वरूप का सार है।

“सहस्रनाम” का अर्थ है—एक हजार नाम। इन नामों में भगवान के पालनकर्ता, करुणामय, सर्वव्यापक, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान और भक्तवत्सल स्वरूप का वर्णन मिलता है। प्रत्येक नाम अपने भीतर एक गहरा आध्यात्मिक संदेश समेटे हुए है और भक्त को ईश्वर के विभिन्न स्वरूपों का स्मरण कराता है।

आज भी लाखों श्रद्धालु प्रतिदिन या विशेष अवसरों पर विष्णु सहस्रनाम का पाठ करते हैं। विशेष रूप से एकादशी, गुरुवार, वैकुण्ठ एकादशी, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी और भगवान विष्णु की पूजा के समय इसका पाठ अत्यंत शुभ माना जाता है।


विष्णु सहस्रनाम का अर्थ

‘विष्णु’ शब्द का अर्थ है—जो सम्पूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त हैं, जो प्रत्येक जीव और प्रत्येक कण में विद्यमान हैं।

‘सहस्र’ का अर्थ है—एक हजार।

‘नाम’ का अर्थ है—दिव्य नाम या गुणों का परिचय।

इस प्रकार विष्णु सहस्रनाम का शाब्दिक अर्थ है—

“भगवान विष्णु के एक हजार दिव्य नामों का पवित्र संग्रह।”

इन नामों के माध्यम से भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप, उनके गुण, उनकी लीलाएँ, उनकी करुणा, धर्म की रक्षा, भक्तों के प्रति उनका प्रेम तथा संपूर्ण सृष्टि के संचालन में उनकी भूमिका का वर्णन किया गया है।


विष्णु सहस्रनाम का इतिहास

विष्णु सहस्रनाम की उत्पत्ति का संबंध महाभारत के अनुशासन पर्व से है। महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था। कौरवों का विनाश हो गया था और पांडवों को विजय प्राप्त हुई, किंतु इस विजय के बाद भी धर्मराज युधिष्ठिर के मन में अनेक प्रश्न थे।

युद्ध में असंख्य लोगों की मृत्यु होने से वे अत्यंत व्यथित थे। उन्हें यह चिंता भी थी कि अब राज्य का संचालन किस प्रकार धर्म के अनुसार किया जाए और मनुष्य को जीवन में सर्वोच्च कल्याण किस साधन से प्राप्त हो सकता है।

उस समय भीष्म पितामह बाणों की शैया पर लेटे हुए थे। भगवान श्रीकृष्ण की आज्ञा से धर्मराज युधिष्ठिर अपने भाइयों, ऋषियों और श्रीकृष्ण के साथ भीष्म पितामह के पास पहुँचे और उनसे धर्म, मोक्ष तथा जीवन के परम रहस्यों के विषय में प्रश्न किए।

इन्हीं प्रश्नों के उत्तर में भीष्म पितामह ने भगवान विष्णु की महिमा का वर्णन करते हुए विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र का उपदेश दिया।


धर्मराज युधिष्ठिर के प्रश्न

महाभारत के अनुशासन पर्व में युधिष्ठिर ने भीष्म पितामह से अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न पूछे। उनका उद्देश्य केवल व्यक्तिगत कल्याण नहीं था, बल्कि सम्पूर्ण मानव समाज के लिए ऐसा मार्ग जानना था जिससे हर व्यक्ति जीवन में सुख, शांति और मोक्ष प्राप्त कर सके।

उन्होंने पूछा—

  • इस संसार में सर्वोच्च देव कौन हैं?
  • मनुष्य को किसकी उपासना करनी चाहिए?
  • किसका स्मरण करने से सभी दुःख दूर होते हैं?
  • कौन-सा जप मनुष्य को जन्म-मरण के बंधन से मुक्त करता है?
  • सभी धर्मों में सबसे श्रेष्ठ धर्म कौन-सा है?

ये प्रश्न आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने महाभारत काल में थे।


भीष्म पितामह का उत्तर

धर्मराज युधिष्ठिर के प्रश्नों का उत्तर देते हुए भीष्म पितामह ने भगवान विष्णु को समस्त लोकों का स्वामी, देवताओं के देव, जगत के पालनकर्ता तथा परम पुरुष बताया।

उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति भगवान विष्णु के हजार नामों का श्रद्धा और भक्ति के साथ स्मरण करता है, वह जीवन के अनेक कष्टों से मुक्ति प्राप्त कर सकता है और उसका मन धर्म तथा ईश्वर की भक्ति में स्थिर होता है।

भीष्म पितामह ने यह भी बताया कि भगवान विष्णु के नामों का जप केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का सरल और प्रभावी साधन है।


विष्णु सहस्रनाम की रचना किसने की?

विष्णु सहस्रनाम महाभारत का अभिन्न अंग है। महाभारत की रचना महर्षि वेदव्यास ने की थी।

हालाँकि विष्णु सहस्रनाम का उपदेश भीष्म पितामह ने धर्मराज युधिष्ठिर को दिया था, इसलिए परंपरा में इसका श्रेय उपदेशकर्ता के रूप में भीष्म पितामह को दिया जाता है, जबकि इसे महाभारत में संकलित करने का श्रेय महर्षि वेदव्यास को प्राप्त है।


श्री विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र (संपूर्ण पाठ)

 

श्री विष्णु सहस्र नाम स्तोत्रम्

ॐ शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥ 1 ॥

यस्यद्विरदवक्त्राद्याः पारिषद्याः परः शतम् ।
विघ्नं निघ्नन्ति सततं विष्वक्सेनं तमाश्रये ॥ 2 ॥

पूर्व पीठिका
व्यासं वसिष्ठ नप्तारं शक्तेः पौत्रमकल्मषम् ।
पराशरात्मजं वन्दे शुकतातं तपोनिधिम् ॥ 3 ॥

व्यासाय विष्णु रूपाय व्यासरूपाय विष्णवे ।
नमो वै ब्रह्मनिधये वासिष्ठाय नमो नमः ॥ 4 ॥

अविकाराय शुद्धाय नित्याय परमात्मने ।
सदैक रूप रूपाय विष्णवे सर्वजिष्णवे ॥ 5 ॥

यस्य स्मरणमात्रेण जन्मसंसारबन्धनात् ।
विमुच्यते नमस्तस्मै विष्णवे प्रभविष्णवे ॥ 6 ॥

ॐ नमो विष्णवे प्रभविष्णवे ।

श्री वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वा धर्मा नशेषेण पावनानि च सर्वशः ।
युधिष्ठिरः शान्तनवं पुनरेवाभ्य भाषत ॥ 7 ॥

युधिष्ठिर उवाच
किमेकं दैवतं लोके किं वाऽप्येकं परायणं
स्तुवन्तः कं कमर्चन्तः प्राप्नुयुर्मानवाः शुभम् ॥ 8 ॥

को धर्मः सर्वधर्माणां भवतः परमो मतः ।
किं जपन्मुच्यते जन्तुर्जन्मसंसार बन्धनात् ॥ 9 ॥

श्री भीष्म उवाच
जगत्प्रभुं देवदेव मनन्तं पुरुषोत्तमम् ।
स्तुवन्नाम सहस्रेण पुरुषः सततोत्थितः ॥ 10 ॥

तमेव चार्चयन्नित्यं भक्त्या पुरुषमव्ययम् ।
ध्यायन् स्तुवन्नमस्यंश्च यजमानस्तमेव च ॥ 11 ॥

अनादि निधनं विष्णुं सर्वलोक महेश्वरम् ।
लोकाध्यक्षं स्तुवन्नित्यं सर्व दुःखातिगो भवेत् ॥ 12 ॥

ब्रह्मण्यं सर्व धर्मज्ञं लोकानां कीर्ति वर्धनम् ।
लोकनाथं महद्भूतं सर्वभूत भवोद्भवम्॥ 13 ॥

