संपूर्ण सुंदरकांड पाठ हिंदी अर्थ सहित और भक्त हनुमान जी

सुंदरकांड संपूर्ण पाठ (Sundarkand Sampurn Path)

संपूर्ण सुंदरकांड पाठ हिंदी अर्थ सहित पढ़ें और गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस के पाँचवें कांड में वर्णित हनुमान जी की अद्भुत वीरता, अटूट श्रीराम भक्ति और माता सीता की खोज के प्रसंगों को सरलता से समझें। सुंदरकांड में हनुमान जी का समुद्र लाँघना, लंका में माता सीता की खोज करना, श्रीराम का संदेश पहुँचाना और संकटों के सामने अद्भुत साहस दिखाना भक्तों को भक्ति, धैर्य और विश्वास की प्रेरणा देता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, श्रद्धापूर्वक सुंदरकांड का पाठ करने से मन को शांति मिलती है और कठिन परिस्थितियों का सामना करने का आत्मविश्वास बढ़ता है। इस लेख में पढ़ें सुंदरकांड की चौपाइयाँ, दोहे, सरल हिन्दी अर्थ और पाठ से जुड़ी उपयोगी जानकारी।

सुंदरकांड का महत्व

सुंदरकांड केवल एक धार्मिक पाठ नहीं है, बल्कि यह भक्ति, शक्ति और विश्वास का प्रतीक है। इसका नियमित पाठ करने से जीवन में कई सकारात्मक परिवर्तन आते हैं:

  • मन को शांति मिलती है
  • भय और चिंता दूर होती है
  • नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है
  • कार्यों में सफलता मिलती है
  • आत्मविश्वास बढ़ता है
  • संकटों से रक्षा होती है

सुंदरकांड का संक्षिप्त परिचय

सुंदरकांड में मुख्य रूप से हनुमान जी की लंका यात्रा का वर्णन है, जिसमें वे:

  • समुद्र पार करते हैं
  • लंका में प्रवेश करते हैं
  • माता सीता की खोज करते हैं
  • अशोक वाटिका में उनसे मिलते हैं
  • रावण को संदेश देते हैं
  • लंका दहन करते हैं
  • वापस श्रीराम के पास लौटते हैं

यह पूरा प्रसंग भक्ति और साहस का अद्भुत उदाहरण है।

श्रीरामचरितमानस — सुंदरकांड संपूर्ण पाठ एवं सरल भावार्थ

सुंदरकांड पाठ की मंगलमय शुरुआत (किष्किंधाकांड, दोहा 29–30)
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः॥
प्रनवउँ पवनकुमार खल बन पावक ग्यानघन।
जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर॥
सरल भावार्थ:
हनुमान जी दुष्टों रूपी वन को जलाने वाली अग्नि के समान हैं और ज्ञान के सागर हैं। उनके हृदय में धनुष-बाण धारण किए हुए श्रीराम सदा निवास करते हैं। ऐसे पवनपुत्र हनुमान जी को मैं श्रद्धापूर्वक प्रणाम करता हूँ।

किष्किन्धाकाण्ड
(दोहा 29)
बलि बाँधत प्रभु बाढ़ेउ सो तनु बरनि न जाइ।
उभय घरी महँ दीन्हीं सात प्रदच्छिन धाइ॥
सरल भावार्थ:
(किष्किन्धाकाण्ड, दोहा 29) प्रभु के उस विराट स्वरूप का वर्णन करना संभव नहीं है। अत्यंत थोड़े समय में ही दौड़कर सात परिक्रमाएँ पूरी कर ली गईं।
अंगद कहइ जाउँ मैं पारा। जियँ संसय कछु फिरती बारा॥
जामवंत कह तुम्ह सब लायक। पठइअ किमि सब ही कर नायक॥1॥
कहइ रीछपति सुनु हनुमाना। का चुप साधि रहेहु बलवाना॥
पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना॥2॥
कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥
राम काज लगि तव अवतारा। सुनतहिं भयउ पर्बताकारा॥3॥
कनक बरन तन तेज बिराजा। मानहुँ अपर गिरिन्ह कर राजा॥
सिंहनाद करि बारहिं बारा। लीलहिं नाघउँ जलनिधि खारा॥4॥
सरल भावार्थ:
अंगद कहते हैं कि वे समुद्र पार तो कर सकते हैं, लेकिन लौटते समय पर्याप्त शक्ति रहेगी या नहीं, इसमें उन्हें संदेह है। जाम्बवान कहते हैं कि सभी वानर वीर और समर्थ हैं, पर सेना के प्रमुख को किस प्रकार भेजा जाए? फिर वे हनुमान जी को उनकी शक्ति याद दिलाते हुए कहते हैं कि हे बलवान हनुमान! आप मौन क्यों बैठे हैं? आप बल में पवन के समान और बुद्धि, विवेक तथा ज्ञान-विज्ञान के भंडार हैं। संसार में ऐसा कौन-सा कठिन कार्य है, जिसे आप पूरा नहीं कर सकते? आपका अवतार ही श्रीराम के कार्य को सिद्ध करने के लिए हुआ है। जाम्बवान के वचन सुनकर हनुमान जी स्वर्ण के समान तेजस्वी और पर्वत के समान विशाल रूप धारण कर बार-बार सिंहनाद करते हुए कहते हैं कि वे खारे समुद्र को खेल-खेल में लाँघ सकते हैं।
सहित सहाय रावनहि मारी। आनउँ इहाँ त्रिकूट उपारी॥
जामवंत मैं पूँछउँ तोही। उचित सिखावनु दीजहु मोही॥5॥
एतना करहु तात तुम्ह जाई। सीतहि देखि कहहु सुधि आई॥
तब निज भुज बल राजिवनैना। कौतुक लागि संग कपि सेना॥6॥

सरल भावार्थ:
हनुमान जी कहते हैं कि वे अपने साथियों की सहायता से रावण का वध करके त्रिकूट पर्वत को भी उखाड़कर यहाँ ले आ सकते हैं। फिर वे विनम्रतापूर्वक जाम्बवान जी से उचित मार्गदर्शन देने की प्रार्थना करते हैं। जाम्बवान जी उन्हें सीता माता का पता लगाने और उनकी कुशलता का समाचार लेकर लौटने का कार्य सौंपते हैं। वे बताते हैं कि इसके बाद कमलनयन श्रीराम अपनी भुजाओं के बल से वानर-सेना के साथ आगे का कार्य स्वयं पूरा करेंगे।

[छन्द]
कपि सेन संग सँघारि निसिचर रामु सीतहि आनिहैं।
त्रैलोक पावन सुजसु सुर मुनि नारदादि बखानिहैं॥
जो सुनत गावत कहत समुझत परम पद नर पावई।
रघुबीर पद पाथोज मधुकर दास तुलसी गावई॥
सरल भावार्थ:
[छन्द] श्रीराम वानर-सेना के साथ राक्षसों का वध करके सीता माता को वापस ले आएँगे। उनके पवित्र यश का गान देवता, ऋषि-मुनि और नारद जी जैसे महान भक्त करेंगे। जो लोग श्रीराम की महिमा को श्रद्धापूर्वक सुनते, गाते, सुनाते और उसके भाव को समझते हैं, वे परम गति प्राप्त करते हैं। तुलसीदास जी स्वयं को श्रीराम के चरण-कमलों का प्रेमी मानकर उनकी महिमा का गान करते हैं।
[दोहा 30 (क)]
भव भेषज रघुनाथ जसु सुनहिं जे नर अरु नारि।
तिन्ह कर सकल मनोरथ सिद्ध करहिं त्रिसिरारि॥

सरल भावार्थ:
(दोहा 30 क) श्रीराम की कीर्ति संसार के दुखों और मोह रूपी रोग को दूर करने वाली औषधि के समान है। जो स्त्री-पुरुष श्रद्धापूर्वक इसका श्रवण करते हैं, त्रिशिरा राक्षस के शत्रु भगवान श्रीराम उनकी मनोकामनाएँ पूर्ण करते हैं।

