शिव अपराध क्षमापन स्तोत्रम् (Shiv Aparadh Kshamapan Stotram)

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शिव अपराध क्षमापन स्तोत्रम् भगवान शिव से क्षमा माँगते भक्त

शिव अपराध क्षमापन स्तोत्रम् (Shiv Aparadh Kshamapan Stotram)

श्री शिव अपराध क्षमापन स्तोत्रम् भगवान शिव से अपने जीवन में जाने-अनजाने हुए अपराधों के लिए क्षमा माँगने वाला अत्यंत भावपूर्ण स्तोत्र है। इसमें मनुष्य अपने बाल्यकाल, युवावस्था और वृद्धावस्था में भगवान शिव का स्मरण न कर पाने, विधिवत पूजा न कर पाने तथा मन-वचन-कर्म से हुए अपराधों के लिए क्षमा प्रार्थना करता है। Shivaparadha Kshamapana Stotram का पाठ भक्त को विनम्रता, आत्मचिंतन और भगवान शिव की शरणागति का भाव प्रदान करता है।

शिव अपराध क्षमापन स्तोत्रम् का महत्व

Shivaparadha Kshamapana Stotram में मनुष्य अपने पूरे जीवन की ओर पीछे मुड़कर देखता है। जन्म से लेकर वृद्धावस्था तक अनेक परिस्थितियों के कारण भगवान का स्मरण नहीं हो पाता। स्तोत्रकार इसी मानवीय दुर्बलता को स्वीकार करते हुए भगवान शिव से क्षमा माँगते हैं।

इस स्तोत्र की सबसे विशेष बात यह है कि इसमें केवल पूजा की भूलों के लिए ही क्षमा नहीं माँगी गई है, बल्कि मन, वचन, शरीर, कर्म, इन्द्रियों और विचारों से हुए सभी अपराधों के लिए भगवान से क्षमा प्रार्थना की गई है।

शिव अपराध क्षमापन स्तोत्रम् पाठ

श्लोक १

आदौ कर्मप्रसङ्गात् कलयति कलुषं मातृकुक्षौ स्थितं मां ।
विण्मूत्रामेध्यमध्ये क्वथयति नितरां जाठरो जातवेदाः ।
यद्यद्वै तत्र दुःखं व्यथयति नितरां शक्यते केन वक्तुं
क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भोः श्रीमहादेव शम्भो ॥ १ ॥

सरल अर्थ:
हे महादेव! जन्म से पहले ही जीव अनेक प्रकार के कष्टों से घिरा रहता है। गर्भ में रहते हुए जो-जो दुःख मुझे सहने पड़े, उन्हें शब्दों में कहना संभव नहीं है। उन परिस्थितियों में मैं आपका स्मरण नहीं कर सका। इसलिए मेरे अपराध को क्षमा करें, हे शिव, हे महादेव शम्भो।

श्लोक २

बाल्ये दुःखातिरेकान्मललुलितवपुः स्तन्यपाने पिपासानः ।
शक्तश्चेन्द्रियेभ्यो भवगुणजनिता जन्तवो मां तुदन्ति ।
नानारोगादिदुःखादुदनपरवशः शङ्करं न स्मरामि
क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भोः श्रीमहादेव शम्भो ॥ २ ॥

सरल अर्थ:
हे शंकर! बचपन में शरीर और इन्द्रियाँ पूरी तरह विकसित नहीं थीं। भूख-प्यास, रोग और अनेक प्रकार के कष्टों के कारण मैं विवश था। उन दिनों भी मैं आपका स्मरण नहीं कर सका। मेरे इस अपराध को क्षमा करें।

श्लोक ३

प्रौढोऽहं यौवनस्थो विषयविषधरैः पञ्चभिर्मर्मसन्धौ
दष्टो नष्टोऽविवेकः सुतधनयुवतिस्वादुसौख्ये निषण्णः ।
शैवी चिन्ताविहीनं मम हृदयमहो मानगर्वाधिरूढं
क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भोः श्रीमहादेव शम्भो ॥ ३ ॥

सरल अर्थ:
हे शिव! युवावस्था में मैं पाँच इन्द्रियों के विषयों में फँस गया। पुत्र, धन, सांसारिक सुख और भोगों में मेरा मन लग गया। विवेक नष्ट हो गया और अहंकार तथा अभिमान बढ़ गया। मेरा हृदय शिवचिंतन से दूर हो गया। मेरे अपराध को क्षमा करें।

