हनुमान जी की उपासना हिंदू धर्म में अत्यंत फलदायी मानी जाती है। उनके अनेक स्तोत्रों और रचनाओं में श्री हनुमान बाहुक का विशेष स्थान है। यह केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि गहन श्रद्धा, विश्वास और आत्मसमर्पण का अद्भुत उदाहरण है। मान्यता है कि इस दिव्य रचना की रचना महान संत गोस्वामी तुलसीदास ने अपने जीवन के अंतिम समय में की थी। यदि श्रद्धा और नियमपूर्वक हनुमान बाहुक पाठ किया जाए, तो यह मानसिक शांति, आत्मबल, साहस और भगवान हनुमान की कृपा प्राप्त करने का श्रेष्ठ माध्यम माना जाता है। इस लेख में आप हनुमान बाहुक का महत्व, इतिहास, पाठ करने की विधि, लाभ, नियम तथा अन्य महत्वपूर्ण जानकारी विस्तार से जानेंगे।
श्री गणेशाय नमः
श्रीजानकीवल्लभो विजयते
श्रीमद्-गोस्वामी-तुलसीदास-कृत
छप्पय
सिंधु तरन, सिय-सोच हरन, रबि बाल बरन तनु |
भुज बिसाल, मूरति कराल कालहु को काल जनु ||
गहन-दहन-निरदहन लंक निःसंक, बंक-भुव |
जातुधान-बलवान मान-मद-दवन पवनसुव ||
कह तुलसिदास सेवत सुलभ सेवक हित सन्तत निकट |
गुन गनत, नमत, सुमिरत जपत समन सकल-संकट-विकट || 1 ||
हिंदी अर्थ
इस पद में गोस्वामी तुलसीदास जी भगवान श्रीहनुमान के दिव्य स्वरूप, अद्भुत पराक्रम और अपार शक्ति का वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि हनुमान जी समुद्र पार करने वाले, माता सीता के दुःखों का नाश करने वाले और सूर्य के समान तेजस्वी हैं। उनका विशाल शरीर, विकराल रूप और असुरों का संहार करने वाला स्वरूप स्वयं काल के भी काल के समान है। उन्होंने निडर होकर लंका का दहन किया और राक्षसों के अहंकार का विनाश किया। तुलसीदास जी कहते हैं कि जो भक्त श्रद्धा से हनुमान जी के गुणों का स्मरण, वंदन और जप करता है, उसके सभी प्रकार के संकट, भय और कष्ट दूर हो जाते हैं तथा हनुमान जी सदैव अपने भक्तों के समीप रहकर उनकी रक्षा करते हैं।
स्वर्न-सैल-संकास कोटि-रवि तरुन तेज घन |
उर विसाल भुज दण्ड चण्ड नख-वज्रतन ||
पिंग नयन, भृकुटी कराल रसना दसनानन |
कपिस केस करकस लंगूर, खल-दल-बल-भानन ||
कह तुलसिदास बस जासु उर मारुतसुत मूरति विकट |
संताप पाप तेहि पुरुष पहि सपनेहुँ नहिं आवत निकट || 2 ||
हिंदी अर्थ
इस पद में भगवान श्रीहनुमान के तेजस्वी और वीर स्वरूप का वर्णन किया गया है। तुलसीदास जी कहते हैं कि हनुमान जी का शरीर स्वर्ण पर्वत के समान दीप्तिमान और करोड़ों उगते हुए सूर्य के समान तेजस्वी है। उनकी विशाल छाती, बलशाली भुजाएँ और वज्र के समान कठोर शरीर उन्हें अद्वितीय पराक्रमी बनाते हैं। उनके नेत्र, भृकुटी और विकराल रूप दुष्टों के लिए भय उत्पन्न करते हैं तथा वे सभी राक्षसों का विनाश करने वाले हैं। तुलसीदास जी कहते हैं कि जिसके हृदय में श्रीहनुमान जी का निवास होता है, उसके पास पाप, दुःख, भय और संताप स्वप्न में भी नहीं आते।
झूलना
पञ्चमुख-छःमुख भृगु मुख्य भट असुर सुर, सर्व सरि समर समरत्थ सूरो |
बांकुरो बीर बिरुदैत बिरुदावली, बेद बंदी बदत पैजपूरो ||
जासु गुनगाथ रघुनाथ कह जासुबल, बिपुल जल भरित जग जलधि झूरो |
दुवन दल दमन को कौन तुलसीस है, पवन को पूत रजपूत रुरो || 3 ||
हिंदी अर्थ
इस पद में गोस्वामी तुलसीदास जी भगवान श्रीहनुमान के अद्वितीय पराक्रम और अपार बल की स्तुति करते हैं। वे बताते हैं कि हनुमान जी देवताओं और असुरों के महान योद्धाओं में भी सर्वश्रेष्ठ हैं तथा प्रत्येक युद्ध में विजय प्राप्त करने में समर्थ हैं। स्वयं वेद भी उनके यश और वीरता का गुणगान करते हैं। भगवान श्रीराम ने भी उनके बल और पराक्रम की प्रशंसा की है, क्योंकि उन्होंने असंभव कार्यों को भी सहजता से पूर्ण किया। तुलसीदास जी कहते हैं कि तीनों लोकों में पवनपुत्र श्रीहनुमान के समान शत्रुओं का संहार करने वाला, धर्म की रक्षा करने वाला और वीरता में अतुलनीय दूसरा कोई नहीं है।
घनाक्षरी
भानुसों पढ़न हनुमान गए भानुमन, अनुमानि सिसु केलि कियो फेर फारसो |
पाछिले पगनि गम गगन मगन मन, क्रम को न भ्रम कपि बालक बिहार सो ||
कौतुक बिलोकि लोकपाल हरिहर विधि, लोचननि चकाचौंधी चित्तनि खबार सो |
बल कैंधो बीर रस धीरज कै, साहस कै, तुलसी सरीर धरे सबनि सार सो || 4 ||
हिंदी अर्थ
इस पद में गोस्वामी तुलसीदास जी भगवान श्रीहनुमान के बाल्यकाल की अद्भुत लीला का वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि जब हनुमान जी सूर्यदेव से विद्या ग्रहण करने गए, तब बालस्वभाव के कारण उन्होंने अपनी चंचल लीलाओं से सभी को आश्चर्यचकित कर दिया। उनकी आकाश में विचरण करने की अद्भुत गति, साहस और पराक्रम को देखकर देवता, भगवान विष्णु, भगवान शिव तथा ब्रह्माजी भी विस्मित रह गए। तुलसीदास जी कहते हैं कि श्रीहनुमान का अतुलनीय बल, वीरता, धैर्य और साहस समस्त श्रेष्ठ गुणों का सार है, इसलिए वे सभी के लिए प्रेरणा और श्रद्धा के पात्र हैं।
भारत में पारथ के रथ केथू कपिराज, गाज्यो सुनि कुरुराज दल हल बल भो |
कह्यो द्रोन भीषम समीर सुत महाबीर, बीर-रस-बारि-निधि जाको बल जल भो ||
बानर सुभाय बाल केलि भूमि भानु लागि, फलँग फलाँग हूतें घाटि नभ तल भो |
नाई-नाई-माथ जोरि-जोरि हाथ जोधा जो हैं, हनुमान देखे जगजीवन को फल भो || 5 ||
हिंदी अर्थ
इस पद में गोस्वामी तुलसीदास जी भगवान श्रीहनुमान के अद्वितीय पराक्रम का वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि महाभारत युद्ध में अर्जुन के रथ पर ध्वज के रूप में विराजमान होकर हनुमान जी ने कौरव सेना के मन में भय उत्पन्न कर दिया। भीष्म और द्रोण जैसे महान योद्धाओं ने भी उनके अपार बल और वीरता की प्रशंसा की। तुलसीदास जी आगे कहते हैं कि बाल्यकाल से ही हनुमान जी असाधारण शक्ति के स्वामी थे। उनकी ऊँची छलांगें और अद्भुत लीलाएँ देखकर सभी वीर योद्धा श्रद्धापूर्वक उनके सामने सिर झुकाते थे। जो भी भक्त श्रीहनुमान जी का दर्शन और स्मरण करता है, उसका जीवन सफल और धन्य हो जाता है।
गो-पद पयोधि करि, होलिका ज्यों लाई लंक, निपट निःसंक पर पुर गल बल भो |
द्रोन सो पहार लियो ख्याल ही उखारि कर, कंदुक ज्यों कपि खेल बेल कैसो फल भो ||
संकट समाज असमंजस भो राम राज, काज जुग पूगनि को करतल पल भो |
साहसी समत्थ तुलसी को नाई जा की बाँह, लोक पाल पालन को फिर थिर थल भो || 6 ||
हिंदी अर्थ
इस पद में गोस्वामी तुलसीदास जी भगवान श्रीहनुमान के अतुलनीय बल और पराक्रम का वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि हनुमान जी ने समुद्र को गौ के खुर के समान छोटा समझकर सहज ही पार कर लिया और बिना किसी भय के लंका में प्रवेश कर उसका दहन कर दिया। संजीवनी लाने के लिए उन्होंने द्रोणगिरि पर्वत को खेल-खेल में गेंद की भाँति उठा लिया। भगवान श्रीराम के सभी कठिन कार्य उन्होंने पलभर में पूर्ण कर दिए। तुलसीदास जी कहते हैं कि श्रीहनुमान इतने साहसी और समर्थ हैं कि उनके बल पर ही देवताओं तथा समस्त संसार की रक्षा और व्यवस्था सुरक्षित बनी रहती है।
