शिवमहिम्नः स्तोत्र (Shiva Mahimna Stotram)

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शिवमहिम्नः स्तोत्र भगवान शिव

शिवमहिम्नः स्तोत्र (Shiva Mahimna Stotram)

शिवमहिम्नः स्तोत्र (Shiva Mahimna Stotram) भगवान शिव की महिमा का वर्णन करने वाला प्रसिद्ध संस्कृत स्तोत्र है। धार्मिक परंपरा के अनुसार इसकी रचना गंधर्वराज पुष्पदंत ने भगवान शिव की स्तुति में की थी। इस स्तोत्र में भगवान शिव के स्वरूप, शक्ति, करुणा और दिव्य महिमा का सुंदर वर्णन मिलता है।

इस लेख में आप शिवमहिम्नः स्तोत्र का संपूर्ण पाठ, सरल हिंदी अर्थ, पुष्पदंत की कथा, पाठ विधि, महत्व और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार लाभ पढ़ सकते हैं।

शिव महिम्न स्तोत्र की कथा

प्रचलित कथा के अनुसार चित्ररथ नामक राजा भगवान शिव के परम भक्त थे। उन्होंने एक सुंदर उद्यान बनवाया था, जिसमें अनेक प्रकार के सुगंधित फूल लगे हुए थे। राजा प्रतिदिन इन्हीं फूलों से भगवान शिव की पूजा करते थे।

एक दिन पुष्पदंत नामक गंधर्व उस उद्यान के पास से गुजरे। बगीचे की सुंदरता देखकर वे आकर्षित हो गए और वहाँ के फूल लेने लगे। धीरे-धीरे वे प्रतिदिन फूल चुराने लगे। राजा को पूजा के लिए फूल मिलने बंद हो गए, लेकिन वे यह पता नहीं लगा पा रहे थे कि फूल कौन ले जा रहा है।

पुष्पदंत को अपनी दिव्य शक्तियों के कारण विश्वास था कि उन्हें कोई देख नहीं सकता। तब राजा ने एक उपाय किया। उन्होंने भगवान शिव को अर्पित किए गए फूल और बेलपत्र उद्यान में बिछवा दिए।

पुष्पदंत अनजाने में उन पवित्र वस्तुओं को पैरों से पार कर गए। कथा के अनुसार इससे उनकी दिव्य शक्ति समाप्त हो गई। अपनी भूल का एहसास होने पर उन्होंने भगवान शिव की स्तुति में शिव महिम्न स्तोत्र की रचना की।

भगवान शिव उनकी भक्ति से प्रसन्न हुए और उनकी भूल को क्षमा कर दिया।


शिव महिम्न स्तोत्र का संपूर्ण पाठ

॥ शिव महिम्न स्तोत्र ॥

महिम्नः पारं ते परमविदुषो यद्यसदृशी
स्तुतिर्ब्रह्मादीनामपि तदवसन्नास्त्वयि गिरः।
अथावाच्यः सर्वः स्वमतिपरिणामावधि गृणन्
ममाप्येष स्तोत्रे हर निरपवादः परिकरः॥

सरल हिंदी अर्थ:
हे हर! आपकी महिमा अनंत है। ब्रह्मा आदि देव भी आपके गुणों का पूर्ण वर्णन नहीं कर सकते। फिर भी प्रत्येक व्यक्ति अपनी बुद्धि और सामर्थ्य के अनुसार आपकी स्तुति करता है। मैं भी अपनी सीमित क्षमता के अनुसार आपकी वंदना कर रहा हूँ।


अतीतः पंथानं तव च महिमा वाङ्मनसयोः
अतद्व्यावृत्त्या यं चकितमभिधत्ते श्रुतिरपि।
स कस्य स्तोत्रव्यः कतिविधगुणः कस्य विषयः
पदे त्वर्वाचीने पतति न मनः कस्य न वचः॥

सरल हिंदी अर्थ:
हे शिव! आपकी महिमा मन और वाणी की पहुंच से परे है। वेद भी आपके विषय में ‘नेति-नेति’ कहकर अपनी सीमाओं को व्यक्त करते हैं। ऐसे अनंत स्वरूप की पूर्ण स्तुति करना किसी के लिए संभव नहीं है।


मधुस्फीता वाचः परमममृतं निर्मितवतः
तव ब्रह्मन् किं वागपि सुरगुरोर्विस्मयपदम्।
मम त्वेतां वाणीं गुणकथनपुण्येन भवतः
पुनामीत्यर्थेऽस्मिन् पुरमथन बुद्धिर्व्यवसिता॥