श्लोक ४

वार्धक्ये चेन्द्रियाणां विगतगतिमतिश्चाधिदैवादितापैः
पापै रोगैर्वियोगैस्त्वनवसितवपुः प्रौढिहीनं च दीनम् ।
मिथ्यामोहाभिलाषैर्भ्रमति मम मनो धूर्जटेर्ध्यानशून्यं
क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भोः श्रीमहादेव शम्भो ॥ ४ ॥

सरल अर्थ:
हे धूर्जटि! वृद्धावस्था में इन्द्रियों की शक्ति समाप्त हो जाती है। रोग, दुःख, वियोग और अनेक कष्ट शरीर को कमजोर कर देते हैं। फिर भी मेरा मन मोह और इच्छाओं में भटकता रहता है और आपका ध्यान नहीं कर पाता। मेरे अपराध को क्षमा करें।

श्लोक ५

नो शक्यं स्मार्तकर्म प्रतिपदगहनप्रत्यवायाकुलाख्यं
श्रौते वार्ता कथं मे द्विजकुलविहिते ब्रह्ममार्गे सुसारे ।
ज्ञातो धर्मो विचारैः श्रवणमननयोः किं निदिध्यासितव्यं
क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भोः श्रीमहादेव शम्भो ॥ ५ ॥

सरल अर्थ:
हे महादेव! मैं विधिपूर्वक सभी धार्मिक और वैदिक कर्म नहीं कर सका। धर्म को जानने और सुनने-मनन करने के बाद भी उसके अनुसार साधना नहीं कर पाया। इसलिए मेरे सभी अपराध क्षमा करें।

श्लोक ६

स्नात्वा प्रत्यूषकाले स्नपनविधिविधौ नाहृतं गाङ्गतोयं
पूजार्थं वा कदाचिद्बहुतरगहनात्खण्डबिल्वीदलानि ।
नानीता पद्ममाला सरसि विकसिता गन्धपुष्पैस्त्वदर्थं
क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भोः श्रीमहादेव शम्भो ॥ ६ ॥

सरल अर्थ:
हे शिव! मैंने प्रातःकाल स्नान करके आपकी पूजा के लिए गंगाजल नहीं लाया, बिल्वपत्र नहीं लाया और कमल तथा सुगंधित पुष्पों की माला भी आपके लिए अर्पित नहीं कर सका। मेरी पूजा में हुई इन कमियों को क्षमा करें।

श्लोक ७

दुग्धैर्मध्वाज्ययुक्तैर्दधिसितसहितैः स्नापितं नैव लिङ्गं
नो लिप्तं चन्दनाद्यैः कनकविरचितैः पूजितं न प्रसूनैः ।
धूपैः कर्पूरदीपैर्विविधरसयुतैर्नैव भक्ष्योपहारैः
क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भोः श्रीमहादेव शम्भो ॥ ७ ॥

सरल अर्थ:
हे प्रभु! मैंने आपके शिवलिंग को दूध, मधु, घी, दही और शर्करा से अभिषेक नहीं कराया। चंदन नहीं लगाया, स्वर्णादि से पूजा नहीं की, पुष्प, धूप, कपूर और दीप नहीं अर्पित किए तथा नैवेद्य भी नहीं चढ़ाया। इन सभी पूजा-अपराधों के लिए मुझे क्षमा करें।

श्लोक ८

ध्यात्वा चित्ते शिवाख्यं प्रचुरतरधनं नैव दत्तं द्विजेभ्यो
हव्यं ते लक्षसंख्यैर्हुतवहवदने नार्पितं बीजमन्त्रैः ।
नो तप्तं गाङ्गतीरे व्रतजपनियमै रुद्रजाप्यैर्न वेदैः
क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भोः श्रीमहादेव शम्भो ॥ ८ ॥

सरल अर्थ:
हे शिव! मैंने मन में आपका ध्यान करके ब्राह्मणों को पर्याप्त दान नहीं दिया, अग्नि में विधिपूर्वक हवन नहीं किया और गंगातट पर तप, व्रत, जप तथा रुद्राध्याय का अनुष्ठान भी नहीं किया। इन सभी कमियों के लिए मुझे क्षमा करें।

श्लोक ९

स्थित्वा स्थाने सरोजे प्रणवमयमरुत्कुण्डले सूक्ष्ममार्गे
शान्ते स्वान्ते प्रलीने प्रकटितबिभवे ज्योतिरूपेऽपराख्ये ।
लिङ्गज्ञे ब्रह्मवाक्ये सकलतनुगतं शङ्करं न स्मरामि
क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भोः श्रीमहादेव शम्भो ॥ ९ ॥