[सोरठा 30 (ख)]
नीलोत्पल तन स्याम काम कोटि सोभा अधिक।
सुनिअ तासु गुन ग्राम जासु नाम अघ खग बधिक॥
सरल भावार्थ:
(सोरठा 30 ख) भगवान श्रीराम का शरीर नीलकमल के समान श्यामवर्ण है और उनकी सुंदरता करोड़ों कामदेवों को भी मात करती है। उनका पवित्र नाम पाप रूपी पक्षियों को नष्ट करने वाले बहेलिए के समान है। इसलिए श्रीराम की दिव्य महिमा और उनके गुणों का श्रवण करना चाहिए।
श्रीजानकीवल्लभो विजयते
श्रीरामचरितमानस — पञ्चम सोपान — सुन्दरकाण्ड
[श्लोक]
शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं
ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम्।
रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं
वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूडामणिम्॥1॥
सरल भावार्थ:
[श्लोक] मैं भगवान श्रीराम को नमन करता हूँ, जो शांत, सनातन, सभी दोषों से रहित और मोक्ष प्रदान करने वाली परम शांति के स्वरूप हैं। ब्रह्मा, भगवान शिव और शेषनाग जिनकी निरंतर सेवा करते हैं, वेदांत जिनके स्वरूप का ज्ञान कराता है और जो समस्त संसार में व्याप्त हैं। वे ही जगत के स्वामी, देवताओं के गुरु और अपनी माया से मनुष्य रूप में प्रकट हुए भगवान हरि हैं। करुणा के सागर तथा सभी राजाओं में श्रेष्ठ श्रीरघुवर को मेरा बारंबार प्रणाम है।
नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये
सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा।
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुंगव निर्भरां मे
कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च॥2॥
सरल भावार्थ:
[श्लोक] हे श्रीरघुनाथ जी! मैं सत्य कहता हूँ और आप सबके हृदय में निवास करने वाले अन्तर्यामी हैं। मेरे मन में आपके अतिरिक्त कोई दूसरी कामना नहीं है। हे रघुकुल के श्रेष्ठ प्रभु! मुझे अपनी अनन्य भक्ति प्रदान करें और मेरे मन को कामना आदि सभी विकारों से मुक्त कर दें।
अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥3॥
सरल भावार्थ:
[श्लोक] मैं पवनपुत्र हनुमान जी को नमन करता हूँ, जो अपार बल के भंडार हैं, जिनका शरीर सुमेरु पर्वत के समान तेजस्वी है और जो दैत्य रूपी वन को जलाने वाली अग्नि के समान हैं। वे ज्ञानियों में श्रेष्ठ, समस्त सद्गुणों के भंडार, वानर-समूह के नायक तथा भगवान श्रीराम के परम प्रिय भक्त हैं।
जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए॥
तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई। सहि दुख कंद मूल फल खाई॥1॥
सरल भावार्थ:
जाम्बवान जी की प्रेरणादायक बातें हनुमान जी को बहुत अच्छी लगीं। उन्होंने अपने साथियों से कहा कि वे सीता माता का पता लगाकर और उनसे मिलकर वापस आने तक धैर्य रखें। इस बीच वे कन्द-मूल और फल खाकर प्रतीक्षा करें तथा मन में चिंता न करें।
जब लगि आवौं सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी॥
यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा। चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा॥2॥
सरल भावार्थ:
हनुमान जी विश्वासपूर्वक कहते हैं कि वे सीता माता के दर्शन करके ही लौटेंगे और उनका कार्य अवश्य सफल होगा, क्योंकि उनके मन में विशेष आनंद उमड़ रहा है, जिसे वे शुभ संकेत मानते हैं। इतना कहकर उन्होंने सभी को सिर झुकाकर प्रणाम किया, हृदय में श्रीराम का स्मरण किया और प्रसन्न मन से आगे की यात्रा पर चल पड़े।
सिंधु तीर एक भूधर सुंदर। कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर॥
बार बार रघुबीर सँभारी। तरकेउ पवनतनय बल भारी॥3॥
सरल भावार्थ:
समुद्र के किनारे एक सुंदर पर्वत था। हनुमान जी सहजता से उछलकर उस पर जा पहुँचे। फिर बार-बार श्रीराम का स्मरण करते हुए, अपने अपार बल के सहारे पवनपुत्र हनुमान जी ने समुद्र पार करने के लिए विशाल छलाँग लगाई।
जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता॥
जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउ हनुमाना॥4॥
सरल भावार्थ:
जिस पर्वत पर पैर रखकर हनुमान जी ने छलाँग लगाई, वह उनके वेग के कारण तुरंत पाताल की ओर धँस गया। इसके बाद हनुमान जी श्रीरघुनाथ जी के अचूक बाण के समान तीव्र गति से समुद्र के पार जाने लगे।
जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। तैं मैनाक होहि श्रमहारी॥5॥
सरल भावार्थ:
समुद्र ने हनुमान जी को भगवान श्रीराम का दूत पहचान लिया। उनकी सेवा करने और यात्रा में विश्राम देने के उद्देश्य से उसने मैनाक पर्वत से कहा कि वह जल से ऊपर उठकर हनुमान जी को कुछ देर ठहरने और उनकी थकान दूर करने का अवसर दे।
[दोहा 1]
हनुमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम।
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम॥
सरल भावार्थ:
(दोहा 1) हनुमान जी ने मैनाक पर्वत को अपने हाथ से स्पर्श किया और उसे प्रणाम करके कहा कि जब तक भगवान श्रीराम का कार्य पूरा नहीं हो जाता, तब तक उनके लिए विश्राम करना संभव नहीं है।
जात पवनसुत देवन्ह देखा। जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा॥
सुरसा नाम अहिन्ह कै माता। पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता॥1॥
सरल भावार्थ:
देवताओं ने हनुमान जी को समुद्र पार जाते देखा। उनके बल और बुद्धि की परीक्षा लेने के लिए उन्होंने सर्पों की माता सुरसा को भेजा। सुरसा ने हनुमान जी के सामने आकर कहा कि आज वह उन्हें अपना भोजन बनाएगी।
आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा। सुनत बचन कह पवनकुमारा॥
राम काजु करि फिरि मैं आवौं। सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं॥2॥
सरल भावार्थ:
सुरसा ने कहा कि आज देवताओं ने उसे भोजन प्राप्त होने का अवसर दिया है। यह सुनकर हनुमान जी ने विनम्रतापूर्वक कहा कि वे पहले भगवान श्रीराम का कार्य पूरा करके लौटें और माता सीता का समाचार प्रभु को सुना दें।
तब तव बदन पैठिहउँ आई। सत्य कहउँ मोहि जान दे माई॥
कवनेहुँ जतन देइ नहिं जाना। ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना॥3॥
सरल भावार्थ:
हनुमान जी ने सुरसा से कहा कि हे माता! श्रीराम का कार्य पूरा करके लौटने पर मैं स्वयं तुम्हारे मुख में प्रवेश कर जाऊँगा। मैं सत्य कह रहा हूँ, इसलिए अभी मुझे जाने दो। जब सुरसा ने किसी भी तरह उन्हें आगे जाने का मार्ग नहीं दिया, तब हनुमान जी ने कहा कि यदि यही तुम्हारी इच्छा है, तो मुझे निगल लो।
जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा। कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा॥
सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ। तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ॥4॥
सरल भावार्थ:
जब सुरसा ने अपना मुख एक योजन तक फैलाया, तब हनुमान जी ने अपना शरीर उससे दोगुना कर लिया। सुरसा ने अपना मुख सोलह योजन तक बढ़ाया, तो हनुमान जी ने भी तत्काल अपना आकार बढ़ाकर बत्तीस योजन का कर लिया।
जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा। तासु दून कपि रूप देखावा॥
सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा॥5॥
सरल भावार्थ:
सुरसा जितना अपना मुख फैलाती जाती थीं, हनुमान जी उससे दोगुना बड़ा रूप धारण कर लेते थे। जब सुरसा ने अपना मुख सौ योजन तक फैला लिया, तब हनुमान जी ने अचानक अत्यंत छोटा रूप बना लिया।
बदन पइठि पुनि बाहेर आवा। मागा बिदा ताहि सिरु नावा॥
मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा। बुधि बल मरमु तोर मैं पावा॥6॥
सरल भावार्थ:
हनुमान जी सूक्ष्म रूप धारण करके सुरसा के मुख में प्रवेश कर तुरंत बाहर निकल आए। इसके बाद उन्होंने सुरसा को प्रणाम किया और आगे जाने की अनुमति माँगी। सुरसा ने प्रसन्न होकर कहा कि देवताओं ने उन्हें जिस उद्देश्य से भेजा था, वह पूरा हो गया है। उन्होंने हनुमान जी की बुद्धि और बल की विशेषता को पहचान लिया।
[दोहा 2]
राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान।
आसिष देइ गई सो हरषि चलेउ हनुमान॥
सरल भावार्थ:
(दोहा 2) सुरसा ने हनुमान जी को आशीर्वाद देते हुए कहा कि हे बल और बुद्धि के भंडार! आप भगवान श्रीराम के सभी कार्य सफलतापूर्वक पूरे करेंगे। इतना कहकर सुरसा वहाँ से चली गईं और हनुमान जी प्रसन्न होकर अपनी यात्रा पर आगे बढ़ गए।
निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई। करि माया नभु के खग गहई॥
जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं। जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं॥1॥
सरल भावार्थ:
समुद्र में एक राक्षसी रहती थी, जो अपनी मायावी शक्ति से आकाश में उड़ने वाले पक्षियों को पकड़ लेती थी। वह पानी में उनकी परछाईं देखकर उन्हें अपने वश में कर लेती थी।
गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई। एहि बिधि सदा गगनचर खाई॥
सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा। तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा॥2॥
सरल भावार्थ:
वह राक्षसी जीवों की परछाईं पकड़ लेती थी, जिससे वे आकाश में आगे नहीं उड़ पाते थे। इसी उपाय से वह उड़ने वाले जीवों को अपना भोजन बनाती थी। उसने हनुमान जी को भी इसी छल से रोकना चाहा, लेकिन हनुमान जी ने तुरंत उसकी माया पहचान ली।
ताहि मारि मारुतसुत बीरा। बारिधि पार गयउ मतिधीरा॥
तहाँ जाइ देखी बन सोभा। गुंजत चंचरीक मधु लोभा॥3॥
सरल भावार्थ:
वीर और बुद्धिमान हनुमान जी ने उस राक्षसी का वध किया और समुद्र पार करके आगे बढ़े। वहाँ पहुँचकर उन्होंने एक सुंदर वन देखा, जहाँ फूलों के रस की चाह में भौंरे मधुर गुंजार कर रहे थे।
नाना तरु फल फूल सुहाए। खग मृग बृंद देखि मन भाए॥
सैल बिसाल देखि एक आगें। ता पर धाइ चढ़ेउ भय त्यागें॥4॥
सरल भावार्थ:
वहाँ अनेक प्रकार के वृक्ष सुंदर फल-फूलों से लदे हुए थे। पक्षियों और पशुओं के झुंड देखकर हनुमान जी का मन प्रसन्न हुआ। आगे उन्हें एक विशाल पर्वत दिखाई दिया, जिस पर वे बिना किसी भय के तेजी से चढ़ गए।
उमा न कछु कपि कै अधिकाई। प्रभु प्रताप जो कालहि खाई॥
गिरि पर चढ़ि लंका तेहिं देखी। कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी॥5॥
सरल भावार्थ:
(शिवजी कहते हैं—) हे उमा! इसमें हनुमान जी की अपनी महिमा नहीं, बल्कि उन भगवान श्रीराम का प्रभाव है जो स्वयं काल के भी काल हैं। पर्वत पर पहुँचकर हनुमान जी ने लंका को देखा। वह नगरी अत्यंत दुर्गम और मजबूत किले से सुरक्षित थी, जिसकी भव्यता का पूरा वर्णन करना कठिन है।
अति उतंग जलनिधि चहु पासा। कनक कोट कर परम प्रकासा॥6॥
सरल भावार्थ:
लंका बहुत ऊँचाई पर बसी हुई थी और चारों ओर से समुद्र से घिरी थी। उसकी सोने से बनी नगर-दीवार तेजस्वी आभा से चमक रही थी।
[छन्द 1]
कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना।
चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना॥
गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथन्हि को गनै।
बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै॥
सरल भावार्थ:
लंका का सोने का परकोटा अनेक प्रकार की सुंदर मणियों से जड़ा हुआ था। वहाँ ऊँचे और भव्य भवन बने थे। चौराहे, बाजार, रास्ते और गलियाँ तरह-तरह से सजे हुए थे। नगर में हाथियों, घोड़ों, खच्चरों, पैदल सैनिकों और रथों की इतनी बड़ी संख्या थी कि उनकी गिनती करना कठिन था। अनेक रूप धारण करने वाले अत्यंत शक्तिशाली राक्षसों की सेना भी अपार थी, जिसका पूरा वर्णन करना संभव नहीं था।
[छन्द 2]
बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं।
नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं॥
कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं।
नाना अखारेन्ह भिरहिं बहुबिधि एक एकन्ह तर्जहीं॥
सरल भावार्थ:
लंका में वन, बाग-बगीचे, उपवन, सुंदर वाटिकाएँ, तालाब, कुएँ और बावड़ियाँ शोभा बढ़ाते थे। नागों, देवताओं और गंधर्वों की कन्याएँ इतनी रूपवती थीं कि उनका सौंदर्य मुनियों के मन को भी आकर्षित कर लेता था। कहीं पर्वत जैसे विशाल शरीर वाले बलशाली पहलवान गर्जना करते दिखाई देते थे, तो कहीं अनेक अखाड़ों में कुश्ती लड़ते हुए एक-दूसरे को चुनौती देते थे।
[छन्द 3]
करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं।
कहुँ महिष मानुष धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं॥
एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही।
रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही॥
सरल भावार्थ:
लंका की चारों दिशाओं में विशाल और विकराल शरीर वाले करोड़ों योद्धा पूरी सतर्कता से पहरा देते थे। कहीं दुष्ट राक्षस भैंस, मनुष्य, गाय, गधे और बकरे जैसे जीवों का मांस खाते दिखाई देते थे। गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि राक्षसों का यह वर्णन इसलिए किया गया है, क्योंकि आगे चलकर यही राक्षस श्रीराम के बाणरूपी तीर्थ में अपने प्राण त्यागकर उत्तम गति प्राप्त करेंगे।
[दोहा 3]
पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार।
अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार॥
सरल भावार्थ: नगर के अनेक रक्षकों को देखकर हनुमानजी ने मन में विचार किया कि मैं बहुत छोटा रूप धारण कर रात के समय नगर में प्रवेश करूँ।
मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी॥
नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी॥1॥
सरल भावार्थ: हनुमानजी मच्छर के समान छोटा रूप धारण करके भगवान श्रीहरि का स्मरण करते हुए लंका में प्रवेश करने चले। वहाँ लंकिनी नाम की एक राक्षसी रहती थी। उसने हनुमानजी को जाते हुए देखा और उन्हें ललकारते हुए कहा।
जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहाँ लगि चोरा॥
मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढनमनी॥2॥
सरल भावार्थ:: लंकिनी ने कहा, “अरे मूर्ख! तू मेरा भेद नहीं जानता। जहाँ तक चोर हैं, वे सब मेरे आहार हैं।” तब हनुमानजी ने उसे एक जोरदार घूँसा मारा। इससे वह खून उगलने लगी और लड़खड़ाकर धरती पर गिर पड़ी।
पुनि संभारि उठी सो लंका। जोरि पानि कर बिनय ससंका॥
जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा। चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा॥3॥
सरल भावार्थ: फिर लंकिनी ने स्वयं को सँभाला और उठकर भयभीत होकर हाथ जोड़ते हुए विनती की। उसने कहा कि जब ब्रह्माजी ने रावण को वरदान दिया था, तब जाते समय उन्होंने मुझे एक संकेत बताया था।
बिकल होसि तैं कपि के मारे। तब जानेसु निसिचर संघारे॥
तात मोर अति पुन्य बहूता। देखेउँ नयन राम कर दूता॥4॥
सरल भावार्थ: ब्रह्माजी ने कहा था कि जब तू किसी वानर की मार से व्याकुल हो जाएगी, तब समझ लेना कि राक्षसों के विनाश का समय निकट आ गया है। हे पुत्र! मेरे बहुत बड़े पुण्य हैं, जो आज मैंने अपनी आँखों से भगवान श्रीराम के दूत को देख लिया।
[दोहा 4]
तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग॥
सरल भावार्थ: हे पुत्र हनुमानजी! स्वर्ग के सुख और मोक्ष के आनंद को तराजू के एक पलड़े में रख दिया जाए, फिर भी वे सब मिलकर भी एक पल भर के सत्संग से मिलने वाले सुख के बराबर नहीं हो सकते।
प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कोसलपुर राजा॥
गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई॥1॥
सरल भावार्थ: भगवान श्रीराम को अपने हृदय में धारण करके नगर में प्रवेश करना और अपने सभी कार्य करना चाहिए। उनके स्मरण और कृपा से विष भी अमृत बन जाता है, शत्रु भी मित्रता करने लगते हैं, समुद्र गाय के खुर के बराबर छोटा हो जाता है और अग्नि में भी शीतलता आ जाती है।
गरुड़ सुमेरु रेनु सम ताही। राम कृपा करि चितवा जाही॥
अति लघु रूप धरेउ हनुमाना। पैठा नगर सुमिरि भगवाना॥2॥
सरल भावार्थ: भगवान श्रीराम जिस पर कृपा करके अपनी दृष्टि डालते हैं, उसके लिए गरुड़ और सुमेरु पर्वत भी धूल के समान तुच्छ हो जाते हैं। हनुमानजी ने भगवान श्रीराम का स्मरण करते हुए अत्यंत छोटा रूप धारण किया और लंका नगर में प्रवेश कर गए।
मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा। देखे जहँ तहँ अगनित जोधा॥
गयउ दसानन मंदिर माहीं। अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं॥3॥
सरल भावार्थ: हनुमानजी ने लंका के एक-एक महल में जाकर खोज की। वहाँ उन्होंने जगह-जगह असंख्य योद्धाओं को देखा। इसके बाद वे रावण के महल में पहुँचे, जो अत्यंत विचित्र और भव्य था। उसकी शोभा का वर्णन करना कठिन है।
सयन किएँ देखा कपि तेही। मंदिर महुँ न दीखि बैदेही॥
भवन एक पुनि दीख सुहावा। हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा॥4॥
सरल भावार्थ: हनुमानजी ने रावण को सोते हुए देखा, लेकिन उसके महल में माता सीता दिखाई नहीं दीं। इसके बाद उन्हें एक सुंदर भवन दिखाई दिया, जिसमें सबसे अलग भगवान श्रीहरि का मंदिर बना हुआ था।
[दोहा 5]
रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ।
नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरष कपिराइ॥
सरल भावार्थ: उस भवन पर भगवान श्रीराम के धनुष-बाण के चिह्न बने हुए थे। उसकी शोभा का वर्णन नहीं किया जा सकता। वहाँ तुलसी के नए-नए पौधे और उनके समूह देखकर हनुमानजी बहुत प्रसन्न हुए।
लंका निसिचर निकर निवासा। इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा॥
मन महुँ तरक करैं कपि लागा। तेहीं समय बिभीषनु जागा॥1॥
सरल भावार्थ: हनुमानजी ने सोचा कि लंका तो राक्षसों का निवास स्थान है, फिर यहाँ सज्जन पुरुष का घर कैसे हो सकता है? वे मन ही मन इस बात पर विचार कर ही रहे थे कि उसी समय विभीषण की नींद खुल गई।
राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा। हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा॥
एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी। साधु ते होइ न कारज हानी॥2॥
सरल भावार्थ: विभीषण ने जागते ही भगवान श्रीराम का नाम स्मरण किया। यह देखकर हनुमानजी के हृदय में प्रसन्नता हुई और उन्होंने पहचान लिया कि विभीषण सज्जन पुरुष हैं। हनुमानजी ने मन में निश्चय किया कि मैं इनसे अवश्य परिचय करूँगा, क्योंकि साधु पुरुष से मिलने पर किसी कार्य में हानि नहीं होती।
बिप्र रूप धरि बचन सुनाए। सुनत बिभीषन उठि तहँ आए॥
करि प्रनाम पूँछी कुसलाई। बिप्र कहहु निज कथा बुझाई॥3॥
सरल भावार्थ: हनुमानजी ने ब्राह्मण का रूप धारण करके विभीषण से बातचीत की। उनकी बातें सुनकर विभीषण तुरंत वहाँ आ गए। उन्होंने प्रणाम किया और कुशल-क्षेम पूछते हुए कहा, “हे ब्राह्मण देवता! कृपया अपना परिचय दीजिए और अपने यहाँ आने का कारण बताइए।”
की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई। मोरें हृदय प्रीति अति होई॥
की तुम्ह रामु दीन अनुरागी। आयहु मोहि करन बड़भागी॥4॥
सरल भावार्थ: विभीषण ने पूछा, “क्या आप भगवान श्रीहरि के भक्तों में से कोई हैं? आपके प्रति मेरे हृदय में बहुत प्रेम और अपनापन अनुभव हो रहा है। या फिर क्या आप दीन-दुखियों से प्रेम करने वाले भगवान श्रीराम ही हैं, जो मुझे सौभाग्यशाली बनाने के लिए यहाँ पधारे हैं?”
[दोहा 6]
तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम।
सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम॥
सरल भावार्थ: तब हनुमानजी ने विभीषण को भगवान श्रीराम की पूरी कथा सुनाई और अपना नाम भी बताया। श्रीराम की कथा सुनकर दोनों के शरीर प्रेम और भक्ति से पुलकित हो उठे तथा उनका मन भगवान के गुणों का स्मरण करते हुए आनंद में डूब गया।
सुनहु पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी॥
तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा। करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा॥1॥
सरल भावार्थ: विभीषण ने कहा, “हे पवनपुत्र! मेरी स्थिति ऐसी है, जैसे दाँतों के बीच बेचारी जीभ रहती है। हे तात! क्या कभी सूर्यवंश के स्वामी भगवान श्रीराम मुझे अनाथ और असहाय जानकर मुझ पर कृपा करेंगे?”
तामस तनु कछु साधन नाहीं। प्रीति न पद सरोज मन माहीं॥
अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता॥2॥
सरल भावार्थ: विभीषण ने कहा, “मेरा शरीर तामसी स्वभाव वाला है और मेरे पास भक्ति के कोई साधन भी नहीं हैं। मेरे मन में भगवान के चरणकमलों के प्रति प्रेम भी नहीं है। हे हनुमानजी! अब मुझे आपसे आशा बँधी है, क्योंकि भगवान की कृपा के बिना संतों का मिलना संभव नहीं होता।”
जौं रघुबीर अनुग्रह कीन्हा। तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा॥
सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती। करहिं सदा सेवक पर प्रीती॥3॥
सरल भावार्थ: विभीषण ने कहा, “यदि भगवान श्रीराम ने मुझ पर कृपा की है, तभी आपने मुझसे मिलने का निश्चय किया और मुझे दर्शन दिए हैं।” हनुमानजी ने उत्तर दिया, “हे विभीषण! सुनिए, भगवान श्रीराम का स्वभाव ही ऐसा है कि वे अपने सेवकों से सदा प्रेम करते हैं।”
कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना॥
प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा॥4॥
सरल भावार्थ: हनुमानजी विनम्रता से कहते हैं, “मैं कौन हूँ, जो अपने को ऊँचे कुल का मानूँ? मैं तो चंचल स्वभाव वाला वानर हूँ और सभी प्रकार से हीन हूँ। जो सुबह उठकर मेरा नाम ले लेता है, उसे उस दिन भोजन तक नहीं मिलता।”
[दोहा 7]
अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।
कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर॥
सरल भावार्थ: हनुमानजी विभीषण से कहते हैं, “हे मित्र! सुनिए, जब मैं इतना नीच और तुच्छ हूँ, तब भी भगवान श्रीराम ने मुझ पर कृपा की है।” भगवान की कृपा और उनके गुणों का स्मरण करते हुए हनुमानजी की आँखों में प्रेम के आँसू भर आए।
जानतहूँ अस स्वामि बिसारी। फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी॥
एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा। पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा॥1॥
सरल भावार्थ: जो भगवान श्रीराम को अपना स्वामी जानते हुए भी उन्हें भुलाकर उनसे विमुख हो जाते हैं, वे दुखी क्यों न हों? इस प्रकार भगवान श्रीराम के गुणों का वर्णन करते हुए हनुमानजी और विभीषण को ऐसा अलौकिक आनंद और शांति प्राप्त हुई, जिसका शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता।
पुनि सब कथा बिभीषन कही। जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही॥
तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता। देखी चहउँ जानकी माता॥2॥
सरल भावार्थ: इसके बाद विभीषण ने हनुमानजी को सारी बातें बताईं कि माता सीता किस प्रकार लंका में रह रही हैं। तब हनुमानजी ने कहा, “हे भाई! सुनिए, मैं माता जानकी के दर्शन करना चाहता हूँ।”
जुगुति बिभीषन सकल सुनाई। चलेउ पवनसुत बिदा कराई॥
करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ। बन असोक सीता रह जहवाँ॥3॥
सरल भावार्थ: विभीषण ने हनुमानजी को माता सीता तक पहुँचने के सभी उपाय और रास्ते समझा दिए। इसके बाद उनसे विदा लेकर हनुमानजी वहाँ से चल पड़े। उन्होंने फिर वही अत्यंत छोटा रूप धारण किया और उस अशोक वाटिका में पहुँचे, जहाँ माता सीता रह रही थीं।
देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा। बैठेहिं बीति जात निसि जामा॥
कृस तनु सीस जटा एक बेनी। जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी॥4॥
सरल भावार्थ: हनुमानजी ने माता सीता को देखकर मन ही मन उन्हें प्रणाम किया। उस समय रात का अंतिम पहर बीत रहा था और माता सीता बैठी हुई थीं। उनका शरीर बहुत कमजोर हो गया था, सिर के बालों की एक ही चोटी बँधी हुई थी और वे हृदय में भगवान श्रीराम के गुणों का स्मरण करते हुए उनका जप कर रही थीं।
[दोहा 8]
निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन।
परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन॥