सरल हिंदी अर्थ:
हे त्रिपुरारी! जब देवगुरु बृहस्पति जैसे विद्वान भी आपकी पूर्ण महिमा का वर्णन नहीं कर सकते, तब मेरी क्षमता तो बहुत छोटी है। फिर भी आपकी स्तुति करने से मेरी वाणी और बुद्धि पवित्र होंगी—इसी भावना से मैं आपका गुणगान कर रहा हूँ।


तवैश्वर्यं यत्तज्जगदुदयरक्षाप्रलयकृत्
त्रयीवस्तु व्यस्तं तिसृषु गुणभिन्नासु तनुषु।
अभव्यानामस्मिन् वरद रमणीयामरमणीं
विहन्तुं व्याक्रोशीं विदधत इहैके जडधियः॥

सरल हिंदी अर्थ:
हे वरद! सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और संहार आपके ही दिव्य सामर्थ्य से जुड़े हैं। आपकी शक्ति विभिन्न रूपों में प्रकट होती है। फिर भी कुछ लोग अज्ञान के कारण आपके स्वरूप के विषय में अनुचित बातें करते हैं।


किमीहः किंकायः स खलु किमुपायस्त्रिभुवनं
किमाधारो धाता सृजति किमुपादान इति च।
अतर्क्यैश्वर्ये त्वय्यनवसरदुःस्थो हतधियः
कुतर्कोऽयं कांश्चित् मुखरयति मोहाय जगतः॥

सरल हिंदी अर्थ:
हे महादेव! आपकी दिव्य सत्ता को सामान्य तर्क से समझना संभव नहीं है। आपके स्वरूप और सृष्टि की रचना के विषय में किए जाने वाले अनेक कुतर्क वास्तव में अज्ञान और भ्रम से उत्पन्न होते हैं।


अजन्मानो लोकाः किमवयववन्तोऽपि जगताम्
अधिष्ठातारं किं भवविधिरनादृत्य भवति।
अनीशो वा कुर्याद् भुवनजनने कः परिकरो
यतो मन्दास्त्वां प्रत्यमरवर संशेरत इमे॥

सरल हिंदी अर्थ:
सृष्टि के विभिन्न लोकों की रचना और व्यवस्था किसी सर्वोच्च शक्ति के बिना कैसे संभव हो सकती है? हे देवश्रेष्ठ! आपके अस्तित्व पर संदेह करना अज्ञान का परिणाम है।


त्रयी साङ्ख्यं योगः पशुपतिमतं वैष्णवमिति
प्रभिन्ने प्रस्थाने परमिदमदः पथ्यमिति च।
रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिल नानापथजुषां
नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव॥

सरल हिंदी अर्थ:
लोग सत्य तक पहुंचने के लिए अलग-अलग आध्यात्मिक मार्ग अपनाते हैं। जैसे अनेक नदियाँ अंततः समुद्र में मिलती हैं, उसी प्रकार विभिन्न साधना-पथ अंततः परम सत्य की ओर ले जाते हैं।


महोक्षः खट्वाङ्गं परशुरजिनं भस्म फणिनः
कपालं चेतीयत्तव वरद तन्त्रोपकरणम्।
सुरास्तां तामृद्धिं दधति तु भवद्भ्रूप्रणिहितां
न हि स्वात्मारामं विषयमृगतृष्णा भ्रमयति॥

सरल हिंदी अर्थ:
हे वरद! आपका स्वरूप अत्यंत सरल है। नंदी, खट्वांग, परशु, बाघम्बर, भस्म, सर्प और कपाल जैसे साधारण प्रतीकों से आपका स्वरूप जुड़ा हुआ है। देवताओं को प्राप्त होने वाला ऐश्वर्य भी आपकी कृपा से मिलता है, फिर भी आप स्वयं सांसारिक वैभव के प्रति आसक्त नहीं हैं।


ध्रुवं कश्चित् सर्वं सकलमपरस्त्वध्रुवमिदं
परो ध्रौव्याऽध्रौव्ये जगति गदति व्यस्तविषये।
समस्तेऽप्येतस्मिन् पुरमथन तैर्विस्मित इव
स्तुवन् जिह्रेमि त्वां न खलु ननु नृष्टा मुखरता॥

सरल हिंदी अर्थ:
संसार के स्वरूप को लेकर अलग-अलग विचार हैं। कोई इसे स्थायी मानता है और कोई अस्थायी। इन मतभेदों के बावजूद आपकी स्तुति करने में मेरी श्रद्धा बनी रहती है।