कमठ की पीठि जाके गोडनि की गाड़ैं मानो, नाप के भाजन भरि जल निधि जल भो |
जातुधान दावन परावन को दुर्ग भयो, महा मीन बास तिमि तोमनि को थल भो ||
कुम्भकरन रावन पयोद नाद ईधन को, तुलसी प्रताप जाको प्रबल अनल भो |
भीषम कहत मेरे अनुमान हनुमान, सारिखो त्रिकाल न त्रिलोक महाबल भो || 7 ||
हिंदी अर्थ
इस पद में गोस्वामी तुलसीदास जी भगवान श्रीहनुमान के अनुपम बल और तेज का गुणगान करते हैं। वे बताते हैं कि जिनके चरणों का बल इतना महान है कि समुद्र भी उनके लिए अत्यंत छोटा प्रतीत होता है और राक्षसों के दुर्ग भी उनके सामने टिक नहीं पाते। कुम्भकर्ण और रावण जैसे महाबलशाली असुर भी उनके पराक्रम रूपी अग्नि में नष्ट हो गए। तुलसीदास जी अंत में कहते हैं कि उनके विचार से तीनों कालों और तीनों लोकों में भगवान श्रीहनुमान के समान बलशाली, पराक्रमी और वीर दूसरा कोई नहीं है।
दूत राम राय को सपूत पूत पौनको तू, अंजनी को नन्दन प्रताप भूरि भानु सो |
सीय-सोच-समन, दुरित दोष दमन, सरन आये अवन लखन प्रिय प्राण सो ||
दसमुख दुसह दरिद्र दरिबे को भयो, प्रकट तिलोक ओक तुलसी निधान सो |
ज्ञान गुनवान बलवान सेवा सावधान, साहेब सुजान उर आनु हनुमान सो || 8 ||
हिंदी अर्थ
इस पद में गोस्वामी तुलसीदास जी भगवान श्रीहनुमान की महिमा का वर्णन करते हुए उन्हें भगवान श्रीराम का परम प्रिय दूत, पवनदेव के तेजस्वी पुत्र और माता अंजनी के गौरव के रूप में स्मरण करते हैं। वे बताते हैं कि श्रीहनुमान माता सीता के दुःखों का नाश करने वाले, सभी पापों और दोषों का विनाश करने वाले तथा शरण में आए भक्तों की रक्षा करने वाले हैं। उन्होंने रावण जैसे महाशक्तिशाली शत्रु का अभिमान तोड़ा और तीनों लोकों में अपनी वीरता का यश फैलाया। तुलसीदास जी प्रार्थना करते हैं कि हे ज्ञान, गुण, बल, विनम्रता और सेवा-भाव से पूर्ण प्रभु हनुमान! आप मेरे हृदय में सदैव निवास करें और अपनी कृपा बनाए रखें।
दवन दुवन दल भुवन बिदित बल, बेद जस गावत बिबुध बंदी छोर को |
पाप ताप तिमिर तुहिन निघटन पटु, सेवक सरोरुह सुखद भानु भोर को ||
लोक परलोक तें बिसोक सपने न सोक, तुलसी के हिये है भरोसो एक ओर को |
राम को दुलारो दास बामदेव को निवास। नाम कलि कामतरु केसरी किसोर को || 9 ||
हिंदी अर्थ
इस पद में गोस्वामी तुलसीदास जी भगवान श्रीहनुमान के विश्वविख्यात बल, तेज और करुणामय स्वरूप का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि श्रीहनुमान की वीरता और महिमा तीनों लोकों में प्रसिद्ध है तथा वेद और देवता भी उनके यश का गुणगान करते हैं। वे अपने भक्तों के पाप, दुःख, भय और अज्ञानरूपी अंधकार का नाश करके उन्हें उगते हुए सूर्य के समान सुख, शांति और नई ऊर्जा प्रदान करते हैं। तुलसीदास जी कहते हैं कि जिन्हें श्रीहनुमान का आश्रय प्राप्त हो जाता है, उन्हें इस लोक और परलोक में किसी प्रकार का शोक या भय नहीं रहता। श्रीहनुमान भगवान श्रीराम के अत्यंत प्रिय सेवक, भक्तों के रक्षक तथा कलियुग में मनोकामनाएँ पूर्ण करने वाले कल्पवृक्ष के समान कृपालु हैं।
महाबल सीम महा भीम महाबान इत, महाबीर बिदित बरायो रघुबीर को |
कुलिस कठोर तनु जोर परै रोर रन, करुना कलित मन धारमिक धीर को ||
दुर्जन को कालसो कराल पाल सज्जन को, सुमिरे हरन हार तुलसी की पीर को |
सीय-सुख-दायक दुलारो रघुनायक को, सेवक सहायक है साहसी समीर को || 10 ||
हिंदी अर्थ
इस पद में गोस्वामी तुलसीदास जी भगवान श्रीहनुमान के अद्वितीय बल, वीरता और करुणामय स्वभाव का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि श्रीहनुमान असीम शक्ति, अपार पराक्रम और अद्भुत साहस के स्वामी हैं, जिनकी वीरता का स्वयं भगवान श्रीराम ने भी गुणगान किया है। उनका शरीर वज्र के समान कठोर है, किंतु उनका हृदय दयालु, धर्मनिष्ठ और भक्तवत्सल है। वे दुष्टों के लिए काल के समान भयावह तथा सज्जनों के रक्षक हैं। तुलसीदास जी कहते हैं कि श्रीहनुमान का स्मरण करने से सभी दुःख और कष्ट दूर हो जाते हैं। वे माता सीता को सुख देने वाले, भगवान श्रीराम के अत्यंत प्रिय तथा अपने भक्तों के सदा सहायक और संकटमोचन हैं।
रचिबे को बिधि जैसे, पालिबे को हरि हर, मीच मारिबे को, ज्याईबे को सुधापान भो|
धरिबे को धरनि, तरनि तम दलिबे को, सोखिबे कृसानु पोषिबे को हिम भानु भो ||
खल दुःख दोषिबे को, जन परितोषिबे को, माँगिबो मलीनता को मोदक दुदान भो|
आरत की आरति निवारिबे को तिहुँ पुर, तुलसी को साहेब हठीलो हनुमान भो || 11 ||
हिंदी अर्थ
इस पद में गोस्वामी तुलसीदास जी भगवान श्रीहनुमान की सर्वशक्तिमान महिमा का वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि जैसे सृष्टि की रचना का कार्य ब्रह्मा, पालन का कार्य भगवान विष्णु और संहार का कार्य भगवान शिव करते हैं, उसी प्रकार श्रीहनुमान भी अपने अद्भुत सामर्थ्य से भक्तों के सभी कष्टों का निवारण करते हैं। वे पृथ्वी का सहारा देने, अंधकार को दूर करने, अग्नि को शांत करने तथा संसार का कल्याण करने में समर्थ हैं। श्रीहनुमान दुष्टों का दमन, सज्जनों की रक्षा और भक्तों की मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं। तुलसीदास जी अंत में प्रार्थना करते हैं कि हे तीनों लोकों के संकटों का नाश करने वाले, अटल और कृपालु हनुमान! आप मेरे सभी दुःखों और कष्टों को दूर कर अपनी कृपा सदैव बनाए रखें।
सेवक स्योकाई जानि जानकीस मानै कानि, सानुकूल सूलपानि नवै नाथ नाँक को|
देवी देव दानव दयावने ह्वै जोरैं हाथ, बापुरे बराक कहा और राजा राँक को ||
जागत सोवत बैठे बागत बिनोद मोद, ताके जो अनर्थ सो समर्थ एक आँक को|
सब दिन रुरो परै पूरो जहाँ तहाँ ताहि, जाके है भरोसो हिये हनुमान हाँक को || 12 ||
हिंदी अर्थ
इस चौपाई में गोस्वामी तुलसीदास जी भगवान श्रीहनुमान जी की कृपा और उनके भक्तों की रक्षा शक्ति का वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि जो सेवक हनुमान जी की शरण में रहता है, उसे माता जानकी भी अपना प्रिय मानती हैं और भगवान शिव भी उस पर अनुकूल होकर कृपा करते हैं। देवी-देवता और दानव भी ऐसे भक्त के सामने दया भाव से हाथ जोड़ देते हैं, फिर चाहे वह गरीब हो या राजा। जो व्यक्ति हर समय—जागते, सोते, बैठते या चलते—आनंद और भक्ति में लीन रहता है, उसके जीवन में कोई भी अनर्थ उसे हानि नहीं पहुँचा सकता, क्योंकि उसका एकमात्र सहारा स्वयं हनुमान जी होते हैं। तुलसीदास जी कहते हैं कि जिस व्यक्ति के हृदय में हनुमान जी का दृढ़ विश्वास और सहारा होता है, उसके जीवन में हर कार्य सहज रूप से सफल होता है और वह हर स्थान पर सुरक्षित और पूर्ण रहता है।
सानुग सगौरि सानुकूल सूलपानि ताहि, लोकपाल सकल लखन राम जानकी|
लोक परलोक को बिसोक सो तिलोक ताहि, तुलसी तमाइ कहा काहू बीर आनकी ||