सरल भावार्थ: माता सीता अपने चरणों पर दृष्टि लगाए हुए थीं और उनका मन भगवान श्रीराम के चरणकमलों में लीन था। माता जानकी की ऐसी दयनीय और दुखी अवस्था देखकर पवनपुत्र हनुमानजी भी अत्यंत दुखी हो गए।
तरु पल्लव महुँ रहा लुकाई। करइ बिचार करौं का भाई॥
तेहि अवसर रावनु तहँ आवा। संग नारि बहु किएँ बनावा॥1॥
सरल भावार्थ: हनुमानजी वृक्ष के पत्तों में छिपकर बैठे रहे और मन ही मन विचार करने लगे कि अब मुझे क्या करना चाहिए। उसी समय रावण वहाँ आया। उसके साथ बहुत-सी सजी-धजी स्त्रियाँ भी थीं।
बहु बिधि खल सीतहि समुझावा। साम दान भय भेद देखावा॥
कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी। मंदोदरी आदि सब रानी॥2॥
सरल भावार्थ: दुष्ट रावण ने माता सीता को अनेक प्रकार से समझाने का प्रयास किया। उसने उन्हें साम, दान, भय और भेद की नीति अपनाकर अपने वश में करना चाहा। रावण ने कहा, “हे सुंदर मुख वाली बुद्धिमती सीता! मंदोदरी सहित मेरी सभी रानियाँ…”
तव अनुचरीं करउँ पन मोरा। एक बार बिलोकु मम ओरा॥
तृन धरि ओट कहति बैदेही। सुमिरि अवधपति परम सनेही॥3॥
सरल भावार्थ: रावण ने माता सीता से कहा, “मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि तुम्हारी सभी रानियाँ तुम्हारी दासी बनकर रहेंगी। तुम एक बार मेरी ओर देखकर मेरी बात स्वीकार कर लो।” माता सीता ने अपने और रावण के बीच तिनके की ओट कर ली और भगवान श्रीराम का स्मरण करते हुए उससे बात कही।
सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा। कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा॥
अस मन समुझु कहति जानकी। खल सुधि नहिं रघुबीर बान की॥4॥
सरल भावार्थ: माता सीता ने कहा, “हे दशमुख रावण! सुन, क्या जुगनू के प्रकाश से कभी कमलिनी खिल सकती है? तू अपने मन में यह बात अच्छी तरह समझ ले।” इस प्रकार माता जानकी ने रावण को समझाया कि भगवान श्रीराम के बाणों की शक्ति का उसे तनिक भी ज्ञान नहीं है।
सठ सूनें हरि आनेहि मोही। अधम निलज्ज लाज नहिं तोही॥5॥
सरल भावार्थ: माता सीता रावण से कहती हैं, “अरे मूर्ख! तूने भगवान श्रीहरि की पत्नी मुझे चुराकर यहाँ ला रखा है। अरे नीच और निर्लज्ज! तुझे ऐसा करते हुए तनिक भी लज्जा नहीं आई?”
[दोहा 9]
आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान।
परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन॥
सरल भावार्थ: माता सीता के कठोर वचन सुनकर रावण बहुत क्रोधित हो गया। वह स्वयं को जुगनू के समान और भगवान श्रीराम को सूर्य के समान बताने वाली बात सुनकर तिलमिला उठा। क्रोध में उसने तलवार निकाल ली और गुस्से से भरकर बोलने लगा।
सीता तैं मम कृत अपमाना। कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना॥
नाहिं त सपदि मानु मम बानी। सुमुखि होति न त जीवन हानी॥1॥
सरल भावार्थ: रावण ने क्रोध में माता सीता से कहा, “सीते! तुमने मेरा अपमान किया है। मैं अपनी इस कठोर तलवार से तुम्हारा सिर काट दूँगा। हे सुंदर मुख वाली सीते! यदि तुम अपना जीवन बचाना चाहती हो, तो तुरंत मेरी बात मान लो और मेरी आज्ञा स्वीकार कर लो।”
स्याम सरोज दाम सम सुंदर। प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर॥
सो भुज कंठ कि तव असि घोरा। सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा॥2॥
सरल भावार्थ: माता सीता रावण से कहती हैं, “भगवान श्रीराम की भुजाएँ नीले कमल की माला के समान सुंदर और हाथी की सूँड़ जैसी बलशाली हैं। हे मूर्ख रावण! क्या मेरा गला तेरी इस भयानक तलवार से कटने के लिए है? सुन, मेरी यह प्रतिज्ञा सत्य है कि मेरा वध केवल भगवान श्रीराम की भुजाओं से ही संभव है।”
चंद्रहास हरु मम परितापं। रघुपति बिरह अनल संजातं॥
सीतल निसित बहसि बर धारा। कह सीता हरु मम दुख भारा॥3॥
सरल भावार्थ: माता सीता रावण की तलवार चंद्रहास से कहती हैं, “हे चंद्रहास! भगवान श्रीराम के विरह की अग्नि से उत्पन्न मेरे संताप को दूर कर दो। तुम्हारी धार बहुत तेज और शीतल है। हे तलवार! तुम मेरे दुःखों के भारी बोझ को हर लो।”
सुनत बचन पुनि मारन धावा। मयतनयाँ कहि नीति बुझावा॥
कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई। सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई॥4॥
सरल भावार्थ: माता सीता के वचन सुनकर रावण फिर उन्हें मारने के लिए दौड़ा। तभी मय दानव की पुत्री मंदोदरी ने उसे नीति की बात समझाकर रोक लिया। इसके बाद रावण ने सभी राक्षसियों को बुलाया और उन्हें आदेश दिया कि वे जाकर माता सीता को अनेक प्रकार से डराएँ और भयभीत करें।
मास दिवस महुँ कहा न माना। तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना॥5॥
सरल भावार्थ: रावण ने राक्षसियों को धमकी देते हुए कहा कि यदि माता सीता एक महीने के भीतर उसकी बात नहीं मानेंगी, तो वह तलवार निकालकर उनका वध कर देगा।
[दोहा 10]
भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद।
सीतहि त्रास देखावहिं धरहिं रूप बहु मंद॥
सरल भावार्थ: रावण अपने महल में लौट गया और यहाँ राक्षसियों का झुंड माता सीता को डराने लगा। वे अनेक भयानक और डरावने रूप धारण करके माता जानकी को भयभीत करने लगीं।
त्रिजटा नाम राच्छसी एका। राम चरन रति निपुन बिबेका॥
सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना। सीतहि सेइ करहु हित अपना॥1॥
सरल भावार्थ: उन राक्षसियों में त्रिजटा नाम की एक राक्षसी थी। वह बुद्धिमती और विवेकशील थी तथा भगवान श्रीराम के चरणों में प्रेम रखती थी। उसने सभी राक्षसियों को बुलाकर अपना स्वप्न सुनाया और समझाया कि माता सीता की सेवा करने और उनका हित करने में ही तुम सबका भला है।
सपनें बानर लंका जारी। जातुधान सेना सब मारी॥
खर आरूढ़ नगन दससीसा। मुंडित सिर खंडित भुज बीसा॥2॥
सरल भावार्थ: त्रिजटा ने बताया कि उसने स्वप्न में देखा कि एक वानर ने लंका को जला दिया और राक्षसों की सारी सेना का नाश कर दिया। उसने रावण को गधे पर सवार, नग्न, सिर मुंडा हुआ और उसकी बीसों भुजाएँ कटी हुई देखीं।
एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई। लंका मनहुँ बिभीषन पाई॥
नगर फिरी रघुबीर दोहाई। तब प्रभु सीता बोलि पठाई॥3॥
सरल भावार्थ: त्रिजटा ने स्वप्न में देखा कि रावण इसी अवस्था में दक्षिण दिशा की ओर जा रहा है और ऐसा लग रहा है मानो लंका विभीषण को मिल गई हो। इसके बाद उसने देखा कि भगवान श्रीराम की जय-जयकार पूरे नगर में गूँज रही है और प्रभु श्रीराम ने माता सीता को बुलाने के लिए संदेश भेजा है।
यह सपना मैं कहउँ पुकारी। होइहि सत्य गएँ दिन चारी॥
तासु बचन सुनि ते सब डरीं। जनकसुता के चरनन्हि परीं॥4॥
सरल भावार्थ: त्रिजटा ने सबको पुकारकर कहा, “मैं अपना यह स्वप्न सुनाती हूँ। आने वाले चार दिनों में यह सच हो जाएगा।” उसकी बातें सुनकर सभी राक्षसियाँ डर गईं और माता सीता के चरणों में गिरकर उनसे क्षमा माँगने लगीं।
[दोहा 11]
जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच।
मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच॥
सरल भावार्थ: सभी राक्षसियाँ वहाँ से चली गईं। उनके जाने के बाद माता सीता मन ही मन चिंता करने लगीं कि दुष्ट रावण ने जो एक महीने की अवधि दी है, उसके बीत जाने पर वह मेरा वध कर देगा।
त्रिजटा सन बोलीं कर जोरी। मातु बिपति संगिनि तैं मोरी॥
तजौं देह करु बेगि उपाई। दुसह बिरहु अब नहिं सहि जाई॥1॥
सरल भावार्थ: माता सीता ने हाथ जोड़कर त्रिजटा से कहा, “हे माता! तुम मेरी विपत्ति की साथी हो। अब कोई ऐसा उपाय करो, जिससे मैं शीघ्र ही अपने प्राण त्याग सकूँ। भगवान श्रीराम का विरह अब मुझसे सहन नहीं हो रहा है।”
आनि काठ रचु चिता बनाई। मातु अनल पुनि देहि लगाई॥
सत्य करहि मम प्रीति सयानी। सुनै को श्रवन सूल सम बानी॥2॥
सरल भावार्थ: माता सीता ने त्रिजटा से कहा, “हे माता! लकड़ियाँ लाकर चिता तैयार कर दो और फिर उसमें आग लगा दो। हे समझदार माता! मेरे प्रति अपने प्रेम को सच्चा करते हुए मेरी सहायता करो। भगवान श्रीराम के विरह की पीड़ा इतनी असहनीय है कि ये बातें सुनना भी कानों में शूल चुभने के समान लगता है।”
सुनत बचन पद गहि समुझाएसि। प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि॥
निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी। अस कहि सो निज भवन सिधारी॥3॥
सरल भावार्थ: माता सीता के वचन सुनकर त्रिजटा ने उनके चरण पकड़कर उन्हें समझाया और भगवान श्रीराम के प्रताप, शक्ति तथा यश का वर्णन करके उन्हें धैर्य बँधाया। फिर उसने कहा, “हे सुकुमारी! रात के समय आग मिलना संभव नहीं है।” इतना कहकर त्रिजटा अपने घर चली गई।
कह सीता बिधि भा प्रतिकूला। मिलिहि न पावक मिटिहि न सूला॥
देखिअत प्रगट गगन अंगारा। अवनि न आवत एकउ तारा॥4॥
सरल भावार्थ: माता सीता मन ही मन कहने लगीं, “विधाता मेरे प्रतिकूल हो गए हैं। न मुझे आग मिल रही है और न ही मेरे हृदय की पीड़ा दूर हो रही है। आकाश में तारे अंगारों के समान दिखाई दे रहे हैं, फिर भी उनमें से एक भी तारा धरती पर नहीं गिरता, जिससे मैं अपनी पीड़ा समाप्त कर सकूँ।”
पावकमय ससि स्रवत न आगी। मानहुँ मोहि जानि हतभागी॥
सुनहि बिनय मम बिटप असोका। सत्य नाम करु हरु मम सोका॥5॥
सरल भावार्थ: माता सीता कहती हैं, “चंद्रमा अग्नि से भरा हुआ दिखाई देता है, फिर भी उससे आग नहीं निकलती। मानो वह मुझे दुर्भाग्यशाली जानकर मेरी सहायता नहीं कर रहा है। हे अशोक वृक्ष! मेरी विनती सुनो। तुम्हारा नाम सच करो और मेरे शोक को दूर कर दो।”
नूतन किसलय अनल समाना। देहि अगिनि जनि करहि निदाना॥
देखि परम बिरहाकुल सीता। सो छन कपिहि कलप सम बीता॥6॥
सरल भावार्थ: माता सीता अशोक वृक्ष से कहती हैं, “तुम्हारी नई-नई कोपलें अग्नि के समान लाल दिखाई देती हैं। इसलिए मुझे आग देकर मेरे दुःख का अंत कर दो।” माता सीता को विरह से अत्यंत व्याकुल देखकर हनुमानजी के लिए वह क्षण एक कल्प के समान लंबा हो गया।
[सोरठा 12]
कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारि तब।
जनु असोक अंगार दीन्ह हरषि उठि कर गहेउ॥
सरल भावार्थ: हनुमानजी ने मन में विचार करके उसी समय अपनी मुद्रिका नीचे गिरा दी। माता सीता ने उसे ऐसे उठाकर हाथ में ले लिया, मानो अशोक वृक्ष ने प्रसन्न होकर उन्हें जलता हुआ अंगारा दे दिया हो।
तब देखी मुद्रिका मनोहर। राम नाम अंकित अति सुंदर॥
चकित चितव मुदरी पहिचानी। हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी॥1॥
सरल भावार्थ: तब माता सीता ने उस सुंदर मुद्रिका को देखा, जिस पर भगवान श्रीराम का नाम अंकित था। वे आश्चर्य से उसे देखने लगीं और पहचान गईं कि यह श्रीराम की ही अंगूठी है। इसे देखकर उनके हृदय में एक साथ खुशी और विरह का दुःख उमड़ पड़ा।
जीति को सकइ अजय रघुराई। माया तें असि रचि नहिं जाई॥
सीता मन बिचार कर नाना। मधुर बचन बोलेउ हनुमाना॥2॥
सरल भावार्थ: माता सीता ने मन में विचार किया कि भगवान श्रीराम को कोई जीत नहीं सकता, वे अजेय हैं। यह अंगूठी भी इतनी अद्भुत है कि इसे माया से बना पाना संभव नहीं है। तभी हनुमानजी ने माता सीता का संशय दूर करने के लिए मधुर वचन कहने शुरू किए।
रामचंद्र गुन बरनैं लागा। सुनतहिं सीता कर दुख भागा॥
लागीं सुनैं श्रवन मन लाई। आदिहु तें सब कथा सुनाई॥3॥
सरल भावार्थ: हनुमानजी भगवान श्रीराम के गुणों का वर्णन करने लगे। उनके वचन सुनते ही माता सीता का दुःख कुछ कम होने लगा। वे पूरे मन से ध्यान लगाकर हनुमानजी की बातें सुनने लगीं। हनुमानजी ने भगवान श्रीराम से जुड़ी सारी कथा आरंभ से सुनाई।
श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई। कही सो प्रगट होति किन भाई॥
तब हनुमंत निकट चलि गयऊ। फिरि बैठीं मन बिसमय भयऊ॥4॥
सरल भावार्थ: माता सीता ने सोचा कि भगवान श्रीराम की कथा कानों को अमृत के समान सुख देने वाली है। हे भाई! यदि यह कथा इतनी मधुर है, तो इसे सुनाने वाले सामने आकर अपना परिचय क्यों नहीं देते? तभी हनुमानजी उनके निकट आए। उन्हें सामने देखकर माता सीता फिर से आश्चर्यचकित हो गईं और मन में विचार करने लगीं।
राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की॥
यह मुद्रिका मातु मैं आनी। दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी॥5॥
सरल भावार्थ: हनुमानजी ने माता सीता से कहा, “हे माता जानकी! मैं भगवान श्रीराम का दूत हूँ। करुणानिधान प्रभु श्रीराम की सच्ची शपथ लेकर कहता हूँ कि मैं उन्हीं का संदेश लेकर आया हूँ। हे माता! यह मुद्रिका मैं ही लाया हूँ। भगवान श्रीराम ने आपको पहचान के रूप में देने के लिए यह अंगूठी मुझे सौंपी थी।”
नर बानरहि संग कहु कैसें। कही कथा भइ संगति जैसें॥6॥
सरल भावार्थ: माता सीता ने आश्चर्य से पूछा, “मनुष्य और वानर का मेल कैसे हुआ? भगवान श्रीराम और वानरों की मित्रता किस प्रकार हुई? मुझे विस्तार से बताओ कि यह सब कैसे संभव हुआ।”
[दोहा 13]
कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास।
जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास॥
सरल भावार्थ: हनुमानजी के प्रेम से भरे वचन सुनकर माता सीता के मन में विश्वास उत्पन्न हो गया। उन्होंने जान लिया कि हनुमानजी मन, कर्म और वचन से भगवान श्रीराम के सच्चे सेवक हैं।
हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी। सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी॥
बूड़त बिरह जलधि हनुमाना। भयहु तात मो कहुँ जलजाना॥1॥
सरल भावार्थ: हनुमानजी को भगवान श्रीराम का सच्चा भक्त जानकर माता सीता के मन में उनके प्रति गहरा स्नेह उमड़ पड़ा। उनकी आँखों में प्रेम के आँसू भर आए और शरीर रोमांचित हो उठा। माता सीता ने कहा, “हे तात हनुमान! मैं श्रीराम के विरह रूपी समुद्र में डूब रही थी। तुम मेरे लिए जहाज बनकर मुझे सहारा देने आए हो।”
अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी। अनुज सहित सुख भवन खरारी॥
कोमलचित कृपाल रघुराई। कपि केहि हेतु धरी निठुराई॥2॥
सरल भावार्थ: माता सीता ने कहा, “हे हनुमानजी! मैं तुम पर बलिहारी जाती हूँ। अब मुझे भगवान श्रीराम की कुशलता बताओ। खर-दूषण का वध करने वाले प्रभु श्रीराम अपने छोटे भाई लक्ष्मण सहित सुखपूर्वक तो हैं न? भगवान श्रीराम तो कोमल हृदय वाले और दयालु हैं। फिर उन्होंने मेरे प्रति इतनी कठोरता क्यों धारण कर रखी है?”
सहज बानि सेवक सुखदायक। कबहुँक सुरति करत रघुनायक॥
कबहुँ नयन मम सीतल ताता। होइहहिं निरखि स्याम मृदु गाता॥3॥
सरल भावार्थ: माता सीता कहती हैं, “हे हनुमानजी! भगवान श्रीराम का स्वभाव सहज ही अपने सेवकों को सुख देने वाला है। क्या वे कभी मेरा स्मरण करते हैं? हे तात! क्या मेरे नेत्रों को कभी भगवान श्रीराम के श्याम और कोमल शरीर के दर्शन करके शीतलता प्राप्त होगी?”
बचनु न आव नयन भरे बारी। अहह नाथ हौं निपट बिसारी॥
देखि परम बिरहाकुल सीता। बोला कपि मृदु बचन बिनीता॥4॥
सरल भावार्थ: माता सीता विरह के दुःख से इतनी व्याकुल हो गईं कि उनके नेत्र आँसुओं से भर गए और वे कुछ बोल नहीं पाईं। वे मन ही मन कहने लगीं, “हे नाथ! आपने मुझे बिल्कुल भुला दिया है।” माता सीता को विरह से अत्यंत व्याकुल देखकर हनुमानजी विनम्रता और कोमलता से बोले।
मातु कुसल प्रभु अनुज समेता। तव दुख दुखी सुकृपा निकेता॥
जनि जननी मानहु जियँ ऊना। तुम्ह ते प्रेमु राम कें दूना॥5॥
सरल भावार्थ: हनुमानजी ने कहा, “हे माता! छोटे भाई लक्ष्मण सहित भगवान श्रीराम कुशलपूर्वक हैं। वे कृपा के धाम हैं और आपके दुःख से स्वयं भी बहुत दुःखी हैं। हे माता! आप अपने मन में किसी प्रकार की कमी या निराशा न मानें। भगवान श्रीराम के हृदय में आपके प्रति प्रेम पहले से भी दोगुना हो गया है।”
[दोहा 14]
रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर।
अस कहि कपि गदगद भयउ भरे बिलोचन नीर॥
सरल भावार्थ: हनुमानजी ने माता सीता से कहा, “हे माता! धैर्य रखकर अब भगवान श्रीराम का संदेश सुनिए।” इतना कहते ही हनुमानजी का गला प्रेम और भावुकता से भर आया तथा उनकी आँखों में आँसू छलक उठे।
कहेउ राम बियोग तव सीता। मो कहुँ सकल भए बिपरीता॥
नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू। कालनिसा सम निसि ससि भानू॥1॥
सरल भावार्थ: हनुमानजी ने कहा, “हे सीता माता! भगवान श्रीराम ने संदेश दिया है कि आपके वियोग में मेरे लिए सब कुछ विपरीत हो गया है। पेड़ों की नई कोमल पत्तियाँ भी मुझे आग के समान जलाने वाली लगती हैं। रात कालरात्रि के समान दुःखदायी हो गई है और चंद्रमा तथा सूर्य भी मेरे लिए समान रूप से कष्ट देने वाले बन गए हैं।”
कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा॥
जे हित रहे करत तेइ पीरा। उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा॥2॥
सरल भावार्थ: भगवान श्रीराम कहते हैं कि कमलों से भरे सुंदर वन भी अब भालों के जंगल के समान चुभने वाले लगते हैं। बादलों से बरसने वाली वर्षा भी मानो गर्म तेल बरसाने जैसी पीड़ा देती है। जो वस्तुएँ पहले सुख देती थीं, वे ही अब दुःख देने लगी हैं। शीतल, मंद और सुगंधित हवा भी साँप की साँस के समान कष्ट पहुँचाती है।
कहेहू तें कछु दुख घटि होई। काहि कहौं यह जान न कोई॥
तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा॥3॥
सरल भावार्थ: भगवान श्रीराम कहते हैं, “हे सीता! अपने दुःख को किसी से कह देने पर शायद कुछ पीड़ा कम हो जाए, लेकिन मैं अपना दुःख किससे कहूँ? मेरे इस विरह की पीड़ा को कोई नहीं समझ सकता। मेरे और तुम्हारे प्रेम की सच्चाई को केवल मेरा मन ही जानता है, क्योंकि हे प्रिये! मेरा मन सदा तुम्हारे पास ही रहता है।”
सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतनेहि माहीं॥
प्रभु संदेसु सुनत बैदेही। मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही॥4॥
सरल भावार्थ: भगवान श्रीराम कहते हैं, “हे सीते! मेरा मन सदा तुम्हारे पास ही रहता है। हमारे प्रेम की गहराई को इसी बात से समझ लो।” प्रभु श्रीराम का यह संदेश सुनकर माता सीता प्रेम में इतनी मग्न हो गईं कि उन्हें अपने शरीर तक की सुध नहीं रही।
कह कपि हृदयँ धीर धरु माता। सुमिरु राम सेवक सुखदाता॥
उर आनहु रघुपति प्रभुताई। सुनि मम बचन तजहु कदराई॥5॥
सरल भावार्थ: हनुमानजी ने माता सीता से कहा, “हे माता! अपने हृदय में धैर्य रखिए और सेवकों को सुख देने वाले भगवान श्रीराम का स्मरण कीजिए। भगवान श्रीराम की महिमा और उनके सामर्थ्य को अपने हृदय में धारण कीजिए। मेरी बात सुनकर अपने मन की दीनता और निराशा त्याग दीजिए।”
[दोहा 15]
निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु।
जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु॥
सरल भावार्थ: हनुमानजी ने माता सीता से कहा, “हे माता! भगवान श्रीराम के बाण अग्नि के समान हैं और राक्षसों के समूह पतंगों के समान हैं, जो उस अग्नि में जलकर नष्ट हो जाएँगे। इसलिए आप अपने हृदय में धैर्य रखिए और विश्वास कीजिए कि राक्षसों का विनाश निश्चित है।”
जौं रघुबीर होति सुधि पाई। करते नहिं बिलंबु रघुराई॥
राम बान रबि उएँ जानकी। तम बरूथ कहँ जातुधान की॥1॥
सरल भावार्थ: हनुमानजी ने माता सीता से कहा, “यदि भगवान श्रीराम को आपके लंका में होने का पता चल गया होता, तो वे आपको मुक्त कराने में तनिक भी देर नहीं करते। हे जानकी माता! भगवान श्रीराम के बाण सूर्य के समान हैं और राक्षसों की सेना अंधकार के समान है। जिस प्रकार सूर्य के उदय होते ही अंधकार मिट जाता है, उसी प्रकार श्रीराम के बाणों के सामने राक्षसों की सेना नष्ट हो जाएगी।”
अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई। प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई॥
कछुक दिवस जननी धरु धीरा। कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा॥2॥
सरल भावार्थ: हनुमानजी ने माता सीता से कहा, “हे माता! यदि भगवान श्रीराम की आज्ञा होती, तो मैं आपको अभी यहाँ से ले जाता। मैं श्रीराम की शपथ लेकर कहता हूँ कि उनकी अनुमति के बिना ऐसा करना उचित नहीं है। हे माता! आप कुछ दिन और धैर्य रखिए। भगवान श्रीराम वानर सेना के साथ यहाँ अवश्य आएँगे।”
निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं। तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं॥
हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना। जातुधान अति भट बलवाना॥3॥
सरल भावार्थ: हनुमानजी ने माता सीता से कहा, “भगवान श्रीराम सभी राक्षसों का वध करके आपको अपने साथ ले जाएँगे। इस महान कार्य के कारण तीनों लोकों में नारद आदि ऋषि-मुनि उनकी कीर्ति का गान करेंगे।” माता सीता ने कहा, “हे पुत्र! सभी वानर तुम्हारे जैसे छोटे शरीर वाले हैं, जबकि राक्षस बहुत बलवान और बड़े योद्धा हैं।”
मोरें हृदय परम संदेहा। सुनि कपि प्रगट कीन्हि निज देहा॥
कनक भूधराकार सरीरा। समर भयंकर अतिबल बीरा॥4॥
सरल भावार्थ: माता सीता के मन में यह संदेह था कि छोटे-छोटे वानर इतने बलवान राक्षसों से कैसे युद्ध कर पाएँगे। उनकी शंका दूर करने के लिए हनुमानजी ने अपना विशाल रूप प्रकट किया। उनका शरीर सोने के पर्वत के समान विशाल था और वे युद्ध में अत्यंत भयंकर तथा बलशाली वीर दिखाई दे रहे थे।
सीता मन भरोस तब भयऊ। पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ॥5॥
सरल भावार्थ: हनुमानजी का विशाल और बलशाली रूप देखकर माता सीता के मन में विश्वास उत्पन्न हो गया कि भगवान श्रीराम की वानर सेना राक्षसों को पराजित कर सकती है। इसके बाद हनुमानजी ने फिर से अपना छोटा रूप धारण कर लिया।
[दोहा 16]
सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल।
प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल॥
सरल भावार्थ: हनुमानजी ने माता सीता से कहा, “हे माता! सुनिए, वानर स्वभाव से ही बहुत बलवान और बुद्धिमान नहीं होते, लेकिन भगवान श्रीराम के प्रताप से एक छोटा-सा साँप भी गरुड़ जैसे शक्तिशाली पक्षी को निगल सकता है।”
मन संतोष सुनत कपि बानी। भगति प्रताप तेज बल सानी॥
आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना। होहु तात बल सील निधाना॥1॥
सरल भावार्थ: हनुमानजी के वचन सुनकर माता सीता के मन को संतोष हुआ। उनके शब्द भगवान श्रीराम की भक्ति, प्रताप, तेज और बल से परिपूर्ण थे। हनुमानजी को भगवान श्रीराम का प्रिय भक्त जानकर माता सीता ने उन्हें आशीर्वाद दिया, “हे पुत्र! तुम बल और उत्तम शील के भंडार बनो।”
अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू॥
करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना। निर्भर प्रेम मगन हनुमाना॥2॥
सरल भावार्थ: माता सीता ने हनुमानजी को आशीर्वाद दिया, “हे पुत्र! तुम अजर, अमर और गुणों के भंडार बने रहो। भगवान श्रीरघुनाथ तुम पर बहुत स्नेह और कृपा करें।” माता सीता के ये वचन सुनकर हनुमानजी अत्यंत प्रेम और भक्ति में मग्न हो गए।
बार बार नाएसि पद सीसा। बोला बचन जोरि कर कीसा॥
अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता। आसिष तव अमोघ बिख्याता॥3॥
सरल भावार्थ: हनुमानजी ने बार-बार माता सीता के चरणों में सिर झुकाकर प्रणाम किया। फिर हाथ जोड़कर कहा, “हे माता! अब मैं धन्य हो गया हूँ और मेरा जीवन सफल हो गया है, क्योंकि आपका आशीर्वाद संसार में अमोघ और अचूक माना जाता है।”
सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा। लागि देखि सुंदर फल रूखा॥
सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी। परम सुभट रजनीचर भारी॥4॥
सरल भावार्थ: हनुमानजी ने माता सीता से कहा, “हे माता! सुनिए, मुझे बहुत तेज भूख लगी है। यहाँ सुंदर-सुंदर फल और वृक्ष देखकर मेरा मन उन्हें खाने के लिए लालायित हो रहा है।” माता सीता ने उत्तर दिया, “हे पुत्र! इस अशोक वाटिका की रखवाली अत्यंत बलवान और पराक्रमी राक्षस करते हैं।”
तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं। जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीं॥5॥
भावार्थ