तवैश्वर्यं यत्नाद् यदुपरि विरिञ्चिर्हरिरधः
परिच्छेतुं यातावनिलमनलस्कन्धवपुषः।
ततो भक्तिश्रद्धा-भरगुरु-गृणद्भ्यां गिरिश यत्
स्वयं तस्थे ताभ्यां तव किमनुवृत्तिर्न फलति॥

सरल हिंदी अर्थ:
ब्रह्मा और विष्णु ने आपके अनंत स्वरूप की सीमा जानने का प्रयास किया, लेकिन वे सफल नहीं हो सके। अंततः भक्ति और श्रद्धा ही आपके प्रति सच्ची अनुभूति का मार्ग बनी।


अयत्नादासाद्य त्रिभुवनमवैरव्यतिकरं
दशास्यो यद्बाहूनभृत-रणकण्डू-परवशान्।
शिरःपद्मश्रेणी-रचितचरणाम्भोरुह-बलेः
स्थिरायास्त्वद्भक्तेस्त्रिपुरहर विस्फूर्जितमिदम्॥

सरल हिंदी अर्थ:
रावण की महान शक्ति और सामर्थ्य को उसकी शिवभक्ति से जोड़ा गया है। उसने अपने शीश तक भगवान शिव के चरणों में अर्पित किए। यह उसकी दृढ़ भक्ति की शक्ति का उदाहरण माना जाता है।


अमुष्य त्वत्सेवा-समधिगतसारं भुजवनं
बलात् कैलासेऽपि त्वदधिवसतौ विक्रमयतः।
अलभ्यापातालेऽप्यलसचलितांगुष्ठशिरसि
प्रतिष्ठा त्वय्यासीद् ध्रुवमुपचितो मुह्यति खलः॥

सरल हिंदी अर्थ:
रावण ने अपने बल के अहंकार में कैलास को उठाने का प्रयास किया। भगवान शिव ने केवल अपने पैर के अंगूठे से उसे दबा दिया। अंततः रावण को अपनी भूल का बोध हुआ और उसने शिव की शरण ग्रहण की।


यदृद्धिं सुत्राम्णो वरद परमोच्चैरपि सतीं
अधश्चक्रे बाणः परिजनविधेयत्रिभुवनः।
न तच्चित्रं तस्मिन् वरिवसितरि त्वच्चरणयोः
न कस्याप्युन्नत्यै भवति शिरसस्त्वय्यवनतिः॥

सरल हिंदी अर्थ:
बाणासुर को प्राप्त सामर्थ्य और ऐश्वर्य को भी भगवान शिव की भक्ति का फल बताया गया है। भगवान के चरणों में झुकना व्यक्ति के उत्थान का माध्यम बन सकता है।


अकाण्ड-ब्रह्माण्ड-क्षयचकित-देवासुरकृपा
विधेयस्याऽऽसीद् यस्त्रिनयन विषं संहृतवतः।
स कल्माषः कण्ठे तव न कुरुते न श्रियमहो
विकारोऽपि श्लाघ्यो भुवन-भय-भङ्ग-व्यसनिनः॥

सरल हिंदी अर्थ:
समुद्र मंथन से निकले भयंकर विष से देव और असुर भयभीत हो गए। संसार की रक्षा के लिए भगवान शिव ने उस विष को ग्रहण किया। उनके कंठ का नीला पड़ना ही उन्हें नीलकंठ नाम से प्रसिद्ध करता है। लोककल्याण के लिए किया गया त्याग भगवान के स्वरूप को और भी गौरवपूर्ण बनाता है।


असिद्धार्था नैव क्वचिदपि सदेवासुरनरे
निवर्तन्ते नित्यं जगति जयिनो यस्य विशिखाः।
स पश्यन्नीश त्वामितरसुरसाधारणमभूत्
स्मरः स्मर्तव्यात्मा न हि वशिषु पथ्यः परिभवः॥

सरल हिंदी अर्थ:
कामदेव के बाणों से सामान्यतः कोई आसानी से बच नहीं पाता, लेकिन भगवान शिव के सामने उसकी शक्ति भी समाप्त हो गई। यह प्रसंग शिव की योगशक्ति और संयम को दर्शाता है।


मही पादाघाताद् व्रजति सहसा संशयपदं
पदं विष्णोर्भ्राम्यद् भुज-परिघ-रुग्ण-ग्रह-गणम्।
मुहुर्द्यौर्दौस्थ्यं यात्यनिभृत-जटा-ताडित-तटा
जगद्रक्षायै त्वं नटसि ननु वामैव विभुता॥