एष मे सर्व धर्माणां धर्मोऽधिक तमोमतः ।
यद्भक्त्या पुण्डरीकाक्षं स्तवैरर्चेन्नरः सदा ॥ 14 ॥

परमं यो महत्तेजः परमं यो महत्तपः ।
परमं यो महद्ब्रह्म परमं यः परायणम् ॥ 15 ॥

पवित्राणां पवित्रं यो मङ्गलानां च मङ्गलम् ।
दैवतं देवतानां च भूतानां योऽव्ययः पिता ॥ 16 ॥

यतः सर्वाणि भूतानि भवन्त्यादि युगागमे ।
यस्मिंश्च प्रलयं यान्ति पुनरेव युगक्षये ॥ 17 ॥

तस्य लोक प्रधानस्य जगन्नाथस्य भूपते ।
विष्णोर्नाम सहस्रं मे श्रुणु पाप भयापहम् ॥ 18 ॥

यानि नामानि गौणानि विख्यातानि महात्मनः ।
ऋषिभिः परिगीतानि तानि वक्ष्यामि भूतये ॥ 19 ॥

ऋषिर्नाम्नां सहस्रस्य वेदव्यासो महामुनिः ॥
छन्दोऽनुष्टुप् तथा देवो भगवान् देवकीसुतः ॥ 20 ॥

अमृतां शूद्भवो बीजं शक्तिर्देवकिनन्दनः ।
त्रिसामा हृदयं तस्य शान्त्यर्थे विनियुज्यते ॥ 21 ॥

विष्णुं जिष्णुं महाविष्णुं प्रभविष्णुं महेश्वरम् ॥
अनेकरूप दैत्यान्तं नमामि पुरुषोत्तमम् ॥ 22 ॥

पूर्वन्यासः
अस्य श्री विष्णोर्दिव्य सहस्रनाम स्तोत्र महामन्त्रस्य ॥
श्री वेदव्यासो भगवान् ऋषिः ।
अनुष्टुप् छन्दः ।
श्रीमहाविष्णुः परमात्मा श्रीमन्नारायणो देवता ।
अमृतांशूद्भवो भानुरिति बीजम् ।
देवकीनन्दनः स्रष्टेति शक्तिः ।
उद्भवः, क्षोभणो देव इति परमोमन्त्रः ।
शङ्खभृन्नन्दकी चक्रीति कीलकम् ।
शार्​ङ्गधन्वा गदाधर इत्यस्त्रम् ।
रथाङ्गपाणि रक्षोभ्य इति नेत्रम् ।
त्रिसामासामगः सामेति कवचम् ।
आनन्दं परब्रह्मेति योनिः ।
ऋतुस्सुदर्शनः काल इति दिग्बन्धः ॥
श्रीविश्वरूप इति ध्यानम् ।
श्री महाविष्णु प्रीत्यर्थे सहस्रनाम जपे पारायणे विनियोगः ।

करन्यासः
विश्वं विष्णुर्वषट्कार इत्यङ्गुष्ठाभ्यां नमः
अमृतां शूद्भवो भानुरिति तर्जनीभ्यां नमः
ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृत् ब्रह्मेति मध्यमाभ्यां नमः
सुवर्णबिन्दु रक्षोभ्य इति अनामिकाभ्यां नमः
निमिषोऽनिमिषः स्रग्वीति कनिष्ठिकाभ्यां नमः
रथाङ्गपाणि रक्षोभ्य इति करतल करपृष्ठाभ्यां नमः

अङ्गन्यासः
सुव्रतः सुमुखः सूक्ष्म इति ज्ञानाय हृदयाय नमः
सहस्रमूर्तिः विश्वात्मा इति ऐश्वर्याय शिरसे स्वाहा
सहस्रार्चिः सप्तजिह्व इति शक्त्यै शिखायै वषट्
त्रिसामा सामगस्सामेति बलाय कवचाय हुं
रथाङ्गपाणि रक्षोभ्य इति नेत्राभ्यां वौषट्
शाङ्गधन्वा गदाधर इति वीर्याय अस्त्रायफट्
ऋतुः सुदर्शनः काल इति दिग्भन्धः

ध्यानम्
क्षीरोधन्वत्प्रदेशे शुचिमणि-विलस-त्सैकते-मौक्तिकानां
माला-कॢप्तासनस्थः स्फटिक-मणिनिभै-र्मौक्तिकै-र्मण्डिताङ्गः ।
शुभ्रै-रभ्रै-रदभ्रै-रुपरिविरचितै-र्मुक्त पीयूष वर्षैः
आनन्दी नः पुनीया-दरिनलिनगदा शङ्खपाणि-र्मुकुन्दः ॥ 1 ॥

भूः पादौ यस्य नाभिर्विय-दसुर निलश्चन्द्र सूर्यौ च नेत्रे
कर्णावाशाः शिरोद्यौर्मुखमपि दहनो यस्य वास्तेयमब्धिः ।
अन्तःस्थं यस्य विश्वं सुर नरखगगोभोगि गन्धर्वदैत्यैः
चित्रं रं रम्यते तं त्रिभुवन वपुशं विष्णुमीशं नमामि ॥ 2 ॥

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् ।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिहृर्ध्यानगम्यम्
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥ 3 ॥

मेघश्यामं पीतकौशेयवासं
श्रीवत्साकं कौस्तुभोद्भासिताङ्गम् ।
पुण्योपेतं पुण्डरीकायताक्षं
विष्णुं वन्दे सर्वलोकैकनाथम् ॥ 4 ॥

नमः समस्त भूतानां आदि भूताय भूभृते ।
अनेकरूप रूपाय विष्णवे प्रभविष्णवे ॥ 5॥

सशङ्खचक्रं सकिरीटकुण्डलं
सपीतवस्त्रं सरसीरुहेक्षणम् ।
सहार वक्षःस्थल शोभि कौस्तुभं
नमामि विष्णुं शिरसा चतुर्भुजम् । 6॥

छायायां पारिजातस्य हेमसिंहासनोपरि
आसीनमम्बुदश्याममायताक्षमलङ्कृतम् ॥ 7 ॥

चन्द्राननं चतुर्बाहुं श्रीवत्साङ्कित वक्षसम्
रुक्मिणी सत्यभामाभ्यां सहितं कृष्णमाश्रये ॥ 8 ॥

पञ्चपूज
लं – पृथिव्यात्मने गन्धं समर्पयामि
हं – आकाशात्मने पुष्पैः पूजयामि
यं – वाय्वात्मने धूपमाघ्रापयामि
रं – अग्न्यात्मने दीपं दर्शयामि
वं – अमृतात्मने नैवेद्यं निवेदयामि
सं – सर्वात्मने सर्वोपचार पूजा नमस्कारान् समर्पयामि

स्तोत्रम्

हरिः ओम्

विश्वं विष्णुर्वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः ।
भूतकृद्भूतभृद्भावो भूतात्मा भूतभावनः ॥ 1 ॥

पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमागतिः ।
अव्ययः पुरुषः साक्षी क्षेत्रज्ञोऽक्षर एव च ॥ 2 ॥

योगो योगविदां नेता प्रधान पुरुषेश्वरः ।
नारसिंहवपुः श्रीमान् केशवः पुरुषोत्तमः ॥ 3 ॥

सर्वः शर्वः शिवः स्थाणुर्भूतादिर्निधिरव्ययः ।
सम्भवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभुरीश्वरः ॥ 4 ॥

स्वयम्भूः शम्भुरादित्यः पुष्कराक्षो महास्वनः ।
अनादिनिधनो धाता विधाता धातुरुत्तमः ॥ 5 ॥

अप्रमेयो हृषीकेशः पद्मनाभोऽमरप्रभुः ।
विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टा स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः ॥ 6 ॥

अग्राह्यः शाश्वतो कृष्णो लोहिताक्षः प्रतर्दनः ।
प्रभूतस्त्रिककुब्धाम पवित्रं मङ्गलं परम् ॥ 7 ॥

