
रावण वध कथा हिंदू धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में आती है। यह कथा मुख्य रूप से...
सनातन धर्म में कहा गया है कि मनुष्य के जीवन का सबसे बड़ा धन “संतोष” है। धन, वैभव, पद और प्रतिष्ठा तो समय के साथ आते-जाते रहते हैं, परंतु जो व्यक्ति संतोष का मार्ग अपनाता है, उसके जीवन में शांति और सुख स्थायी हो जाते हैं। इसी दिव्य सत्य को समझाने के लिए संतोष की अधिष्ठात्री देवी — संतोषी माता — की पूजा का विधान प्राचीन लोकपरंपराओं में बताया गया है।
शुक्रवार का दिन माता की आराधना के लिए विशेष रूप से शुभ माना गया है। इस दिन किया गया व्रत केवल इच्छापूर्ति का साधन नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर धैर्य, विश्वास और संतोष की भावना जगाने का एक आध्यात्मिक मार्ग है। कहा जाता है कि जो भक्त सच्चे मन से माता का व्रत करता है, उसके जीवन के कष्ट धीरे-धीरे समाप्त हो जाते हैं।
यह पावन कथा एक ऐसी धर्मपरायण स्त्री की है, जिसने अत्यंत कठिन परिस्थितियों में भी अपनी आस्था नहीं छोड़ी। उसने संतोषी माता के व्रत के माध्यम से न केवल अपने जीवन को बदला, बल्कि यह भी सिद्ध किया कि सच्ची श्रद्धा से किया गया व्रत कभी निष्फल नहीं जाता।
प्राचीन समय की बात है। एक नगर में एक वृद्धा अपने सात पुत्रों के साथ रहती थी। छह पुत्र संपन्न और परिश्रमी थे, जबकि सबसे छोटा पुत्र सरल और निष्कपट स्वभाव का था। वह दुनियादारी में कुशल नहीं था, इसलिए परिवार के अन्य सदस्य उसे महत्व नहीं देते थे।
समय बीतने पर छहों पुत्रों का विवाह हो गया और वे अपने-अपने परिवारों के साथ सुखपूर्वक रहने लगे। सबसे छोटे पुत्र का भी विवाह हुआ, परंतु उसकी पत्नी अत्यंत साधारण और निर्धन परिवार से थी। घर में उसका सम्मान नहीं था। उसे प्रायः तिरस्कार और उपेक्षा का सामना करना पड़ता था।
वह सुबह से रात तक घर के कार्य करती, फिर भी उसे भरपेट भोजन नहीं मिलता। कई बार तो उसे बचा-खुचा अन्न ही मिलता। फिर भी वह अपने मन में किसी के प्रति दुर्भावना नहीं रखती थी। उसका विश्वास था कि एक दिन ईश्वर उसकी पुकार अवश्य सुनेंगे।
सबसे छोटा पुत्र अपनी पत्नी की स्थिति देखकर दुखी रहने लगा। वह समझ गया कि जब तक वह स्वयं कुछ कमाने योग्य नहीं बनेगा, तब तक उसकी पत्नी का सम्मान नहीं बढ़ेगा।
एक दिन उसने अपनी पत्नी से कहा —
“मैं परदेश जा रहा हूँ। वहां श्रम करूँगा, कुछ कमाऊँगा और लौटकर तुम्हारे सारे दुख दूर करूँगा।”
पत्नी ने आंसुओं से भरी आंखों से उसे विदा किया और मन-ही-मन ईश्वर से उसकी रक्षा की प्रार्थना करती रही।
समय बीतता गया। महीनों तक पति का कोई समाचार नहीं आया। घर में उसकी स्थिति और भी दयनीय हो गई। उसे अधिक काम करना पड़ता और ताने भी सहने पड़ते। लेकिन वह हर परिस्थिति में धैर्य बनाए रखती और मन ही मन ईश्वर का स्मरण करती।
एक दिन वह लकड़ी लेने जंगल की ओर जा रही थी। रास्ते में उसने देखा कि कुछ स्त्रियां अत्यंत श्रद्धा से पूजा कर रही थीं। वे गुड़ और चने का भोग लगाकर किसी देवी की कथा सुन रही थीं।
उसने विनम्रता से पूछा —
“बहनों, आप किस देवी की पूजा कर रही हैं?”
स्त्रियों ने बताया —
“हम संतोषी माता का व्रत कर रही हैं। यह व्रत शुक्रवार को किया जाता है। जो भी स्त्री श्रद्धा और नियम से यह व्रत करती है, उसके जीवन के दुख दूर होते हैं और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।”
यह सुनते ही उसके हृदय में आशा का दीप जल उठा। उसने उसी क्षण निश्चय किया कि वह भी माता का व्रत करेगी।
अगले शुक्रवार से उसने व्रत प्रारंभ किया। वह प्रातः स्नान कर श्रद्धा से माता का स्मरण करती, गुड़-चना का भोग लगाती और कथा सुनती।
उसकी प्रार्थना सरल थी —
“माता, मुझे धन नहीं चाहिए। बस मेरे जीवन के दुख दूर कर दो और मेरे पति को सुरक्षित लौटा दो।”
वह अत्यंत संतोष के साथ व्रत करती रही। धीरे-धीरे उसके मन में शांति बढ़ने लगी।
उधर परदेश में उसका पति एक व्यापारी के यहां कार्य करने लगा था। उसकी ईमानदारी और परिश्रम से व्यापारी अत्यंत प्रसन्न था।
एक रात व्यापारी को स्वप्न में देवी का संकेत मिला कि उसके यहां कार्य करने वाला युवक एक सच्ची भक्त का पति है। उसे सम्मान देकर घर भेजा जाए।
अगली सुबह व्यापारी ने उसे बुलाकर भरपूर धन दिया और कहा —
“तुम्हारी निष्ठा ने मुझे प्रसन्न किया है। अब अपने घर जाओ और सुखपूर्वक जीवन बिताओ।”
जब वह घर लौटा तो उसकी पत्नी का हर्ष शब्दों में व्यक्त नहीं हो सकता था। उसने माता को धन्यवाद दिया और व्रत के उद्यापन का निश्चय किया।
उद्यापन के समय उसने बच्चों को भोजन के लिए बुलाया, परंतु कुछ लोगों ने उन्हें खट्टा भोजन मांगने के लिए उकसाया। नियम न जानने के कारण उसने भूलवश उन्हें खट्टा पदार्थ दे दिया।
इससे व्रत भंग हुआ और कुछ समय के लिए फिर संकट आया। तब उसने समझा कि व्रत में नियमों का पालन कितना आवश्यक है।
उसने पुनः पूर्ण श्रद्धा से व्रत किया और क्षमा मांगी। अंततः माता की कृपा से उसके जीवन में स्थायी सुख और समृद्धि आ गई।
शुक्रवार का यह व्रत विशेष रूप से गृहस्थ जीवन की शांति के लिए किया जाता है। लोकविश्वास है कि इससे परिवार में प्रेम बढ़ता है, आर्थिक संकट दूर होते हैं और मानसिक तनाव समाप्त होता है।
संतोषी माता की यह पावन कथा हमें यह सिखाती है कि जीवन में चाहे कितने ही कष्ट क्यों न हों, यदि मन में श्रद्धा, धैर्य और संतोष बना रहे तो ईश्वर की कृपा अवश्य प्राप्त होती है। माता की भक्ति मनुष्य को बाहरी सुख ही नहीं, बल्कि आंतरिक शांति भी प्रदान करती है।

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