सरल हिंदी अर्थ:
जब भगवान शिव लोककल्याण के लिए तांडव करते हैं, तब उनकी गति से पृथ्वी, आकाश और ग्रह-नक्षत्र तक प्रभावित होते हैं। उनका नटराज स्वरूप सृष्टि के व्यापक सामर्थ्य का प्रतीक है।


वियद्व्यापी तारा-गण-गुणित-फेनोद्गम-रुचिः
प्रवाहो वारां यः पृषतलघुदृष्टः शिरसि ते।
जगद्द्वीपाकारं जलधिवलयं तेन कृतमिति
अनेनैवोन्नेयं धृतमहिम दिव्यं तव वपुः॥

सरल हिंदी अर्थ:
आकाश से प्रवाहित होने वाली गंगा भगवान शिव की जटाओं पर अत्यंत छोटी दिखाई देती हैं। इससे भगवान शिव की विराटता और दिव्य सामर्थ्य का वर्णन किया गया है।


रथः क्षोणी यन्ता शतधृतिरगेन्द्रो धनुरथो
रथाङ्गे चन्द्रार्कौ रथ-चरण-पाणिः शर इति।
दिधक्षोस्ते कोऽयं त्रिपुरतृणमाडम्बर-विधिः
विधेयैः क्रीडन्त्यो न खलु परतन्त्राः प्रभुधियः॥

सरल हिंदी अर्थ:
त्रिपुरासुर के संहार के लिए पृथ्वी को रथ, ब्रह्मा को सारथी तथा सूर्य-चंद्र को रथ के अंगों के रूप में बताया गया है। स्तोत्रकार कहते हैं कि भगवान शिव के लिए त्रिपुर का विनाश स्वयं में कठिन कार्य नहीं था।


हरिस्ते सहस्रं कमल बलिमाधाय पदयोः
यदेकोने तस्मिन् निजमुदहरन्नेत्रकमलम्।
गतो भक्त्युद्रेकः परिणतिमसौ चक्रवपुषः
त्रयाणां रक्षायै त्रिपुरहर जागर्ति जगताम्॥

सरल हिंदी अर्थ:
भगवान विष्णु ने शिव की पूजा में सहस्र कमल अर्पित करने का संकल्प लिया। एक कमल कम पड़ने पर उन्होंने अपनी आंख को ही कमल के रूप में अर्पित करने का भाव प्रकट किया। उनकी भक्ति से सुदर्शन चक्र की प्राप्ति का प्रसंग जुड़ा है।


क्रतौ सुप्ते जाग्रत् त्वमसि फलयोगे क्रतुमतां
क्व कर्म प्रध्वस्तं फलति पुरुषाराधनमृते।
अतस्त्वां सम्प्रेक्ष्य क्रतुषु फलदान-प्रतिभुवं
श्रुतौ श्रद्धां बध्वा दृढपरिकरः कर्मसु जनः॥

सरल हिंदी अर्थ:
कर्मों के फल का विधान भगवान की व्यवस्था से जुड़ा हुआ माना गया है। इसी विश्वास से मनुष्य श्रद्धापूर्वक शुभ कर्म और धार्मिक अनुष्ठान करता है।


क्रियादक्षो दक्षः क्रतुपतिरधीशस्तनुभृतां
ऋषीणामार्त्विज्यं शरणद सदस्याः सुर-गणाः।
क्रतुभ्रंशस्त्वत्तः क्रतुफल-विधान-व्यसनिनः
ध्रुवं कर्तुं श्रद्धा विधुरमभिचाराय हि मखाः॥

सरल हिंदी अर्थ:
दक्ष प्रजापति के यज्ञ का प्रसंग यह संदेश देता है कि केवल बाहरी कर्मकांड पर्याप्त नहीं हैं। श्रद्धा और उचित भाव के बिना किया गया धार्मिक कर्म अपेक्षित परिणाम नहीं देता।


प्रजानाथं नाथ प्रसभमभिकं स्वां दुहितरं
गतं रोहिद् भूतां रिरमयिषुमृष्यस्य वपुषा।
धनुष्पाणेर्यातं दिवमपि सपत्राकृतममुं
त्रसन्तं तेऽद्यापि त्यजति न मृगव्याधरभसः॥

सरल हिंदी अर्थ:
इस श्लोक में ब्रह्मा से संबंधित एक प्रसंग का वर्णन करते हुए भगवान शिव के रौद्र और अनुशासनकारी स्वरूप का उल्लेख किया गया है।