केसरी किसोर बन्दीछोर के नेवाजे सब, कीरति बिमल कपि करुनानिधान की|
बालक ज्यों पालि हैं कृपालु मुनि सिद्धता को, जाके हिये हुलसति हाँक हनुमान की || 13 ||
हिंदी अर्थ
इस चौपाई में तुलसीदास जी श्रीहनुमान जी की कृपा और शक्ति का वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि जिस भक्त पर हनुमान जी कृपा करते हैं, उस पर भगवान शिव, माता पार्वती और श्रीराम सहित सभी देवता अनुकूल हो जाते हैं और सकी रक्षा करते हैं। ऐसा भक्त इस लोक और परलोक दोनों में सुखी और निर्भय रहता है। उसे किसी प्रकार का भय या संकट नहीं सताता। तुलसीदास जी कहते हैं कि हनुमान जी अत्यंत दयालु और शक्तिशाली हैं, जो अपने भक्तों का उसी प्रकार पालन करते हैं जैसे माता-पिता अपने बालक का करते हैं। उनके स्मरण मात्र से जीवन में शांति, सुरक्षा और कल्याण बना रहता है।
करुनानिधान बलबुद्धि के निधान हौ, महिमा निधान गुनज्ञान के निधान हौ|
बाम देव रुप भूप राम के सनेही, नाम, लेत देत अर्थ धर्म काम निरबान हौ ||
आपने प्रभाव सीताराम के सुभाव सील, लोक बेद बिधि के बिदूष हनुमान हौ|
मन की बचन की करम की तिहूँ प्रकार, तुलसी तिहारो तुम साहेब सुजान हौ || 14 ||
हिंदी अर्थ
इस चौपाई में गोस्वामी तुलसीदास जी भगवान श्रीहनुमान जी की करुणा, ज्ञान और महान गुणों का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि हनुमान जी करुणा के भंडार हैं, बल और बुद्धि के निधान हैं तथा सभी श्रेष्ठ गुणों और ज्ञान से परिपूर्ण हैं। वे श्रीराम के अत्यंत प्रिय भक्त हैं और उनका स्मरण करने से भक्तों को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—सभी की प्राप्ति होती है। हनुमान जी श्रीराम और सीता जी के गुणों और आदर्शों को पूर्ण रूप से जानते हैं तथा लोक और वेद के अनुसार आचरण करने वाले श्रेष्ठ ज्ञानी हैं। तुलसीदास जी अंत में विनती करते हैं कि हे प्रभु हनुमान जी! आप मेरे मन, वचन और कर्म—तीनों के स्वामी हैं और मैं आपकी शरण में हूँ।
मन को अगम तन सुगम किये कपीस, काज महाराज के समाज साज साजे हैं|
देवबंदी छोर रनरोर केसरी किसोर, जुग जुग जग तेरे बिरद बिराजे हैं|
बीर बरजोर घटि जोर तुलसी की ओर, सुनि सकुचाने साधु खल गन गाजे हैं|
बिगरी सँवार अंजनी कुमार कीजे मोहिं, जैसे होत आये हनुमान के निवाजे हैं || 15 ||
हिंदी अर्थ
इस चौपाई में गोस्वामी तुलसीदास जी भगवान श्रीहनुमान जी की महिमा और भक्तवत्सलता का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि हे कपिश्रेष्ठ हनुमान जी! आपने अपने भक्तों के लिए कठिन से कठिन कार्यों को भी सरल बना दिया है और अपने पराक्रम से देवताओं के भी संकट दूर किए हैं। आप अंजनी पुत्र और केसरी नंदन हैं, जो युद्धभूमि में अत्यंत वीर और शक्तिशाली हैं। आपका यश और पराक्रम युगों-युगों से संसार में प्रसिद्ध है। तुलसीदास जी कहते हैं कि आपकी शक्ति के आगे बड़े-बड़े बलवान भी कमजोर पड़ जाते हैं और आपके नाम मात्र से ही साधु आनंदित और दुष्ट भयभीत हो जाते हैं। अंत में वे प्रार्थना करते हैं कि हे हनुमान जी! मेरी बिगड़ी हुई स्थिति को भी आप उसी प्रकार सुधार दें जैसे आप अपने भक्तों पर सदा कृपा करते आए हैं।
सवैया
जान सिरोमनि हो हनुमान सदा जन के मन बास तिहारो|
ढ़ारो बिगारो मैं काको कहा केहि कारन खीझत हौं तो तिहारो ||
साहेब सेवक नाते तो हातो कियो सो तहां तुलसी को न चारो|
दोष सुनाये तैं आगेहुँ को होशियार ह्वैं हों मन तो हिय हारो || 16 ||
हिंदी अर्थ
इस चौपाई में तुलसीदास जी भगवान श्रीहनुमान जी से अपनी विनती करते हैं। वे कहते हैं कि हे हनुमान जी! आप भक्तों के सिरमौर हैं और सदैव अपने भक्तों के हृदय में निवास करते हैं। आप सबके बिगड़े काम सुधारने वाले हैं, इसलिए मेरे जीवन में जो भी कष्ट या बाधाएँ हैं, उनका निवारण भी आप ही करें। मैं किसी और के पास जाने योग्य नहीं हूँ, केवल आपकी ही शरण में हूँ। तुलसीदास जी कहते हैं कि स्वामी और सेवक के इस संबंध को आप ही संभाल सकते हैं, क्योंकि मेरे लिए और कोई सहारा नहीं है। अंत में वे निवेदन करते हैं कि यदि मुझसे कोई दोष हो गया हो, तो उसे क्षमा करें और मुझे अपनी कृपा से संभाल लें, क्योंकि मेरा मन पूरी तरह आपके चरणों में समर्पित है।
तेरे थपै उथपै न महेस, थपै थिर को कपि जे उर घाले|
तेरे निबाजे गरीब निबाज बिराजत बैरिन के उर साले ||
संकट सोच सबै तुलसी लिये नाम फटै मकरी के से जाले|
बूढ भये बलि मेरिहिं बार, कि हारि परे बहुतै नत पाले || 17 ||
हिंदी अर्थ
इस चौपाई में तुलसीदास जी भगवान श्रीहनुमान जी की अपार शक्ति और संकटमोचन स्वरूप का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि हे हनुमान जी! जिसको आप स्थापित करते हैं, उसे स्वयं भगवान शिव भी नहीं हटा सकते, और जिसे आप स्थिर कर देते हैं, वह सदा अचल रहता है। आप गरीबों पर विशेष कृपा करने वाले हैं और अपने भक्तों के शत्रुओं के हृदय में भी भय उत्पन्न कर देते हैं। तुलसीदास जी कहते हैं कि आपके नाम मात्र के स्मरण से सभी प्रकार के संकट और चिंताएँ ऐसे नष्ट हो जाती हैं जैसे मकड़ी का जाला टूट जाता है। अंत में वे प्रार्थना करते हैं कि हे हनुमान जी! अब मेरे ऊपर भी कृपा करें, क्योंकि मैं दुर्बल और अनेक प्रकार के दुखों से घिरा हुआ हूँ, और पूरी तरह आपकी शरण में हूँ।
सिंधु तरे बड़े बीर दले खल, जारे हैं लंक से बंक मवासे|
तैं रनि केहरि केहरि के बिदले अरि कुंजर छैल छवासे ||
तोसो समत्थ सुसाहेब सेई सहै तुलसी दुख दोष दवा से|
बानरबाज ! बढ़े खल खेचर, लीजत क्यों न लपेटि लवासे || 18 ||
हिंदी अर्थ
इस चौपाई में तुलसीदास जी भगवान श्रीहनुमान जी की वीरता और पराक्रम का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि हे महावीर हनुमान जी! आपने विशाल समुद्र को पार किया, राक्षसों का संहार किया और लंका को जलाकर शत्रुओं का नाश किया। आप युद्धभूमि में सिंह के समान पराक्रमी हैं, जो बड़े-बड़े शत्रु रूपी हाथियों को भी नष्ट कर देते हैं। आपके समान शक्तिशाली और समर्थ स्वामी के होते हुए भी तुलसीदास को अभी तक दुख और कष्ट सहने पड़ रहे हैं। अंत में वे विनती करते हैं कि हे वानरराज हनुमान जी! अब आप कृपा करके मेरे सभी कष्टों और पापों का नाश करें और मुझे अपने संरक्षण में ले लें।
अच्छ विमर्दन कानन भानि दसानन आनन भा न निहारो|
बारिदनाद अकंपन कुंभकरन से कुञ्जर केहरि वारो ||
राम प्रताप हुतासन, कच्छ, विपच्छ, समीर समीर दुलारो|
पाप ते साप ते ताप तिहूँ तें सदा तुलसी कह सो रखवारो || 19 ||
हिंदी अर्थ
