निर्वाण षट्कम् क्या है?
Nirvana Shatakam (निर्वाण षट्कम्) आदि शंकराचार्य से परंपरागत रूप से संबद्ध एक अत्यंत प्रसिद्ध संस्कृत स्तोत्र है। इसे आत्मषट्कम् भी कहा जाता है। इसमें आत्मा के वास्तविक स्वरूप का वर्णन करते हुए बताया गया है कि आत्मा शरीर, मन, बुद्धि, अहंकार और सांसारिक पहचान से परे है।
इस स्तोत्र के प्रत्येक चरण में साधक अपने वास्तविक स्वरूप की ओर संकेत करता है और अंत में उद्घोष करता है—
“चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्”
अर्थात् मेरा वास्तविक स्वरूप चैतन्य और आनंदमय है; मैं शिवस्वरूप हूँ।
निर्वाण षट्कम् का आध्यात्मिक महत्व
Nirvana Shatakam अद्वैत वेदांत की मूल भावना को अत्यंत संक्षिप्त और प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत करता है। इसमें साधक स्वयं को केवल शरीर या मन मानने के बजाय अपने शुद्ध आत्मस्वरूप को पहचानने की दिशा में बढ़ता है।
इसमें आत्मा को—
- मन से परे
- बुद्धि से परे
- अहंकार से परे
- इन्द्रियों से परे
- पंचमहाभूतों से परे
- सुख-दुःख से परे
- जन्म-मृत्यु से परे
बताया गया है।
निर्वाण षट्कम् का संपूर्ण पाठ
प्रथम श्लोक
मनोबुद्ध्यहङ्कारचित्तानि नाहं
न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे ।
न च व्योमभूमिर्न तेजो न वायुः
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥ १ ॥
सरल हिंदी अर्थ:
मैं मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त नहीं हूँ। मैं कान, जिह्वा, नाक और आँखें भी नहीं हूँ। मैं आकाश, पृथ्वी, अग्नि और वायु भी नहीं हूँ। मेरा वास्तविक स्वरूप चैतन्य और आनंद है—मैं शिवस्वरूप हूँ।
द्वितीय श्लोक
न च प्राणसंज्ञो न वै पञ्चवायुः
न वा सप्तधातुर्न वा पञ्चकोशः ।
न वाक्पाणिपादं न चोपस्थपायू
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥ २ ॥
सरल हिंदी अर्थ:
मैं प्राण नहीं हूँ और न ही पाँच प्राणवायु हूँ। मैं सात धातु और पाँच कोश भी नहीं हूँ। मैं वाणी, हाथ, पैर तथा शरीर की अन्य कर्मेन्द्रियाँ भी नहीं हूँ। मेरा स्वरूप चिदानंद है—मैं शिवस्वरूप हूँ।
तृतीय श्लोक
न मे द्वेषरागौ न मे लोभमोहौ
मदो नैव मे नैव मात्सर्यभावः ।
न धर्मो न चार्थो न कामो न मोक्षः
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥ ३ ॥
सरल हिंदी अर्थ:
मेरे भीतर न द्वेष है, न राग, न लोभ और न मोह। न अहंकार है और न ईर्ष्या। मैं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सीमित पहचान से भी परे हूँ। मेरा वास्तविक स्वरूप चिदानंद है—मैं शिवस्वरूप हूँ।
चतुर्थ श्लोक
न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखं
न मन्त्रो न तीर्थं न वेदा न यज्ञाः ।
अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥ ४ ॥
सरल हिंदी अर्थ:
मैं पुण्य और पाप, सुख और दुःख से परे हूँ। मैं मंत्र, तीर्थ, वेद या यज्ञ मात्र नहीं हूँ। मैं न भोजन हूँ, न भोज्य वस्तु और न ही भोक्ता हूँ। मेरा वास्तविक स्वरूप चिदानंद है—मैं शिवस्वरूप हूँ।
पंचम श्लोक
न मे मृत्युशङ्का न मे जातिभेदः
पिता नैव मे नैव माता न जन्म ।
न बन्धुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्यः
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥ ५ ॥
सरल हिंदी अर्थ:
मुझे मृत्यु का भय नहीं है और न ही मेरे लिए जाति का भेद है। मेरे वास्तविक आत्मस्वरूप का न कोई पिता है, न माता और न जन्म। न कोई बंधु है, न मित्र, न गुरु और न शिष्य। मेरा स्वरूप चिदानंद है—मैं शिवस्वरूप हूँ।
षष्ठ श्लोक
अहं निर्विकल्पो निराकाररूपो
विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम् ।
न चासङ्गतं नैव मुक्तिर्न मेयः
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥ ६ ॥
सरल हिंदी अर्थ:
मैं निर्विकल्प और निराकार स्वरूप हूँ। अपनी व्यापकता के कारण मैं सब जगह विद्यमान हूँ और सभी इन्द्रियों के आधारस्वरूप हूँ। मैं आसक्ति से परे हूँ। मेरा स्वरूप चिदानंद है—मैं शिवस्वरूप हूँ।
निर्वाण षट्कम् में “शिवोऽहम्” का अर्थ
निर्वाण षट्कम् का सबसे प्रसिद्ध वाक्य है:
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्।
यहाँ “शिव” शब्द का अर्थ केवल भगवान शिव के किसी साकार रूप तक सीमित नहीं है। अद्वैत वेदांत की दृष्टि से यह शुद्ध चैतन्य, परम कल्याण और आत्मस्वरूप की ओर संकेत करता है।
“शिवोऽहम्” का भाव है कि हमारा वास्तविक आत्मस्वरूप शुद्ध चैतन्य और आनंदमय है।
निर्वाण षट्कम् को आत्मषट्कम् क्यों कहा जाता है?