स्वलावण्याशंसा धृतधनुषमह्नाय तृणवत्
पुरः प्लुष्टं दृष्ट्वा पुरमथन पुष्पायुधमपि।
यदि स्त्रैणं देवी यमनिरत-देहार्ध-घटनात्
अवैति त्वामद्धा बत वरद मुग्धा युवतयः॥

सरल हिंदी अर्थ:
भगवान शिव योगी और काम-विजेता हैं। कामदेव को भस्म करने का प्रसंग उनकी इंद्रिय-निग्रह और तपशक्ति को दर्शाता है।


श्मशानेष्वाक्रीडा स्मरहर पिशाचाः सहचराः
चिता-भस्मालेपः स्रगपि नृकरोटी-परिकरः।
अमङ्गल्यं शीलं तव भवतु नामैवमखिलं
तथापि स्मर्तॄणां वरद परमं मङ्गलमसि॥

सरल हिंदी अर्थ:
भगवान शिव का श्मशान-वासी और भस्मधारी स्वरूप सामान्य दृष्टि से भले ही भयावह दिखाई दे, लेकिन भक्तों के लिए वही शिव परम मंगलकारी हैं। वे अपने भक्तों को आश्रय और कल्याण प्रदान करने वाले माने जाते हैं।


मनः प्रत्यक् चित्ते सविधमविधायात्त-मरुतः
प्रहृष्यद्रोमाणः प्रमद-सलिलोत्सङ्गति-दृशः।
यदालोक्याह्लादं ह्रद इव निमज्यामृतमये
दधत्यन्तस्तत्त्वं किमपि यमिनस्तत् किल भवान्॥

सरल हिंदी अर्थ:
योग और ध्यान के माध्यम से साधक जिस आंतरिक आनंद का अनुभव करते हैं, उसे भगवान शिव की अनुभूति से जोड़ा गया है। शिव साधना मन को भीतर की ओर ले जाने वाली मानी जाती है।


त्वमर्कस्त्वं सोमस्त्वमसि पवनस्त्वं हुतवहः
त्वमापस्त्वं व्योम त्वमु धरणिरात्मा त्वमिति च।
परिच्छिन्नामेवं त्वयि परिणता बिभ्रति गिरं
न विद्मस्तत्तत्त्वं वयमिह तु यत् त्वं न भवसि॥

सरल हिंदी अर्थ:
हे शिव! सूर्य, चंद्रमा, वायु, अग्नि, जल, आकाश और पृथ्वी—इन सभी में आपकी सत्ता को देखा गया है। स्तोत्रकार कहते हैं कि ऐसा कुछ भी ज्ञात नहीं जिसे आपके स्वरूप से अलग किया जा सके।


त्रयीं तिस्रो वृत्तीस्त्रिभुवनमथो त्रीनपि सुरान्
अकाराद्यैर्वर्णैस्त्रिभिरभिदधत् तीर्णविकृति।
तुरीयं ते धाम ध्वनिभिरवरुन्धानमणुभिः
समस्त-व्यस्तं त्वां शरणद गृणात्योमिति पदम्॥

सरल हिंदी अर्थ:
ॐकार के तीन अक्षरों—अ, उ और म—को विभिन्न त्रिविध तत्वों से जोड़ा गया है। ॐ को भगवान शिव के व्यापक और परम स्वरूप का प्रतीक माना गया है।


भवः शर्वो रुद्रः पशुपतिरथोग्रः सहमहान्
तथा भीमेशानाविति यदभिधानाष्टकमिदम्।
अमुष्मिन् प्रत्येकं प्रविचरति देव श्रुतिरपि
प्रियायास्मै धाम्ने प्रणिहित-नमस्योऽस्मि भवते॥

सरल हिंदी अर्थ:
भगवान शिव के आठ नाम—भव, शर्व, रुद्र, पशुपति, उग्र, महादेव, भीम और ईशान—का स्मरण किया गया है। इन नामों के माध्यम से शिव के विभिन्न दिव्य स्वरूपों की वंदना की जाती है।


नमो नेदिष्ठाय प्रियदव दविष्ठाय च नमः
नमः क्षोदिष्ठाय स्मरहर महिष्ठाय च नमः।
नमो वर्षिष्ठाय त्रिनयन यविष्ठाय च नमः
नमः सर्वस्मै ते तदिदमतिसर्वाय च नमः॥

सरल हिंदी अर्थ:
हे त्रिनेत्रधारी! आप अत्यंत निकट भी हैं और दूर भी। आप सूक्ष्म से सूक्ष्म तथा महान से महान हैं। आप सबमें विद्यमान हैं और फिर भी सभी सीमाओं से परे हैं।