ईशानः प्राणदः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठः प्रजापतिः ।
हिरण्यगर्भो भूगर्भो माधवो मधुसूदनः ॥ 8 ॥

ईश्वरो विक्रमीधन्वी मेधावी विक्रमः क्रमः ।
अनुत्तमो दुराधर्षः कृतज्ञः कृतिरात्मवान्॥ 9 ॥

सुरेशः शरणं शर्म विश्वरेताः प्रजाभवः ।
अहस्संवत्सरो व्यालः प्रत्ययः सर्वदर्शनः ॥ 10 ॥

अजस्सर्वेश्वरः सिद्धः सिद्धिः सर्वादिरच्युतः ।
वृषाकपिरमेयात्मा सर्वयोगविनिस्सृतः ॥ 11 ॥

वसुर्वसुमनाः सत्यः समात्मा सम्मितस्समः ।
अमोघः पुण्डरीकाक्षो वृषकर्मा वृषाकृतिः ॥ 12 ॥

रुद्रो बहुशिरा बभ्रुर्विश्वयोनिः शुचिश्रवाः ।
अमृतः शाश्वतस्थाणुर्वरारोहो महातपाः ॥ 13 ॥

सर्वगः सर्व विद्भानुर्विष्वक्सेनो जनार्दनः ।
वेदो वेदविदव्यङ्गो वेदाङ्गो वेदवित्कविः ॥ 14 ॥

लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षः कृताकृतः ।
चतुरात्मा चतुर्व्यूहश्चतुर्दंष्ट्रश्चतुर्भुजः ॥ 15 ॥

भ्राजिष्णुर्भोजनं भोक्ता सहिष्णुर्जगदादिजः ।
अनघो विजयो जेता विश्वयोनिः पुनर्वसुः ॥ 16 ॥

उपेन्द्रो वामनः प्रांशुरमोघः शुचिरूर्जितः ।
अतीन्द्रः सङ्ग्रहः सर्गो धृतात्मा नियमो यमः ॥ 17 ॥

वेद्यो वैद्यः सदायोगी वीरहा माधवो मधुः ।
अतीन्द्रियो महामायो महोत्साहो महाबलः ॥ 18 ॥

महाबुद्धिर्महावीर्यो महाशक्तिर्महाद्युतिः ।
अनिर्देश्यवपुः श्रीमानमेयात्मा महाद्रिधृक् ॥ 19 ॥

महेश्वासो महीभर्ता श्रीनिवासः सताङ्गतिः ।
अनिरुद्धः सुरानन्दो गोविन्दो गोविदां पतिः ॥ 20 ॥

मरीचिर्दमनो हंसः सुपर्णो भुजगोत्तमः ।
हिरण्यनाभः सुतपाः पद्मनाभः प्रजापतिः ॥ 21 ॥

अमृत्युः सर्वदृक् सिंहः सन्धाता सन्धिमान् स्थिरः ।
अजो दुर्मर्षणः शास्ता विश्रुतात्मा सुरारिहा ॥ 22 ॥

गुरुर्गुरुतमो धाम सत्यः सत्यपराक्रमः ।
निमिषोऽनिमिषः स्रग्वी वाचस्पतिरुदारधीः ॥ 23 ॥

अग्रणीग्रामणीः श्रीमान् न्यायो नेता समीरणः
सहस्रमूर्धा विश्वात्मा सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥ 24 ॥

आवर्तनो निवृत्तात्मा संवृतः सम्प्रमर्दनः ।
अहः संवर्तको वह्निरनिलो धरणीधरः ॥ 25 ॥

सुप्रसादः प्रसन्नात्मा विश्वधृग्विश्वभुग्विभुः ।
सत्कर्ता सत्कृतः साधुर्जह्नुर्नारायणो नरः ॥ 26 ॥

असङ्ख्येयोऽप्रमेयात्मा विशिष्टः शिष्टकृच्छुचिः ।
सिद्धार्थः सिद्धसङ्कल्पः सिद्धिदः सिद्धि साधनः ॥ 27 ॥

वृषाही वृषभो विष्णुर्वृषपर्वा वृषोदरः ।
वर्धनो वर्धमानश्च विविक्तः श्रुतिसागरः ॥ 28 ॥

सुभुजो दुर्धरो वाग्मी महेन्द्रो वसुदो वसुः ।
नैकरूपो बृहद्रूपः शिपिविष्टः प्रकाशनः ॥ 29 ॥

ओजस्तेजोद्युतिधरः प्रकाशात्मा प्रतापनः ।
ऋद्दः स्पष्टाक्षरो मन्त्रश्चन्द्रांशुर्भास्करद्युतिः ॥ 30 ॥

अमृतांशूद्भवो भानुः शशबिन्दुः सुरेश्वरः ।
औषधं जगतः सेतुः सत्यधर्मपराक्रमः ॥ 31 ॥

भूतभव्यभवन्नाथः पवनः पावनोऽनलः ।
कामहा कामकृत्कान्तः कामः कामप्रदः प्रभुः ॥ 32 ॥

युगादि कृद्युगावर्तो नैकमायो महाशनः ।
अदृश्यो व्यक्तरूपश्च सहस्रजिदनन्तजित् ॥ 33 ॥

इष्टोऽविशिष्टः शिष्टेष्टः शिखण्डी नहुषो वृषः ।
क्रोधहा क्रोधकृत्कर्ता विश्वबाहुर्महीधरः ॥ 34 ॥

अच्युतः प्रथितः प्राणः प्राणदो वासवानुजः ।
अपान्निधिरधिष्ठानमप्रमत्तः प्रतिष्ठितः ॥ 35 ॥

स्कन्दः स्कन्दधरो धुर्यो वरदो वायुवाहनः ।
वासुदेवो बृहद्भानुरादिदेवः पुरन्धरः ॥ 36 ॥

अशोकस्तारणस्तारः शूरः शौरिर्जनेश्वरः ।
अनुकूलः शतावर्तः पद्मी पद्मनिभेक्षणः ॥ 37 ॥

पद्मनाभोऽरविन्दाक्षः पद्मगर्भः शरीरभृत् ।
महर्धिरृद्धो वृद्धात्मा महाक्षो गरुडध्वजः ॥ 38 ॥

अतुलः शरभो भीमः समयज्ञो हविर्हरिः ।
सर्वलक्षणलक्षण्यो लक्ष्मीवान् समितिञ्जयः ॥ 39 ॥

विक्षरो रोहितो मार्गो हेतुर्दामोदरः सहः ।
महीधरो महाभागो वेगवानमिताशनः ॥ 40 ॥

उद्भवः, क्षोभणो देवः श्रीगर्भः परमेश्वरः ।
करणं कारणं कर्ता विकर्ता गहनो गुहः ॥ 41 ॥

व्यवसायो व्यवस्थानः संस्थानः स्थानदो ध्रुवः ।
परर्धिः परमस्पष्टः तुष्टः पुष्टः शुभेक्षणः ॥ 42 ॥

रामो विरामो विरजो मार्गोनेयो नयोऽनयः ।
वीरः शक्तिमतां श्रेष्ठो धर्मोधर्म विदुत्तमः ॥ 43 ॥

वैकुण्ठः पुरुषः प्राणः प्राणदः प्रणवः पृथुः ।
हिरण्यगर्भः शत्रुघ्नो व्याप्तो वायुरधोक्षजः ॥ 44 ॥

ऋतुः सुदर्शनः कालः परमेष्ठी परिग्रहः ।
उग्रः संवत्सरो दक्षो विश्रामो विश्वदक्षिणः ॥ 45 ॥

विस्तारः स्थावर स्थाणुः प्रमाणं बीजमव्ययम् ।
अर्थोऽनर्थो महाकोशो महाभोगो महाधनः ॥ 46 ॥