सरल भावार्थ: हनुमानजी ने माता सीता से कहा, “हे माता! मुझे उन राक्षसों का कोई भय नहीं है। यदि आप अपने मन में उचित समझें और आपको अच्छा लगे, तो मैं इन सुंदर वृक्षों के फल खा सकता हूँ।”
[दोहा 17]
देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु।
रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु॥
सरल भावार्थ: हनुमानजी की बुद्धि और बल में निपुणता देखकर माता जानकी ने कहा, “हे पुत्र! जाओ, अपने हृदय में भगवान श्रीराम के चरणों को धारण करके अशोक वाटिका के मीठे फल खाओ।”
चलेउ नाइ सिरु पैठेउ बागा। फल खाएसि तरु तोरैं लागा॥
रहे तहाँ बहु भट रखवारे। कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे॥1॥
सरल भावार्थ: माता सीता से आज्ञा लेकर हनुमानजी ने सिर झुकाया और अशोक वाटिका में प्रवेश किया। वहाँ उन्होंने मीठे फल खाए और वृक्षों को तोड़ने लगे। वाटिका की रखवाली के लिए बहुत-से राक्षस योद्धा तैनात थे। हनुमानजी ने उनमें से कुछ को मार डाला और कुछ भागकर रावण के पास इसकी सूचना देने चले गए।
नाथ एक आवा कपि भारी। तेहिं असोक बाटिका उजारी॥
खाएसि फल अरु बिटप उपारे। रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे॥2॥
सरल भावार्थ: राक्षसों ने रावण के पास जाकर कहा, “हे स्वामी! एक बहुत बलशाली वानर आया है, जिसने अशोक वाटिका को उजाड़ दिया है। उसने फल खाए हैं, वृक्षों को उखाड़ दिया है और रखवाली करने वाले राक्षसों को बुरी तरह कुचलकर धरती पर गिरा दिया है।”
सुनि रावन पठए भट नाना। तिन्हहि देखि गर्जेउ हनुमाना॥
सब रजनीचर कपि संघारे। गए पुकारत कछु अधमारे॥3॥
सरल भावार्थ:  रावण ने यह समाचार सुनकर अनेक योद्धाओं को भेजा। उन्हें सामने देखकर हनुमान जी जोर से गरजे और सभी राक्षसों को मार गिराया। कुछ राक्षस बुरी तरह घायल होकर पुकारते हुए वहाँ से भाग निकले।
पुनि पठयउ तेहिं अच्छकुमारा। चला संग लै सुभट अपारा॥
आवत देखि बिटप गहि तर्जा। ताहि निपाति महाधुनि गर्जा॥4॥
सरल भावार्थ: इसके बाद रावण ने अक्षयकुमार को भेजा, जो अपने साथ बड़ी संख्या में वीर योद्धाओं को लेकर चला। उन्हें आते देखकर हनुमान जी ने एक वृक्ष उठा लिया और उन्हें ललकारा। फिर अक्षयकुमार को मार गिराकर हनुमान जी ने जोरदार गर्जना की।
[दोहा 18]
कछु मारेसि कछु मर्देसि कछु मिलएसि धरि धूरि।
कछु पुनि जाइ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि॥
सरल भावार्थ: हनुमान जी ने कुछ राक्षसों को मार डाला, कुछ को कुचलकर धरती पर गिरा दिया और कुछ को पकड़कर धूल में पटक दिया। जो राक्षस बचकर भागे, वे रावण के पास जाकर पुकारने लगे कि हे स्वामी! इस वानर में बहुत अधिक बल है।
सुनि सुत बध लंकेस रिसाना। पठएसि मेघनाद बलवाना॥
मारसि जनि सुत बाँधेसु ताही। देखिअ कपिहि कहाँ कर आही॥1॥
सरल भावार्थ: अपने पुत्र अक्षयकुमार के मारे जाने का समाचार सुनकर रावण क्रोध से भर उठा। उसने शक्तिशाली मेघनाद को बुलाकर भेजा और कहा, “पुत्र! इस वानर को मारना मत, इसे बाँधकर ले आना। मैं देखना चाहता हूँ कि यह कहाँ का रहने वाला है।”
चला इंद्रजित अतुलित जोधा। बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा॥
कपि देखा दारुन भट आवा। कटकटाइ गर्जा अरु धावा॥2॥
सरल भावार्थ: अद्वितीय योद्धा इंद्रजीत अपने भाई की मृत्यु का समाचार सुनकर क्रोध में भरकर युद्ध के लिए चला। भयंकर योद्धा को अपनी ओर आते देखकर हनुमान जी दाँत पीसते हुए जोर से गरजे और उस पर टूट पड़े।
अति बिसाल तरु एक उपारा। बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा॥
रहे महाभट ताके संगा। गहि गहि कपि मर्दइ निज अंगा॥3॥
सरल भावार्थ: हनुमान जी ने एक बहुत बड़ा वृक्ष उखाड़ लिया और उससे रावण के पुत्र मेघनाद के रथ को नष्ट कर उसे रथहीन कर दिया। उसके साथ आए बड़े-बड़े योद्धाओं को हनुमान जी पकड़-पकड़कर अपने बल से कुचलने लगे।
तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा। भिरे जुगल मानहुँ गजराजा॥
मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई। ताहि एक छन मुरुछा आई॥4॥
सरल भावार्थ: उन योद्धाओं को परास्त करने के बाद हनुमान जी मेघनाद से भिड़ गए। दोनों के बीच ऐसा भयंकर युद्ध होने लगा, मानो दो विशाल हाथी आपस में लड़ रहे हों। हनुमान जी ने मेघनाद पर घूँसे से प्रहार किया और फिर एक वृक्ष पर जा चढ़े। उस प्रहार से मेघनाद कुछ क्षणों के लिए मूर्च्छित हो गया।
उठि बहोरि कीन्हिसि बहु माया। जीति न जाइ प्रभंजन जाया॥5॥
सरल भावार्थ: होश में आने के बाद मेघनाद ने अनेक मायावी उपाय किए, लेकिन पवनपुत्र हनुमान जी को परास्त करना उसके लिए संभव नहीं हुआ।
[दोहा 19]
ब्रह्म अस्त्र तेहि साँधा कपि मन कीन्ह बिचार।
जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार॥
सरल भावार्थ: जब मेघनाद ने हनुमान जी पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया, तब हनुमान जी ने मन में विचार किया कि यदि मैं ब्रह्मास्त्र के प्रभाव को स्वीकार नहीं करूँगा, तो इस दिव्य अस्त्र की अपार महिमा निष्फल हो जाएगी। इसलिए उन्होंने ब्रह्मास्त्र का मान रखने का विचार किया।
ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहिं मारा। परतिहुँ बार कटकु संघारा॥
तेहिं देखा कपि मुरुछित भयऊ। नागपास बाँधेसि लै गयऊ॥1॥
सरल भावार्थ: मेघनाद ने हनुमान जी पर ब्रह्मबाण चलाया, लेकिन हनुमान जी उससे बँधने के बाद भी बार-बार राक्षसों की सेना को नष्ट करते रहे। जब मेघनाद ने उन्हें मूर्च्छित अवस्था में देखा, तब वह उन्हें नागपाश में बाँधकर ले गया।
जासु नाम जपि सुनहु भवानी। भव बंधन काटहिं नर ग्यानी॥
तासु दूत कि बंध तरु आवा। प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा॥2॥
सरल भावार्थ: शिवजी माता भवानी से कहते हैं, “हे भवानी! जिन श्रीराम का नाम जपने से ज्ञानी मनुष्य संसार के बंधनों से मुक्त हो जाते हैं, उनके दूत हनुमान जी वास्तव में बंधन में कैसे पड़ सकते हैं? उन्होंने तो अपने प्रभु का कार्य पूरा करने के लिए स्वयं को बँधने दिया था।”
कपि बंधन सुनि निसिचर धाए। कौतुक लागि सभाँ सब आए॥
दसमुख सभा दीखि कपि जाई। कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई॥3॥
सरल भावार्थ: हनुमान जी के पकड़े जाने का समाचार सुनकर राक्षस दौड़े चले आए। उन्हें देखने के लिए सभी रावण की सभा में इकट्ठा हो गए। हनुमान जी ने वहाँ पहुँचकर रावण की सभा का वैभव देखा, जिसकी विशालता और भव्यता का वर्णन करना कठिन था।
कर जोरें सुर दिसिप बिनीता। भृकुटि बिलोकत सकल सभीता॥
देखि प्रताप न कपि मन संका। जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका॥4॥
सरल भावार्थ: सभा में देवता और दिक्पाल हाथ जोड़े विनम्र भाव से खड़े थे। सभी रावण की त्योरियाँ देखकर भयभीत थे। फिर भी रावण का इतना प्रभाव देखकर हनुमान जी के मन में कोई डर नहीं आया। वे सर्पों के बीच गरुड़ की तरह निर्भय बने रहे।
[दोहा 20]
कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद।
सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिषाद॥
सरल भावार्थ: हनुमान जी को सामने देखकर रावण उनका उपहास करने लगा और अपमानजनक बातें कहकर हँसा। लेकिन जब उसे अपने पुत्र अक्षयकुमार के मारे जाने की याद आई, तो उसके मन में फिर से दुःख उत्पन्न हो गया।
कह लंकेस कवन तैं कीसा। केहि कें बल घालेहि बन खीसा॥
की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही। देखउँ अति असंक सठ तोही॥1॥
सरल भावार्थ: रावण ने पूछा, “अरे वानर! तू कौन है और किसके बल पर तूने मेरा वन उजाड़ दिया? क्या तूने मेरे पराक्रम के बारे में नहीं सुना? अरे मूर्ख! मैं देख रहा हूँ कि तुझे तनिक भी भय नहीं है।”
मारे निसिचर केहिं अपराधा। कहु सठ तोहि न प्रान कइ बाधा॥
सुनु रावन ब्रह्मांड निकाया। पाइ जासु बल बिरचति माया॥2॥
सरल भावार्थ: रावण ने पूछा, “अरे मूर्ख! तूने किस अपराध के कारण मेरे राक्षसों को मारा? क्या तुझे अपने प्राणों का भय नहीं है?” हनुमान जी ने उत्तर दिया, “हे रावण! सुन, जिनके बल से माया असंख्य ब्रह्मांडों की रचना करती है, उन्हीं श्रीराम का मैं दूत हूँ।”
जाकें बल बिरंचि हरि ईसा। पालत सृजत हरत दससीसा॥
जा बल सीस धरत सहसानन। अंडकोस समेत गिरि कानन॥3॥
सरल भावार्थ: हनुमान जी ने कहा, “हे दशमुख! जिनकी शक्ति से ब्रह्मा सृष्टि की रचना करते हैं, विष्णु उसका पालन करते हैं और शिव उसका संहार करते हैं, उन्हीं प्रभु की शक्ति से सहस्रमुख शेषनाग पर्वतों, वनों और समस्त ब्रह्मांड को अपने सिर पर धारण करते हैं।”
धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता। तुम्ह से सठन्ह सिखावनु दाता॥
हर कोदंड कठिन जेहिं भंजा। तेहि समेत नृप दल मद गंजा॥4॥
सरल भावार्थ: हनुमान जी ने आगे कहा, “जो देवताओं की रक्षा के लिए अनेक रूप धारण करते हैं, वही प्रभु तुम जैसे मूर्खों को शिक्षा देने वाले हैं। उन्हीं श्रीराम ने शिवजी का कठोर धनुष तोड़ा और सीता स्वयंवर में उपस्थित राजाओं के समूह का अभिमान चूर कर दिया।”
खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली। बधे सकल अतुलित बलसाली॥5॥
सरल भावार्थ: हनुमान जी ने कहा कि श्रीराम ने खर, दूषण, त्रिशिरा और बालि जैसे अत्यंत शक्तिशाली योद्धाओं का वध किया है। वे अपने प्रभु श्रीराम के पराक्रम का वर्णन कर रहे थे।
[दोहा 21]
जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि।
तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि॥
सरल भावार्थ: हनुमान जी ने रावण से कहा, “जिस प्रभु की शक्ति के थोड़े-से अंश के सहारे तूने समस्त चराचर जगत को जीतने का अभिमान किया है, मैं उन्हीं का दूत हूँ। उन्हीं प्रभु की प्रिय पत्नी सीता जी को तू हरकर ले आया है।”
जानउँ मैं तुम्हारि प्रभुताई। सहसबाहु सन परी लराई॥
समर बालि सन करि जसु पावा। सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा॥1॥
सरल भावार्थ: हनुमान जी ने कहा, “मैं तुम्हारी शक्ति और पराक्रम को जानता हूँ। तुम्हारा सहस्रबाहु से युद्ध हुआ था और बालि के साथ युद्ध करके भी तुम्हें अपने पराक्रम का परिचय मिल चुका है।” उनकी बातें सुनकर रावण हँसने लगा और बात को टालने का प्रयास करने लगा।
खायउँ फल प्रभु लागी भूँखा। कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा॥
सब कें देह परम प्रिय स्वामी। मारहिं मोहि कुमारग गामी॥2॥
सरल भावार्थ: हनुमान जी ने कहा, “हे स्वामी! मुझे भूख लगी थी, इसलिए मैंने फल खाए। वानर स्वभाव के कारण मैंने वृक्ष भी तोड़े। हर प्राणी को अपना शरीर प्रिय होता है, फिर भी तुम्हारे कुमार्ग पर चलने वाले राक्षस मुझे मारने लगे।”
जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे। तेहि पर बाँधेउँ तनयँ तुम्हारे॥
मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा। कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा॥3॥
सरल भावार्थ: हनुमान जी ने कहा, “जिन राक्षसों ने मुझ पर प्रहार किया, मैंने उन्हीं को मारा। इसके बाद तुम्हारे पुत्र ने मुझे बाँध लिया। मुझे बँधे होने में कोई लज्जा नहीं है, क्योंकि मैं अपने प्रभु का कार्य पूरा करना चाहता हूँ।”
बिनती करउँ जोरि कर रावन। सुनहु मान तजि मोर सिखावन॥
देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी। भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी॥4॥
सरल भावार्थ: हनुमान जी ने हाथ जोड़कर रावण से विनती की, “हे रावण! अपना अभिमान छोड़कर मेरी बात सुनो। अपने कुल की मर्यादा पर विचार करो, भ्रम त्याग दो और भक्तों के भय दूर करने वाले श्रीराम का भजन करो।”
जाकें डर अति काल डेराई। जो सुर असुर चराचर खाई॥
तासों बयरु कबहुँ नहिं कीजै। मोरे कहें जानकी दीजै॥5॥
सरल भावार्थ: हनुमान जी ने समझाया, “जिस प्रभु के भय से काल भी भयभीत रहता है और जो देवताओं, असुरों तथा समस्त चराचर जगत का अंत करने में समर्थ हैं, उनसे कभी शत्रुता नहीं करनी चाहिए। मेरी बात मानकर सीता जी को लौटा दो।”
[दोहा 22]
प्रनतपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि।
गएँ सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि॥
सरल भावार्थ: हनुमान जी ने कहा, “श्रीराम शरण में आने वालों की रक्षा करने वाले, करुणा के सागर और खर के शत्रु हैं। यदि तुम उनकी शरण में चले जाओगे, तो वे तुम्हारे अपराधों को भुलाकर तुम्हारी रक्षा करेंगे।”
राम चरन पंकज उर धरहू। लंका अचल राजु तुम्ह करहू॥
रिषि पुलस्ति जसु बिमल मयंका। तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका॥1॥
सरल भावार्थ: हनुमान जी ने कहा, “श्रीराम के चरण-कमलों को अपने हृदय में स्थान दो और लंका पर स्थिर होकर राज्य करो। पुलस्त्य ऋषि का यश निर्मल चंद्रमा के समान है। तुम अपने कर्मों से उस उज्ज्वल वंश की कीर्ति पर कलंक मत लगाओ।”
राम नाम बिनु गिरा न सोहा। देखु बिचारि त्यागि मद मोहा॥
बसन हीन नहिं सोह सुरारी। सब भूषन भूषित बर नारी॥2॥
सरल भावार्थ: हनुमान जी ने समझाया, “श्रीराम के नाम के बिना वाणी शोभा नहीं पाती। अभिमान और मोह छोड़कर इस बात पर विचार करो। हे रावण! जैसे वस्त्रों के बिना स्त्री अनेक आभूषण धारण करने पर भी शोभा नहीं पाती, वैसे ही श्रीराम के नाम के बिना अन्य उपलब्धियाँ भी अधूरी हैं।”
राम बिमुख संपति प्रभुताई। जाइ रही पाई बिनु पाई॥
सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं। बरषि गएँ पुनि तबहिं सुखाहीं॥3॥
सरल भावार्थ: श्रीराम से विमुख व्यक्ति की संपत्ति और प्रभुता ऐसी है, मानो उसे पाकर भी कुछ प्राप्त न हुआ हो। उसका वैभव स्थायी नहीं रहता। जिन नदियों का जलस्रोत नहीं होता, वे वर्षा समाप्त होते ही सूख जाती हैं। उसी प्रकार प्रभु से विमुख होकर प्राप्त वैभव भी टिक नहीं पाता।
सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी। बिमुख राम त्राता नहिं कोपी॥
संकर सहस बिष्नु अज तोही। सकहिं न राखि राम कर द्रोही॥4॥
सरल भावार्थ: हनुमान जी ने दृढ़ता से कहा, “हे दशमुख! मेरी बात सुनो। मैं प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि श्रीराम से विमुख व्यक्ति को कोई भी बचाने में समर्थ नहीं है। हजारों शिव, विष्णु और ब्रह्मा भी श्रीराम से द्रोह करने वाले की रक्षा नहीं कर सकते।”
[दोहा 23]
मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान।
भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान॥
सरल भावार्थ: हनुमान जी ने रावण से कहा, “मोह से उत्पन्न होने वाले और अनेक कष्ट देने वाले अज्ञान तथा अभिमान को त्याग दो। कृपा के सागर, रघुकुल के नायक भगवान श्रीराम का भजन करो।”
जदपि कही कपि अति हित बानी। भगति बिबेक बिरति नय सानी॥
बोला बिहसि महा अभिमानी। मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी॥1॥
सरल भावार्थ: हनुमान जी ने भक्ति, विवेक, वैराग्य और नीति से युक्त अत्यंत हितकारी बातें कहीं। फिर भी महा अभिमानी रावण हँसकर बोला, “वाह! हमें यह वानर बड़ा ज्ञानी गुरु मिल गया है!”
मृत्यु निकट आई खल तोही। लागेसि अधम सिखावन मोही॥
उलटा होइहि कह हनुमाना। मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना॥2॥
सरल भावार्थ: रावण ने कहा, “अरे दुष्ट! तेरी मृत्यु निकट आ गई है, तभी तू मुझे उपदेश देने लगा है।” हनुमान जी ने उत्तर दिया, “इसका परिणाम उलटा होगा। तेरी ही मृत्यु निकट है। मैंने तेरे बुद्धि-भ्रम को स्पष्ट रूप से पहचान लिया है।”
सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना। बेगि न हरहु मूढ़ कर प्राना॥
सुनत निसाचर मारन धाए। सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए॥3॥
सरल भावार्थ: हनुमान जी की बातें सुनकर रावण बहुत क्रोधित हो गया। वह बोला, “अरे मूर्खो! इस वानर के प्राण शीघ्र क्यों नहीं ले लेते?” यह सुनते ही राक्षस हनुमान जी को मारने के लिए दौड़े। तभी विभीषण अपने मंत्रियों के साथ वहाँ आ पहुँचे।
नाइ सीस करि बिनय बहूता। नीति बिरोध न मारिअ दूता॥
आन दंड कछु करिअ गोसाईं। सबहीं कहा मंत्र भल भाई॥4॥
सरल भावार्थ: विभीषण ने सिर झुकाकर विनम्रता से निवेदन किया, “हे स्वामी! दूत का वध करना नीति के विरुद्ध है। इसलिए इसे मारना उचित नहीं होगा। आप चाहें तो इसे कोई दूसरा दंड दे सकते हैं।” वहाँ उपस्थित लोगों ने कहा कि विभीषण ने उचित सलाह दी है।
सुनत बिहसि बोला दसकंधर। अंग भंग करि पठइअ बंदर॥5॥
सरल भावार्थ: विभीषण की बात सुनकर रावण हँसा और बोला, “इस वानर को मारने के बजाय इसके अंगों को विकृत करके वापस भेज दिया जाए।”
[दोहा 24]
कपि कें ममता पूँछ पर सबहि कहउँ समुझाइ।
तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ॥
सरल भावार्थ: रावण ने कहा, “वानर को अपनी पूँछ बहुत प्रिय होती है। मैं तुम सबको यह बात समझाता हूँ। इसकी पूँछ पर तेल में भिगोए हुए कपड़े लपेटकर बाँध दो और फिर उसमें आग लगा दो।”
पूँछहीन बानर तहँ जाइहि। तब सठ निज नाथहि लइ आइहि॥
जिन्ह कै कीन्हिसि बहुत बड़ाई। देखउँ मैं तिन्ह कै प्रभुताई॥1॥
सरल भावार्थ: रावण कहता है कि यह पूँछहीन वानर वहाँ जाएगा और तब वह मूर्ख अपने स्वामी को भी साथ ले आएगा। जिनकी इसने इतनी प्रशंसा की है, अब मैं उनकी शक्ति और सामर्थ्य देखूँगा।
बचन सुनत कपि मन मुसुकाना। भइ सहाय सारद मैं जाना॥
जातुधान सुनि रावन बचना। लागे रचैं मूढ़ सोइ रचना॥2॥
सरल भावार्थ: रावण की बातें सुनकर हनुमानजी मन ही मन मुस्कुराए। उन्होंने समझ लिया कि माता सरस्वती उनकी सहायता कर रही हैं। रावण की आज्ञा सुनकर राक्षस उस मूर्खतापूर्ण योजना को पूरा करने में जुट गए।
रहा न नगर बसन घृत तेला। बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला॥
कौतुक कहँ आए पुरबासी। मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी॥3॥
सरल भावार्थ: नगर में ऐसा कोई घर नहीं बचा जहाँ से कपड़ा, घी और तेल न मँगाया गया हो। इनसे हनुमानजी की पूँछ को बढ़ाकर लपेट दिया गया और हनुमानजी यह सब लीला की तरह देखते रहे। यह तमाशा देखने के लिए नगरवासी इकट्ठा हो गए। वे हनुमानजी के पैरों पर प्रहार करते और उनका उपहास उड़ाते थे।
बाजहिं ढोल देहिं सब तारी। नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी॥
पावक जरत देखि हनुमंता। भयउ परम लघुरूप तुरंता॥4॥
सरल भावार्थ: राक्षस ढोल बजा रहे थे और तालियाँ पीट रहे थे। हनुमानजी को पूरे नगर में घुमाने के बाद उन्होंने उनकी पूँछ में आग लगा दी। अपनी पूँछ को जलता देखकर हनुमानजी तुरंत अत्यंत छोटा रूप धारण कर लिया।
निबुकि चढ़ेउ कपि कनक अटारीं। भई सभीत निसाचर नारीं॥5॥
सरल भावार्थ: हनुमानजी बंधनों से छूटकर सोने की अटारियों पर चढ़ गए। यह देखकर राक्षसों की स्त्रियाँ भयभीत हो गईं।
[दोहा 25]
हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।
अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास॥
सरल भावार्थ: उसी समय भगवान् की प्रेरणा से उनचासों प्रकार की वायु चलने लगी। हनुमानजी जोर से अट्टहास करके गरजे और विशाल रूप धारण करते हुए आकाश की ओर बढ़ने लगे।
देह बिसाल परम हरुआई। मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई॥
जरइ नगर भा लोग बिहाला। झपट लपट बहु कोटि कराला॥1॥
सरल भावार्थ: हनुमानजी का शरीर विशाल था, फिर भी वह अत्यंत हल्का था। वे एक महल से दूसरे महल पर तेजी से छलाँग लगाते हुए दौड़ने लगे। लंका का नगर जलने लगा और लोग घबराकर बेहाल हो गए। आग की लपटें तेजी से फैल रही थीं और उनका विकराल रूप भय उत्पन्न कर रहा था।
तात मातु हा सुनिअ पुकारा। एहिं अवसर को हमहि उबारा॥
हम जो कहा यह कपि नहिं होई। बानर रूप धरें सुर कोई॥2॥
सरल भावार्थ: लंका के लोग घबराकर पुकारने लगे, “हे पिता! हे माता! हमारी पुकार सुनो। इस संकट के समय हमें कौन बचाएगा?” वे कहने लगे, “हमने पहले ही कहा था कि यह कोई साधारण वानर नहीं है। यह तो वानर का रूप धारण करके आया कोई देवता है।”
साधु अवग्या कर फलु ऐसा। जरइ नगर अनाथ कर जैसा॥
जारा नगरु निमिष एक माहीं। एक बिभीषन कर गृह नाही॥3॥
सरल भावार्थ: लंकावासी कहने लगे कि साधु का अपमान करने का फल ऐसा ही होता है। जिस नगर का कोई रक्षक नहीं होता, वह इसी तरह जलकर नष्ट होने लगता है। हनुमानजी ने थोड़े ही समय में पूरी लंका जला दी, लेकिन विभीषण का घर नहीं जलाया।
ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा। जरा न सो तेहि कारन गिरिजा॥
उलटि पलटि लंका सब जारी। कूदि परा पुनि सिंधु मझारी॥4॥
सरल भावार्थ: हे गिरिजा! जिस अग्नि की रचना भगवान् ने की है, उसी भगवान् के दूत हनुमानजी को वह अग्नि नहीं जला सकी। हनुमानजी ने लंका को चारों ओर से जलाकर राख कर दिया और फिर समुद्र के बीच में छलाँग लगा दी।
[दोहा 26]
पूँछ बुझाइ खोइ श्रम धरि लघु रूप बहोरि।
जनकसुता कें आगें ठाढ़ भयउ कर जोरि॥
सरल भावार्थ: हनुमानजी ने अपनी पूँछ की आग बुझा दी और सारी थकान दूर करके फिर से छोटा रूप धारण कर लिया। इसके बाद वे माता सीता के सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गए।
मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा। जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा॥
चूड़ामनि उतारि तब दयऊ। हरष समेत पवनसुत लयऊ॥1॥
सरल भावार्थ: हनुमानजी ने माता सीता से कहा, “माता! मुझे कोई ऐसी निशानी दीजिए, जैसी श्रीराम ने मुझे दी थी।” तब माता सीता ने अपने सिर की चूड़ामणि उतारकर उन्हें दे दी। पवनपुत्र हनुमानजी ने उसे बड़े हर्ष के साथ ग्रहण किया।
कहेहु तात अस मोर प्रनामा। सब प्रकार प्रभु पूरनकामा॥
दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ मम संकट भारी॥2॥
सरल भावार्थ: माता सीता ने हनुमानजी से कहा, “हे पुत्र! मेरी ओर से श्रीराम को प्रणाम कहना और उनसे कहना कि वे सभी प्रकार से पूर्णकाम हैं, अर्थात् उनकी सभी इच्छाएँ पूर्ण हैं। हे नाथ! आप दीन-दुखियों पर दया करने वाले हैं। अपने इस स्वभाव और कीर्ति को याद करके मेरे भारी संकट को दूर कीजिए।”
तात सक्रसुत कथा सुनाएहु। बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु॥
मास दिवस महुँ नाथु न आवा। तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा॥3॥
सरल भावार्थ: माता सीता ने हनुमानजी से कहा, “हे पुत्र! श्रीराम को इंद्रपुत्र जयंत की घटना याद दिलाना और उनके बाण के प्रभाव का स्मरण कराना। उनसे कहना कि यदि एक महीने के भीतर मेरे स्वामी मुझे लेने नहीं आए, तो वे मुझे जीवित नहीं पाएँगे।”
कहु कपि केहि बिधि राखौं प्राना। तुम्हहू तात कहत अब जाना॥
तोहि देखि सीतलि भइ छाती। पुनि मो कहुँ सोइ दिनु सो राती॥
सरल भावार्थ: माता सीता कहती हैं, “हे हनुमान! बताओ, मैं किस प्रकार अपने प्राणों को बनाए रखूँ? हे पुत्र! तुम भी अब जाने की बात कह रहे हो। तुम्हें देखकर मेरे हृदय को शांति मिली थी, लेकिन तुम्हारे चले जाने पर मेरे लिए फिर वही दुखभरे दिन और रातें हो जाएँगी।”
जनकसुतहि समुझाइ करि बहु बिधि धीरजु दीन्ह।
चरन कमल सिरु नाइ कपि गवनु राम पहिं कीन्ह॥
सरल भावार्थ: माता जानकी को अनेक प्रकार से समझाकर और धैर्य बँधाकर हनुमानजी ने उनके चरणकमलों में सिर झुकाया और फिर श्रीराम के पास चल दिए।
चलत महाधुनि गर्जेसि भारी। गर्भ स्रवहिं सुनि निसिचर नारी॥
नाघि सिंधु एहि पारहि आवा। सबद किलिकिला कपिन्ह सुनावा॥1॥
सरल भावार्थ: चलते समय हनुमानजी ने बहुत जोर से गर्जना की। उनकी गर्जना सुनकर राक्षसों की स्त्रियाँ भयभीत हो गईं। समुद्र को लाँघकर वे इस पार आ पहुँचे और वानरों को हर्ष से किलकारी जैसी ध्वनि सुनाई।
हरषे सब बिलोकि हनुमाना। नूतन जन्म कपिन्ह तब जाना॥
मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा। कीन्हेसि रामचंद्र कर काजा॥2॥
सरल भावार्थ: हनुमानजी को देखकर सभी वानर प्रसन्न हो गए। उन्हें लगा, मानो उन्हें नया जीवन मिल गया हो। हनुमानजी का मुख प्रसन्न था और उनका शरीर तेज से दमक रहा था। इससे सब समझ गए कि उन्होंने श्रीराम का कार्य सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है।
मिले सकल अति भए सुखारी। तलफत मीन पाव जिमि बारी॥
चले हरषि रघुनायक पासा। पूँछत कहत नवल इतिहासा॥3॥