बहुल-रजसे विश्वोत्पत्तौ भवाय नमो नमः
प्रबल-तमसे तत् संहारे हराय नमो नमः।
जन-सुखकृते सत्त्वोद्रिक्तौ मृडाय नमो नमः
प्रमहसि पदे निस्त्रैगुण्ये शिवाय नमो नमः॥

सरल हिंदी अर्थ:
सृष्टि, पालन और संहार को क्रमशः विभिन्न गुणों से जोड़ा गया है। अंततः भगवान शिव को इन तीनों गुणों से परे परम स्वरूप के रूप में नमन किया गया है।


कृश-परिणति-चेतः क्लेशवश्यं क्व चेदं
क्व च तव गुण-सीमोल्लङ्घिनी शश्वदृद्धिः।
इति चकितममन्दीकृत्य मां भक्तिराधाद्
वरद चरणयोस्ते वाक्य-पुष्पोपहारम्॥

सरल हिंदी अर्थ:
मेरी बुद्धि सीमित है और आपकी महिमा अनंत। फिर भी भक्ति मुझे आपके चरणों में अपनी स्तुति अर्पित करने का साहस देती है।


असित-गिरि-समं स्यात् कज्जलं सिन्धु-पात्रे
सुर-तरुवर-शाखा लेखनी पत्रमुर्वी।
लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं
तदपि तव गुणानामीश पारं न याति॥

सरल हिंदी अर्थ:
यदि काले पर्वत जितनी स्याही बनाई जाए, समुद्र उसका पात्र हो, देववृक्ष की शाखा लेखनी बन जाए और पृथ्वी कागज बन जाए, फिर भी देवी सरस्वती अनंत काल तक लिखती रहें तो भी भगवान शिव की महिमा का अंत नहीं लिखा जा सकता।


असुर-सुर-मुनीन्द्रैरर्चितस्येन्दु-मौलेः
ग्रथित-गुणमहिम्नो निर्गुणस्येश्वरस्य।
सकल-गण-वरिष्ठः पुष्पदन्ताभिधानः
रुचिरमलघुवृत्तैः स्तोत्रमेतच्चकार॥

सरल हिंदी अर्थ:
यह स्तोत्र चंद्रमौली भगवान शिव की महिमा का वर्णन करता है और इसकी रचना पुष्पदंत नामक गंधर्व द्वारा की गई मानी जाती है।


अहरहरनवद्यं धूर्जटेः स्तोत्रमेतत्
पठति परमभक्त्या शुद्ध-चित्तः पुमान् यः।
स भवति शिवलोके रुद्रतुल्यस्तथाऽत्र
प्रचुरतर-धनायुः पुत्रवान् कीर्तिमांश्च॥

सरल हिंदी अर्थ:
जो व्यक्ति श्रद्धा और शुद्ध मन से इस स्तोत्र का नियमित पाठ करता है, उसके लिए धार्मिक मान्यताओं में आध्यात्मिक उन्नति, सुख, समृद्धि और शिवकृपा की कामना की गई है।


महेशान्नापरो देवो महिम्नो नापरा स्तुतिः
अघोरान्नापरो मन्त्रो नास्ति तत्त्वं गुरोः परम्॥

सरल हिंदी अर्थ:
महेश्वर से श्रेष्ठ देव नहीं, महिम्न स्तोत्र से श्रेष्ठ स्तुति नहीं और गुरु से ऊपर कोई परम सत्य नहीं—इस प्रकार भगवान शिव की महिमा को सर्वोच्च बताया गया है।


दीक्षा दानं तपस्तीर्थं ज्ञानं
योगादिकाः क्रियाः।
महिम्नस्तव पाठस्य कलां
नार्हन्ति षोडशीम्॥

सरल हिंदी अर्थ:
इस श्लोक में शिव महिम्न स्तोत्र के पाठ की महत्ता को अत्यंत ऊंचा बताया गया है और इसे अनेक धार्मिक साधनाओं से भी विशेष माना गया है।


कुसुमदशन-नामा सर्व-गन्धर्व-राजः
शशिधरवर-मौलेर्देवदेवस्य दासः।
स खलु निज-महिम्नो भ्रष्ट एवास्य रोषात्
स्तवनमिदमकार्षीद् दिव्य-दिव्यं महिम्नः॥

सरल हिंदी अर्थ:
कुसुमदंत नामक गंधर्व भगवान शिव के भक्त थे। अपराध के कारण उन्हें अपनी दिव्य शक्ति से वंचित होना पड़ा और उन्होंने शिव की स्तुति करके भगवान को प्रसन्न किया।