सरल अर्थ:
हे शंकर! सूक्ष्म साधना, ध्यान और ब्रह्मज्ञान के माध्यम से आपको अपने अंतःकरण में अनुभव करने का प्रयास भी मैं नहीं कर सका। समस्त शरीर में स्थित आपके दिव्य स्वरूप का स्मरण नहीं कर पाया। मेरे इस अपराध को क्षमा करें।

श्लोक १०

नग्नो निःसङ्गशुद्धस्त्रिगुणविरहितो ध्वस्तमोहान्धकारो
नासाग्रे न्यस्तदृष्टिर्विदितभवगुणो नैव दृष्टः कदाचित् ।
उन्मन्यावस्थया त्वां विगतकलिमलं शङ्करं न स्मरामि
क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भोः श्रीमहादेव शम्भो ॥ १० ॥

सरल अर्थ:
हे शंकर! मैं उस परम अवस्था को प्राप्त नहीं कर सका जिसमें मोह और अज्ञान समाप्त हो जाते हैं, इन्द्रियाँ शांत हो जाती हैं और मन पूर्णतः आपके ध्यान में लीन हो जाता है। मैं आपका उस प्रकार ध्यान नहीं कर पाया। मेरे अपराध को क्षमा करें।

श्लोक ११

चन्द्रोद्भासितशेखरे स्मरहरे गङ्गाधरे शङ्करे
सर्पैर्भूषितकण्ठकर्णविवरे नेत्रोत्थवैश्वानरे ।
दन्तित्वक्कृतसुन्दराम्बरधरे त्रैलोक्यसारे हरे
मोक्षार्थं कुरु चित्तवृत्तिमखिलामन्यैस्तु किं कर्मभिः ॥ ११ ॥

सरल अर्थ:
हे चन्द्रमा से सुशोभित मस्तक वाले, कामदेव का संहार करने वाले, गंगाधर और सर्पों से अलंकृत शिव! हे त्रिलोकी के सारस्वरूप प्रभु! मेरी समस्त चित्तवृत्तियों को मोक्ष की ओर लगा दीजिए। जब आपका स्मरण ही सर्वोच्च साधना है, तब अन्य कर्मों से क्या प्रयोजन?

श्लोक १२

किं वाऽनेन धनेन वाजिकरिभिः प्राप्तेन राज्येन किं
किं वा पुत्रकलत्रमित्रपशुभिर्देहेन गेहेन किम् ।
ज्ञात्वैतत्क्षणभङ्गुरं सपदिरे त्याज्यं मनो दूरतः
स्वात्मार्थं गुरुवाक्यतो भज भज श्रीपार्वतीवल्लभम् ॥ १२ ॥

सरल अर्थ:
धन, राज्य, घोड़े-हाथी, पुत्र, पत्नी, मित्र, पशु, शरीर और घर—इन सबका क्या लाभ है? जब यह संसार क्षणभंगुर है, तब मन को इन मोहों से दूर करके गुरु के वचनानुसार अपने आत्मकल्याण के लिए माता पार्वती के प्रिय भगवान शिव का भजन करना चाहिए।

श्लोक १३

आयुर्नश्यति पश्यतां प्रतिदिनं याति क्षयं यौवनं
प्रत्यायान्ति गताः पुनर्न दिवसाः कालो जगद्भक्षकः ।
लक्ष्मीस्तोयतरङ्गभङ्गचपला विद्युत्चलं जीवितं
तस्मान्मां शरणागतं शरणद त्वं रक्ष रक्षाधुना ॥ १३ ॥

सरल अर्थ:
देखते-देखते प्रत्येक दिन हमारी आयु समाप्त होती जा रही है। युवावस्था नष्ट हो रही है और बीते हुए दिन वापस नहीं आते। काल सम्पूर्ण संसार को नष्ट करने वाला है। धन जल की लहरों के समान चंचल और जीवन बिजली की चमक के समान क्षणभंगुर है। इसलिए हे शरण देने वाले शिव! आपकी शरण में आए हुए मेरी अभी रक्षा कीजिए।

श्लोक १४

करचरणकृतं वाक्कायजं कर्मजं वा
श्रवणनयनजं वा मानसं वाऽपराधम् ।
विहितमविहितं वा सर्वमेतत्क्षमस्व
जय जय करुणाब्धे श्रीमहादेव शम्भो ॥ १४ ॥