अनिर्विण्णः स्थविष्ठो भूर्धर्मयूपो महामखः ।
नक्षत्रनेमिर्नक्षत्री क्षमः, क्षामः समीहनः ॥ 47 ॥

यज्ञ इज्यो महेज्यश्च क्रतुः सत्रं सताङ्गतिः ।
सर्वदर्शी विमुक्तात्मा सर्वज्ञो ज्ञानमुत्तमम् ॥ 48 ॥

सुव्रतः सुमुखः सूक्ष्मः सुघोषः सुखदः सुहृत् ।
मनोहरो जितक्रोधो वीर बाहुर्विदारणः ॥ 49 ॥

स्वापनः स्ववशो व्यापी नैकात्मा नैककर्मकृत्। ।
वत्सरो वत्सलो वत्सी रत्नगर्भो धनेश्वरः ॥ 50 ॥

धर्मगुब्धर्मकृद्धर्मी सदसत्क्षरमक्षरम्॥
अविज्ञाता सहस्त्रांशुर्विधाता कृतलक्षणः ॥ 51 ॥

गभस्तिनेमिः सत्त्वस्थः सिंहो भूत महेश्वरः ।
आदिदेवो महादेवो देवेशो देवभृद्गुरुः ॥ 52 ॥

उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः ।
शरीर भूतभृद् भोक्ता कपीन्द्रो भूरिदक्षिणः ॥ 53 ॥

सोमपोऽमृतपः सोमः पुरुजित् पुरुसत्तमः ।
विनयो जयः सत्यसन्धो दाशार्हः सात्वतां पतिः ॥ 54 ॥

जीवो विनयिता साक्षी मुकुन्दोऽमित विक्रमः ।
अम्भोनिधिरनन्तात्मा महोदधि शयोन्तकः ॥ 55 ॥

अजो महार्हः स्वाभाव्यो जितामित्रः प्रमोदनः ।
आनन्दोऽनन्दनोनन्दः सत्यधर्मा त्रिविक्रमः ॥ 56 ॥

महर्षिः कपिलाचार्यः कृतज्ञो मेदिनीपतिः ।
त्रिपदस्त्रिदशाध्यक्षो महाशृङ्गः कृतान्तकृत् ॥ 57 ॥

महावराहो गोविन्दः सुषेणः कनकाङ्गदी ।
गुह्यो गभीरो गहनो गुप्तश्चक्र गदाधरः ॥ 58 ॥

वेधाः स्वाङ्गोऽजितः कृष्णो दृढः सङ्कर्षणोऽच्युतः ।
वरुणो वारुणो वृक्षः पुष्कराक्षो महामनाः ॥ 59 ॥

भगवान् भगहाऽऽनन्दी वनमाली हलायुधः ।
आदित्यो ज्योतिरादित्यः सहिष्णुर्गतिसत्तमः ॥ 60 ॥

सुधन्वा खण्डपरशुर्दारुणो द्रविणप्रदः ।
दिवःस्पृक् सर्वदृग्व्यासो वाचस्पतिरयोनिजः ॥ 61 ॥

त्रिसामा सामगः साम निर्वाणं भेषजं भिषक् ।
सन्यासकृच्छमः शान्तो निष्ठा शान्तिः परायणम्। 62 ॥

शुभाङ्गः शान्तिदः स्रष्टा कुमुदः कुवलेशयः ।
गोहितो गोपतिर्गोप्ता वृषभाक्षो वृषप्रियः ॥ 63 ॥

अनिवर्ती निवृत्तात्मा सङ्क्षेप्ता क्षेमकृच्छिवः ।
श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासः श्रीपतिः श्रीमतांवरः ॥ 64 ॥

श्रीदः श्रीशः श्रीनिवासः श्रीनिधिः श्रीविभावनः ।
श्रीधरः श्रीकरः श्रेयः श्रीमाँल्लोकत्रयाश्रयः ॥ 65 ॥

स्वक्षः स्वङ्गः शतानन्दो नन्दिर्ज्योतिर्गणेश्वरः ।
विजितात्माऽविधेयात्मा सत्कीर्तिच्छिन्नसंशयः ॥ 66 ॥

उदीर्णः सर्वतश्चक्षुरनीशः शाश्वतस्थिरः ।
भूशयो भूषणो भूतिर्विशोकः शोकनाशनः ॥ 67 ॥

अर्चिष्मानर्चितः कुम्भो विशुद्धात्मा विशोधनः ।
अनिरुद्धोऽप्रतिरथः प्रद्युम्नोऽमितविक्रमः ॥ 68 ॥

कालनेमिनिहा वीरः शौरिः शूरजनेश्वरः ।
त्रिलोकात्मा त्रिलोकेशः केशवः केशिहा हरिः ॥ 69 ॥

कामदेवः कामपालः कामी कान्तः कृतागमः ।
अनिर्देश्यवपुर्विष्णुर्वीरोऽनन्तो धनञ्जयः ॥ 70 ॥

ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद् ब्रह्मा ब्रह्म ब्रह्मविवर्धनः ।
ब्रह्मविद् ब्राह्मणो ब्रह्मी ब्रह्मज्ञो ब्राह्मणप्रियः ॥ 71 ॥

महाक्रमो महाकर्मा महातेजा महोरगः ।
महाक्रतुर्महायज्वा महायज्ञो महाहविः ॥ 72 ॥

स्तव्यः स्तवप्रियः स्तोत्रं स्तुतिः स्तोता रणप्रियः ।
पूर्णः पूरयिता पुण्यः पुण्यकीर्तिरनामयः ॥ 73 ॥

मनोजवस्तीर्थकरो वसुरेता वसुप्रदः ।
वसुप्रदो वासुदेवो वसुर्वसुमना हविः ॥ 74 ॥

सद्गतिः सत्कृतिः सत्ता सद्भूतिः सत्परायणः ।
शूरसेनो यदुश्रेष्ठः सन्निवासः सुयामुनः ॥ 75 ॥

भूतावासो वासुदेवः सर्वासुनिलयोऽनलः ।
दर्पहा दर्पदो दृप्तो दुर्धरोऽथापराजितः ॥ 76 ॥

विश्वमूर्तिर्महामूर्तिर्दीप्तमूर्तिरमूर्तिमान् ।
अनेकमूर्तिरव्यक्तः शतमूर्तिः शताननः ॥ 77 ॥

एको नैकः स्तवः कः किं यत्तत् पदमनुत्तमम् ।
लोकबन्धुर्लोकनाथो माधवो भक्तवत्सलः ॥ 78 ॥

सुवर्णवर्णो हेमाङ्गो वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी ।
वीरहा विषमः शून्यो घृताशीरचलश्चलः ॥ 79 ॥

अमानी मानदो मान्यो लोकस्वामी त्रिलोकधृत् ।
सुमेधा मेधजो धन्यः सत्यमेधा धराधरः ॥ 80 ॥

तेजोऽवृषो द्युतिधरः सर्वशस्त्रभृतांवरः ।
प्रग्रहो निग्रहो व्यग्रो नैकशृङ्गो गदाग्रजः ॥ 81 ॥

चतुर्मूर्ति श्चतुर्बाहु श्चतुर्व्यूह श्चतुर्गतिः ।
चतुरात्मा चतुर्भावश्चतुर्वेदविदेकपात् ॥ 82 ॥

समावर्तोऽनिवृत्तात्मा दुर्जयो दुरतिक्रमः ।
दुर्लभो दुर्गमो दुर्गो दुरावासो दुरारिहा ॥ 83 ॥

शुभाङ्गो लोकसारङ्गः सुतन्तुस्तन्तुवर्धनः ।
इन्द्रकर्मा महाकर्मा कृतकर्मा कृतागमः ॥ 84 ॥

उद्भवः सुन्दरः सुन्दो रत्ननाभः सुलोचनः ।
अर्को वाजसनः शृङ्गी जयन्तः सर्वविज्जयी ॥ 85 ॥