इस चौपाई में तुलसीदास जी भगवान श्रीहनुमान जी की अपार वीरता और रक्षक स्वरूप का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि हे हनुमान जी! आपने लंका में जाकर राक्षसों का विनाश किया और दुष्टों के समूह को नष्ट कर दिया, जिससे स्वयं रावण भी भयभीत हो गया। आप युद्ध में ऐसे पराक्रमी हैं जैसे सिंह हाथियों का नाश करता है, उसी प्रकार आपने बड़े-बड़े योद्धाओं का संहार किया। आप श्रीराम के प्रताप से प्रज्वलित अग्नि के समान हैं, जो शत्रुओं का नाश करने वाले हैं और पवनपुत्र होने के कारण सभी बाधाओं को दूर करने वाले हैं। तुलसीदास जी अंत में कहते हैं कि हे हनुमान जी! आप ही हमें पाप, श्राप और ताप—तीनों प्रकार के दुखों से सदा रक्षा करने वाले हैं।
घनाक्षरी
जानत जहान हनुमान को निवाज्यो जन, मन अनुमानि बलि बोल न बिसारिये|
सेवा जोग तुलसी कबहुँ कहा चूक परी, साहेब सुभाव कपि साहिबी संभारिये ||
अपराधी जानि कीजै सासति सहस भान्ति, मोदक मरै जो ताहि माहुर न मारिये|
साहसी समीर के दुलारे रघुबीर जू के, बाँह पीर महाबीर बेगि ही निवारिये || 20 ||
हिंदी अर्थ
इस चौपाई में गोस्वामी तुलसीदास जी भगवान श्रीहनुमान जी से विनम्र प्रार्थना करते हैं। वे कहते हैं कि हे हनुमान जी! संसार जानता है कि आपने अपने भक्तों पर सदा कृपा की है, इसलिए कृपा करके मेरी प्रार्थना को भी मत भूलिए। यदि मैंने सेवा में कोई भूल या अपराध किया हो, तो उसे क्षमा करके अपने स्वभाव के अनुसार दया करें, क्योंकि आप स्वामी हैं और भक्तों की रक्षा करना आपका स्वभाव है। तुलसीदास जी कहते हैं कि मुझे अपराधी मानकर चाहे हजार प्रकार की सजा दे दीजिए, परंतु जैसे कोई मूर्ख व्यक्ति को मीठा देकर मारा नहीं जाता, वैसे ही मुझे पूर्ण रूप से नष्ट न कीजिए। अंत में वे विनती करते हैं कि हे महावीर हनुमान जी! आप पवनपुत्र और श्रीराम के प्रिय भक्त हैं, कृपा करके मेरे सभी कष्टों और दुखों को शीघ्र दूर कीजिए।
बालक बिलोकि, बलि बारें तें आपनो कियो, दीनबन्धु दया कीन्हीं निरुपाधि न्यारिये|
रावरो भरोसो तुलसी के, रावरोई बल, आस रावरीयै दास रावरो विचारिये ||
बड़ो बिकराल कलि काको न बिहाल कियो, माथे पगु बलि को निहारि सो निबारिये|
केसरी किसोर रनरोर बरजोर बीर, बाँह पीर राहु मातु ज्यौं पछारि मारिये || 21 ||
हिंदी अर्थ
इस चौपाई में तुलसीदास जी भगवान श्रीहनुमान जी की दया, बल और रक्षक स्वरूप का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि हे दीनों के बंधु हनुमान जी! आपने बाल्यावस्था में ही अपने अद्भुत बल का परिचय दिया और बिना किसी स्वार्थ के दया करके भक्तों की रक्षा की। तुलसीदास जी कहते हैं कि मुझे केवल आपका ही भरोसा है, मेरी शक्ति और आशा सब आपके ही चरणों में है, इसलिए मुझे अपना दास समझकर मेरी रक्षा कीजिए। वे आगे कहते हैं कि भयानक कलियुग ने सभी को पीड़ित कर रखा है, इसलिए आप अपने बल से इस संकट को दूर कर दीजिए। अंत में वे प्रार्थना करते हैं कि हे केसरी नंदन महावीर हनुमान जी! आप युद्ध में अत्यंत शक्तिशाली हैं, कृपा करके मेरी सभी बाधाओं और कष्टों का नाश कर मुझे सुरक्षित कीजिए।
उथपे थपनथिर थपे उथपनहार, केसरी कुमार बल आपनो संबारिये|
राम के गुलामनि को काम तरु रामदूत, मोसे दीन दूबरे को तकिया तिहारिये ||
साहेब समर्थ तो सों तुलसी के माथे पर, सोऊ अपराध बिनु बीर, बाँधि मारिये|
पोखरी बिसाल बाँहु, बलि, बारिचर पीर, मकरी ज्यों पकरि के बदन बिदारिये || 22 ||
हिंदी अर्थ
इस चौपाई में तुलसीदास जी भगवान श्रीहनुमान जी से अपनी रक्षा और कृपा की प्रार्थना करते हैं। वे कहते हैं कि हे केसरी नंदन हनुमान जी! आप ही अस्थिर को स्थिर करने वाले और स्थिर को अस्थिर करने वाले महान बलवान हैं, इसलिए अपने बल और सामर्थ्य से मेरी रक्षा कीजिए। तुलसीदास जी कहते हैं कि मैं श्रीराम के दासों का दास हूँ, और मेरे जैसे दीन-दुर्बल के लिए केवल आप ही सहारा और आश्रय हैं। वे विनती करते हैं कि यदि मुझसे कोई अपराध हो भी गया हो, तो हे वीर हनुमान जी! आप मुझे अपने भक्त मानकर क्षमा करें और कठोर दंड न दें। अंत में वे कहते हैं कि हे महाबली हनुमान जी! जैसे विशाल सरोवर में मकड़ी को आसानी से पकड़ लिया जाता है, उसी प्रकार आप मेरे सभी दुखों और संकटों को नष्ट करके मेरी रक्षा करें।
राम को सनेह, राम साहस लखन सिय, राम की भगति, सोच संकट निवारिये|
मुद मरकट रोग बारिनिधि हेरि हारे, जीव जामवंत को भरोसो तेरो भारिये ||
कूदिये कृपाल तुलसी सुप्रेम पब्बयतें, सुथल सुबेल भालू बैठि कै विचारिये|
महाबीर बाँकुरे बराकी बाँह पीर क्यों न, लंकिनी ज्यों लात घात ही मरोरि मारिये || 23 ||
हिंदी अर्थ
इस चौपाई में तुलसीदास जी भगवान श्रीहनुमान जी की कृपा और उनकी अद्भुत शक्ति का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि हे हनुमान जी! जिनके हृदय में श्रीराम के प्रति प्रेम, विश्वास और भक्ति होती है, उनके सभी प्रकार के दुख और चिंताएँ आप ही दूर करते हैं। देवता, वानर और जामवंत जैसे सभी भी आपकी ही शक्ति और सहायता पर भरोसा करते हैं। आप कृपालु हैं और भक्तों के सभी संकट हर लेते हैं। तुलसीदास जी प्रार्थना करते हैं कि हे महाबली हनुमान जी! जैसे आपने लंका में लंकिनी का विनाश किया था, वैसे ही कृपा करके मेरे सभी कष्टों और दुखों को भी नष्ट कर दीजिए और मेरी रक्षा कीजिए।
लोक परलोकहुँ तिलोक न विलोकियत, तोसे समरथ चष चारिहूँ निहारिये|
कर्म, काल, लोकपाल, अग जग जीवजाल, नाथ हाथ सब निज महिमा बिचारिये ||
खास दास रावरो, निवास तेरो तासु उर, तुलसी सो, देव दुखी देखिअत भारिये|
बात तरुमूल बाँहूसूल कपिकच्छु बेलि, उपजी सकेलि कपि केलि ही उखारिये || 24 ||
हिंदी अर्थ
इस चौपाई में तुलसीदास जी भगवान श्रीहनुमान जी की सर्वश्रेष्ठता और अपार शक्ति का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि तीनों लोकों में हनुमान जी के समान समर्थ कोई नहीं है, क्योंकि समस्त कर्म, काल, लोकपाल, देवता और संपूर्ण जीव-जगत सब उनकी महिमा और नियंत्रण के अधीन हैं। तुलसीदास जी स्वयं को हनुमान जी का दास मानकर कहते हैं कि मेरा एकमात्र सहारा केवल आप ही हैं और मैं पूरी तरह आपकी शरण में हूँ, इसलिए कृपा करके मेरी रक्षा करें और मेरे सभी कष्टों का नाश करें।
गोस्वामी श्री तुलसीदास कृत हनुमान बाहुक
करम कराल कंस भूमिपाल के भरोसे, बकी बक भगिनी काहू तें कहा डरैगी|
बड़ी बिकराल बाल घातिनी न जात कहि, बाँहू बल बालक छबीले छोटे छरैगी ||
आई है बनाई बेष आप ही बिचारि देख, पाप जाय सब को गुनी के पाले परैगी|
पूतना पिसाचिनी ज्यौं कपि कान्ह तुलसी की, बाँह पीर महाबीर तेरे मारे मरैगी || 25 ||
हिंदी अर्थ
इस चौपाई में गोस्वामी तुलसीदास जी भगवान श्रीहनुमान जी की अपार शक्ति और दुष्टों के नाश करने वाले स्वरूप का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि कंस जैसे अत्याचारी और उसकी जैसी दुष्ट शक्तियाँ हनुमान जी के सामने कुछ भी नहीं हैं, क्योंकि वे स्वयं सभी बुराइयों का अंत करने वाले हैं। बालक रूप में भी आपने बड़े-बड़े दुष्टों का संहार किया है, इसलिए कोई भी दुष्ट शक्ति आपके भक्तों को हानि नहीं पहुँचा सकती। तुलसीदास जी कहते हैं कि जैसे पूतना नामक राक्षसी का भगवान श्रीकृष्ण ने अंत किया था, उसी प्रकार हे महावीर हनुमान जी! आप भी मेरी सभी बाधाओं और कष्टों को नष्ट कर दीजिए और मेरी रक्षा कीजिए।