सरल अर्थ:
हे करुणासागर महादेव! हाथ-पैर से, वाणी और शरीर से, कर्मों से, कान और आँखों से अथवा मन से जो भी अपराध मुझसे हुए हैं, चाहे वे जानबूझकर किए गए हों या अनजाने में—आप उन सभी को क्षमा करें। हे श्रीमहादेव शम्भो! आपकी जय हो।

शिव अपराध क्षमापन स्तोत्रम् का मुख्य संदेश

इस स्तोत्र का सबसे गहरा संदेश आत्मस्वीकार और शरणागति है। मनुष्य अपने जीवन की कमियों को स्वीकार करता है और भगवान शिव से कहता है कि वह पूर्ण नहीं है, पूजा-पाठ और साधना में अनेक कमियाँ रह गई हैं, इसलिए प्रभु उन अपराधों को क्षमा करें।

विशेष रूप से अंतिम श्लोक में मन, वाणी, शरीर, कर्म, श्रवण और दृष्टि—सभी से हुए अपराधों के लिए क्षमा माँगी गई है।

शिव अपराध क्षमापन स्तोत्रम् कब पढ़ें?

  • सोमवार को भगवान शिव की पूजा के बाद।
  • प्रदोष व्रत के दिन।
  • महाशिवरात्रि पर।
  • दैनिक शिव-पूजन के अंत में।
  • जब मन में अपने किसी कर्म के लिए पश्चात्ताप हो।
  • प्रातःकाल अथवा संध्या के शांत समय में।

इसका पाठ करते समय केवल शब्दों का उच्चारण ही नहीं, बल्कि क्षमा, विनम्रता और आत्मचिंतन का भाव रखना अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।

शिव अपराध क्षमापन स्तोत्रम् का सार

शिव अपराध क्षमापन स्तोत्रम् हमें यह स्मरण कराता है कि मनुष्य से जीवन में अनेक भूलें होती हैं। कभी अज्ञान के कारण, कभी परिस्थितियों के कारण और कभी सांसारिक मोह के कारण हम ईश्वर से दूर हो जाते हैं।

भगवान शिव के सामने अपनी भूल स्वीकार करके क्षमा माँगना ही इस स्तोत्र की मूल भावना है। इसलिए इसका पाठ भक्त के मन में विनम्रता, वैराग्य, आत्मचिंतन और शिव-भक्ति का भाव जागृत करता है।

निष्कर्ष

शिव अपराध क्षमापन स्तोत्रम् भगवान शिव के चरणों में की गई अत्यंत विनम्र क्षमा-प्रार्थना है। इसमें भक्त अपने जीवन की प्रत्येक अवस्था और अपनी पूजा-साधना की कमियों को स्वीकार करता है और अंत में भगवान शिव से सभी अपराधों को क्षमा करने की प्रार्थना करता है।

जो भक्त श्रद्धा और सच्चे पश्चात्ताप के साथ इसका पाठ करता है, उसके लिए यह स्तोत्र केवल पाठ नहीं बल्कि अपने जीवन को देखकर भगवान शिव की शरण में जाने का माध्यम बन जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शिव अपराध क्षमापन स्तोत्रम् किसने लिखा है?

परंपरागत रूप से शिवापराधक्षमापनस्तोत्रम् को श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचित माना जाता है।

शिव अपराध क्षमापन स्तोत्रम् का पाठ कब करना चाहिए?

इसका पाठ सोमवार, प्रदोष, महाशिवरात्रि या दैनिक शिव-पूजन के बाद किया जा सकता है। श्रद्धा और एकाग्रता के साथ किसी भी समय इसका पाठ किया जा सकता है।

शिव अपराध क्षमापन स्तोत्रम् में किससे क्षमा माँगी जाती है?

इसमें भगवान श्री महादेव शिव से मन, वाणी, शरीर, कर्म तथा इन्द्रियों से हुए जाने-अनजाने अपराधों के लिए क्षमा माँगी जाती है।

क्या शिव पूजा के बाद यह स्तोत्र पढ़ सकते हैं?

हाँ। शिव-पूजन के अंत में क्षमा-प्रार्थना के रूप में इसका पाठ करना इसकी विषय-वस्तु के अनुरूप है।

शिव अपराध क्षमापन स्तोत्रम् का मुख्य भाव क्या है?

इसका मुख्य भाव है—अपने अपराधों को स्वीकार करना, सांसारिक मोह से दूर होना और भगवान शिव की शरण में जाकर क्षमा माँगना।

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