सुरगुरुमभिपूज्य स्वर्ग-मोक्षैक-हेतुं
पठति यदि मनुष्यः प्राञ्जलिर्नान्य-चेताः।
व्रजति शिव-समीपं किन्नरैः स्तूयमानः
स्तवनमिदममोघं पुष्पदन्तप्रणीतम्॥

सरल हिंदी अर्थ:
जो व्यक्ति एकाग्र भाव से इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसके लिए इसे शिव की निकटता और आध्यात्मिक कल्याण का साधन माना गया है।


आसमाप्तमिदं स्तोत्रं पुण्यं गन्धर्व-भाषितम्
अनौपम्यं मनोहारि सर्वमीश्वरवर्णनम्॥

सरल हिंदी अर्थ:
पुष्पदंत द्वारा रचित यह स्तोत्र भगवान शिव के अनुपम स्वरूप और गुणों का सुंदर वर्णन करने वाला माना गया है।


इत्येषा वाङ्मयी पूजा श्रीमच्छङ्कर-पादयोः
अर्पिता तेन देवेशः प्रीयतां मे सदाशिवः॥

सरल हिंदी अर्थ:
यह स्तुति भगवान शंकर के चरणों में वाणी के माध्यम से की गई पूजा के रूप में समर्पित है। स्तोत्रकार भगवान सदाशिव से प्रसन्न होने की प्रार्थना करते हैं।


तव तत्त्वं न जानामि कीदृशोऽसि महेश्वर।
यादृशोऽसि महादेव तादृशाय नमो नमः॥

सरल हिंदी अर्थ:
हे महेश्वर! मैं आपके वास्तविक स्वरूप को पूरी तरह नहीं जानता। आप जैसे भी हैं, उस परम स्वरूप को मेरा बार-बार प्रणाम है।


एककालं द्विकालं वा त्रिकालं यः पठेन्नरः
सर्वपाप-विनिर्मुक्तः शिव लोके महीयते॥

सरल हिंदी अर्थ:
जो व्यक्ति इस स्तोत्र का एक, दो या तीन समय श्रद्धापूर्वक पाठ करता है, उसके लिए धार्मिक मान्यता में पापों से मुक्ति और शिवलोक की प्राप्ति का फल बताया गया है।


श्री पुष्पदन्त-मुख-पंकज-निर्गतेन
स्तोत्रेण किल्बिष-हरेण हर-प्रियेण।
कण्ठस्थितेन पठितेन समाहितेन
सुप्रीणितो भवति भूतपतिर्महेशः॥

सरल हिंदी अर्थ:
पुष्पदंत के मुख से निकला यह स्तोत्र भगवान शिव को प्रिय माना गया है। एकाग्र होकर इसका पाठ करने से भगवान महेश प्रसन्न होते हैं—ऐसी धार्मिक मान्यता है।

।। इति श्री पुष्पदन्त विरचितं शिवमहिम्नः स्तोत्रं समाप्तम्।।


शिव महिम्न स्तोत्र का महत्व

शिव महिम्न स्तोत्र में भगवान शिव को अनंत, निर्गुण, सर्वव्यापक और परम शक्ति के रूप में नमन किया गया है। इसमें शिव के अनेक स्वरूपों और पौराणिक प्रसंगों के माध्यम से उनकी महिमा को समझाने का प्रयास किया गया है।

इस स्तोत्र की एक विशेषता यह भी है कि इसमें भगवान शिव की महानता के साथ-साथ उनकी सादगी और वैराग्य का भी सुंदर वर्णन मिलता है।


शिव महिम्न स्तोत्र का पाठ कब करें?

आप अपनी श्रद्धा और सुविधा के अनुसार इसका पाठ कर सकते हैं। विशेष रूप से शिव आराधना के अवसरों पर इसका पाठ किया जा सकता है।

  • सोमवार
  • सावन के सोमवार
  • महाशिवरात्रि
  • प्रदोष व्रत
  • नियमित शिव पूजा
  • प्रातःकाल या सायंकाल

सबसे महत्वपूर्ण बात श्रद्धा और एकाग्रता है।


शिव महिम्न स्तोत्र का पाठ कैसे करें?