भाल की कि काल की कि रोष की त्रिदोष की है, बेदन बिषम पाप ताप छल छाँह की|
करमन कूट की कि जन्त्र मन्त्र बूट की, पराहि जाहि पापिनी मलीन मन माँह की ||
पैहहि सजाय, नत कहत बजाय तोहि, बाबरी न होहि बानि जानि कपि नाँह की|
आन हनुमान की दुहाई बलवान की, सपथ महाबीर की जो रहै पीर बाँह की || 26 ||
हिंदी अर्थ
इस चौपाई में तुलसीदास जी भगवान श्रीहनुमान जी से प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि हे महाबली हनुमान जी! भाल, काल, क्रोध, त्रिदोष, असहनीय पीड़ा, पाप, ताप, छल और मानसिक कष्ट—ये सभी जो भी दुख हैं, वे आपके भक्त के पास नहीं आ सकते। कर्मों के बंधन, तंत्र-मंत्र या किसी भी प्रकार की नकारात्मक शक्तियाँ आपके सामने टिक नहीं सकतीं और सभी पापिनी व बुरी शक्तियाँ नष्ट हो जाती हैं। तुलसीदास जी विनती करते हैं कि हे कपिराज! मैं आपकी शपथ लेता हूँ, आपके समान बलवान कोई नहीं है, इसलिए मेरी बाँह (कष्ट/पीड़ा) की रक्षा कीजिए और उसे शीघ्र दूर कर दीजिए।
सिंहिका सँहारि बल सुरसा सुधारि छल, लंकिनी पछारि मारि बाटिका उजारी है|
लंक परजारि मकरी बिदारि बार बार, जातुधान धारि धूरि धानी करि डारी है ||
तोरि जमकातरि मंदोदरी कठोरि आनी, रावन की रानी मेघनाद महतारी है|
भीर बाँह पीर की निपट राखी महाबीर, कौन के सकोच तुलसी के सोच भारी है || 27 ||
हिंदी अर्थ
इस चौपाई में तुलसीदास जी भगवान श्रीहनुमान जी के लंका-प्रवेश के पराक्रम और दुष्टों के संहार का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि हे महाबली हनुमान जी! आपने सिंहिका राक्षसी का वध किया, सुरसा के छल को पराजित किया और लंकिनी को पटककर लंका की वाटिका को उजाड़ दिया। आपने लंका को जलाकर मकरी जैसी राक्षसी शक्तियों का नाश किया और अनेक दुष्ट राक्षसों का संहार किया। आपने रावण की रानी मंदोदरी और मेघनाद की माता जैसी शक्तिशाली स्त्रियों को भी भयभीत किया। हे महावीर! आपने बड़े-बड़े संकटों को समाप्त किया है, इसलिए तुलसीदास जी की इस बाँह-पीड़ा और जीवन के कष्टों को भी दूर कर दीजिए, क्योंकि मेरे सभी दुखों का भार अब आपके ही सहारे है।
तेरो बालि केलि बीर सुनि सहमत धीर, भूलत सरीर सुधि सक्र रवि राहु की|
तेरी बाँह बसत बिसोक लोक पाल सब, तेरो नाम लेत रहैं आरति न काहु की ||
साम दाम भेद विधि बेदहू लबेद सिधि, हाथ कपिनाथ ही के चोटी चोर साहु की|
आलस अनख परिहास कै सिखावन है, एते दिन रही पीर तुलसी के बाहु की || 28 ||
हिंदी अर्थ
इस चौपाई में तुलसीदास जी भगवान श्रीहनुमान जी की अद्भुत शक्ति और प्रभाव का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि हे महावीर हनुमान जी! आपका बाल्यकाल का खेल भी इतना अद्भुत है कि उसे सुनकर बड़े-बड़े धैर्यवान लोग भी विचलित हो जाते हैं, यहाँ तक कि सूर्य और राहु जैसी शक्तियाँ भी आपके सामने कुछ नहीं हैं। आपके बल और प्रभाव के कारण सभी लोकपाल निर्भय होकर सुखपूर्वक रहते हैं और आपका नाम लेने मात्र से किसी को भी कोई कष्ट नहीं रहता। तुलसीदास जी कहते हैं कि सभी नीति, वेद, उपाय और सिद्धियाँ भी आपके ही अधीन हैं, क्योंकि सारा सामर्थ्य आपके हाथ में है। अंत में वे विनती करते हैं कि हे कपिनाथ! अब मेरे आलस्य, क्रोध और इस दीर्घकालीन बाँह-पीड़ा को समाप्त कर दीजिए, क्योंकि अब तक मैंने बहुत कष्ट सह लिया है।
टूकनि को घर घर डोलत कँगाल बोलि, बाल ज्यों कृपाल नत पाल पालि पोसो है|
कीन्ही है सँभार सार अँजनी कुमार बीर, आपनो बिसारि हैं न मेरेहू भरोसो है ||
इतनो परेखो सब भान्ति समरथ आजु, कपिराज सांची कहौं को तिलोक तोसो है|
सासति सहत दास कीजे पेखि परिहास, चीरी को मरन खेल बालकनि कोसो है || 29 ||
हिंदी अर्थ
इस चौपाई में तुलसीदास जी भगवान श्रीहनुमान जी से अत्यंत दीन भाव से प्रार्थना करते हैं। वे कहते हैं कि हे कृपालु हनुमान जी! मैं टुकड़ों पर जीने वाला एक कंगाल जैसा हूँ, जो घर-घर भटकता है। जैसे आप बालक को पालते-पोषते हैं, वैसे ही आपने हमेशा दीनों की रक्षा की है। हे अंजनी कुमार वीर! आपने सदा अपने भक्तों का पालन और संरक्षण किया है, इसलिए मुझे भी यह भरोसा है कि आप मुझे नहीं छोड़ेंगे। तुलसीदास जी कहते हैं कि हे कपिराज! आपने अपनी कृपा से सब प्रकार से अपनी शक्ति सिद्ध कर दी है, और तीनों लोकों में आपके समान कोई नहीं है। अंत में वे विनती करते हैं कि हे महाबली! यदि मैं कोई अपराध कर बैठा हूँ तो उसे दंड के रूप में क्षमा कीजिए, क्योंकि आपका क्रोध भी मेरे लिए उतना ही सहज है जितना बच्चों का खेल होता है।
आपने ही पाप तें त्रिपात तें कि साप तें, बढ़ी है बाँह बेदन कही न सहि जाति है|
औषध अनेक जन्त्र मन्त्र टोटकादि किये, बादि भये देवता मनाये अधीकाति है ||
करतार, भरतार, हरतार, कर्म काल, को है जगजाल जो न मानत इताति है|
चेरो तेरो तुलसी तू मेरो कह्यो राम दूत, ढील तेरी बीर मोहि पीर तें पिराति है || 30 ||
हिंदी अर्थ
इस चौपाई में तुलसीदास जी भगवान श्रीहनुमान जी से अपनी तीव्र पीड़ा और संकट का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि हे हनुमान जी! यह बाँह की पीड़ा पाप, श्राप या किसी त्रिविध ताप से उत्पन्न हुई है, जो अब असहनीय हो चुकी है। मैंने अनेक औषधियाँ, मंत्र-तंत्र और टोटके भी किए, देवताओं की आराधना भी की, परंतु सब व्यर्थ सिद्ध हुए और यह कष्ट दूर नहीं हुआ। तुलसीदास जी कहते हैं कि संसार में कर्म, काल और सभी शक्तियाँ उसी के अधीन हैं, जो आपकी इच्छा के अनुसार चलता है, फिर भी यह संसार मेरी पीड़ा को नहीं समझ पाया। अंत में वे विनती करते हैं कि हे रामदूत हनुमान जी! मैं आपका दास हूँ और आप मेरे स्वामी हैं, इसलिए अब आपकी थोड़ी-सी भी देरी मुझे अत्यंत कष्ट दे रही है, कृपा करके मेरी पीड़ा को शीघ्र दूर कीजिए।
दूत राम राय को, सपूत पूत वाय को, समत्व हाथ पाय को सहाय असहाय को|
बाँकी बिरदावली बिदित बेद गाइयत, रावन सो भट भयो मुठिका के धाय को ||
एते बडे साहेब समर्थ को निवाजो आज, सीदत सुसेवक बचन मन काय को|
थोरी बाँह पीर की बड़ी गलानि तुलसी को, कौन पाप कोप, लोप प्रकट प्रभाय को || 31 ||
हिंदी अर्थ
इस चौपाई में तुलसीदास जी भगवान श्रीहनुमान जी की महानता और उनके दूत स्वरूप का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि हे हनुमान जी! आप श्रीराम के दूत हैं, पवनदेव के पुत्र हैं, और असहायों के लिए सच्चे सहायक हैं। आपके समान शक्तिशाली और दयालु कोई नहीं है, जो सबका सहारा बन सके। आपकी वीरता और यश की गाथा वेद भी गाते हैं। आपने रावण जैसे महान योद्धा को भी अपनी शक्ति से पराजित किया। तुलसीदास जी कहते हैं कि ऐसे समर्थ और कृपालु स्वामी होने पर भी आज आपका दास दुखी है और संकट में है। अंत में वे विनती करते हैं कि हे प्रभु! मेरी बाँह की पीड़ा और कष्ट बहुत बढ़ गया है, इसे देखकर अब मुझे लगता है कि यह किसी पाप या कोप का परिणाम है, कृपा करके मेरी रक्षा कीजिए और मेरी पीड़ा दूर कर दीजिए।