सरल भावार्थ: सभी वानर हनुमानजी से मिलकर बहुत प्रसन्न हुए, जैसे तड़पती हुई मछली को पानी मिल जाने पर राहत मिलती है। फिर वे हर्षपूर्वक श्रीराम के पास चले और रास्ते में उनसे नया समाचार पूछते तथा सुनते रहे।
तब मधुबन भीतर सब आए। अंगद संमत मधु फल खाए॥
रखवारे जब बरजन लागे। मुष्टि प्रहार हनत सब भागे॥4॥
सरल भावार्थ: इसके बाद सभी वानर मधुवन में पहुँचे और युवराज अंगद की अनुमति से मधु तथा फल खाने लगे। जब वन के रखवाले उन्हें रोकने लगे, तो वानरों ने उन पर मुक्कों से प्रहार किया, जिससे वे भागने लगे।
जाइ पुकारे ते सब बन उजार जुबराज।
सुनि सुग्रीव हरष कपि करि आए प्रभु काज॥
सरल भावार्थ: वन के रखवालों ने जाकर सुग्रीव से शिकायत की कि युवराज अंगद के नेतृत्व में वानरों ने मधुवन उजाड़ दिया है। यह सुनकर सुग्रीव प्रसन्न हुए, क्योंकि वे समझ गए कि वानरों ने श्रीराम का कार्य सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है।
जौं न होति सीता सुधि पाई। मधुबन के फल सकहिं कि खाई॥
एहि बिधि मन बिचार कर राजा। आइ गए कपि सहित समाजा॥1॥
सरल भावार्थ: सुग्रीव मन ही मन सोचने लगे, “यदि वानरों को माता सीता का समाचार न मिला होता, तो क्या वे इतने निश्चिंत होकर मधुवन के फल खा सकते थे?” राजा सुग्रीव यही विचार कर रहे थे कि सभी वानर अपने दल के साथ वहाँ आ पहुँचे।
आइ सबन्हि नावा पद सीसा। मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा॥
पूँछी कुसल कुसल पद देखी। राम कृपाँ भा काजु बिसेषी॥2॥
सरल भावार्थ: सभी वानरों ने आकर सुग्रीव के चरणों में सिर झुकाया। कपिराज सुग्रीव सबसे बड़े प्रेम से मिले और उनकी कुशल पूछी। उनके हाव-भाव देखकर सुग्रीव समझ गए कि श्रीराम की कृपा से कोई विशेष कार्य सफल हुआ है।
नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना। राखे सकल कपिन्ह के प्राना॥
सुनि सुग्रीव बहुरि तेहि मिलेऊ। कपिन्ह सहित रघुपति पहिं चलेऊ॥3॥
सरल भावार्थ: वानरों ने कहा, “हे नाथ! हनुमानजी ने श्रीराम का कार्य पूरा कर दिया और हम सभी वानरों के प्राण बचा लिए।” यह सुनकर सुग्रीव हनुमानजी से फिर प्रेमपूर्वक मिले और सभी वानरों के साथ श्रीराम के पास चल पड़े।
राम कपिन्ह जब आवत देखा। किएँ काजु मन हरष बिसेषा॥
फटिक सिला बैठे द्वौ भाई। परे सकल कपि चरनन्हि जाई॥4॥
सरल भावार्थ: जब श्रीराम ने वानरों को कार्य पूरा करके लौटते देखा, तो उनके मन में बहुत हर्ष हुआ। उस समय श्रीराम और लक्ष्मण दोनों भाई स्फटिक की शिला पर बैठे थे। सभी वानर उनके पास जाकर उनके चरणों में झुक पड़े।
प्रीति सहित सब भेटे रघुपति करुना पुंज।
पूँछी कुसल नाथ अब कुसल देखि पद कंज॥
सरल भावार्थ: करुणा के सागर श्रीराम सभी वानरों से प्रेमपूर्वक मिले और उनकी कुशल पूछी। वानरों ने कहा, “हे नाथ! आपके चरणकमलों के दर्शन पाकर अब हम सब कुशल हैं।”
जामवंत कह सुनु रघुराया। जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया॥
ताहि सदा सुभ कुसल निरंतर। सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर॥1॥
सरल भावार्थ: जाम्बवान ने कहा, “हे रघुनाथ! मेरी बात सुनिए। जिस पर आपकी कृपा होती है, उसका सदा कल्याण और मंगल होता है। देवता, मनुष्य और मुनि भी उस पर प्रसन्न रहते हैं।”
सोइ बिजई बिनई गुन सागर। तासु सुजसु त्रैलोक उजागर॥
प्रभु कीं कृपा भयउ सबु काजू। जन्म हमार सुफल भा आजू॥2॥
सरल भावार्थ: आपकी कृपा पाने वाला व्यक्ति विजयी, विनम्र और गुणों का भंडार बनता है। उसका सुयश तीनों लोकों में फैल जाता है। प्रभु की कृपा से हमारा सारा कार्य पूरा हुआ और आज हमारा जन्म सफल हो गया।
नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी। सहसहुँ मुख न जाइ सो बरनी॥
पवनतनय के चरित सुहाए। जामवंत रघुपतिहि सुनाए॥3॥
सरल भावार्थ: जाम्बवान ने कहा, “हे नाथ! पवनपुत्र हनुमानजी ने जो अद्भुत कार्य किया है, उसका वर्णन हजारों मुखों से भी पूरी तरह नहीं किया जा सकता।” इसके बाद जाम्बवान ने हनुमानजी के सुंदर और अद्भुत कार्यों का वर्णन श्रीराम को सुनाया।
सुनत कृपानिधि मन अति भाए। पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए॥
कहहु तात केहि भाँति जानकी। रहति करति रच्छा स्वप्रान की॥4॥
सरल भावार्थ: हनुमानजी के कार्यों का वर्णन सुनकर कृपानिधान श्रीराम बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने हनुमानजी को प्रेमपूर्वक हृदय से लगा लिया। फिर उन्होंने पूछा, “हे पुत्र! बताओ, माता जानकी किस प्रकार रह रही हैं और अपने प्राणों की रक्षा कैसे कर रही हैं?”
नाम पाहरू दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।
लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट॥
सरल भावार्थ: हनुमानजी ने कहा, “हे प्रभु! आपका नाम माता सीता के प्राणों की रक्षा करने वाला पहरेदार है और दिन-रात आपका ध्यान उनके लिए द्वार की तरह है। उनके नेत्र आपके चरणों में टिके हुए हैं। फिर उनके प्राण किस रास्ते से निकल सकते
चलत मोहि चूड़ामनि दीन्ही। रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही॥
नाथ जुगल लोचन भरि बारी। बचन कहे कछु जनककुमारी॥1॥
सरल भावार्थ: हनुमानजी बताते हैं कि चलते समय माता सीता ने उन्हें अपनी चूड़ामणि दी थी। श्रीराम ने उस निशानी को हृदय से लगा लिया। हनुमानजी आगे कहते हैं कि माता जानकी ने आँखों में आँसू भरकर कुछ बातें कही थीं।
अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना। दीन बंधु प्रनतारति हरना॥
मन क्रम बचन चरन अनुरागी। केहिं अपराध नाथ हौं त्यागी॥2॥
सरल भावार्थ: माता सीता ने संदेश दिया, “हे प्रभु! लक्ष्मणजी सहित मेरे प्रणाम स्वीकार कीजिए। आप दीन-दुखियों के सहायक और शरण में आए लोगों की पीड़ा दूर करने वाले हैं। मैं मन, वचन और कर्म से आपके चरणों के प्रति समर्पित हूँ। फिर हे नाथ, ऐसा कौन-सा अपराध हुआ कि आपने मुझे छोड़ दिया?”
अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना॥
नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। निसरत प्रान करहिं हठि बाधा॥3॥
सरल भावार्थ: माता सीता कहती हैं, “मैं अपना एक दोष मानती हूँ कि आपके वियोग में मेरे प्राण तुरंत नहीं निकल गए। हे नाथ! इसका दोष मेरी आँखों का है। वे आँसू बहाकर मेरे प्राणों को शरीर से निकलने नहीं देतीं।”
बिरह अगिनि तनु तूल समीरा। स्वास जरइ छन माहिं सरीरा॥
नयन स्रवहिं जलु निज हित लागी। जरैं न पाव देह बिरहागी॥4॥
सरल भावार्थ: सीता जी अपने विरह की पीड़ा बताते हुए कहती हैं कि वियोग अग्नि के समान है, शरीर रूई जैसा है और साँस हवा के समान है। इन तीनों के मेल से शरीर पलभर में जल जाना चाहिए, लेकिन आँखें आँसू बहाती रहती हैं। इस कारण विरह की अग्नि उनके शरीर को पूरी तरह जला नहीं पाती।
सीता कै अति बिपति बिसाला। बिनहिं कहें भलि दीनदयाला॥5॥
सरल भावार्थ: हनुमानजी श्रीराम से कहते हैं, “हे दीनदयाल! माता सीता की विपत्ति अत्यंत बड़ी है। उनकी पीड़ा इतनी गहरी है कि उसे विस्तार से कहने की आवश्यकता नहीं; आप उनके दुख को स्वयं समझ सकते हैं।”
निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति।
बेगि चलिअ प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति॥
सरल भावार्थ: हनुमानजी कहते हैं, “हे करुणानिधान! माता सीता का प्रत्येक क्षण कल्प के समान लंबा बीत रहा है। इसलिए शीघ्र चलिए और अपने पराक्रम से दुष्टों को पराजित करके उन्हें वापस ले आइए।”
सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना। भरि आए जल राजिव नयना॥
बचन कायँ मन मम गति जाही। सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही॥1॥
सरल भावार्थ: माता सीता का दुख सुनकर सुख के धाम श्रीराम के कमल जैसे नेत्रों में आँसू भर आए। वे कहते हैं, “जो व्यक्ति वचन, शरीर और मन से मेरी शरण में है, उसे स्वप्न में भी विपत्ति का भय क्यों होना चाहिए?”
कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई॥
केतिक बात प्रभु जातुधान की। रिपुहि जीति आनिबी जानकी॥2॥
सरल भावार्थ: हनुमानजी कहते हैं, “हे प्रभु! वास्तविक विपत्ति तो वही है, जब आपका स्मरण और भजन न हो। राक्षसों की शक्ति आपके सामने कितनी है? आप उन्हें पराजित करके माता जानकी को वापस ले आएँगे।”
सुनु कपि तोहि समान उपकारी। नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी॥
प्रति उपकार करौं का तोरा। सनमुख होइ न सकत मन मोरा॥3॥
सरल भावार्थ: श्रीराम कहते हैं, “हे हनुमान! तुम्हारे समान उपकार करने वाला कोई देवता, मनुष्य या मुनि नहीं है। तुम्हारे उपकार का बदला मैं किस प्रकार चुका सकता हूँ? तुम्हारे प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए भी मेरा मन पर्याप्त नहीं समझता।”
सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं। देखेउँ करि बिचार मन माहीं॥
पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता। लोचन नीर पुलक अति गाता॥4॥
सरल भावार्थ: श्रीराम कहते हैं, “हे पुत्र! मैंने मन में विचार करके देख लिया है कि मैं तुम्हारे उपकारों से कभी उऋण नहीं हो सकता।” देवताओं के रक्षक श्रीराम बार-बार हनुमानजी को देखते हैं। उनके नेत्रों में प्रेम के आँसू हैं और उनका शरीर भाव-विभोर होकर पुलकित हो रहा है।
सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख गात हरषि हनुमंत।
चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि त्राहि भगवंत॥
सरल भावार्थ: श्रीराम के प्रेमपूर्ण वचन सुनकर और उनका भाव-विभोर स्वरूप देखकर हनुमानजी आनंदित हो गए। प्रेम से व्याकुल होकर वे प्रभु के चरणों में गिर पड़े और विनयपूर्वक पुकारने लगे, “हे भगवान! मेरी रक्षा कीजिए!”
बार बार प्रभु चहइ उठावा। प्रेम मगन तेहि उठब न भावा॥
प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा। सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा॥1॥
सरल भावार्थ: श्रीराम बार-बार हनुमानजी को उठाना चाहते थे, लेकिन वे प्रेम में इतने मग्न थे कि उठना नहीं चाहते थे। प्रभु का कमल के समान कोमल हाथ हनुमानजी के सिर पर था। इस प्रेममयी अवस्था का स्मरण करके भगवान शिव भी भाव-विभोर हो गए।
सावधान मन करि पुनि संकर। लागे कहन कथा अति सुंदर॥
कपि उठाइ प्रभु हृदयँ लगावा। कर गहि परम निकट बैठावा॥2॥
सरल भावार्थ: इसके बाद भगवान शंकर मन को स्थिर करके सुंदर कथा आगे सुनाने लगे। श्रीराम ने हनुमानजी को उठाकर हृदय से लगाया और उनका हाथ पकड़कर अपने बहुत निकट बैठा लिया।
कहु कपि रावन पालित लंका। केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका॥
प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना। बोला बचन बिगत अभिमाना॥3॥
सरल भावार्थ: श्रीराम ने पूछा, “हे हनुमान! रावण की रक्षा में रहने वाली उस अत्यंत दुर्गम लंका को तुमने किस प्रकार जलाया?” प्रभु को प्रसन्न देखकर हनुमानजी ने बिना किसी अभिमान के उत्तर देना शुरू किया।
साखामृग कै बड़ि मनुसाई। साखा तें साखा पर जाई॥
नाघि सिंधु हाटकपुर जारा। निसिचर गन बधि बिपिन उजारा॥4॥
सरल भावार्थ: हनुमानजी विनम्रता से कहते हैं कि वानर की अपनी योग्यता तो बस एक डाल से दूसरी डाल पर छलाँग लगाने तक है। समुद्र लाँघना, सोने की लंका जलाना, राक्षसों का वध करना और वन को उजाड़ देना उनकी व्यक्तिगत शक्ति का कमाल नहीं है।
सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई॥5॥
सरल भावार्थ: हनुमानजी कहते हैं, “हे रघुनाथ! यह सब आपके ही प्रताप से संभव हुआ है। इसमें मेरी अपनी कोई विशेष शक्ति या महानता नहीं है।”
ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकूल।
तव प्रभावँ बड़वानलहि जारि सकइ खलु तूल॥
सरल भावार्थ: श्रीराम कहते हैं कि जिस पर प्रभु की कृपा हो, उसके लिए कुछ भी असंभव नहीं रहता। आपके प्रभाव से तो रूई जैसी तुच्छ वस्तु भी समुद्र के भीतर की प्रचंड अग्नि को जला सकती है। यह असंभव को संभव कर देने वाली प्रभु-कृपा का वर्णन है।
नाथ भगति अति सुखदायनी। देहु कृपा करि अनपायनी॥
सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी। एवमस्तु तब कहेउ भवानी॥1॥
सरल भावार्थ: हनुमानजी प्रार्थना करते हैं, “हे नाथ! कृपा करके मुझे आपकी ऐसी भक्ति दीजिए जो अत्यंत सुख देने वाली और कभी नष्ट न होने वाली हो।” उनकी सरल और निष्कपट प्रार्थना सुनकर श्रीराम ने कहा, “ऐसा ही हो।” भगवान शिव माता पार्वती से कहते हैं कि प्रभु ने हनुमानजी की प्रार्थना स्वीकार कर ली।
उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहि भजनु तजि भाव न आना॥
यह संबाद जासु उर आवा। रघुपति चरन भगति सोइ पावा॥2॥
सरल भावार्थ: भगवान शिव कहते हैं, “हे उमा! जिसने श्रीराम के स्वभाव और महिमा को समझ लिया, उसे भक्ति छोड़कर दूसरी कोई बात अच्छी नहीं लगती। जिसके हृदय में यह संवाद स्थान पा लेता है, वह श्रीरघुनाथ के चरणों की भक्ति प्राप्त करता है।”
सुनि प्रभु बचन कहहिं कपिबृंदा। जय जय जय कृपाल सुखकंदा॥
तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा। कहा चलैं कर करहु बनावा॥3॥
सरल भावार्थ: प्रभु के वचन सुनकर वानर-समूह जयकार करने लगा, “हे कृपालु! हे सुख के मूल! आपकी जय हो।” इसके बाद श्रीराम ने वानरराज सुग्रीव को बुलाया और प्रस्थान की तैयारी करने का आदेश दिया।
अब बिलंबु केहि कारन कीजे। तुरत कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे॥
कौतुक देखि सुमन बहु बरषी। नभ तें भवन चले सुर हरषी॥4॥
सरल भावार्थ: श्रीराम ने कहा, “अब विलंब करने का क्या कारण है? वानरों को तुरंत चलने की आज्ञा दीजिए।” इस अद्भुत दृश्य को देखकर देवताओं ने आकाश से फूल बरसाए और प्रसन्न होकर अपने-अपने लोकों को लौट गए।
कपिपति बेगि बोलाए आए जूथप जूथ।
नाना बरन अतुल बल बानर भालु बरूथ॥
सरल भावार्थ: वानरराज सुग्रीव के शीघ्र बुलाने पर वानर-सेना के अनेक दलों के नायक आ पहुँचे। उन दलों में विभिन्न रंगों वाले और अपार बल से संपन्न वानर तथा भालू सम्मिलित थे।
प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा। गर्जहिं भालु महाबल कीसा॥
देखी राम सकल कपि सेना। चितइ कृपा करि राजिव नैना॥1॥
सरल भावार्थ: सभी वानर और भालू प्रभु के चरणकमलों में सिर झुकाने लगे और महाबली वानर-भालू गर्जना करने लगे। श्रीराम ने पूरी सेना को देखा और अपने कमल जैसे नेत्रों से सब पर कृपापूर्वक दृष्टि डाली।
राम कृपा बल पाइ कपिंदा। भए पच्छजुत मनहुँ गिरिंदा॥
हरषि राम तब कीन्ह पयाना। सगुन भए सुंदर सुभ नाना॥2॥
सरल भावार्थ: श्रीराम की कृपा से बल पाकर श्रेष्ठ वानर ऐसे प्रतीत होने लगे, मानो वे पंखों वाले विशाल पर्वत हों। इसके बाद श्रीराम हर्षपूर्वक यात्रा पर निकले और मार्ग में अनेक सुंदर तथा शुभ शकुन दिखाई दिए।
जासु सकल मंगलमय कीती। तासु पयान सगुन यह नीती॥
प्रभु पयान जाना बैदेहीं। फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं॥3॥
सरल भावार्थ: जिनकी कीर्ति संपूर्ण मंगल से भरी हुई है, उनके प्रस्थान के समय शुभ शकुन होना स्वाभाविक है। श्रीराम के प्रस्थान का समाचार मानो माता सीता के बाएँ अंग के फड़कने से भी मिल गया, जो शुभ संकेत माना जाता है।
जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई। असगुन भयउ रावनहि सोई॥
चला कटकु को बरनै पारा। गर्जहिं बानर भालु अपारा॥4॥
सरल भावार्थ: माता जानकी के लिए जो-जो शुभ शकुन हो रहे थे, वही रावण के लिए अशुभ संकेत बन रहे थे। श्रीराम की विशाल सेना आगे बढ़ चली। उसमें असंख्य वानर और भालू गर्जना कर रहे थे; उसकी विशालता का वर्णन करना कठिन था।
नख आयुध गिरि पादपधारी। चले गगन महि इच्छाचारी॥
केहरिनाद भालु कपि करहीं। डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं॥5॥
सरल भावार्थ: वानर और भालू अपने नाखूनों को ही हथियार मानते थे तथा पर्वत और वृक्ष उठा सकते थे। वे अपनी इच्छानुसार आकाश और पृथ्वी पर विचरण करते हुए आगे बढ़ रहे थे। उनके सिंह जैसी गर्जना करने से दिशाओं के हाथी डगमगाने और चिंघाड़ने लगे।
चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे।
मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किंनर दुख टरे॥
कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं।
जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं॥
सरल भावार्थ: दिशाओं के हाथी चिंघाड़ रहे थे, पृथ्वी डोल रही थी, पर्वत हिल रहे थे और समुद्र में हलचल मची हुई थी। देवता, गंधर्व, मुनि, नाग और किन्नर प्रसन्न थे तथा उनके दुख दूर हो रहे थे। असंख्य पराक्रमी वानर दाँत कटकटाते हुए दौड़ रहे थे और श्रीराम, कोसलपति के प्रबल प्रताप तथा गुणों का जयगान कर रहे थे।
सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोहई।
गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ठ कठोर सो किमि सोहई॥
रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी।
जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी॥
सरल भावार्थ: श्रीराम की सेना का भार इतना विशाल बताया गया है कि शेषनाग उसे सँभालते हुए बार-बार व्याकुल हो रहे हैं। वे बार-बार कच्छप की कठोर पीठ को दाँतों से पकड़ते हैं। कवि इस अद्भुत दृश्य की कल्पना करते हैं, मानो शेषनाग कच्छप की पीठ पर श्रीराम की पवित्र और अटल कीर्ति लिख रहे हों।
एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर।
जहँ तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर॥
सरल भावार्थ: इस प्रकार कृपानिधान श्रीराम समुद्र के तट पर पहुँचे। वहाँ बहुत-से वीर वानर और भालू अलग-अलग स्थानों पर फल खाने लगे।
उहाँ निसाचर रहहिं ससंका। जब तें जारि गयउ कपि लंका॥
निज निज गृहँ सब करहिं बिचारा। नहिं निसिचर कुल केर उबारा॥1॥
सरल भावार्थ: उधर, हनुमानजी के लंका जलाकर चले जाने के बाद राक्षस भय और आशंका में रहने लगे। वे अपने-अपने घरों में यही सोचते थे कि अब राक्षसों के कुल का विनाश होने से कोई नहीं बचा सकता।
जासु दूत बल बरनि न जाई। तेहि आएँ पुर कवन भलाई॥
दूतिन्ह सन सुनि पुरजन बानी। मंदोदरी अधिक अकुलानी॥2॥
सरल भावार्थ: लंकावासी आपस में कहने लगे, “जिसके दूत का बल ही वर्णन से परे है, उसके स्वयं लंका आने पर हमारा क्या हाल होगा?” नगरवासियों की ऐसी बातें सुनकर मंदोदरी बहुत व्याकुल हो गई।
रहसि जोरि कर पति पग लागी। बोली बचन नीति रस पागी॥
कंत करष हरि सन परिहरहू। मोर कहा अति हित हियँ धरहू॥3॥
सरल भावार्थ: मंदोदरी एकांत में हाथ जोड़कर अपने पति रावण के चरणों में गई और नीतिपूर्ण बातें कहने लगी। उसने कहा, “हे स्वामी! श्रीहरि से वैर करना छोड़ दीजिए और मेरी अत्यंत हितकारी सलाह को हृदय में धारण कीजिए।”
समुझत जासु दूत कइ करनी। स्रवहिं गर्भ रजनीचर घरनी॥
तासु नारि निज सचिव बोलाई। पठवहु कंत जो चहहु भलाई॥4॥
सरल भावार्थ: मंदोदरी ने समझाया, “जिसके दूत के पराक्रम का स्मरण करके ही राक्षसों की स्त्रियाँ भय से काँप उठती हैं, उस प्रभु से विरोध करना उचित नहीं है। हे स्वामी! यदि आप अपना कल्याण चाहते हैं, तो अपने मंत्रियों को बुलाकर श्रीराम की पत्नी सीता को सम्मानपूर्वक वापस भेज दीजिए।”
तव कुल कमल बिपिन दुखदाई। सीता सीत निसा सम आई॥
सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें। हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें॥5॥
सरल भावार्थ: मंदोदरी कहती है, “हे नाथ! सीता आपके कुलरूपी कमलवन के लिए शीतकालीन रात के समान दुखदायी सिद्ध हो रही हैं। मेरी बात सुनिए, सीता को लौटाए बिना आपका कल्याण न तो भगवान शंकर कर सकते हैं और न ही ब्रह्माजी।”
राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक।
जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक॥
सरल भावार्थ: मंदोदरी रावण को सावधान करती है कि श्रीराम के बाण सर्पों के समान हैं और राक्षसों का समूह मेंढकों के समान है। इससे पहले कि वे राक्षसों का विनाश कर दें, रावण को अपना हठ छोड़कर सीता को लौटा देना चाहिए।
श्रवन सुनी सठ ता करि बानी। बिहसा जगत बिदित अभिमानी॥
सभय सुभाउ नारि कर साचा। मंगल महुँ भय मन अति काचा॥1॥
सरल भावार्थ: मंदोदरी की बातें सुनकर संसार में प्रसिद्ध अभिमानी रावण हँस पड़ा। वह सोचने लगा कि स्त्रियों का स्वभाव डरना ही है और वे शुभ अवसर पर भी भय के कारण विचलित हो जाती हैं।
जौं आवइ मर्कट कटकाई। जिअहिं बिचारे निसिचर खाई॥
कंपहिं लोकप जाकीं त्रासा। तासु नारि सभीत बड़ि हासा॥2॥
सरल भावार्थ: रावण ने उपहास करते हुए कहा, “यदि वानरों की सेना आ भी गई, तो बेचारे राक्षस उन्हें खाकर जीवित रहेंगे।” वह आगे सोचता है कि जिस रावण के भय से लोकपाल काँपते हैं, उसकी पत्नी का डरना हास्यास्पद है।
अस कहि बिहसि ताहि उर लाई। चलेउ सभाँ ममता अधिकाई॥
मंदोदरी हृदयँ कर चिंता। भयउ कंत पर बिधि बिपरीता॥3॥
सरल भावार्थ: ऐसा कहकर रावण हँसा, मंदोदरी को हृदय से लगाया और फिर सभा की ओर चला गया। मंदोदरी मन ही मन चिंता करने लगी कि उसके पति की बुद्धि पर विधाता का विपरीत प्रभाव पड़ गया है।
बैठेउ सभाँ खबरि असि पाई। सिंधु पार सेना सब आई॥
बूझेसि सचिव उचित मत कहहू। ते सब हँसे मष्ट करि रहहू॥4॥
सरल भावार्थ: सभा में बैठते ही रावण को समाचार मिला कि श्रीराम की पूरी सेना समुद्र पार आ चुकी है। उसने मंत्रियों से उचित सलाह माँगी, लेकिन वे हँसकर उसकी चापलूसी करने लगे और उसे निश्चिंत रहने को कहने लगे।
जितेहु सुरासुर तब श्रम नाहीं। नर बानर केहि लेखे माहीं॥5॥
सरल भावार्थ: मंत्री बोले, “आपने देवताओं और असुरों को जीतते समय कोई कठिनाई नहीं मानी। फिर मनुष्यों और वानरों की गिनती ही क्या है? वे आपके सामने कुछ भी नहीं हैं।”
सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास॥
सरल भावार्थ: मंत्री, वैद्य और गुरु—ये तीनों यदि भय या लालच के कारण केवल मन को अच्छी लगने वाली बातें कहें और सत्य न बताएँ, तो क्रमशः राज्य, शरीर और धर्म का शीघ्र विनाश हो जाता है।
सोइ रावन कहुँ बनी सहाई। अस्तुति करहिं सुनाइ सुनाई॥
अवसर जानि बिभीषनु आवा। भ्राता चरन सीसु तेहिं नावा॥1॥
सरल भावार्थ: रावण के लिए मंत्रियों की चापलूसी ही सहारा बन गई थी। वे बार-बार उसकी प्रशंसा करने लगे। इसी समय उचित अवसर देखकर विभीषण वहाँ आए और उन्होंने अपने बड़े भाई रावण के चरणों में सिर झुकाया।
पुनि सिरु नाइ बैठ निज आसन। बोला बचन पाइ अनुसासन॥
जौ कृपाल पूँछिहु मोहि बाता। मति अनुरूप कहउँ हित ताता॥2॥
सरल भावार्थ: विभीषण ने फिर सिर झुकाया, अपने आसन पर बैठे और बोलने की अनुमति मिलने पर कहा, “हे तात! यदि आप मेरी राय पूछें, तो मैं अपनी बुद्धि के अनुसार आपके हित की बात कहूँगा।”
जो आपन चाहै कल्याना। सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना॥
सो परनारि लिलार गोसाईं। तजउ चउथि के चंद कि नाईं॥3॥
सरल भावार्थ: विभीषण कहते हैं, “हे स्वामी! जो अपना कल्याण, अच्छा यश, सद्बुद्धि, शुभ गति और अनेक प्रकार के सुख चाहता है, उसे पराई स्त्री के प्रति अनुचित दृष्टि और आसक्ति से बचना चाहिए, जैसे चौथ के चंद्रमा को देखने से बचने की लोकमान्यता प्रचलित है।”
चौदह भुवन एक पति होई। भूत द्रोह तिष्टइ नहिं सोई॥
गुन सागर नागर नर जोऊ। अलप लोभ भल कहइ न कोऊ॥4॥
सरल भावार्थ: विभीषण समझाते हैं कि कोई व्यक्ति चौदहों लोकों का स्वामी ही क्यों न हो, यदि वह प्राणियों से वैर रखता है, तो उसका टिके रहना कठिन है। कोई मनुष्य कितना ही गुणवान और चतुर क्यों न हो, थोड़ा-सा लोभ भी उसे दूसरों की दृष्टि में अच्छा नहीं रहने देता।
काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ।
सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत॥
सरल भावार्थ: विभीषण कहते हैं, “हे नाथ! काम, क्रोध, अहंकार और लोभ—ये सभी विनाश की ओर ले जाने वाले मार्ग हैं। इनका त्याग करके श्रीराम का भजन कीजिए, जिनकी संतजन निरंतर उपासना करते हैं।”
तात राम नहिं नर भूपाला। भुवनेस्वर कालहु कर काला॥
ब्रह्म अनामय अज भगवंता। ब्यापक अजित अनादि अनंता॥1॥