पाठ से पहले स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें। भगवान शिव के सामने दीपक और धूप जलाकर अपनी श्रद्धा के अनुसार जल या अन्य पूजन सामग्री अर्पित करें।

इसके बाद शांत मन से भगवान शिव का स्मरण करें और शिव महिम्न स्तोत्र का पाठ करें।

यदि पूरा पाठ एक बार में करना संभव न हो, तो अपनी सुविधा के अनुसार नियमित रूप से पाठ करने की आदत बनाई जा सकती है।


शिव महिम्न स्तोत्र के लाभ

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शिव महिम्न स्तोत्र का श्रद्धापूर्वक पाठ करने से:

  • मन को शांति और स्थिरता प्राप्त होती है।
  • भगवान शिव के प्रति भक्ति और श्रद्धा बढ़ती है।
  • नकारात्मक विचारों से मन को दूर रखने में सहायता मिलती है।
  • आत्मिक चिंतन और आध्यात्मिक साधना को बढ़ावा मिलता है।
  • भक्त भगवान शिव की कृपा और आशीर्वाद की कामना करता है।
  • नियमित पाठ से मन में एकाग्रता और भक्ति भाव विकसित हो सकता है।

ध्यान दें: ये धार्मिक मान्यताएँ हैं; इन्हें चिकित्सकीय या वैज्ञानिक उपचार का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।


शिव महिम्न स्तोत्र किसने लिखा?

प्रचलित परंपरा के अनुसार शिव महिम्न स्तोत्र की रचना पुष्पदंत गंधर्व ने भगवान शिव की स्तुति में की थी। इससे जुड़ी कथा में पुष्पदंत के शिवभक्त होने और अपनी भूल के पश्चात भगवान शिव की आराधना करने का वर्णन मिलता है।


शिव महिम्न स्तोत्र में भगवान शिव के कौन-कौन से स्वरूप बताए गए हैं?

इस स्तोत्र में भगवान शिव को अनेक रूपों और नामों से संबोधित किया गया है, जैसे:

  • महेश
  • रुद्र
  • पशुपति
  • त्रिनेत्र
  • नटराज
  • नीलकंठ
  • त्रिपुरांतक
  • ईशान
  • भव
  • शर्व
  • महादेव

इन नामों के माध्यम से भगवान शिव के अलग-अलग दिव्य गुणों और स्वरूपों की स्तुति की गई है।


शिव महिम्न स्तोत्र और भक्ति का संदेश

शिव महिम्न स्तोत्र का एक प्रमुख संदेश यह है कि भगवान शिव की महिमा मनुष्य की सीमित बुद्धि और वाणी से पूरी तरह व्यक्त नहीं की जा सकती। इसलिए स्तोत्रकार अपनी सीमाओं को स्वीकार करते हुए भी भक्ति के माध्यम से भगवान की स्तुति करते हैं।

इससे भक्त को यह भाव मिलता है कि सच्ची श्रद्धा और समर्पण ही शिव आराधना का मूल आधार है।


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शिव महिम्न स्तोत्र क्या है?

शिव महिम्न स्तोत्र भगवान शिव की महिमा का वर्णन करने वाला प्रसिद्ध स्तोत्र है। परंपरा के अनुसार इसकी रचना पुष्पदंत गंधर्व ने की थी।

शिव महिम्न स्तोत्र के रचयिता कौन हैं?

प्रचलित मान्यता के अनुसार इसके रचयिता पुष्पदंत गंधर्व हैं।

क्या शिव महिम्न स्तोत्र का पाठ रोज कर सकते हैं?

हाँ, श्रद्धा और अपनी सुविधा के अनुसार इसका नियमित पाठ किया जा सकता है।

शिव महिम्न स्तोत्र कब पढ़ना चाहिए?

सोमवार, सावन, महाशिवरात्रि, प्रदोष तथा नियमित शिव पूजा के समय इसका पाठ करना भक्तिपरंपरा में विशेष माना जाता है।

शिव महिम्न स्तोत्र का मुख्य संदेश क्या है?

इसका मुख्य भाव भगवान शिव की अनंत महिमा, उनकी सर्वव्यापकता, वैराग्य और भक्तों के प्रति उनकी करुणा का स्मरण करना है।


निष्कर्ष

शिव महिम्न स्तोत्र भगवान शिव की महिमा का सुंदर और भक्तिपूर्ण स्तवन है। पुष्पदंत और भगवान शिव से जुड़ी इसकी कथा, शिव के विभिन्न स्वरूपों का वर्णन और भक्ति की महत्ता इसे विशेष बनाते हैं।

जो भक्त श्रद्धा और एकाग्रता के साथ इसका पाठ करता है, वह भगवान शिव के प्रति अपनी भक्ति और समर्पण को और गहरा कर सकता है।

हर हर महादेव 🔱
ॐ नमः शिवाय 🙏

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