देवी देव दनुज मनुज मुनि सिद्ध नाग, छोटे बड़े जीव जेते चेतन अचेत हैं|
पूतना पिसाची जातुधानी जातुधान बाग, राम दूत की रजाई माथे मानि लेत हैं ||
घोर जन्त्र मन्त्र कूट कपट कुरोग जोग, हनुमान आन सुनि छाड़त निकेत हैं|
क्रोध कीजे कर्म को प्रबोध कीजे तुलसी को, सोध कीजे तिनको जो दोष दुख देत हैं || 32 ||
हिंदी अर्थ
इस चौपाई में तुलसीदास जी भगवान श्रीहनुमान जी की सर्वव्यापी शक्ति और संरक्षण का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि देवी-देवता, दानव, मनुष्य, मुनि, सिद्ध, नाग और सभी छोटे-बड़े जीव—चाहे चेतन हों या अचेतन—सब हनुमान जी की महिमा को स्वीकार करते हैं और उनके प्रति श्रद्धा रखते हैं। पूतना, पिशाचिनी और अन्य दुष्ट शक्तियाँ भी हनुमान जी के नाम और उनकी कृपा से भयभीत होकर दूर हो जाती हैं। तुलसीदास जी कहते हैं कि भयानक तंत्र-मंत्र, छल-कपट और रोग-शोक भी हनुमान जी के नाम मात्र से नष्ट हो जाते हैं। अंत में वे प्रार्थना करते हैं कि हे हनुमान जी! आप क्रोध करके नहीं, बल्कि कृपा करके मेरे कर्मों का सुधार कीजिए और जो भी मेरे दुख के कारण हैं, उन्हें दूर कर दीजिए।
तेरे बल बानर जिताये रन रावन सों, तेरे घाले जातुधान भये घर घर के|
तेरे बल राम राज किये सब सुर काज, सकल समाज साज साजे रघुबर के ||
तेरो गुनगान सुनि गीरबान पुलकत, सजल बिलोचन बिरंचि हरिहर के|
तुलसी के माथे पर हाथ फेरो कीस नाथ, देखिये न दास दुखी तोसो कनिगर के || 33 ||
हिंदी अर्थ
इस चौपाई में तुलसीदास जी भगवान श्रीहनुमान जी की अपार शक्ति, पराक्रम और कृपा का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि हनुमान जी के ही बल से वानर सेना ने रावण को युद्ध में पराजित किया और उनके पराक्रम से राक्षसों का विनाश होकर वे समाप्त हो गए, साथ ही उन्हीं की शक्ति से श्रीराम का राज्य स्थापित हुआ और देवताओं के सभी कार्य सफल हुए तथा रघुकुल के स्वामी श्रीराम का संपूर्ण कार्य भी आपकी ही कृपा से पूर्ण हुआ। आपका यश सुनकर देवता भी आनंदित हो जाते हैं और ब्रह्मा तथा शिव भी भावविभोर होकर आपके गुणों का स्मरण करते हैं। अंत में तुलसीदास जी विनती करते हैं कि हे कपिनाथ हनुमान जी! मेरे सिर पर अपनी कृपा-दृष्टि रखें और मुझे दुखी अवस्था में न देखें, क्योंकि मैं आपका दास हूँ और केवल आपकी शरण में हूँ।
पालो तेरे टूक को परेहू चूक मूकिये न, कूर कौड़ी दूको हौं आपनी ओर हेरिये|
भोरानाथ भोरे ही सरोष होत थोरे दोष, पोषि तोषि थापि आपनो न अव डेरिये ||
अँबु तू हौं अँबु चूर, अँबु तू हौं डिंभ सो न, बूझिये बिलंब अवलंब मेरे तेरिये|
बालक बिकल जानि पाहि प्रेम पहिचानि, तुलसी की बाँह पर लामी लूम फेरिये || 34 ||
हिंदी अर्थ
इस चौपाई में तुलसीदास जी भगवान श्रीहनुमान जी से अत्यंत दीनता और प्रेमपूर्वक प्रार्थना करते हैं कि हे प्रभु! मैं आपके टुकड़ों पर जीने वाला बहुत ही तुच्छ और कमजोर सेवक हूँ, मेरी छोटी-छोटी भूलों को अनदेखा करके मुझे क्षमा करें और मुझे अपनी ओर से दूर न करें। वे कहते हैं कि मैं अत्यंत दीन और कंगाल जैसा हूँ, इसलिए आप मुझ पर कृपा दृष्टि बनाए रखें और मुझे अपनाकर अपनी शरण में रखें। आगे वे निवेदन करते हैं कि जैसे छोटे दोषों पर स्वामी कभी-कभी क्रोधित हो जाते हैं, वैसे आप मुझ पर क्रोध न करें बल्कि मुझे अपने सेवक के रूप में स्वीकार करके सुरक्षित रखें। तुलसीदास जी स्वयं को असहाय बालक मानते हुए कहते हैं कि आप ही मेरे एकमात्र सहारा हैं, इसलिए कृपा करके देर न करें और प्रेमपूर्वक मेरी रक्षा करें तथा मेरी बाँहों पर अपनी करुणा का हाथ फेरें।
घेरि लियो रोगनि, कुजोगनि, कुलोगनि ज्यौं, बासर जलद घन घटा धुकि धाई है|
बरसत बारि पीर जारिये जवासे जस, रोष बिनु दोष धूम मूल मलिनाई है ||
करुनानिधान हनुमान महा बलवान, हेरि हँसि हाँकि फूंकि फौंजै ते उड़ाई है|
खाये हुतो तुलसी कुरोग राढ़ राकसनि, केसरी किसोर राखे बीर बरिआई है || 35 ||
हिंदी अर्थ
इस चौपाई में तुलसीदास जी भगवान श्रीहनुमान जी से अपनी पीड़ा और संकट दूर करने की प्रार्थना करते हैं। वे कहते हैं कि जैसे रोग, बुरे योग और ग्रह-दोष किसी व्यक्ति को चारों ओर से घेर लेते हैं, वैसे ही मेरी बाँह की पीड़ा भी मुझे चारों ओर से घेरकर बहुत कष्ट दे रही है, जैसे वर्षा के समय काले बादल और जल की धारा फैल जाती है। यह पीड़ा लगातार बढ़ती जा रही है और शरीर को जलाकर बहुत दुख दे रही है, जैसे बिना कारण धुआँ और जलन फैल जाती है। तुलसीदास जी कहते हैं कि हे करुणा के भंडार महाबली हनुमान जी! आपने अपने बल से बड़े-बड़े संकट और दुष्ट शक्तियों का नाश किया है, इसलिए कृपा करके मेरी इस पीड़ा और रोग को भी दूर कर दीजिए, क्योंकि मैं पूरी तरह आपकी शरण में हूँ।
सवैया
राम गुलाम तु ही हनुमान गोसाँई सुसाँई सदा अनुकूलो|
पाल्यो हौं बाल ज्यों आखर दू पितु मातु सों मंगल मोद समूलो ||
बाँह की बेदन बाँह पगार पुकारत आरत आनँद भूलो|
श्री रघुबीर निवारिये पीर रहौं दरबार परो लटि लूलो || 36 ||
हिंदी अर्थ
इस चौपाई में तुलसीदास जी भगवान श्रीहनुमान जी से अपनी शरणागति और करुणा की प्रार्थना करते हैं। वे कहते हैं कि हे प्रभु हनुमान जी! आप श्रीराम के सच्चे दास और मेरे भी स्वामी हैं, जो सदा अपने भक्तों पर अनुकूल रहते हैं। आपने मुझे बालक की तरह पालन-पोषण दिया है और माता-पिता की तरह मेरी रक्षा की है, जिससे मेरा जीवन आनंद और मंगल से भरा रहा है। अब मेरी बाँह की पीड़ा अत्यंत बढ़ गई है, मैं उसे सह नहीं पा रहा हूँ और बार-बार आपकी शरण में पुकार रहा हूँ। तुलसीदास जी विनती करते हैं कि हे श्री रघुवीर के दूत महाबली हनुमान जी! कृपा करके मेरी इस पीड़ा को दूर कीजिए, क्योंकि मैं आपके दरबार में एक असहाय दीन सेवक के रूप में पड़ा हुआ हूँ और केवल आपकी ही कृपा का सहारा है।
घनाक्षरी
काल की करालता करम कठिनाई कीधौ, पाप के प्रभाव की सुभाय बाय बावरे|
बेदन कुभाँति सो सही न जाति राति दिन, सोई बाँह गही जो गही समीर डाबरे ||
लायो तरु तुलसी तिहारो सो निहारि बारि, सींचिये मलीन भो तयो है तिहुँ तावरे|
भूतनि की आपनी पराये की कृपा निधान, जानियत सबही की रीति राम रावरे || 37 ||
हिंदी अर्थ