सरल भावार्थ: विभीषण कहते हैं, “हे तात! श्रीराम केवल मनुष्य राजा नहीं हैं। वे समस्त लोकों के स्वामी और काल के भी काल हैं। वे विकारों से रहित, अजन्मा, सर्वव्यापक, अजेय, अनादि और अनंत भगवान हैं।”
गो द्विज धेनु देव हितकारी। कृपा सिंधु मानुष तनुधारी॥
जन रंजन भंजन खल ब्राता। बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता॥2॥
सरल भावार्थ: वे गौ, ब्राह्मण और देवताओं के हितकारी तथा करुणा के सागर हैं, जिन्होंने मनुष्य का शरीर धारण किया है। हे भाई! वे अपने भक्तों को आनंद देने वाले, दुष्टों के समूह का नाश करने वाले तथा वेद और धर्म की रक्षा करने वाले हैं।
ताहि बयरु तजि नाइअ माथा। प्रनतारति भंजन रघुनाथा॥
देहु नाथ प्रभु कहुँ बैदेही। भजहु राम बिनु हेतु सनेही॥3॥
सरल भावार्थ: विभीषण कहते हैं, “जो शरण में आए लोगों की पीड़ा दूर करने वाले रघुनाथ हैं, उनसे वैर छोड़कर उनके चरणों में सिर झुकाना चाहिए। हे नाथ! माता सीता को प्रभु श्रीराम को लौटा दीजिए और उन श्रीराम का भजन कीजिए, जो बिना किसी स्वार्थ के अपने भक्तों से प्रेम करते हैं।”
सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा। बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा॥
जासु नाम त्रय ताप नसावन। सोइ प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन॥4॥
सरल भावार्थ: जो व्यक्ति प्रभु की शरण में आ जाता है, वे उसे भी नहीं त्यागते, भले ही उसने संसार से द्रोह करने जैसा बड़ा पाप किया हो। जिनका नाम तीनों प्रकार के तापों का नाश करता है, हे रावण! अपने मन में समझ लो कि वे ही प्रभु श्रीराम इस संसार में प्रकट हुए हैं।
[दोहा 39 (क)]
बार बार पद लागउँ बिनय करउँ दससीस।
परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस॥
सरल भावार्थ: हे दशानन! मैं बार-बार आपके चरणों में प्रणाम करके विनती करता हूँ कि अभिमान, मोह और अहंकार छोड़कर कोसलपति श्रीराम का भजन कीजिए।
[दोहा 39 (ख)]
मुनि पुलस्ति निज सिष्य सन कहि पठई यह बात।
तुरत सो मैं प्रभु सन कही पाइ सुअवसरु तात॥
सरल भावार्थ: हे तात! महर्षि पुलस्त्य ने अपने शिष्य के माध्यम से यह संदेश भेजा था। उचित अवसर मिलते ही मैंने वही बात आपसे कह दी।
माल्यवंत अति सचिव सयाना। तासु बचन सुनि अति सुख माना॥
तात अनुज तव नीति बिभूषन। सो उर धरहु जो कहत बिभीषन॥1॥
सरल भावार्थ: माल्यवान नामक बुद्धिमान मंत्री ने विभीषण की बातें सुनकर प्रसन्नता व्यक्त की। उसने रावण से कहा, “हे तात! आपका छोटा भाई नीति और सद्बुद्धि का आभूषण है। विभीषण जो उचित सलाह दे रहा है, उसे अपने हृदय में धारण कीजिए।”
रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ। दूरि न करहु इहाँ हइ कोऊ॥
माल्यवंत गृह गयउ बहोरी। कहइ बिभीषनु पुनि कर जोरी॥2॥
सरल भावार्थ: रावण ने क्रोधित होकर कहा, “ये दोनों मूर्ख शत्रु की प्रशंसा कर रहे हैं। यहाँ कोई है जो इन्हें मेरे सामने से हटा दे?” इसके बाद माल्यवान अपने घर लौट गया। विभीषण ने फिर हाथ जोड़कर रावण को समझाना शुरू किया।
सुमति कुमति सब कें उर रहहीं। नाथ पुरान निगम अस कहहीं॥
जहाँ सुमति तहँ संपति नाना। जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना॥3॥
सरल भावार्थ: हे नाथ! पुराण और वेद कहते हैं कि सद्बुद्धि और दुर्बुद्धि दोनों ही मनुष्यों के हृदय में रह सकती हैं। जहाँ अच्छी बुद्धि होती है, वहाँ अनेक प्रकार की समृद्धि आती है; जहाँ बुरी बुद्धि होती है, वहाँ अंततः विपत्ति आती है।
तव उर कुमति बसी बिपरीता। हित अनहित मानहु रिपु प्रीता॥
कालराति निसिचर कुल केरी। तेहि सीता पर प्रीति घनेरी॥4॥
सरल भावार्थ: विभीषण कहते हैं, “आपके हृदय में उलटी बुद्धि बस गई है। इसी कारण आप अपने हित को अहित और शत्रु को मित्र समझ रहे हैं। सीता जी को राक्षस-कुल के लिए कालरात्रि के समान समझना चाहिए, फिर भी आप उनसे अत्यधिक आसक्ति रखते हैं।”
[दोहा 40]
तात चरन गहि मागउँ राखहु मोर दुलार।
सीता देहु राम कहुँ अहित न होइ तुम्हार॥
सरल भावार्थ: हे तात! मैं आपके चरण पकड़कर विनती करता हूँ। मेरे प्रति अपने स्नेह का मान रखिए और सीता जी को श्रीराम को लौटा दीजिए, ताकि आपका अहित न हो।
बुध पुरान श्रुति संमत बानी। कही बिभीषन नीति बखानी॥
सुनत दसानन उठा रिसाई। खल तोहि निकट मृत्यु अब आई॥1॥
सरल भावार्थ: विभीषण ने विद्वानों, पुराणों और वेदों की सम्मति के अनुरूप नीति की बात कही। यह सुनते ही रावण क्रोध से उठ खड़ा हुआ और बोला, “अरे दुष्ट! अब तेरी मृत्यु निकट आ गई है।”
जिअसि सदा सठ मोर जिआवा। रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा॥
कहसि न खल अस को जग माहीं। भुज बल जाहि जिता मैं नाहीं॥2॥
सरल भावार्थ: रावण ने कहा, “अरे मूर्ख! तू मेरा आश्रय पाकर जीवित रहता है, फिर भी तुझे शत्रु का पक्ष अच्छा लगता है। अरे दुष्ट! तू यह क्यों नहीं कहता कि संसार में ऐसा कौन है, जिसे मैंने अपने बाहुबल से न हराया हो?”
मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती। सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती॥
अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा। अनुज गहे पद बारहिं बारा॥3॥
सरल भावार्थ: रावण ने कहा, “मेरे नगर में रहकर भी तेरा प्रेम तपस्वियों से है! मूर्ख, जा और उन्हीं को अपनी नीति समझा।” ऐसा कहकर उसने विभीषण को लात मारी। इसके बावजूद विभीषण बार-बार उसके चरण पकड़कर उसे समझाते रहे।
उमा संत कइ इहइ बड़ाई। मंद करत जो करइ भलाई॥
तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा। रामु भजें हित नाथ तुम्हारा॥4॥
सरल भावार्थ: शिवजी कहते हैं, “हे उमा! संत की यही विशेषता है कि जो उसके साथ बुरा करता है, वह भी उसका भला ही चाहता है।” विभीषण ने कहा, “आप मेरे पिता के समान हैं। आपने मुझे मारा, तब भी मैं यही कहता हूँ कि श्रीराम का भजन करने में ही आपका कल्याण है।”
सचिव संग लै नभ पथ गयऊ। सबहि सुनाइ कहत अस भयऊ॥5॥
सरल भावार्थ: इसके बाद विभीषण अपने मंत्रियों के साथ आकाश-मार्ग से चले और सबको सुनाते हुए कहने लगे।
[दोहा 41]
रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि।
मैं रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि॥
सरल भावार्थ: विभीषण ने कहा, “श्रीराम सत्यसंकल्प प्रभु हैं और हे रावण! तुम्हारी सभा काल के वश में है। इसलिए मैं अब श्रीरघुवीर की शरण में जा रहा हूँ। इसके लिए मुझे दोष मत देना।”
अस कहि चला बिभीषनु जबहीं। आयू हीन भए सब तबहीं॥
सरल भावार्थ: विभीषण के ऐसा कहकर चले जाने के साथ ही रावण और उसके पक्ष के लोगों का विनाश निश्चित हो गया; मानो उनकी आयु समाप्त हो गई हो।
साधु अवग्या तुरत भवानी। कर कल्यान अखिल कै हानी॥1॥
सरल भावार्थ: शिवजी कहते हैं, “हे भवानी! संत का अपमान करने से मनुष्य के समस्त कल्याण का तत्काल नाश हो जाता है।”
रावन जबहिं बिभीषन त्यागा। भयउ बिभव बिनु तबहिं अभागा॥
चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं। करत मनोरथ बहु मन माहीं॥2॥
सरल भावार्थ: जिस क्षण रावण ने विभीषण को त्यागा, उसी क्षण से उसका वैभव नष्ट होने लगा और वह अभागा बन गया। दूसरी ओर, विभीषण प्रसन्न होकर मन में अनेक शुभ इच्छाएँ लिए श्रीराम के पास चल पड़े।
देखिहउँ जाइ चरन जलजाता। अरुन मृदुल सेवक सुखदाता॥
जे पद परसि तरी रिषिनारी। दंडक कानन पावनकारी॥3॥
सरल भावार्थ: विभीषण मन में सोचते हैं, “मैं जाकर प्रभु के लालिमा लिए कोमल चरण-कमलों के दर्शन करूँगा, जो अपने सेवकों को सुख देते हैं। उन्हीं चरणों के स्पर्श से ऋषि-पत्नी अहल्या का उद्धार हुआ और उन्हीं से दंडक वन पवित्र हुआ।”
जे पद जनकसुताँ उर लाए। कपट कुरंग संग धर धाए॥
हर उर सर सरोज पद जेई। अहोभाग्य मैं देखिहउँ तेई॥4॥
सरल भावार्थ: विभीषण सोचते हैं, “जिन चरणों को जानकी जी ने अपने हृदय में धारण किया, जिनके स्वामी छल से बने मृग के पीछे दौड़े और जिन चरणों को शिवजी अपने हृदय-रूपी सरोवर में कमल के समान धारण करते हैं, आज मैं उन्हीं का दर्शन करूँगा। यह मेरा महान सौभाग्य है।”
[वे सोचते जाते थे—] मैं जाकर भगवान्‌के कोमल और लाल वर्णके सुन्दर चरणकमलोंके दर्शन करूँगा, जो सेवकोंको सुख देनेवाले हैं, जिन चरणोंका स्पर्श पाकर ऋषिपत्नी अहल्या तर गयीं और जो दण्डकवनको पवित्र करनेवाले हैं॥3॥
सरल भावार्थ: विभीषण प्रेमपूर्वक विचार करते हैं कि वे प्रभु के कोमल, सुंदर चरण-कमलों के दर्शन करेंगे। उन्हीं चरणों के स्पर्श से अहल्या का उद्धार हुआ था और उन्हीं के आगमन से दंडक वन पवित्र हुआ था।
[दोहा 42]
जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरतु रहे मन लाइ।
ते पद आजु बिलोकिहउँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ॥
सरल भावार्थ: विभीषण सोचते हैं, “जिन चरणों की पादुकाओं को भरत जी ने अत्यंत प्रेम से धारण किया और जिनकी सेवा में अपना मन लगाए रखा, आज मैं उन्हीं चरणों को अपनी आँखों से देखने जा रहा हूँ।”
एहि बिधि करत सप्रेम बिचारा। आयउ सपदि सिंधु एहिं पारा॥
कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा। जाना कोउ रिपु दूत बिसेषा॥1॥
सरल भावार्थ: इस प्रकार प्रेमपूर्वक विचार करते हुए विभीषण शीघ्र ही समुद्र के इस पार पहुँच गए। वानरों ने उन्हें आते देखा तो समझा कि शायद कोई विशेष शत्रु-दूत आया है।
ताहि राखि कपीस पहिं आए। समाचार सब ताहि सुनाए॥
कह सुग्रीव सुनहु रघुराई। आवा मिलन दसानन भाई॥2॥
सरल भावार्थ: वानरों ने विभीषण को वहीं रोककर सुग्रीव के पास जाकर सारा समाचार सुनाया। सुग्रीव ने श्रीराम से कहा, “हे रघुनाथ! सुनिए, रावण का भाई आपसे मिलने आया है।”
कह प्रभु सखा बूझिऐ काहा। कहइ कपीस सुनहु नरनाहा॥
जानि न जाइ निसाचर माया। कामरूप केहि कारन आया॥3॥
सरल भावार्थ: श्रीराम ने पूछा, “हे सखा! इस विषय में क्या करना उचित होगा?” सुग्रीव ने कहा, “हे नरश्रेष्ठ! राक्षसों की माया को समझना कठिन है। यह इच्छानुसार रूप धारण कर सकता है। पता नहीं, किस उद्देश्य से आया है।”
भेद हमार लेन सठ आवा। राखिअ बाँधि मोहि अस भावा॥
सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी। मम पन सरनागत भयहारी॥4॥
सरल भावार्थ: सुग्रीव ने कहा, “यह दुष्ट हमारा भेद लेने आया है। मुझे तो इसे बाँधकर रखना उचित लगता है।” श्रीराम ने उत्तर दिया, “हे सखा! तुमने नीति के अनुसार अच्छा विचार किया, लेकिन शरण में आने वालों का भय दूर करना मेरा प्रण है।”
सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना। सरनागत बच्छल भगवाना॥5॥
सरल भावार्थ: प्रभु के वचन सुनकर हनुमान जी प्रसन्न हुए। उन्होंने अनुभव किया कि भगवान अपने शरणागत भक्तों पर अत्यंत स्नेह रखते हैं।
[दोहा 43]
सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि।
ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि॥
सरल भावार्थ: जो लोग अपने अहित की आशंका से शरण में आए व्यक्ति को त्याग देते हैं, वे नीच और पापपूर्ण आचरण वाले हैं। ऐसे लोगों का आचरण स्वयं हानिकारक है।
कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू॥
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥1॥
सरल भावार्थ: श्रीराम कहते हैं, “जिस पर करोड़ों ब्राह्मणों की हत्या जैसा गंभीर पाप भी लगा हो, शरण में आने पर मैं उसे भी नहीं त्यागता। जीव जब भी सच्चे भाव से मेरे सम्मुख आता है, उसके करोड़ों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं।”
पापवंत कर सहज सुभाऊ। भजनु मोर तेहि भाव न काऊ॥
जौं पै दुष्ट हृदय सोइ होई। मोरें सनमुख आव कि सोई॥2॥
सरल भावार्थ: श्रीराम कहते हैं, “पापी का स्वभाव ऐसा होता है कि उसे मेरा भजन अच्छा नहीं लगता। यदि विभीषण वास्तव में दुष्ट हृदय का होता, तो क्या वह मेरी शरण में आने का साहस करता?”
निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा॥
भेद लेन पठवा दससीसा। तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा॥3॥
सरल भावार्थ: श्रीराम कहते हैं, “निर्मल मन वाला व्यक्ति ही मुझे प्राप्त करता है। मुझे कपट, छल और दोषपूर्ण आचरण प्रिय नहीं हैं। हे सुग्रीव! मान लो कि रावण ने इसे भेद लेने के लिए भेजा हो, तब भी हमें इससे भयभीत होने या हानि की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है।”
जग महुँ सखा निसाचर जेते। लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते॥
जौं सभीत आवा सरनाईं। रखिहउँ ताहि प्रान की नाईं॥4॥
सरल भावार्थ: श्रीराम कहते हैं, “हे सखा! संसार में जितने भी राक्षस हैं, लक्ष्मण क्षणभर में उन सबका सामना कर सकते हैं। फिर भी यदि कोई भयभीत होकर मेरी शरण में आए, तो मैं उसकी रक्षा अपने प्राणों के समान करूँगा।”
[दोहा 44]
उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत।
जय कृपाल कहि कपि चले अंगद हनू समेत॥
सरल भावार्थ: कृपा के धाम श्रीराम मुस्कुराकर बोले, “उसे ले आओ। यदि वह मित्र बनकर आया है, तो भी अच्छा है और यदि शत्रु बनकर आया है, तो भी हमें कोई भय नहीं।” “जय कृपालु!” कहते हुए अंगद और हनुमान जी सहित वानर उसे लाने चले।
सादर तेहि आगें करि बानर। चले जहाँ रघुपति करुनाकर॥
दूरिहि ते देखे द्वौ भ्राता। नयनानंद दान के दाता॥1॥
सरल भावार्थ: वानर विभीषण को आदरपूर्वक आगे करके उस स्थान पर ले चले जहाँ करुणामय श्रीराम विराजमान थे। विभीषण ने दूर से ही श्रीराम और लक्ष्मण के दर्शन किए। दोनों भाई नेत्रों को आनंद देने वाले थे।
बहुरि राम छबिधाम बिलोकी। रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी॥
भुज प्रलंब कंजारुन लोचन। स्यामल गात प्रनत भय मोचन॥2॥
सरल भावार्थ: शोभा के धाम श्रीराम को देखकर विभीषण ठिठक गए और पलकें रोके एकटक निहारते रहे। प्रभु की भुजाएँ लंबी थीं, नेत्र कमल के समान अरुण थे, शरीर श्यामल था और वे शरण में आए लोगों का भय दूर करने वाले थे।
सिंघ कंध आयत उर सोहा। आनन अमित मदन मन मोहा॥
नयन नीर पुलकित अति गाता। मन धरि धीर कही मृदु बाता॥3॥
सरल भावार्थ: श्रीराम के सिंह के समान कंधे और विशाल वक्षःस्थल सुशोभित थे। उनका मुख असंख्य कामदेवों के मन को मोहित करने वाला था। प्रभु को देखकर विभीषण की आँखों में आँसू आ गए और शरीर रोमांचित हो उठा। उन्होंने मन को सँभालकर विनम्र वचन कहे।
नाथ दसानन कर मैं भ्राता। निसिचर बंस जनम सुरत्राता॥
सहज पापप्रिय तामस देहा। जथा उलूकहि तम पर नेहा॥4॥
सरल भावार्थ: विभीषण बोले, “हे नाथ! मैं दशानन रावण का भाई हूँ। हे देवताओं के रक्षक! मेरा जन्म राक्षस-कुल में हुआ है। मेरा शरीर तामस स्वभाव का है और मैं पाप की ओर प्रवृत्त रहा हूँ, जैसे उल्लू को अँधेरे से स्वाभाविक लगाव होता है।”
[दोहा 45]
श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर।
त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर॥
सरल भावार्थ: विभीषण बोले, “हे प्रभु! आपके पवित्र यश को सुनकर मैं आपकी शरण में आया हूँ। आप संसार के जन्म-मरण रूपी भय को दूर करने वाले हैं। हे दुखियों के कष्ट हरने वाले और शरणागत को सुख देने वाले रघुवीर! मेरी रक्षा कीजिए।”
अस कहि करत दंडवत देखा। तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा॥
दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा। भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा॥1॥
सरल भावार्थ: विभीषण को दंडवत प्रणाम करते देखकर श्रीराम अत्यंत प्रसन्न होकर तुरंत उठ खड़े हुए। उनके विनम्र और दीन वचन प्रभु को प्रिय लगे। श्रीराम ने अपनी विशाल भुजाओं से उन्हें उठाकर हृदय से लगा लिया।
अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी। बोले बचन भगत भयहारी॥
कहु लंकेस सहित परिवारा। कुसल कुठाहर बास तुम्हारा॥2॥
सरल भावार्थ: श्रीराम ने लक्ष्मण सहित विभीषण को अपने पास बैठाया और भक्तों का भय हरने वाले प्रभु ने पूछा, “हे लंकेश! अपने परिवार सहित बताओ, उस अनुचित और दुष्ट वातावरण में तुम्हारा निवास सकुशल तो है?”
खल मंडली बसहु दिनु राती। सखा धरम निबहइ केहि भाँती॥
मैं जानउँ तुम्हारि सब रीती। अति नय निपुन न भाव अनीती॥3॥
सरल भावार्थ: श्रीराम बोले, “हे सखा! तुम दिन-रात दुष्टों के बीच रहते हो। वहाँ अपने धर्म का पालन किस प्रकार करते हो? मैं तुम्हारे स्वभाव को जानता हूँ। तुम नीति में कुशल हो और तुम्हें अन्याय पसंद नहीं है।”
बरु भल बास नरक कर ताता। दुष्ट संग जनि देइ बिधाता॥
अब पद देखि कुसल रघुराया। जौं तुम्ह कीन्हि जानि जन दाया॥4॥
सरल भावार्थ: श्रीराम कहते हैं, “हे तात! नरक में रहना भी स्वीकार है, लेकिन विधाता किसी को दुष्टों की संगति न दे।” विभीषण ने कहा, “हे रघुनाथ! आपके चरणों के दर्शन से अब मैं सकुशल हो गया हूँ। आपने मुझे अपना सेवक मानकर जो दया की है, उससे मेरा जीवन धन्य हो गया।”
[दोहा 46]
तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम।
जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम॥
सरल भावार्थ: जब तक जीव कामना और शोक के बंधनों को छोड़कर श्रीराम का भजन नहीं करता, तब तक उसे वास्तविक कल्याण और मन की शांति नहीं मिलती; स्वप्न में भी उसका मन पूरी तरह विश्राम नहीं पाता।
तब लगि हृदयँ बसत खल नाना। लोभ मोह मच्छर मद माना॥
जब लगि उर न बसत रघुनाथा। धरें चाप सायक कटि भाथा॥1॥
सरल भावार्थ: जब तक धनुष-बाण धारण करने वाले श्रीरघुनाथ हृदय में नहीं बसते, तब तक वहाँ लोभ, मोह, ईर्ष्या, अहंकार और अभिमान जैसे अनेक दुर्गुण बने रहते हैं।
ममता तरुन तमी अँधिआरी। राग द्वेष उलूक सुखकारी॥
तब लगि बसति जीव मन माहीं। जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं॥2॥
सरल भावार्थ: ममता रूपी घोर अँधेरी रात मन में तब तक बनी रहती है, जब तक प्रभु के प्रताप रूपी सूर्य का उदय नहीं होता। उस अँधेरे में राग और द्वेष रूपी उल्लुओं को ही सुख मिलता है।
अब मैं कुसल मिटे भय भारे। देखि राम पद कमल तुम्हारे॥
तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला। ताहि न ब्याप त्रिबिध भव सूला॥3॥
सरल भावार्थ: विभीषण कहते हैं, “हे प्रभु! आपके चरण-कमलों के दर्शन से अब मैं सकुशल हूँ और मेरे बड़े-बड़े भय मिट गए हैं। जिस पर आपकी कृपा और अनुकूलता होती है, उसे संसार के तीनों प्रकार के ताप नहीं सताते।”
मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ। सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ॥
जासु रूप मुनि ध्यान न आवा। तेहिं प्रभु हरषि हृदयँ मोहि लावा॥4॥
सरल भावार्थ: विभीषण कहते हैं, “मैं राक्षस हूँ और मेरा स्वभाव अत्यंत अधम रहा है। मैंने कभी अच्छे आचरण का पालन नहीं किया। फिर भी जिन प्रभु के स्वरूप का ध्यान करना मुनियों के लिए भी कठिन है, उन्हीं प्रभु ने प्रसन्न होकर मुझे हृदय से लगा लिया।”
[दोहा 47]
अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज।
देखेउँ नयन बिरंचि सिव सेब्य जुगल पद कंज॥
सरल भावार्थ: विभीषण कहते हैं, “श्रीराम की कृपा से मेरा अपार सौभाग्य जाग उठा है। मैंने अपनी आँखों से उन दोनों चरण-कमलों के दर्शन किए हैं, जिनकी सेवा ब्रह्मा और शिवजी भी करते हैं।”
सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ। जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ॥
जौं नर होइ चराचर द्रोही। आवै सभय सरन तकि मोही॥1॥
सरल भावार्थ: श्रीराम कहते हैं, “हे सखा! मेरा स्वभाव सुनो। इसे काकभुशुण्डि, शिवजी और पार्वती जी भी जानते हैं। यदि कोई व्यक्ति समस्त चर-अचर जगत से द्रोह करने वाला भी हो, लेकिन भयभीत होकर मेरी शरण में आ जाए,”
तजि मद मोह कपट छल नाना। करउँ सद्य तेहि साधु समाना॥
जननी जनक बंधु सुत दारा। तनु धनु भवन सुहृद परिवारा॥2॥
सरल भावार्थ: “और अहंकार, मोह तथा अनेक प्रकार के छल-कपट छोड़ दे, तो मैं उसे तुरंत साधु के समान बना देता हूँ। माता, पिता, भाई, पुत्र, पत्नी, शरीर, धन, घर, मित्र और परिवार—”
सब कै ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी॥
समदरसी इच्छा कछु नाहीं। हरष सोक भय नहिं मन माहीं॥3॥
सरल भावार्थ: “इन सभी के प्रति ममता रूपी धागों को समेटकर उनकी एक मजबूत डोरी बनाता है और अपने मन को मेरे चरणों से बाँध देता है। वह सबको समान दृष्टि से देखता है, उसकी कोई निजी इच्छा नहीं रहती और उसके मन में हर्ष, शोक तथा भय का प्रभाव नहीं रहता।”
अस सज्जन मम उर बस कैसें। लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें॥
तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें। धरउँ देह नहिं आन निहोरें॥4॥
सरल भावार्थ: ऐसे सज्जन मेरे हृदय में वैसे ही निवास करते हैं, जैसे लोभी के हृदय में धन बसा रहता है। हे विभीषण! तुम जैसे संत मुझे अत्यंत प्रिय हैं। मैं भक्तों पर कृपा करने के लिए ही शरीर धारण करता हूँ; मुझे किसी अन्य स्वार्थ की आवश्यकता नहीं है।
[दोहा 48]
सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम।
ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम॥
सरल भावार्थ: जो सगुण भगवान की उपासना करते हैं, दूसरों के हित में लगे रहते हैं, नीति का पालन करते हैं, अपने नियमों में दृढ़ रहते हैं और ब्राह्मणों के चरणों के प्रति श्रद्धा रखते हैं, वे मुझे अपने प्राणों के समान प्रिय हैं।
सुनु लंकेस सकल गुन तोरें। तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें॥
राम बचन सुनि बानर जूथा। सकल कहहिं जय कृपा बरूथा॥1॥
सरल भावार्थ: श्रीराम कहते हैं, “हे लंकेश! ये सभी गुण तुममें हैं, इसलिए तुम मुझे अत्यंत प्रिय हो।” प्रभु के वचन सुनकर वानरों का पूरा समूह उनकी जय-जयकार करने लगा।
सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी। नहिं अघात श्रवनामृत जानी॥
पद अंबुज गहि बारहिं बारा। हृदयँ समात न प्रेमु अपारा॥2॥
सरल भावार्थ: प्रभु के वचनों को अमृत के समान सुनकर विभीषण तृप्त ही नहीं होते थे। वे बार-बार श्रीराम के चरण-कमलों को पकड़ते और उनके हृदय में उमड़ता अपार प्रेम समाता नहीं था।
सुनहु देव सचराचर स्वामी। प्रनतपाल उर अंतरजामी॥
उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही॥3॥
सरल भावार्थ: विभीषण बोले, “हे देव! हे समस्त चर-अचर जगत के स्वामी, शरणागतों की रक्षा करने वाले और सबके हृदय की बात जानने वाले प्रभु! पहले मेरे मन में कुछ सांसारिक इच्छाएँ थीं, लेकिन अब वे आपके चरणों के प्रति प्रेम की नदी में बह गई हैं।”
अब कृपाल निज भगति पावनी। देहु सदा सिव मन भावनी॥
एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा। मागा तुरत सिंधु कर नीरा॥4॥
सरल भावार्थ: विभीषण ने प्रार्थना की, “हे कृपालु प्रभु! मुझे अपनी पवित्र भक्ति प्रदान कीजिए, जो शिवजी के मन को भी प्रिय है।” रणभूमि में धीर रहने वाले श्रीराम ने “ऐसा ही हो” कहकर तुरंत समुद्र का जल मँगवाया।
जदपि सखा तव इच्छा नाहीं। मोर दरसु अमोघ जग माहीं॥
अस कहि राम तिलक तेहि सारा। सुमन बृष्टि नभ भई अपारा॥5॥
सरल भावार्थ: श्रीराम बोले, “हे सखा! यद्यपि तुम्हारे मन में राज्य पाने की इच्छा नहीं है, फिर भी संसार में मेरा दर्शन कभी निष्फल नहीं होता।” ऐसा कहकर प्रभु ने विभीषण का राजतिलक किया। आकाश से अपार पुष्पवर्षा होने लगी।
[दोहा 49 (क)]
रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड।
जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेउ राजु अखंड॥
सरल भावार्थ: रावण के क्रोध रूपी अग्नि और उसकी प्रचंड साँस रूपी हवा से संकट में पड़े विभीषण को श्रीराम ने बचा लिया और उन्हें स्थिर, अखंड राज्य प्रदान किया।
[दोहा 49 (ख)]
जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ।
सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्हि रघुनाथ॥
सरल भावार्थ: रावण ने दस सिर अर्पित करके शिवजी से जो संपत्ति प्राप्त की थी, वही संपदा श्रीरघुनाथ ने विभीषण को सहज कृपा से दे दी।
अस प्रभु छाड़ि भजहिं जे आना। ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना॥
निज जन जानि ताहि अपनावा। प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा॥1॥