इसमें कुल छह श्लोक हैं और प्रत्येक श्लोक आत्मा के वास्तविक स्वरूप पर प्रकाश डालता है। इसलिए इसे आत्मषट्कम् भी कहा जाता है।
यह स्तोत्र साधक को बाहरी पहचान से हटाकर भीतर के आत्मस्वरूप की ओर देखने की प्रेरणा देता है।
निर्वाण षट्कम् का पाठ कब करें?
- प्रातःकाल शांत वातावरण में।
- ध्यान और साधना के समय।
- पूजा के बाद।
- सोमवार या विशेष आध्यात्मिक साधना के दिनों में।
- जब मन को शांत और एकाग्र करना हो।
इसका पाठ करते समय केवल उच्चारण पर ध्यान देने के बजाय “मैं वास्तव में कौन हूँ?” इस आत्मचिंतन के भाव को समझना अधिक महत्वपूर्ण है।
निर्वाण षट्कम् का मुख्य संदेश
Nirvana Shatakam का मूल संदेश आत्म-पहचान से जुड़ा है। मनुष्य सामान्यतः स्वयं को शरीर, नाम, परिवार, पद, भावनाओं और विचारों से जोड़कर देखता है। यह स्तोत्र साधक को इन सभी सीमित पहचानों से आगे अपने शुद्ध आत्मस्वरूप को पहचानने की प्रेरणा देता है।
निष्कर्ष
निर्वाण षट्कम् (Nirvana Shatakam) अद्वैत वेदांत की गहन भावना को छह छोटे लेकिन अत्यंत प्रभावशाली श्लोकों में व्यक्त करता है। आदि शंकराचार्य से परंपरागत रूप से संबद्ध यह स्तोत्र साधक को शरीर और मन की सीमित पहचान से ऊपर उठकर आत्मस्वरूप का चिंतन करने की प्रेरणा देता है।
इसका अंतिम संदेश—“चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्”—आत्मचिंतन और अद्वैत दर्शन की केंद्रीय भावना को अत्यंत सुंदर रूप में सामने रखता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
निर्वाण षट्कम् किसने लिखा है?
निर्वाण षट्कम् को परंपरागत रूप से आदि शंकराचार्य से संबद्ध माना जाता है।
निर्वाण षट्कम् में कितने श्लोक हैं?
निर्वाण षट्कम् में छह श्लोक हैं। इसी कारण इसे आत्मषट्कम् भी कहा जाता है।
निर्वाण षट्कम् का दूसरा नाम क्या है?
इसे आत्मषट्कम् (Atma Shatakam) भी कहा जाता है।
“शिवोऽहम्” का क्या अर्थ है?
“शिवोऽहम्” का भाव है कि आत्मा का वास्तविक स्वरूप शुद्ध चैतन्य और आनंद है। अद्वैत वेदांत में यह आत्मा और परम सत्य की एकता की ओर संकेत करता है।
क्या निर्वाण षट्कम् का पाठ रोज कर सकते हैं?
हाँ, श्रद्धा और समझ के साथ इसका दैनिक पाठ किया जा सकता है। ध्यान और आत्मचिंतन के साथ इसका पाठ विशेष रूप से उपयोगी माना जाता है।