इस चौपाई में तुलसीदास जी भगवान श्रीहनुमान जी से अपनी तीव्र पीड़ा और संकट दूर करने की प्रार्थना करते हैं। वे कहते हैं कि काल की कठोरता, कर्मों की कठिनाई और पापों के प्रभाव से यह संसार बहुत ही पीड़ादायक हो गया है और मैं इस कष्ट को दिन-रात सह नहीं पा रहा हूँ, इसलिए मैंने आपकी शरण ली है जो पवनपुत्र हनुमान जी हैं। तुलसीदास जी आगे कहते हैं कि मैंने आपके नाम रूपी सहारे को ही अपना आधार बनाया है, अब आप ही कृपा करके मेरी इस मलिन अवस्था को दूर कीजिए जैसे सूखे पौधे को जल से सींचकर फिर से हरा-भरा कर दिया जाता है। अंत में वे कहते हैं कि हे प्रभु! आप कृपा के भंडार हैं और सबकी रीति-नीति को जानते हैं, इसलिए मेरे जैसे दीन पर भी अपनी दया बनाए रखें और मेरी रक्षा करें।
पाँय पीर पेट पीर बाँह पीर मुंह पीर, जर जर सकल पीर मई है|
देव भूत पितर करम खल काल ग्रह, मोहि पर दवरि दमानक सी दई है ||
हौं तो बिनु मोल के बिकानो बलि बारे हीतें, ओट राम नाम की ललाट लिखि लई है|
कुँभज के किंकर बिकल बूढ़े गोखुरनि, हाय राम राय ऐसी हाल कहूँ भई है || 38 ||
हिंदी अर्थ
इस चौपाई में तुलसीदास जी अपनी अत्यंत दीन और पीड़ित अवस्था का वर्णन करते हुए भगवान श्रीहनुमान जी से कृपा की प्रार्थना करते हैं। वे कहते हैं कि मेरे शरीर में पाँव, पेट, बाँह और मुख सभी जगह भयंकर पीड़ा फैली हुई है, जिससे मेरा पूरा शरीर दुख और कष्ट से भर गया है। देवता, भूत, पितर, कर्म, शत्रु और काल आदि सभी प्रकार के कष्ट मुझे चारों ओर से घेरे हुए हैं और मैं पूरी तरह पीड़ा में डूबा हुआ हूँ। तुलसीदास जी आगे कहते हैं कि मैं तो बिना किसी मूल्य के भी तुम्हारे लिए समर्पित हूँ और मैंने अपने मस्तक पर श्रीराम नाम की शरण को ही अपना सहारा बना लिया है। अंत में वे करुण भाव से कहते हैं कि हे रामराय! मेरी ऐसी दयनीय और असहाय स्थिति हो गई है, इसलिए कृपा करके मेरी रक्षा कीजिए।
बाहुक सुबाहु नीच लीचर मरीच मिलि, मुँह पीर केतुजा कुरोग जातुधान है|
राम नाम जप जाग कियो चहों सानुराग, काल कैसे दूत भूत कहा मेरे मान है ||
सुमिरे सहाय राम लखन आखर दौऊ, जिनके समूह साके जागत जहान है|
तुलसी सँभारि ताडका सँहारि भारि भट, बेधे बरगद से बनाई बानवान है || 39 ||
हिंदी अर्थ
इस चौपाई में तुलसीदास जी भगवान श्रीहनुमान जी से अपनी रक्षा और कृपा की प्रार्थना करते हैं। वे कहते हैं कि सुबाहु, मारीच जैसे नीच और राक्षसी प्रवृत्ति वाले दुष्ट भी मुझे चारों ओर से घेरकर मानसिक और शारीरिक कष्ट दे रहे हैं, और रोग तथा दुखों ने मेरे मुख तक पीड़ा पहुँचा दी है। मैं श्रीराम नाम का जप प्रेमपूर्वक करना चाहता हूँ, लेकिन काल, दूत और भूत जैसी बाधाएँ मुझे परेशान कर रही हैं, फिर भी मेरे मन में श्रीराम और लक्ष्मण के नाम का ही सहारा है, जिनकी महिमा से सारा संसार सुरक्षित रहता है। तुलसीदास जी स्मरण करते हैं कि जैसे भगवान श्रीराम ने ताड़का और बड़े-बड़े दुष्टों का संहार किया था, वैसे ही हे महाबली हनुमान जी! आप मेरी इन सभी बाधाओं और कष्टों का भी नाश करके मेरी रक्षा कीजिए।
बालपने सूधे मन राम सनमुख भयो, राम नाम लेत माँगि खात टूक टाक हौं|
परयो लोक रीति में पुनीत प्रीति राम राय, मोह बस बैठो तोरि तरकि तराक हौं ||
खोटे खोटे आचरन आचरत अपनायो, अंजनी कुमार सोध्यो रामपानि पाक हौं|
तुलसी गुसाँई भयो भोंडे दिन भूल गयो, ताको फल पावत निदान परिपाक हौं || 40 ||
हिंदी अर्थ
इस चौपाई में तुलसीदास जी अपने जीवन और भक्ति का आत्म-चिंतन करते हुए भगवान श्रीहनुमान जी से विनती करते हैं। वे कहते हैं कि बचपन से ही मेरा मन श्रीराम की ओर झुका रहा और मैं राम नाम लेते हुए भिक्षा मांगकर जीवन यापन करता रहा, फिर भी लोक व्यवहार और सांसारिक मोह के कारण मेरा मन कई बार भटक गया और मैं अस्थिर हो गया। वे स्वीकार करते हैं कि मैंने अनेक प्रकार के अनुचित और गलत आचरण भी अपनाए, जिससे मेरा जीवन मलिन हो गया, फिर भी हे अंजनी कुमार हनुमान जी! मैंने श्रीराम का नाम नहीं छोड़ा और उसी का सहारा लिया। तुलसीदास जी अंत में कहते हैं कि मैं अब अपने बीते हुए बुरे दिनों को याद करके पछता रहा हूँ और उनके कर्मों का फल भोग रहा हूँ, इसलिए कृपा करके मेरी रक्षा कीजिए और मुझे इस स्थिति से उबार लीजिए।
असन बसन हीन बिषम बिषाद लीन, देखि दीन दूबरो करै न हाय हाय को|
तुलसी अनाथ सो सनाथ रघुनाथ कियो, दियो फल सील सिंधु आपने सुभाय को ||
नीच यहि बीच पति पाइ भरु हाईगो, बिहाइ प्रभु भजन बचन मन काय को|
ता तें तनु पेषियत घोर बरतोर मिस, फूटि फूटि निकसत लोन राम राय को || 41 ||
हिंदी अर्थ
इस चौपाई में तुलसीदास जी अपनी दीन-हीन अवस्था और भगवान श्रीराम की कृपा का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि मैं वस्त्र और भोजन से भी रहित, अत्यंत दुख और विषाद में डूबा हुआ एक दीन व्यक्ति हूँ, जिसे देखकर कोई भी करुणा भाव से भी सहायता नहीं करता। फिर भी भगवान श्रीराम, जो करुणा और शील के सागर हैं, उन्होंने मुझ अनाथ को सनाथ बना दिया और अपनी कृपा से मुझे सहारा दिया। तुलसीदास जी स्वीकार करते हैं कि मैंने सांसारिक मोह और गलत आचरण के कारण प्रभु भजन, वचन और कर्म से दूर होकर अपने जीवन को बिगाड़ लिया, जिसका परिणाम आज मुझे कष्ट के रूप में भुगतना पड़ रहा है। अंत में वे कहते हैं कि इस शरीर को अब घोर कष्टों के कारण पीड़ा हो रही है और मानो मेरे पापों का कड़वा फल आँसुओं के रूप में बाहर निकल रहा है, इसलिए हे रामराज! कृपा करके मेरी रक्षा कीजिए।
जीओ जग जानकी जीवन को कहाइ जन, मरिबे को बारानसी बारि सुर सरि को|
तुलसी के दोहूँ हाथ मोदक हैं ऐसे ठाँऊ, जाके जिये मुये सोच करिहैं न लरि को ||
मो को झूँटो साँचो लोग राम कौ कहत सब, मेरे मन मान है न हर को न हरि को|
भारी पीर दुसह सरीर तें बिहाल होत, सोऊ रघुबीर बिनु सकै दूर करि को || 42 ||
हिंदी अर्थ
इस चौपाई में तुलसीदास जी भगवान श्रीराम की महिमा और जीवन-मरण के सत्य का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि जो लोग भगवान श्रीराम और माता जानकी के जीवन को समझते हैं, उनके लिए जीवन और मृत्यु दोनों ही सार्थक हो जाते हैं—जीने पर अयोध्या और मरने पर काशी तथा गंगा की प्राप्ति मानी जाती है। तुलसीदास जी कहते हैं कि ऐसे भक्त के लिए जीवन और मृत्यु दोनों ही आनंदमय हैं और उसे किसी प्रकार का शोक नहीं रहता। वे आगे कहते हैं कि लोग मुझे झूठा या सच्चा कुछ भी कहें, लेकिन मेरे मन में केवल श्रीराम का ही विश्वास है, न कि किसी अन्य देव या शक्ति का। अंत में वे विनती करते हैं कि यह शरीर अत्यंत पीड़ा से व्याकुल है और इस कष्ट को केवल श्रीरघुबीर श्रीराम ही दूर कर सकते हैं।
सीतापति साहेब सहाय हनुमान नित, हित उपदेश को महेस मानो गुरु कै|
मानस बचन काय सरन तिहारे पाँय, तुम्हरे भरोसे सुर मैं न जाने सुर कै ||
ब्याधि भूत जनित उपाधि काहु खल की, समाधि की जै तुलसी को जानि जन फुर कै|
कपिनाथ रघुनाथ भोलानाथ भूतनाथ, रोग सिंधु क्यों न डारियत गाय खुर कै || 43 ||
हिंदी अर्थ