सरल भावार्थ: शिवजी कहते हैं, “ऐसे कृपालु प्रभु को छोड़कर जो दूसरे की उपासना में लग जाते हैं, वे बिना पूँछ और सींग वाले पशु के समान हैं।” श्रीराम ने विभीषण को अपना सेवक मानकर अपनाया। प्रभु का यह स्वभाव वानरों को बहुत अच्छा लगा।
पुनि सर्बग्य सर्ब उर बासी। सर्बरूप सब रहित उदासी॥
बोले बचन नीति प्रतिपालक। कारन मनुज दनुज कुल घालक॥2॥
सरल भावार्थ: इसके बाद सर्वज्ञ, सबके हृदय में निवास करने वाले, सर्वरूप होते हुए भी सबसे निर्लिप्त प्रभु श्रीराम ने नीति के अनुसार वचन कहे। वे भक्तों के हित के लिए मनुष्य रूप धारण करके दानव-कुल का विनाश करने वाले हैं।
सुनु कपीस लंकापति बीरा। केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा॥
संकुल मकर उरग झष जाती। अति अगाध दुस्तर सब भाँती॥3॥
सरल भावार्थ: श्रीराम ने कहा, “हे वीर वानरराज सुग्रीव और लंकापति विभीषण! सुनो, इस गहरे समुद्र को किस प्रकार पार किया जाए? यह मगरमच्छों, सर्पों और अनेक प्रकार की मछलियों से भरा है तथा अत्यंत अगाध और दुस्तर है।”
कह लंकेस सुनहु रघुनायक। कोटि सिंधु सोषक तव सायक॥
जद्यपि तदपि नीति असि गाई। बिनय करिअ सागर सन जाई॥4॥
सरल भावार्थ: विभीषण ने कहा, “हे रघुनायक! आपका बाण करोड़ों समुद्रों को भी सुखा सकता है। फिर भी नीति यही कहती है कि पहले समुद्र के पास जाकर विनयपूर्वक मार्ग माँगना चाहिए।”
[दोहा 50]
प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि।
बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि॥
सरल भावार्थ: विभीषण बोले, “हे प्रभु! समुद्र आपके पूर्वजों से संबंधित है और आपके कुल के लिए आदरणीय है। वह विचार करके ऐसा उपाय बताएगा, जिससे भालू और वानरों की पूरी सेना सरलता से समुद्र पार कर सके।”
सखा कही तुम्ह नीकि उपाई। करिअ दैव जौं होइ सहाई॥
मंत्र न यह लछिमन मन भावा। राम बचन सुनि अति दुख पावा॥1॥
सरल भावार्थ: श्रीराम बोले, “हे सखा! तुमने अच्छा उपाय बताया है। हम वही करेंगे, यदि दैव भी सहायक हुआ।” लेकिन केवल दैव के सहारे रहने की यह बात लक्ष्मण को अच्छी नहीं लगी और श्रीराम के वचन सुनकर उन्हें दुःख हुआ।
नाथ दैव कर कवन भरोसा। सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा॥
कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा॥2॥
सरल भावार्थ: लक्ष्मण बोले, “हे नाथ! दैव का क्या भरोसा? आप क्रोध करके समुद्र को सुखा दीजिए। दैव का सहारा लेना कायर मन की कमजोरी है। आलसी लोग ही बार-बार दैव का नाम लेकर पुकारते रहते हैं।”
सुनत बिहसि बोले रघुबीरा। ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा॥
अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई। सिंधु समीप गए रघुराई॥3॥
सरल भावार्थ: लक्ष्मण की बात सुनकर श्रीराम मुस्कुराए और बोले, “ऐसा ही करेंगे, तुम धैर्य रखो।” फिर प्रभु ने अपने छोटे भाई को समझाया और समुद्र के किनारे चले गए।
प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरु नाई। बैठे पुनि तट दर्भ डसाई॥
जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए। पाछें रावन दूत पठाए॥4॥
सरल भावार्थ: श्रीराम ने पहले सिर झुकाकर समुद्र को प्रणाम किया और फिर तट पर कुश बिछाकर बैठ गए। जब विभीषण श्रीराम की शरण में आए, तब रावण ने उनके पीछे-पीछे अपने गुप्तचर भेजे थे।
[दोहा 51]
सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह।
प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह॥
सरल भावार्थ: वानरों का छद्म रूप धारण किए हुए उन गुप्तचरों ने श्रीराम की सारी गतिविधियाँ देखीं। शरणागत के प्रति प्रभु का प्रेम देखकर वे मन ही मन उनके गुणों की प्रशंसा करने लगे।
प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ। अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ॥
रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने। सकल बाँधि कपीस पहिं आने॥1॥
सरल भावार्थ: वे खुले रूप से श्रीराम के स्वभाव की प्रशंसा करने लगे और प्रेम में अपना भेद छिपाना भूल गए। तब वानरों ने पहचान लिया कि वे शत्रु के दूत हैं। उन्होंने सबको बाँधकर सुग्रीव के पास पहुँचा दिया।
कह सुग्रीव सुनहु सब बानर। अंग भंग करि पठवहु निसिचर॥
सुनि सुग्रीव बचन कपि धाए। बाँधि कटक चहु पास फिराए॥2॥
सरल भावार्थ: सुग्रीव ने कहा, “हे वानरो! इन राक्षसों को अंग-भंग करके भेज दो।” उनकी आज्ञा सुनकर वानर दौड़े और उन दूतों को बाँधकर सेना के चारों ओर घुमाने लगे।
बहु प्रकार मारन कपि लागे। दीन पुकारत तदपि न त्यागे॥
जो हमार हर नासा काना। तेहि कोसलाधीस कै आना॥3॥
सरल भावार्थ: वानर उन्हें अनेक प्रकार से मारने लगे। वे दीन होकर पुकारते रहे, फिर भी वानरों ने उन्हें नहीं छोड़ा। तब दूत बोले, “जिसने हमारी नाक और कान काटे, उसे कोसलाधीश श्रीराम की शपथ है!”
सुनि लछिमन सब निकट बोलाए। दया लागि हँसि तुरत छोड़ाए॥
रावन कर दीजहु यह पाती। लछिमन बचन बाचु कुलघाती॥4॥
सरल भावार्थ: यह सुनकर लक्ष्मण जी ने उन सबको अपने पास बुलाया। दया आने पर उन्होंने मुस्कुराकर उन्हें तुरंत छुड़वा दिया और कहा, “यह पत्र रावण को दे देना। हे कुल का नाश करने वाले रावण! लक्ष्मण का संदेश पढ़ना।”
[दोहा 52]
कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार।
सीता देइ मिलहु न त आवा कालु तुम्हार॥
सरल भावार्थ: लक्ष्मण ने संदेश दिया, “उस मूर्ख रावण से मेरा यह स्पष्ट संदेश कहना—सीता जी को श्रीराम को लौटा दो और उनसे मिलकर संधि कर लो; अन्यथा तुम्हारा विनाश निकट है।”
तुरत नाइ लछिमन पद माथा। चले दूत बरनत गुन गाथा॥
कहत राम जसु लंकाँ आए। रावन चरन सीस तिन्ह नाए॥1॥
सरल भावार्थ: दूतों ने तुरंत लक्ष्मण के चरणों में सिर झुकाया और श्रीराम के गुणों का वर्णन करते हुए चल पड़े। श्रीराम का यश गाते हुए वे लंका पहुँचे और रावण के चरणों में प्रणाम किया।
बिहसि दसानन पूँछी बाता। कहसि न सुक आपनि कुसलाता॥
पुनि कहु खबरि बिभीषन केरी। जाहि मृत्यु आई अति नेरी॥2॥
सरल भावार्थ: रावण ने हँसकर पूछा, “हे शुक! अपनी कुशल क्यों नहीं बताते? अब उस विभीषण का समाचार सुनाओ, जिसकी मृत्यु बहुत निकट आ गई है।”
करत राज लंका सठ त्यागी। होइहि जव कर कीट अभागी॥
पुनि कहु भालु कीस कटकाई। कठिन काल प्रेरित चलि आई॥3॥
सरल भावार्थ: रावण बोला, “यह मूर्ख राज्य और लंका छोड़कर चला गया। अब इसका हाल जौ के दाने में रहने वाले कीड़े जैसा होगा।” फिर उसने पूछा, “उस भालू-वानरों की सेना का समाचार बताओ, जो मानो विनाश के समय से प्रेरित होकर यहाँ चली आई है।”
जिन्ह कें जीवन कर रखवारा। भयउ मृदुल चित सिंधु बिचारा॥
कहु तपसिन्ह कै बात बहोरी। जिन्ह कें हृदयँ त्रास अति मोरी॥4॥
सरल भावार्थ: रावण व्यंग्य करते हुए बोला, “जिनकी रक्षा करने वाला यह कोमल हृदय वाला समुद्र बन गया है, उन तपस्वियों का हाल भी बताओ, जिनसे मुझे बहुत भय है।”
[दोहा 53]
की भइ भेंट कि फिरि गए श्रवन सुजसु सुनि मोर।
कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर॥
सरल भावार्थ: रावण ने कहा, “क्या तुम्हारी उनसे भेंट हुई, या मेरा यश सुनकर ही लौट आए? तुम शत्रु की सेना के तेज और बल का वर्णन क्यों नहीं करते? तुम्हारा मन बहुत चकित दिखाई देता है।”
नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें। मानहु कहा क्रोध तजि तैसें॥
मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा। जातहिं राम तिलक तेहि सारा॥1॥
सरल भावार्थ: शुक ने कहा, “हे नाथ! आपने कृपा करके जो पूछा है, उसी प्रकार मेरा उत्तर भी क्रोध छोड़कर स्वीकार कीजिए। आपका छोटा भाई विभीषण जब श्रीराम के पास पहुँचा, तो प्रभु ने उसी समय उसका राजतिलक कर दिया।”
रावन दूत हमहि सुनि काना। कपिन्ह बाँधि दीन्हे दुख नाना॥
श्रवन नासिका काटैं लागे। राम सपथ दीन्हें हम त्यागे॥2॥
सरल भावार्थ: शुक बोला, “जैसे ही वानरों ने सुना कि हम रावण के दूत हैं, उन्होंने हमें बाँधकर अनेक कष्ट दिए। वे हमारी नाक और कान काटने लगे, लेकिन श्रीराम की शपथ देने पर उन्होंने हमें छोड़ दिया।”
पूँछिहु नाथ राम कटकाई। बदन कोटि सत बरनि न जाई॥
नाना बरन भालु कपि धारी। बिकटानन बिसाल भयकारी॥3॥
सरल भावार्थ: शुक ने कहा, “हे नाथ! आपने श्रीराम की सेना के बारे में पूछा है। उसका वर्णन करोड़ों मुखों से भी पूरा नहीं किया जा सकता। उसमें अनेक रंगों के भालू और वानर हैं, जिनके विशाल और विकराल रूप भय उत्पन्न करते हैं।”
जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा। सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा॥
अमित नाम भट कठिन कराला। अमित नाग बल बिपुल बिसाला॥4॥
सरल भावार्थ: शुक कहता है, “जिसने लंका जलाई और आपके पुत्र अक्षयकुमार को मारा, उसका बल भी पूरी वानर-सेना की तुलना में कम है। वहाँ असंख्य भयंकर योद्धा हैं, जिनमें अनेक हाथियों के बराबर बल है और जिनके शरीर विशाल हैं।”
[दोहा 54]
द्विबिद मयंद नील नल अंगद गद बिकटासि।
दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवंत बलरासि॥
सरल भावार्थ: शुक वानर-सेना के प्रमुख योद्धाओं के नाम बताता है—द्विविद, मयंद, नील, नल, अंगद, गद, विकटास्य, दधिमुख, केसरी, निशठ, शठ और बल के भंडार जाम्बवान।
ए कपि सब सुग्रीव समाना। इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना॥
राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं। तृन समान त्रैलोकहि गनहीं॥1॥
सरल भावार्थ: ये सभी वानर सुग्रीव के समान बलवान हैं। इनके जैसे करोड़ों योद्धाओं की संख्या कौन गिन सकता है? श्रीराम की कृपा से इन्हें अतुलनीय बल प्राप्त है और ये तीनों लोकों को तिनके के समान समझते हैं।
अस मैं सुना श्रवन दसकंधर। पदुम अठारह जूथप बंदर॥
नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं। जो न तुम्हहि जीतै रन माहीं॥2॥
सरल भावार्थ: शुक कहता है, “हे दशानन! मैंने ऐसा सुना है कि वानरों के सेनापतियों की संख्या अठारह पद्म है। हे नाथ! उस सेना में ऐसा कोई वानर नहीं दिखाई देता जो युद्ध में आपको परास्त न कर सके।” यह शत्रु-दूत द्वारा कही गई प्रशंसात्मक अतिशयोक्ति है।
परम क्रोध मीजहिं सब हाथा। आयसु पै न देहिं रघुनाथा॥
सोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला। पूरहिं न त भरि कुधर बिसाला॥3॥
सरल भावार्थ: शुक कहता है, “वानर अत्यंत क्रोधित होकर हाथ मलते हैं, लेकिन श्रीराम उन्हें अभी आज्ञा नहीं देते। वे कहते हैं कि समुद्र को मछलियों और सर्पों सहित सुखा दें या विशाल पर्वतों से भरकर उसे पाट दें।”
मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा। ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा॥
गर्जहिं तर्जहिं सहज असंका। मानहुँ ग्रसन चहत हहिं लंका॥4॥
सरल भावार्थ: वे कहते हैं कि रावण को कुचलकर धूल में मिला देंगे। वानर इसी प्रकार के वचन बोलते हुए निडर होकर गरजते और ललकारते हैं, मानो पूरी लंका को निगल जाना चाहते हों।
[दोहा 55]
सहज सूर कपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम।
रावन काल कोटि कहुँ जीति सकहिं संग्राम॥
सरल भावार्थ: शुक कहता है, “हे रावण! सभी वानर और भालू स्वभाव से ही वीर हैं और उनके ऊपर स्वयं प्रभु श्रीराम हैं। वे युद्ध में करोड़ों कालों को भी पराजित कर सकते हैं।”
राम तेज बल बुधि बिपुलाई। सेष सहस सत सकहिं न गाई॥
सक सर एक सोषि सत सागर। तव भ्रातहि पूँछेउ नय नागर॥1॥
सरल भावार्थ: शुक कहता है, “श्रीराम के तेज, बल और बुद्धि की विशालता का वर्णन हजारों शेषनाग भी नहीं कर सकते। वे एक ही बाण से सौ समुद्र सुखाने में समर्थ हैं, फिर भी नीति का पालन करते हुए उन्होंने आपके भाई विभीषण से समुद्र पार करने का उपाय पूछा।”
तासु बचन सुनि सागर पाहीं। मागत पंथ कृपा मन माहीं॥
सुनत बचन बिहसा दससीसा। जौं असि मति सहाय कृत कीसा॥2॥
सरल भावार्थ: शुक बताता है कि विभीषण की सलाह सुनकर श्रीराम मन में कृपा रखते हुए समुद्र से मार्ग माँग रहे हैं। यह सुनकर रावण हँस पड़ा और बोला, “यदि ऐसी ही बुद्धि है, तभी तो उन्होंने वानरों को अपना सहायक बनाया है!”
सहज भीरु कर बचन दूढ़ाई। सागर सन ठानी मचलाई॥
मूढ़ मृषा का करसि बड़ाई। रिपु बल बुद्धि थाह मैं पाई॥3॥
सरल भावार्थ: रावण कहता है, “स्वभाव से डरपोक विभीषण की बात को सच मानकर श्रीराम समुद्र के सामने बालहठ कर रहे हैं। अरे मूर्ख! शत्रु की झूठी प्रशंसा क्यों करता है? मैं उसके बल और बुद्धि की वास्तविकता जान चुका हूँ।”
सचिव सभीत बिभीषन जाकें। बिजय बिभूति कहाँ जग ताकें॥
सुनि खल बचन दूत रिस बाढ़ी। समय बिचारि पत्रिका काढ़ी॥4॥
सरल भावार्थ: रावण कहता है, “जिसका मंत्री विभीषण जैसा भयभीत हो, उसे संसार में विजय और वैभव कैसे मिल सकता है?” दुष्ट रावण की बातें सुनकर शुक का क्रोध बढ़ गया। उचित अवसर देखकर उसने लक्ष्मण द्वारा दिया गया पत्र निकाल लिया।
रामानुज दीन्ही यह पाती। नाथ बचाइ जुड़ावहु छाती॥
बिहसि बाम कर लीन्ही रावन। सचिव बोलि सठ लाग बचावन॥5॥
सरल भावार्थ: शुक ने कहा, “हे नाथ! यह पत्र श्रीराम के छोटे भाई लक्ष्मण ने दिया है। इसे पढ़वा लीजिए, इससे आपकी छाती को ठंडक मिल जाएगी।” रावण ने हँसते हुए बाएँ हाथ से पत्र लिया और मंत्री को बुलाकर उसे पढ़ने के लिए कहा।
[दोहा 56 (क)]
बातन्ह मनहि रिझाइ सठ जनि घालसि कुल खीस।
राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज ईस॥
सरल भावार्थ: पत्र में लिखा था, “अरे मूर्ख! मीठी बातों से अपने मन को बहलाकर अपने कुल का नाश मत कर। श्रीराम से शत्रुता करके तू विष्णु, ब्रह्मा या शिवजी की शरण में जाकर भी नहीं बच सकेगा।”
[दोहा 56 (ख)]
की तजि मान अनुज इव प्रभु पद पंकज भृंग।
होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतंग॥
सरल भावार्थ: पत्र में आगे लिखा था, “या तो अभिमान छोड़कर अपने छोटे भाई विभीषण की तरह प्रभु के चरण-कमलों का भ्रमर बन जा, या फिर हे दुष्ट! अपने कुल सहित श्रीराम के बाण रूपी अग्नि में जलने वाले पतंगे बन जा।”
सुनत सभय मन मुख मुसुकाई। कहत दसानन सबहि सुनाई॥
भूमि परा कर गहत अकासा। लघु तापस कर बाग बिलासा॥1॥
सरल भावार्थ: पत्र सुनकर रावण के मन में भय उत्पन्न हुआ, लेकिन वह चेहरे पर मुस्कान लाकर सबको सुनाने लगा, “धरती पर पड़ा हुआ कोई व्यक्ति हाथ से आकाश पकड़ना चाहता है! यह किसी छोटे तपस्वी की वाणी का दिखावा मात्र है।”
कह सुक नाथ सत्य सब बानी। समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी॥
सुनहु बचन मम परिहरि क्रोधा। नाथ राम सन तजहु बिरोधा॥2॥
सरल भावार्थ: शुक ने कहा, “हे नाथ! इस पत्र में कही गई सभी बातें सत्य हैं। अपने अभिमानी स्वभाव को छोड़कर इन्हें समझिए। मेरा वचन सुनिए और क्रोध त्यागकर श्रीराम से शत्रुता छोड़ दीजिए।”
अति कोमल रघुबीर सुभाऊ। जद्यपि अखिल लोक कर राऊ॥
मिलत कृपा तुम्ह पर प्रभु करिही। उर अपराध न एकउ धरिही॥3॥
सरल भावार्थ: शुक कहता है, “यद्यपि श्रीरघुवीर समस्त लोकों के स्वामी हैं, फिर भी उनका स्वभाव अत्यंत कोमल और दयालु है। आप उनसे मिलेंगे, तो वे आप पर कृपा करेंगे और आपके किसी अपराध को मन में नहीं रखेंगे।”
जनकसुता रघुनाथहि दीजे। एतना कहा मोर प्रभु कीजे॥
जब तेहिं कहा देन बैदेही। चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही॥4॥
सरल भावार्थ: शुक ने विनती की, “जानकी जी को श्रीरघुनाथ को लौटा दीजिए। हे प्रभु! मेरी बस इतनी-सी बात मान लीजिए।” जब शुक ने सीता जी को लौटाने की सलाह दी, तो क्रोधित रावण ने उसे लात मार दी।
नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ। कृपासिंधु रघुनायक जहाँ॥
करि प्रनामु निज कथा सुनाई। राम कृपाँ आपनि गति पाई॥5॥
सरल भावार्थ: शुक रावण के चरणों में सिर झुकाकर वहाँ चला गया, जहाँ कृपासागर श्रीराम विराजमान थे। उसने प्रभु को प्रणाम करके अपनी पूरी कथा सुनाई। श्रीराम की कृपा से उसे अपना वास्तविक स्वरूप और पूर्व स्थिति प्राप्त हुई।
रिषि अगस्ति कीं साप भवानी। राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी॥
बंदि राम पद बारहिं बारा। मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा॥6॥
सरल भावार्थ: शिवजी कहते हैं, “हे भवानी! अगस्त्य ऋषि के शाप से वह ज्ञानी मुनि राक्षस बन गया था। श्रीराम के चरणों की बार-बार वंदना करके वह मुनि अपने आश्रम की ओर चला गया।”
[दोहा 57]
बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति।
बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति॥
सरल भावार्थ: तीन दिन बीत गए, लेकिन जड़ समुद्र ने श्रीराम की विनती स्वीकार नहीं की। तब श्रीराम क्रोधित होकर बोले, “कभी-कभी भय उत्पन्न किए बिना प्रीति और विनय का महत्व समझ में नहीं आता।”
लछिमन बान सरासन आनू। सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू॥
सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती। सहज कृपन सन सुंदर नीती॥1॥
सरल भावार्थ: श्रीराम बोले, “हे लक्ष्मण! धनुष-बाण लाओ। मैं अग्नि के समान बाण से समुद्र को सुखा दूँगा। मूर्ख से विनय करना, कपटी से प्रेम करना और स्वभाव से कंजूस व्यक्ति को उदार नीति समझाना व्यर्थ है।”
ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी॥
क्रोधिहि सम कामिहि हरिकथा। ऊसर बीज बएँ फल जथा॥2॥
सरल भावार्थ: “ममता में डूबे व्यक्ति को ज्ञान की बात सुनाना, अत्यंत लोभी को वैराग्य समझाना, क्रोधी को शांति की शिक्षा देना और कामासक्त व्यक्ति को हरिकथा सुनाना वैसा ही है, जैसे ऊसर भूमि में बीज बोने पर फल की आशा करना।”
अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा। यह मत लछिमन के मन भावा॥
संधानेउ प्रभु बिसिख कराला। उठी उदधि उर अंतर ज्वाला॥3॥
सरल भावार्थ: ऐसा कहकर श्रीराम ने धनुष पर बाण चढ़ाया। यह निर्णय लक्ष्मण को अच्छा लगा। प्रभु ने भयंकर बाण का संधान किया, जिससे समुद्र के भीतर ज्वाला उठने लगी।
मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने॥
कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयउ तजि माना॥4॥
सरल भावार्थ: मगरमच्छ, सर्प और मछलियाँ व्याकुल हो उठीं। समुद्र ने जब अपने भीतर के जीवों को जलते देखा, तब उसने अभिमान छोड़ दिया और सोने के थाल में अनेक मणियाँ लेकर ब्राह्मण का रूप धारण करके श्रीराम के सामने उपस्थित हुआ।
[दोहा 58]
काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच।
बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच॥
सरल भावार्थ: शिवजी कहते हैं, “हे गरुड़! सुनो, केले के पेड़ को काटने पर ही फल प्राप्त होता है, चाहे उसे कितने ही प्रयत्न से सींचा जाए। इसी प्रकार कुछ नीच स्वभाव वाले लोग विनय से नहीं, बल्कि कठोरता दिखाने पर ही बात मानते हैं।”
सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे। छमहु नाथ सब अवगुन मेरे॥
गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी॥1॥
सरल भावार्थ: भयभीत समुद्र ने श्रीराम के चरण पकड़कर कहा, “हे नाथ! मेरे सभी दोष क्षमा कीजिए। आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी—इन पंचमहाभूतों का स्वभाव जड़ है; ये अपनी प्रकृति के अनुसार ही कार्य करते हैं।”
तव प्रेरित मायाँ उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए॥
प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई। सो तेहि भाँति रहें सुख लहई॥2॥
सरल भावार्थ: समुद्र कहता है, “हे प्रभु! आपकी प्रेरणा से माया ने सृष्टि के कार्य के लिए इन तत्त्वों को उत्पन्न किया है—ऐसा सभी ग्रंथों में कहा गया है। आपकी व्यवस्था के अनुसार जिसे जिस प्रकार रहना है, वह उसी प्रकार रहकर अपना कार्य करता है।”
प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्ही। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही॥
ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥3॥
सरल भावार्थ: समुद्र कहता है, “प्रभु ने मुझे शिक्षा देकर अच्छा किया और आपने ही सृष्टि की मर्यादाएँ निर्धारित की हैं।” इसके बाद दी गई पंक्ति में तत्कालीन सामाजिक और अनुशासन-संबंधी धारणाओं का उल्लेख है। यहाँ ‘ताड़ना’ शब्द के अर्थ को लेकर अलग-अलग व्याख्याएँ की जाती हैं; इसे बिना संदर्भ के किसी वर्ग या स्त्री के प्रति हिंसा का सार्वभौमिक आदेश मानना उचित नहीं है।
प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई। उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई॥
प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई। करौं सो बेगि जो तुम्हहि सोहाई॥4॥
सरल भावार्थ: समुद्र कहता है, “यदि मैं प्रभु के प्रताप से सूख जाऊँ और सेना पार उतर जाए, तो इसमें मेरी कोई बड़ाई नहीं होगी। वेदों ने प्रभु की आज्ञा को अटल बताया है। इसलिए हे प्रभु! जो उपाय आपको उचित लगे, मैं शीघ्र वही करूँगा।”
[दोहा 59]
सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ।
जेहि बिधि उतरै कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ॥
सरल भावार्थ: समुद्र के विनम्र वचन सुनकर कृपालु श्रीराम मुस्कुराए और बोले, “हे तात! ऐसा उपाय बताओ, जिससे वानरों की सेना समुद्र पार कर सके।”
नाथ नील नल कपि द्वौ भाई। लरिकाईं रिषि आसिष पाई॥
तिन्ह कें परस किएँ गिरि भारे। तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे॥1॥
सरल भावार्थ: समुद्र ने कहा, “हे नाथ! नील और नल नाम के दोनों वानर भाइयों को बचपन में ऋषि का आशीर्वाद मिला था। उनके स्पर्श से भारी पर्वत भी आपके प्रताप से समुद्र पर तैर सकेंगे।”
मैं पुनि उर धरि प्रभु प्रभुताई। करिहउँ बल अनुमान सहाई॥
एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ। जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ॥2॥
सरल भावार्थ: समुद्र कहता है, “मैं भी आपकी प्रभुता को हृदय में रखकर अपनी सामर्थ्य के अनुसार सहायता करूँगा। हे नाथ! इसी प्रकार समुद्र पर सेतु बनवाइए, जिससे यह महान यश तीनों लोकों में गाया जाए।”
एहिं सर मम उत्तर तट बासी। हतहु नाथ खल नर अघ रासी॥
सुनि कृपाल सागर मन पीरा। तुरतहिं हरी राम रनधीरा॥3॥
सरल भावार्थ: समुद्र ने कहा, “हे नाथ! मेरे उत्तरी तट पर रहने वाले दुष्ट और पापी मनुष्यों को इस बाण से दंड दीजिए।” समुद्र की पीड़ा और विनती सुनकर कृपालु रणधीर श्रीराम ने तुरंत उसकी प्रार्थना स्वीकार की।
देखि राम बल पौरुष भारी। हरषि पयोनिधि भयउ सुखारी॥
सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा। चरन बंदि पाथोधि सिधावा॥4॥
सरल भावार्थ: श्रीराम का महान बल और पराक्रम देखकर समुद्र प्रसन्न हो गया और उसे संतोष मिला। उसने सारी बात प्रभु को बताई, उनके चरणों की वंदना की और फिर अपने स्थान को लौट गया।
[छन्द]
निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ।
यह चरित कलि मलहर जथामति दास तुलसी गायऊ॥
सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना।
तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना॥
सरल भावार्थ: समुद्र अपने स्थान पर लौट गया और श्रीरघुपति को उसका यह उपाय उचित लगा। तुलसीदास जी कहते हैं कि उन्होंने अपनी बुद्धि के अनुसार इस कलियुग के पापों को दूर करने वाले चरित्र का वर्णन किया है। हे मूर्ख मन! सभी आशाओं और सांसारिक भरोसों को छोड़कर सुख के धाम, संदेह मिटाने वाले और दुःख का नाश करने वाले श्रीराम के गुणों को निरंतर गा और सुन।
[दोहा 60]
सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।
सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान॥
सरल भावार्थ: भगवान श्रीराम के गुणों का गान सभी प्रकार के मंगल और कल्याण देने वाला है। जो लोग श्रद्धा और आदर के साथ उनकी महिमा सुनते हैं, वे बिना नौका के ही संसार रूपी भवसागर को पार कर जाते हैं।
मासपारायण, चौबीसवाँ विश्राम
इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने पञ्चमः सोपानः समाप्तः।
सरल भावार्थ: इस प्रकार श्रीरामचरितमानस के कलियुग के समस्त पापों का नाश करने वाले पाँचवें सोपान, अर्थात् सुंदरकाण्ड, का समापन होता है।