सुवर्णबिन्दुरक्षोभ्यः सर्ववागीश्वरेश्वरः ।
महाहृदो महागर्तो महाभूतो महानिधिः ॥ 86 ॥

कुमुदः कुन्दरः कुन्दः पर्जन्यः पावनोऽनिलः ।
अमृताशोऽमृतवपुः सर्वज्ञः सर्वतोमुखः ॥ 87 ॥

सुलभः सुव्रतः सिद्धः शत्रुजिच्छत्रुतापनः ।
न्यग्रोधोऽदुम्बरोऽश्वत्थश्चाणूरान्ध्र निषूदनः ॥ 88 ॥

सहस्रार्चिः सप्तजिह्वः सप्तैधाः सप्तवाहनः ।
अमूर्तिरनघोऽचिन्त्यो भयकृद्भयनाशनः ॥ 89 ॥

अणुर्बृहत्कृशः स्थूलो गुणभृन्निर्गुणो महान् ।
अधृतः स्वधृतः स्वास्यः प्राग्वंशो वंशवर्धनः ॥ 90 ॥

भारभृत् कथितो योगी योगीशः सर्वकामदः ।
आश्रमः श्रमणः, क्षामः सुपर्णो वायुवाहनः ॥ 91 ॥

धनुर्धरो धनुर्वेदो दण्डो दमयिता दमः ।
अपराजितः सर्वसहो नियन्ताऽनियमोऽयमः ॥ 92 ॥

सत्त्ववान् सात्त्विकः सत्यः सत्यधर्मपरायणः ।
अभिप्रायः प्रियार्होऽर्हः प्रियकृत् प्रीतिवर्धनः ॥ 93 ॥

विहायसगतिर्ज्योतिः सुरुचिर्हुतभुग्विभुः ।
रविर्विरोचनः सूर्यः सविता रविलोचनः ॥ 94 ॥

अनन्तो हुतभुग्भोक्ता सुखदो नैकजोऽग्रजः ।
अनिर्विण्णः सदामर्षी लोकधिष्ठानमद्भुतः ॥ 95 ॥

सनात्सनातनतमः कपिलः कपिरव्ययः ।
स्वस्तिदः स्वस्तिकृत्स्वस्तिः स्वस्तिभुक् स्वस्तिदक्षिणः ॥ 96 ॥

अरौद्रः कुण्डली चक्री विक्रम्यूर्जितशासनः ।
शब्दातिगः शब्दसहः शिशिरः शर्वरीकरः ॥ 97 ॥

अक्रूरः पेशलो दक्षो दक्षिणः, क्षमिणांवरः ।
विद्वत्तमो वीतभयः पुण्यश्रवणकीर्तनः ॥ 98 ॥

उत्तारणो दुष्कृतिहा पुण्यो दुःस्वप्ननाशनः ।
वीरहा रक्षणः सन्तो जीवनः पर्यवस्थितः ॥ 99 ॥

अनन्तरूपोऽनन्त श्रीर्जितमन्युर्भयापहः ।
चतुरश्रो गभीरात्मा विदिशो व्यादिशो दिशः ॥ 100 ॥

अनादिर्भूर्भुवो लक्ष्मीः सुवीरो रुचिराङ्गदः ।
जननो जनजन्मादिर्भीमो भीमपराक्रमः ॥ 101 ॥

आधारनिलयोऽधाता पुष्पहासः प्रजागरः ।
ऊर्ध्वगः सत्पथाचारः प्राणदः प्रणवः पणः ॥ 102 ॥

प्रमाणं प्राणनिलयः प्राणभृत् प्राणजीवनः ।
तत्त्वं तत्त्वविदेकात्मा जन्ममृत्युजरातिगः ॥ 103 ॥

भूर्भुवः स्वस्तरुस्तारः सविता प्रपितामहः ।
यज्ञो यज्ञपतिर्यज्वा यज्ञाङ्गो यज्ञवाहनः ॥ 104 ॥

यज्ञभृद् यज्ञकृद् यज्ञी यज्ञभुक् यज्ञसाधनः ।
यज्ञान्तकृद् यज्ञगुह्यमन्नमन्नाद एव च ॥ 105 ॥

आत्मयोनिः स्वयञ्जातो वैखानः सामगायनः ।
देवकीनन्दनः स्रष्टा क्षितीशः पापनाशनः ॥ 106 ॥

शङ्खभृन्नन्दकी चक्री शार्​ङ्गधन्वा गदाधरः ।
रथाङ्गपाणिरक्षोभ्यः सर्वप्रहरणायुधः ॥ 107 ॥

श्री सर्वप्रहरणायुध ॐ नम इति ।

वनमाली गदी शार्​ङ्गी शङ्खी चक्री च नन्दकी ।
श्रीमान्नारायणो विष्णुर्वासुदेवोऽभिरक्षतु ॥ 108 ॥

श्री वासुदेवोऽभिरक्षतु ॐ नम इति ।

उत्तर पीठिका

फलश्रुतिः
इतीदं कीर्तनीयस्य केशवस्य महात्मनः ।
नाम्नां सहस्रं दिव्यानामशेषेण प्रकीर्तितम्। ॥ 1 ॥

य इदं शृणुयान्नित्यं यश्चापि परिकीर्तयेत्॥
नाशुभं प्राप्नुयात् किञ्चित्सोऽमुत्रेह च मानवः ॥ 2 ॥

वेदान्तगो ब्राह्मणः स्यात् क्षत्रियो विजयी भवेत् ।
वैश्यो धनसमृद्धः स्यात् शूद्रः सुखमवाप्नुयात् ॥ 3 ॥

धर्मार्थी प्राप्नुयाद्धर्ममर्थार्थी चार्थमाप्नुयात् ।
कामानवाप्नुयात् कामी प्रजार्थी चाप्नुयात्प्रजाम् ॥ 4 ॥ [प्राप्नुयात्प्रजाम्]

भक्तिमान् यः सदोत्थाय शुचिस्तद्गतमानसः ।
सहस्रं वासुदेवस्य नाम्नामेतत् प्रकीर्तयेत् ॥ 5 ॥

यशः प्राप्नोति विपुलं यातिप्राधान्यमेव च ।
अचलां श्रियमाप्नोति श्रेयः प्राप्नोत्यनुत्तमम्। ॥ 6 ॥

न भयं क्वचिदाप्नोति वीर्यं तेजश्च विन्दति ।
भवत्यरोगो द्युतिमान् बलरूप गुणान्वितः ॥ 7 ॥

रोगार्तो मुच्यते रोगाद्बद्धो मुच्येत बन्धनात् ।
भयान्मुच्येत भीतस्तु मुच्येतापन्न आपदः ॥ 8 ॥

दुर्गाण्यतितरत्याशु पुरुषः पुरुषोत्तमम् ।
स्तुवन्नामसहस्रेण नित्यं भक्तिसमन्वितः ॥ 9 ॥

वासुदेवाश्रयो मर्त्यो वासुदेवपरायणः ।
सर्वपापविशुद्धात्मा याति ब्रह्म सनातनम्। ॥ 10 ॥

न वासुदेव भक्तानामशुभं विद्यते क्वचित् ।
जन्ममृत्युजराव्याधिभयं नैवोपजायते ॥ 11 ॥

इमं स्तवमधीयानः श्रद्धाभक्तिसमन्वितः ।
युज्येतात्म सुखक्षान्ति श्रीधृति स्मृति कीर्तिभिः ॥ 12 ॥

न क्रोधो न च मात्सर्यं न लोभो नाशुभामतिः ।
भवन्ति कृतपुण्यानां भक्तानां पुरुषोत्तमे ॥ 13 ॥

द्यौः स-चन्द्रार्क नक्षत्रा खं दिशो भूर्महोदधिः ।
वासुदेवस्य वीर्येण विधृतानि महात्मनः ॥ 14 ॥