इस चौपाई में तुलसीदास जी भगवान श्रीहनुमान जी की शरणागति स्वीकार करते हुए उनकी महिमा का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि हे सीतापति श्रीराम के सहायक हनुमान जी! आप ही मेरे सच्चे सहायक और हित के उपदेशक हैं, जिन्हें मैं महेश (शिव) के समान गुरु मानता हूँ। मैं मन, वचन और कर्म से आपकी शरण में हूँ और पूरी तरह आपके ही भरोसे जीवन जी रहा हूँ, इसलिए मुझे किसी अन्य देव या शक्ति का सहारा नहीं है। वे आगे कहते हैं कि यदि यह रोग, भूत-प्रेत या किसी दुष्ट शक्ति के कारण उत्पन्न कष्ट है, तो हे कपिनाथ, रघुनाथ और भूतनाथ हनुमान जी! कृपा करके मेरे सभी रोग और दुखों को ऐसे नष्ट कर दीजिए जैसे गाय के खुर से पानी का समुद्र मिट जाता है।
कहों हनुमान सों सुजान राम राय सों, कृपानिधान संकर सों सावधान सुनिये|
हरष विषाद राग रोष गुन दोष मई, बिरची बिरञ्ची सब देखियत दुनिये ||
माया जीव काल के करम के सुभाय के, करैया राम बेद कहें साँची मन गुनिये|
तुम्ह तें कहा न होय हा हा सो बुझैये मोहिं, हौं हूँ रहों मौनही वयो सो जानि लुनिये || 44 ||
हिंदी अर्थ
इस चौपाई में तुलसीदास जी भगवान श्रीहनुमान जी, श्रीराम और भगवान शिव से विनम्र भाव से प्रार्थना करते हैं। वे कहते हैं कि हे सुजान हनुमान जी! मैं आपसे, कृपानिधान श्रीराम से और भगवान शंकर से निवेदन करता हूँ कि कृपया मेरी बात ध्यान से सुनिए। यह संसार हर्ष, विषाद, राग, द्वेष और अनेक गुण-दोषों से भरा हुआ है, और यहां तक कि ब्रह्मा जैसे महान देवता भी इस संसार की माया में बंधे हुए दिखाई देते हैं। वे आगे कहते हैं कि यह सब माया, जीव, काल और कर्म के प्रभाव से उत्पन्न हुआ है, जिसे वेद भी सत्य मानते हैं। अंत में तुलसीदास जी कहते हैं कि हे प्रभु! आपके बिना मेरा कोई सहारा नहीं है, इसलिए मैं अब मौन होकर आपकी कृपा का ही इंतजार करता हूँ, क्योंकि आप ही मेरे सभी कष्टों को दूर करने में सक्षम हैं।
👉 नोट: ऊपर दिए गए सभी हिंदी अर्थ सरल भाषा में समझाने के लिए लिखे गए हैं।
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हनुमान बाहुक क्या है?
हनुमान बाहुक भगवान हनुमान की स्तुति में रचित एक अत्यंत प्रसिद्ध भक्तिमय काव्य है। इसे गोस्वामी तुलसीदास जी की प्रमुख रचनाओं में गिना जाता है। “बाहुक” शब्द का संबंध भुजा अथवा शरीर की पीड़ा से माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार तुलसीदास जी को जीवन के अंतिम समय में भुजाओं में असहनीय पीड़ा थी, तब उन्होंने भगवान हनुमान की करुणा प्राप्त करने के लिए इस स्तोत्र की रचना की।
यह केवल शारीरिक कष्टों से मुक्ति की प्रार्थना नहीं, बल्कि ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण और अटूट भक्ति का भी संदेश देता है।
हनुमान बाहुक का इतिहास
भक्ति साहित्य में हनुमान बाहुक का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। मान्यता है कि जब गोस्वामी तुलसीदास जी शारीरिक कष्टों से पीड़ित थे, तब उन्होंने श्री हनुमान जी का स्मरण करते हुए यह दिव्य स्तुति लिखी। उनकी अटूट श्रद्धा और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान हनुमान ने उन्हें मानसिक शक्ति और कष्टों से राहत प्रदान की।
इसी कारण आज भी अनेक श्रद्धालु कठिन परिस्थितियों, मानसिक तनाव और जीवन की बाधाओं के समय हनुमान बाहुक का पाठ करते हैं।
हनुमान बाहुक का धार्मिक महत्व
हनुमान बाहुक केवल एक स्तोत्र नहीं, बल्कि भक्ति, विश्वास और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। इसके नियमित पाठ से भक्त भगवान हनुमान के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं और उनसे जीवन की कठिनाइयों को दूर करने की प्रार्थना करते हैं।
धार्मिक दृष्टि से यह पाठ—
- भगवान हनुमान के प्रति भक्ति को दृढ़ करता है।
- मन को सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है।
- आत्मविश्वास बढ़ाने में सहायक माना जाता है।
- विपरीत परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखने की प्रेरणा देता है।
- आध्यात्मिक साधना को मजबूत करता है।
हनुमान बाहुक पढ़ने के लाभ
श्रद्धा और विश्वास के साथ हनुमान बाहुक का पाठ करने से अनेक आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होने की मान्यता है।
मानसिक शांति
नियमित पाठ मन को शांत और सकारात्मक बनाने में सहायक माना जाता है।
आत्मविश्वास में वृद्धि
भगवान हनुमान साहस और पराक्रम के प्रतीक हैं। उनका स्मरण व्यक्ति के आत्मबल को बढ़ाता है।
नकारात्मक विचारों से मुक्ति
भक्ति और ध्यान के माध्यम से मन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
आध्यात्मिक उन्नति
नियमित पाठ व्यक्ति को भगवान के प्रति समर्पण और भक्ति की भावना से जोड़ता है।
संकटों का सामना करने की शक्ति
हनुमान जी को संकटमोचन कहा जाता है। श्रद्धालु मानते हैं कि उनकी कृपा से कठिन समय में साहस और धैर्य प्राप्त होता है।
हनुमान बाहुक पाठ करने की विधि
- प्रातःकाल या सायंकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- पूजा स्थान को स्वच्छ रखें।
- भगवान हनुमान की प्रतिमा या चित्र के सामने दीपक और धूप जलाएँ।
- श्रीराम एवं हनुमान जी का ध्यान करें।
- शांत मन से हनुमान बाहुक का पाठ करें।
- पाठ के अंत में हनुमान जी की आरती करें और प्रसाद अर्पित करें।
हनुमान बाहुक कब पढ़ना चाहिए?
हनुमान बाहुक का पाठ किसी भी दिन श्रद्धा के साथ किया जा सकता है, लेकिन विशेष रूप से—
- मंगलवार
- शनिवार
- हनुमान जयंती
- राम नवमी
- संकट या मानसिक तनाव के समय
इन अवसरों पर इसका पाठ करना शुभ माना जाता है।
हनुमान बाहुक पाठ के नियम
- पाठ से पहले स्नान करें।
- स्वच्छ स्थान पर बैठकर पाठ करें।
- यथासंभव एक ही समय पर नियमित पाठ करें।
- पाठ के दौरान मन को शांत रखें।
- भगवान श्रीराम और हनुमान जी का स्मरण अवश्य करें।
- श्रद्धा और विश्वास के साथ पाठ करें।
निष्कर्ष
श्री हनुमान बाहुक केवल एक धार्मिक स्तोत्र नहीं, बल्कि भगवान हनुमान के प्रति अटूट श्रद्धा और समर्पण का दिव्य प्रतीक है। इसका नियमित पाठ व्यक्ति को आध्यात्मिक शक्ति, मानसिक शांति और सकारात्मक सोच प्रदान करने की प्रेरणा देता है। यदि इसे श्रद्धा, नियम और विश्वास के साथ किया जाए, तो यह साधना को और अधिक सार्थक बना सकता है।
FAQ
हनुमान बाहुक किसने लिखा?
हनुमान बाहुक की रचना महान संत गोस्वामी तुलसीदास जी ने की थी।
हनुमान बाहुक का पाठ कब करना चाहिए?
मंगलवार, शनिवार अथवा प्रतिदिन प्रातः या सायंकाल श्रद्धा के साथ किया जा सकता है।
क्या महिलाएँ हनुमान बाहुक का पाठ कर सकती हैं?
हाँ, श्रद्धा और मर्यादा के साथ कोई भी भक्त इसका पाठ कर सकता है।
हनुमान बाहुक पढ़ने से क्या लाभ होते हैं?
धार्मिक मान्यता के अनुसार यह मानसिक शांति, आत्मबल, साहस और भक्ति को बढ़ाने में सहायक माना जाता है।
क्या हनुमान बाहुक का प्रतिदिन पाठ किया जा सकता है?
हाँ, यदि समय और श्रद्धा हो तो इसका नियमित पाठ किया जा सकता है।