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सुंदरकांड पढ़ने के लाभ

सुंदरकांड में हनुमान जी की भक्ति, साहस, बुद्धिमत्ता और प्रभु श्रीराम के प्रति अटूट समर्पण का वर्णन मिलता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, श्रद्धापूर्वक सुंदरकांड का पाठ करने से भक्तों को मानसिक शांति और कठिन परिस्थितियों का सामना करने की प्रेरणा मिलती है।

सुंदरकांड पाठ से मिलने वाली प्रमुख प्रेरणाएँ इस प्रकार हैं:

  • मन को शांति: श्रद्धापूर्वक पाठ करने से मन को एकाग्र करने और तनाव के समय धैर्य बनाए रखने में सहायता मिल सकती है।
  • भय का सामना करने का साहस: हनुमान जी की लंका यात्रा और उनके पराक्रम से विपरीत परिस्थितियों में हिम्मत बनाए रखने की प्रेरणा मिलती है।
  • आत्मविश्वास में वृद्धि: सुंदरकांड हमें अपनी क्षमता पर विश्वास रखने और कठिनाइयों से हार न मानने का संदेश देता है।
  • भक्ति और सकारात्मक सोच: श्रीराम के प्रति हनुमान जी की निष्ठा भक्तों को विश्वास, सेवा और समर्पण का महत्व समझाती है।
  • संकट में धैर्य: सुंदरकांड के प्रसंग कठिन समय में विवेक और साहस से काम लेने की प्रेरणा देते हैं।
  • पारिवारिक पूजा का अवसर: घर में परिवार के साथ सुंदरकांड का पाठ करने से भक्ति और आध्यात्मिक चिंतन के लिए समय निकालने का अवसर मिलता है।

सुंदरकांड का पाठ कब करना चाहिए?

सुंदरकांड का पाठ श्रद्धा और सुविधानुसार किसी भी दिन किया जा सकता है। मंगलवार और शनिवार को हनुमान जी की पूजा के साथ सुंदरकांड पढ़ने की विशेष लोकमान्यता है।

  • मंगलवार और शनिवार: इन दिनों अनेक श्रद्धालु हनुमान जी की पूजा के साथ सुंदरकांड का पाठ करते हैं।
  • सुबह या शाम: शांत समय चुनें, जब आप बिना जल्दबाजी के पाठ कर सकें।
  • विशेष कार्य से पहले: किसी महत्वपूर्ण कार्य के समय मन को स्थिर करने और साहस की प्रेरणा पाने के लिए पाठ कर सकते हैं।
  • कठिन समय में: चिंता या परेशानी के समय सुंदरकांड का पाठ भक्ति, धैर्य और आशा का सहारा बन सकता है।

पाठ के लिए कोई एक समय सभी के लिए अनिवार्य नहीं है। अपनी दिनचर्या और श्रद्धा के अनुसार समय चुनना उचित है।

सुंदरकांड पढ़ने की सही विधि और ध्यान रखने योग्य बातें

सुंदरकांड का पाठ करते समय सबसे महत्वपूर्ण है श्रद्धा, एकाग्रता और पाठ के शब्दों को सही ढंग से पढ़ने का प्रयास। सामान्य रूप से इन बातों का ध्यान रखा जा सकता है:

  • पाठ से पहले स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें, यदि परिस्थितियाँ इसकी अनुमति दें।
  • शांत और स्वच्छ स्थान पर बैठकर श्रीराम और हनुमान जी का स्मरण करें।
  • चौपाइयों और दोहों को जल्दबाजी में पढ़ने के बजाय ध्यानपूर्वक पढ़ें।
  • अर्थ सहित पाठ कर रहे हों, तो प्रसंग और चौपाइयों के भाव को समझने का प्रयास करें।
  • बीच में रुकना पड़े, तो घबराएँ नहीं; सुविधा होने पर श्रद्धापूर्वक पाठ आगे बढ़ाएँ।
  • पाठ के लिए कोई विशेष नियम अपनाते हों, तो अपनी परंपरा या योग्य धार्मिक मार्गदर्शक की सलाह के अनुसार चलें।

क्या सुंदरकांड पढ़ने के लिए कठोर नियम अनिवार्य हैं?

सुंदरकांड के सामान्य पाठ के लिए हर व्यक्ति पर एक जैसे कठोर नियम लागू मानना उचित नहीं है। स्वच्छता, श्रद्धा और एकाग्रता अच्छी आदतें हैं, लेकिन किसी कारण से निर्धारित समय पर पाठ न हो पाए या बीच में रुकना पड़े, तो इसे लेकर अनावश्यक भय न रखें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

प्रश्न 1. क्या सुंदरकांड रोज पढ़ सकते हैं?

हाँ, श्रद्धालु अपनी सुविधा और समय के अनुसार सुंदरकांड का प्रतिदिन पाठ कर सकते हैं। नियमित पाठ के लिए ऐसा समय चुनें जिसे आप सहजता से बनाए रख सकें।

प्रश्न 2. क्या सुंदरकांड पढ़ने से डर दूर होता है?

सुंदरकांड में हनुमान जी के साहस, बुद्धिमत्ता और भक्ति के प्रसंग मिलते हैं। इनका पाठ भय का सामना करने, धैर्य रखने और आत्मविश्वास बढ़ाने की प्रेरणा दे सकता है।

प्रश्न 3. क्या महिलाएँ सुंदरकांड का पाठ कर सकती हैं?

हाँ, सामान्य भक्ति-पाठ के रूप में महिलाएँ सुंदरकांड पढ़ सकती हैं। यदि किसी विशेष पारिवारिक या संप्रदायगत परंपरा में अलग नियम हों, तो उनका संदर्भ अलग हो सकता है।

प्रश्न 4. क्या घर में सुंदरकांड का पाठ कर सकते हैं?

हाँ, घर में स्वच्छ और शांत स्थान पर सुंदरकांड का पाठ किया जा सकता है। इसके लिए मंदिर जाना अनिवार्य नहीं है।

प्रश्न 5. सुंदरकांड पढ़ने में कितना समय लगता है?

संपूर्ण सुंदरकांड का पाठ करने में सामान्यतः लगभग 1 से 2 घंटे लग सकते हैं। वास्तविक समय पाठ की गति, विराम और अर्थ पढ़ने पर निर्भर करता है।

प्रश्न 6. सुंदरकांड पढ़ने का सबसे अच्छा दिन कौन-सा है?

मंगलवार और शनिवार को सुंदरकांड पढ़ने की विशेष लोकमान्यता है, लेकिन श्रद्धालु अपनी सुविधा के अनुसार अन्य दिनों में भी इसका पाठ कर सकते हैं।

प्रश्न 7. क्या महिलाएँ सुंदरकांड का पाठ रोज कर सकती हैं?

हाँ, महिलाएँ अपनी सुविधा, श्रद्धा और दिनचर्या के अनुसार प्रतिदिन सुंदरकांड का पाठ कर सकती हैं।

निष्कर्ष

सुंदरकांड केवल श्रीरामचरितमानस का एक महत्वपूर्ण कांड नहीं, बल्कि भक्ति, साहस, धैर्य और समर्पण की प्रेरणा देने वाला प्रसंग भी है। हनुमान जी की लंका यात्रा और माता सीता की खोज हमें सिखाती है कि कठिन परिस्थितियों में भी विवेक, विश्वास और निरंतर प्रयास का साथ नहीं छोड़ना चाहिए। श्रद्धापूर्वक सुंदरकांड का पाठ करें, उसके भाव को समझें और उसके संदेशों को अपने जीवन में अपनाने का प्रयास करें।

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