ससुरासुरगन्धर्वं सयक्षोरगराक्षसम् ।
जगद्वशे वर्ततेदं कृष्णस्य स चराचरम्। ॥ 15 ॥

इन्द्रियाणि मनोबुद्धिः सत्त्वं तेजो बलं धृतिः ।
वासुदेवात्मकान्याहुः, क्षेत्रं क्षेत्रज्ञ एव च ॥ 16 ॥

सर्वागमानामाचारः प्रथमं परिकल्पते ।
आचारप्रभवो धर्मो धर्मस्य प्रभुरच्युतः ॥ 17 ॥

ऋषयः पितरो देवा महाभूतानि धातवः ।
जङ्गमाजङ्गमं चेदं जगन्नारायणोद्भवम् ॥ 18 ॥

योगोज्ञानं तथा साङ्ख्यं विद्याः शिल्पादिकर्म च ।
वेदाः शास्त्राणि विज्ञानमेतत्सर्वं जनार्दनात् ॥ 19 ॥

एको विष्णुर्महद्भूतं पृथग्भूतान्यनेकशः ।
त्रींलोकान्व्याप्य भूतात्मा भुङ्क्ते विश्वभुगव्ययः ॥ 20 ॥

इमं स्तवं भगवतो विष्णोर्व्यासेन कीर्तितम् ।
पठेद्य इच्चेत्पुरुषः श्रेयः प्राप्तुं सुखानि च ॥ 21 ॥

विश्वेश्वरमजं देवं जगतः प्रभुमव्ययम्।
भजन्ति ये पुष्कराक्षं न ते यान्ति पराभवम् ॥ 22 ॥

न ते यान्ति पराभवं ॐ नम इति ।

अर्जुन उवाच
पद्मपत्र विशालाक्ष पद्मनाभ सुरोत्तम ।
भक्ताना मनुरक्तानां त्राता भव जनार्दन ॥ 23 ॥

श्रीभगवानुवाच
यो मां नामसहस्रेण स्तोतुमिच्छति पाण्डव ।
सोऽहमेकेन श्लोकेन स्तुत एव न संशयः ॥ 24 ॥

स्तुत एव न संशय ॐ नम इति ।

व्यास उवाच
वासनाद्वासुदेवस्य वासितं भुवनत्रयम् ।
सर्वभूतनिवासोऽसि वासुदेव नमोऽस्तु ते ॥ 25 ॥

श्रीवासुदेव नमोस्तुत ॐ नम इति ।

पार्वत्युवाच
केनोपायेन लघुना विष्णोर्नामसहस्रकम् ।
पठ्यते पण्डितैर्नित्यं श्रोतुमिच्छाम्यहं प्रभो ॥ 26 ॥

ईश्वर उवाच
श्रीराम राम रामेति रमे रामे मनोरमे ।
सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥ 27 ॥

श्रीराम नाम वरानन ॐ नम इति ।

ब्रह्मोवाच
नमोऽस्त्वनन्ताय सहस्रमूर्तये सहस्रपादाक्षिशिरोरुबाहवे ।
सहस्रनाम्ने पुरुषाय शाश्वते सहस्रकोटी युगधारिणे नमः ॥ 28 ॥

श्री सहस्रकोटी युगधारिणे नम ॐ नम इति ।

सञ्जय उवाच
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥ 29 ॥

श्री भगवान् उवाच
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्। ॥ 30 ॥

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥ 31 ॥

आर्ताः विषण्णाः शिथिलाश्च भीताः घोरेषु च व्याधिषु वर्तमानाः ।
सङ्कीर्त्य नारायणशब्दमात्रं विमुक्तदुःखाः सुखिनो भवन्ति ॥ 32 ॥

कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा बुद्ध्यात्मना वा प्रकृतेः स्वभावात् ।
करोमि यद्यत्सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयामि ॥ 33 ॥

यदक्षर पदभ्रष्टं मात्राहीनं तु यद्भवेत्
तत्सर्वं क्षम्यतां देव नारायण नमोऽस्तु ते ।
विसर्ग बिन्दु मात्राणि पदपादाक्षराणि च
न्यूनानि चातिरिक्तानि क्षमस्व पुरुषोत्तमः ॥

इति श्री महाभारते शतसाहस्रिकायां संहितायां वैयासिक्यामनुशासन पर्वान्तर्गत आनुशासनिक पर्वणि, मोक्षधर्मे भीष्म युधिष्ठिर संवादे श्री विष्णोर्दिव्य सहस्रनाम स्तोत्रं नामैकोन पञ्च शताधिक शततमोध्यायः ॥
श्री विष्णु सहस्रनाम स्तोत्रं समाप्तम् ॥
ॐ तत्सत् सर्वं श्री कृष्णार्पणमस्तु ॥

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विष्णु सहस्रनाम का आध्यात्मिक महत्व

सनातन धर्म में नाम-स्मरण को भगवान तक पहुँचने का सबसे सरल और प्रभावी मार्ग माना गया है। विष्णु सहस्रनाम इसी नाम-भक्ति की सर्वोच्च परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है। भगवान श्रीहरि के एक हजार नाम केवल संबोधन नहीं हैं, बल्कि प्रत्येक नाम उनके किसी न किसी दिव्य गुण, स्वरूप, शक्ति, लीला और तत्त्व का परिचय देता है।

जब भक्त श्रद्धा के साथ इन नामों का जप करता है, तो उसका मन धीरे-धीरे सांसारिक चिंताओं से हटकर भगवान की ओर केंद्रित होने लगता है। यही कारण है कि अनेक वैष्णव संत, आचार्य और विद्वान विष्णु सहस्रनाम को दैनिक साधना का महत्वपूर्ण अंग मानते हैं।


भगवान विष्णु के 1000 नामों का रहस्य

बहुत से लोगों के मन में प्रश्न आता है कि भगवान विष्णु के एक हजार नाम ही क्यों बताए गए हैं?

शास्त्रों के अनुसार भगवान के गुण अनंत हैं और उनके नाम भी अनंत हैं। “सहस्र” शब्द यहाँ केवल संख्या का संकेत नहीं है, बल्कि भगवान की अनंत महिमा का प्रतीक भी माना जाता है। इन एक हजार नामों में भगवान के प्रमुख गुणों और स्वरूपों का सार समाहित है।

प्रत्येक नाम किसी विशेष आध्यात्मिक अर्थ को प्रकट करता है।

  • विष्णु – जो सम्पूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त हैं।
  • नारायण – जो सभी जीवों के परम आश्रय हैं।
  • वासुदेव – जो प्रत्येक जीव के हृदय में निवास करते हैं।
  • माधव – जो लक्ष्मीपति हैं तथा ज्ञान और आनंद के स्रोत हैं।
  • गोविन्द – जो पृथ्वी, गौ और समस्त प्राणियों का पालन करते हैं।
  • हरि – जो भक्तों के पाप, भय और दुःख का हरण करते हैं।
  • जनार्दन – जो संसार के सभी प्राणियों का कल्याण करते हैं।
  • अच्युत – जो कभी अपने स्वरूप से विचलित नहीं होते।
  • केशव – जिनकी महिमा देवता भी गाते हैं।
  • पुरुषोत्तम – समस्त पुरुषों में श्रेष्ठ परम पुरुष।

इसी प्रकार प्रत्येक नाम भगवान के किसी विशिष्ट गुण का स्मरण कराता है और साधक को ईश्वर के निकट ले जाता है।


विष्णु सहस्रनाम का नियमित पाठ क्यों करना चाहिए?

धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में विष्णु सहस्रनाम के नियमित पाठ को अत्यंत शुभ माना गया है। यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मन, वाणी और विचारों को शुद्ध करने का एक साधन भी है।

नियमित पाठ से व्यक्ति का मन भगवान की भक्ति में स्थिर होता है। जीवन में आने वाली कठिन परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति बढ़ती है तथा व्यक्ति के भीतर धैर्य, संयम और सकारात्मक दृष्टिकोण का विकास होता है।


विष्णु सहस्रनाम पाठ करने की सही विधि

यद्यपि भगवान के नाम का स्मरण किसी भी समय किया जा सकता है, फिर भी शास्त्रीय परंपरा के अनुसार कुछ सरल नियमों का पालन करना शुभ माना जाता है।

1. प्रातःकाल उठें

सूर्योदय से पहले या प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।

2. पूजा स्थान तैयार करें

भगवान विष्णु, श्री लक्ष्मी-नारायण या श्रीकृष्ण की प्रतिमा अथवा चित्र के सामने दीपक और धूप जलाएँ।

3. ध्यान करें

कुछ क्षण शांत बैठकर भगवान विष्णु का ध्यान करें और मन को एकाग्र करें।

4. संकल्प लें

अपने और समस्त परिवार के कल्याण तथा भगवान की कृपा प्राप्ति का संकल्प करें।

5. विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें

पूरे मन, श्रद्धा और स्पष्ट उच्चारण के साथ विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें। यदि पूरा पाठ संभव न हो तो प्रतिदिन कुछ भाग का भी नियमित पाठ किया जा सकता है।

6. अंत में प्रार्थना करें

पाठ पूर्ण होने के बाद भगवान श्रीहरि से क्षमा याचना करें और सभी के कल्याण की प्रार्थना करें।


विष्णु सहस्रनाम पाठ करने के नियम

यद्यपि भगवान का नाम लेने के लिए कठोर नियम आवश्यक नहीं हैं, फिर भी निम्न बातों का ध्यान रखना लाभदायक माना जाता है—

  • यथासंभव स्नान के बाद पाठ करें।
  • स्वच्छ एवं शांत स्थान का चयन करें।
  • मन में श्रद्धा और विश्वास रखें।
  • जल्दबाजी में पाठ न करें।
  • उच्चारण शुद्ध रखने का प्रयास करें।
  • यदि किसी शब्द का उच्चारण कठिन लगे तो पहले अभ्यास करें।
  • पाठ के दौरान मन को इधर-उधर भटकने न दें।
  • पाठ के अंत में भगवान का स्मरण और प्रार्थना अवश्य करें।

विष्णु सहस्रनाम का पाठ कब करना चाहिए?

भगवान का स्मरण किसी भी समय किया जा सकता है, किंतु कुछ अवसर विशेष रूप से शुभ माने गए हैं—

  • प्रतिदिन प्रातःकाल
  • एकादशी के दिन
  • गुरुवार
  • वैकुण्ठ एकादशी
  • श्रीकृष्ण जन्माष्टमी
  • देवउठनी एकादशी
  • विष्णु पूजा या सत्यनारायण व्रत के समय
  • किसी शुभ कार्य की शुरुआत से पहले

क्या महिलाएँ विष्णु सहस्रनाम का पाठ कर सकती हैं?

हाँ। भगवान विष्णु के नामों का स्मरण करने पर किसी प्रकार का भेद नहीं बताया गया है। श्रद्धा और भक्ति के साथ स्त्री, पुरुष, वृद्ध, युवा या विद्यार्थी—कोई भी व्यक्ति विष्णु सहस्रनाम का पाठ कर सकता है।


यदि पूरा विष्णु सहस्रनाम पढ़ना संभव न हो तो क्या करें?

हर व्यक्ति के पास प्रतिदिन पर्याप्त समय नहीं होता। ऐसे में निराश होने की आवश्यकता नहीं है। आप अपनी सुविधा के अनुसार भगवान का स्मरण कर सकते हैं।

उदाहरण के लिए—

  • ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जप करें।
  • भगवान विष्णु के कुछ प्रमुख नामों का स्मरण करें।
  • प्रतिदिन विष्णु सहस्रनाम का एक भाग पढ़ें।
  • साप्ताहिक या एकादशी के दिन संपूर्ण पाठ करें।

नियमितता, श्रद्धा और भक्ति सबसे अधिक महत्वपूर्ण मानी जाती है।


क्या विष्णु सहस्रनाम का पाठ घर में किया जा सकता है?

हाँ। घर के पूजा स्थल में, मंदिर में, तीर्थ स्थान पर या किसी शांत एवं स्वच्छ स्थान पर विष्णु सहस्रनाम का पाठ किया जा सकता है। परिवार के सदस्य मिलकर सामूहिक रूप से भी इसका पाठ कर सकते हैं, जिससे भक्ति और आध्यात्मिक वातावरण का अनुभव होता है।


विष्णु सहस्रनाम पाठ के लाभ (Benefits of Vishnu Sahasranamam)

सनातन धर्म में भगवान विष्णु के नामों का स्मरण अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। विष्णु सहस्रनाम का पाठ केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह मन, बुद्धि और आत्मा को भगवान से जोड़ने का एक श्रेष्ठ माध्यम भी है। शास्त्रों में इसकी महिमा का वर्णन करते हुए बताया गया है कि श्रद्धा और विश्वास के साथ इसका नियमित पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में आध्यात्मिक, मानसिक और नैतिक उन्नति होती है।

ध्यान रहे कि नीचे दिए गए लाभ पारंपरिक धार्मिक मान्यताओं और शास्त्रीय विश्वासों पर आधारित हैं।


1. भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होने की मान्यता

विष्णु सहस्रनाम भगवान श्रीहरि को अत्यंत प्रिय स्तोत्र माना जाता है। भक्तिभाव से इसका पाठ करने वाले साधक पर भगवान विष्णु की कृपा बनी रहती है और वह धर्ममार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा प्राप्त करता है।


2. मन को शांति और स्थिरता मिलती है

आज के व्यस्त जीवन में मानसिक तनाव एक सामान्य समस्या बन गया है। विष्णु सहस्रनाम का शांत वातावरण में पाठ करने से मन एकाग्र होने में सहायता मिलती है। भगवान के नामों का स्मरण व्यक्ति को नकारात्मक विचारों से दूर ले जाकर सकारात्मक सोच विकसित करने में सहायक माना जाता है।


3. आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है

विष्णु सहस्रनाम केवल नामों का संग्रह नहीं, बल्कि भगवान के दिव्य स्वरूप का ध्यान है। नियमित पाठ से साधक का मन ईश्वर की ओर आकर्षित होता है और भक्ति, विनम्रता तथा आत्मचिंतन की भावना विकसित होती है।


4. धर्म और सदाचार की प्रेरणा मिलती है

भगवान विष्णु धर्म की रक्षा करने वाले देवता माने जाते हैं। उनके नामों का स्मरण व्यक्ति को सत्य, दया, क्षमा, सेवा और सदाचार जैसे गुण अपनाने की प्रेरणा देता है।


5. भय और चिंता कम करने में सहायक

धार्मिक मान्यता है कि भगवान श्रीहरि का स्मरण भक्त के मन से भय और असुरक्षा की भावना को दूर करता है। कठिन परिस्थितियों में भी ईश्वर पर विश्वास व्यक्ति को मानसिक शक्ति प्रदान करता है।


6. सकारात्मक ऊर्जा का संचार

नियमित रूप से विष्णु सहस्रनाम का पाठ करने से घर का वातावरण शांत, सात्त्विक और भक्तिमय बनता है। सामूहिक पाठ से परिवार में आध्यात्मिक वातावरण का अनुभव होता है।


7. भगवान के विभिन्न स्वरूपों का ज्ञान

विष्णु सहस्रनाम के प्रत्येक नाम के पीछे एक विशेष अर्थ और आध्यात्मिक संदेश छिपा है। जब साधक इन नामों के अर्थ को समझकर पाठ करता है, तो उसे भगवान विष्णु के विविध स्वरूपों और गुणों का ज्ञान प्राप्त होता है।


विष्णु सहस्रनाम का वैज्ञानिक एवं मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण

धार्मिक ग्रंथों के साथ-साथ आधुनिक मनोविज्ञान भी यह स्वीकार करता है कि नियमित ध्यान, प्रार्थना और सकारात्मक शब्दों का उच्चारण मन को शांत रखने में सहायक हो सकता है।

जब कोई व्यक्ति श्रद्धा के साथ किसी स्तोत्र का पाठ करता है, तो उसका ध्यान एक स्थान पर केंद्रित होता है। इससे मानसिक विचलन कम हो सकता है और मन में सकारात्मक भाव उत्पन्न हो सकते हैं। हालांकि, इसे किसी चिकित्सकीय उपचार का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।


विष्णु सहस्रनाम और नाम-स्मरण की परंपरा

सनातन धर्म में नाम-जप की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। विभिन्न ग्रंथों में भगवान के नामों के स्मरण को कलियुग में सरल और प्रभावी साधना बताया गया है।

इसी परंपरा में—

  • श्री विष्णु सहस्रनाम
  • श्री ललिता सहस्रनाम
  • शिव सहस्रनाम
  • श्रीराम नाम
  • श्रीकृष्ण नाम

का विशेष महत्व माना गया है।

इनमें विष्णु सहस्रनाम भगवान श्रीहरि के दिव्य गुणों का व्यापक वर्णन प्रस्तुत करता है।


विष्णु सहस्रनाम से जुड़ी प्रमुख मान्यताएँ

विष्णु सहस्रनाम के संबंध में विभिन्न धार्मिक परंपराओं में कई मान्यताएँ प्रचलित हैं—

  • एकादशी के दिन इसका पाठ विशेष शुभ माना जाता है।
  • भगवान विष्णु की पूजा के साथ इसका पाठ करने की परंपरा है।
  • वैष्णव संप्रदाय में इसे दैनिक साधना का महत्वपूर्ण भाग माना जाता है।
  • कई श्रद्धालु विशेष अवसरों पर सामूहिक विष्णु सहस्रनाम पाठ का आयोजन करते हैं।
  • धार्मिक विश्वास है कि भगवान के नामों का स्मरण व्यक्ति को ईश्वर के निकट ले जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

विष्णु सहस्रनाम क्या है?

विष्णु सहस्रनाम भगवान श्रीहरि विष्णु के एक हजार दिव्य नामों का पवित्र स्तोत्र है, जिसका वर्णन महाभारत के अनुशासन पर्व में मिलता है।


विष्णु सहस्रनाम किसने सुनाया था?

महाभारत के अनुसार भीष्म पितामह ने धर्मराज युधिष्ठिर को विष्णु सहस्रनाम का उपदेश दिया था।


विष्णु सहस्रनाम की रचना किसने की?

विष्णु सहस्रनाम महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत का एक महत्वपूर्ण भाग है।


क्या विष्णु सहस्रनाम का पाठ प्रतिदिन किया जा सकता है?

हाँ। श्रद्धा और भक्ति के साथ प्रतिदिन इसका पाठ किया जा सकता है। यदि समय कम हो तो नियमित रूप से कुछ भाग का पाठ भी किया जा सकता है।


विष्णु सहस्रनाम का पाठ किस समय करना चाहिए?

प्रातःकाल, एकादशी, गुरुवार या भगवान विष्णु की पूजा के समय इसका पाठ करना शुभ माना जाता है। हालांकि भगवान का स्मरण किसी भी समय किया जा सकता है।


क्या महिलाएँ विष्णु सहस्रनाम का पाठ कर सकती हैं?

हाँ। श्रद्धा और भक्ति के साथ स्त्री और पुरुष दोनों विष्णु सहस्रनाम का पाठ कर सकते हैं।


यदि पूरा पाठ संभव न हो तो क्या करें?

आप “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप कर सकते हैं या प्रतिदिन विष्णु सहस्रनाम का कुछ भाग पढ़ सकते हैं।


निष्कर्ष

विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र केवल भगवान विष्णु के एक हजार नामों का संग्रह नहीं, बल्कि सनातन धर्म की अमूल्य आध्यात्मिक धरोहर है। महाभारत में भीष्म पितामह द्वारा दिया गया यह दिव्य उपदेश आज भी करोड़ों श्रद्धालुओं को भक्ति, श्रद्धा और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।

श्रद्धा, विश्वास और नियमितता के साथ भगवान श्रीहरि के नामों का स्मरण मन को शांति, सकारात्मकता और ईश्वर के प्रति समर्पण की भावना प्रदान करता है। यदि आप भगवान विष्णु की भक्ति में रुचि रखते हैं, तो विष्णु सहस्रनाम का नियमित अध्ययन और पाठ आपकी आध्यात्मिक साधना का महत्वपूर्ण भाग बन सकता है।

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

🌐 संदर्भ (External References)

भगवान / God

साईं बाबा मंत्र जाप करते हुए शिरडी साईं बाबा का दिव्य स्वरूप

श्री शिरडी साईं बाबा (Shri Shirdi Sai Baba)​

भगवान और गुरु पर सच्चा विश्वास मनुष्य के जीवन को बदल सकता है। श्री शिरडी साईं बाबा (Shri Shirdi Sai Baba) की शिक्षाएं भी इसी सत्य को दर्शाती हैं। उनका संदेश था कि जीवन में

भगवान श्री हनुमान (Lord Shree Hanuman)​

भगवान श्री हनुमान (Lord Shree Hanuman) सनातन धर्म में भक्ति, निष्ठा और अपार शक्ति के सबसे महान प्रतीकों में माने जाते हैं। Bhakti Margdarshan के अनुसार जब कोई भक्त बिना किसी स्वार्थ और अपेक्षा के

मंदिर (Temple)

वृंदावन का बांके बिहारी मंदिर

बांके बिहारी मंदिर वृंदावन: इतिहास, कथा, दर्शन समय और महत्व (Banke Bihari Mandir Vrindavan)

वृंदावन के प्रसिद्ध बांके बिहारी मंदिर का इतिहास, श्री बांके बिहारी जी के प्राकट्य की परंपरा, स्वामी हरिदास जी से संबंध, दर्शन समय और मंदिर की विशेष सेवा-पद्धति विस्तार से जानें।
वृंदावन का प्रेम मंदिर राधा कृष्ण मंदिर

प्रेम मंदिर, वृंदावन: इतिहास, दर्शन समय, राधा-कृष्ण की झांकियां और यात्रा की पूरी जानकारी (Prem Mandir Vrindavan)

प्रेम मंदिर वृंदावन भगवान श्रीराधा-कृष्ण और श्रीसीताराम को समर्पित भव्य मंदिर है। जानिए इसका इतिहास, वास्तुकला, दर्शन समय, कृष्ण लीला की झांकियां और म्यूजिकल एवं डिजिटल फाउंटेन की पूरी जानकारी।
घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर महाराष्ट्र

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर की अद्भुत कथा: घुश्मा की भक्ति से कैसे प्रकट हुए भगवान शिव? जानिए मंदिर का इतिहास और रहस्य (Grishneshwar Jyotirlinga Mandir)

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में 12वां और अंतिम ज्योतिर्लिंग माना जाता है। जानिए घुश्मा की अद्भुत शिवभक्ति से जुड़ी पौराणिक कथा, मंदिर का इतिहास, अहिल्याबाई होलकर का योगदान, शानदार वास्तुकला, पूजा-पद्धति, दर्शन
भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग मंदिर महाराष्ट्र

भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग मंदिर: भगवान शिव ने क्यों धारण किया भीमाशंकर रूप? जानिए कथा, इतिहास और मंदिर का रहस्य (Bhimashankar Jyotirlinga Mandir)

भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के 12 पवित्र ज्योतिर्लिंगों में से एक है। महाराष्ट्र के सह्याद्री पर्वतों में स्थित इस पवित्र मंदिर से भीमासुर की कथा, प्राचीन इतिहास, सुंदर नागर स्थापत्य, भीमा नदी और प्राकृतिक सौंदर्य

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