Author name: bhaktimarg2018

चालीसा (Chalisa)

श्री कृष्ण चालीसा (Shri Krishna Chalisa)

पूर्ण इन्द्र, अरविन्द मुख, पीताम्बर शुभ साज । जय मनमोहन मदन छवि, कृष्णचन्द्र महाराज ॥
जय यदुनंदन जय जगवंदन । जय वसुदेव देवकी नन्दन ॥ जय यशुदा सुत नन्द दुलारे । जय प्रभु भक्‍तन के दृग तारे ॥ जय नट-नागर, नाग नथैया । कृष्ण कन्हैया धेनु चरैया ॥ पुनि नख पर प्रभु गिरिवर धारो । आओ दी

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चालीसा (Chalisa)

श्री गणेश चालीसा (Shri Ganesh Chalisa)

दोहा जय गणपति सद्गुण सदन कविवर बदन कृपाल। विघ्न हरण मंगल करण जय जय गिरिजालाल॥ ॥ चौपाई ॥ जय जय जय गणपति राजू। मंगल भरण करण शुभ काजू॥ जय गजबदन सदन सुखदाता। विश्व विनायक बुद्धि विधाता॥ वक्र तुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन। तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन॥ राजित मणि मुक्तन उर माला। स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला॥ पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं। मोदक भोग सुगन्धित फूलं॥ सुन्दर पीताम्बर तन साजित। चरण पादुका मुनि मन राजित॥ धनि शिवसुवन षडानन भ्राता। गौरी ललन विश्व-विधाता॥ ऋद्धि सिद्धि तव चँवर डुलावे। मूषक वाहन सोहत द्वारे॥ कहौ जन्म शुभ कथा तुम्हारी। अति शुचि पावन मंगल कारी॥ एक समय गिरिराज कुमारी। पुत्र हेतु तप कीन्हा भारी॥ भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा। तब पहुंच्यो तुम धरि द्विज रूपा। अतिथि जानि कै गौरी सुखारी। बहु विधि सेवा करी तुम्हारी॥ अति प्रसन्न ह्वै तुम वर दीन्हा। मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा॥ मिलहि पुत्र तुहि बुद्धि विशाला। बिना गर्भ धारण यहि काला॥ गणनायक गुण ज्ञान निधाना। पूजित प्रथम रूप भगवाना॥ अस कहि अन्तर्धान रूप ह्वै। पलना पर बालक स्वरूप ह्वै॥ बनि शिशु रुदन जबहि तुम ठाना। लखि मुख सुख नहिं गौरि समाना॥ सकल मगन सुख मंगल गावहिं। नभ ते सुरन सुमन वर्षावहिं॥ शम्भु उमा बहुदान लुटावहिं। सुर मुनि जन सुत देखन आवहिं॥ लखि अति आनन्द मंगल साजा। देखन भी आए शनि राजा॥ निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं। बालक देखन चाहत नाहीं॥ गिरजा कछु मन भेद बढ़ायो। उत्सव मोर न शनि तुहि भायो॥ कहन लगे शनि मन सकुचाई। का करिहौ शिशु मोहि दिखाई॥ नहिं विश्वास उमा कर भयऊ। शनि सों बालक देखन कह्यऊ॥ पड़तहिं शनि दृग कोण प्रकाशा। बालक शिर उड़ि गयो आकाशा॥ गिरजा गिरीं विकल ह्वै धरणी। सो दुख दशा गयो नहिं वरणी॥ हाहाकार मच्यो कैलाशा। शनि कीन्ह्यों लखि सुत को नाशा॥ तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधाए। काटि चक्र सो गज शिर लाए॥ बालक के धड़ ऊपर धारयो। प्राण मन्त्र पढ़ शंकर डारयो॥ नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे। प्रथम पूज्य बुद्धि निधि वर दीन्हे॥ बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा। पृथ्वी की प्रदक्षिणा लीन्हा॥ चले षडानन भरमि भुलाई। रची बैठ तुम बुद्धि उपाई॥ चरण मातु-पितु के धर लीन्हें। तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें॥ धनि गणेश कहि शिव हिय हरषे। नभ ते सुरन सुमन बहु बरसे॥ तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई। शेष सहस मुख सकै न गाई॥ मैं मति हीन मलीन दुखारी। करहुँ कौन बिधि विनय तुम्हारी॥ भजत रामसुन्दर प्रभुदासा। लख प्रयाग ककरा दुर्वासा॥ अब प्रभु दया दीन पर कीजै। अपनी शक्ति भक्ति कुछ दीजै॥ दोहा श्री गणेश यह चालीसा पाठ करें धर ध्यान। नित नव मंगल गृह बसै लहे जगत सन्मान॥ सम्वत् अपन सहस्र दश ऋषि पंचमी दिनेश। पूरण चालीसा भयो मंगल मूर्ति गणेश॥

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हिंदू संत और गुरु (Hindu Saints & Gurus)

वास्तविकता में गुरु का क्या महत्व है? (Guru Importance in Life)

  प्रस्तावना भारतीय संस्कृति में गुरु को केवल एक शिक्षक नहीं, बल्कि जीवन का मार्गदर्शक, ज्ञान का प्रकाश और आत्मिक उन्नति का साधन माना गया है। हमारे शास्त्रों में गुरु का स्थान इतना ऊँचा बताया गया है कि उन्हें भगवान के समान सम्मान दिया गया है। कहा जाता है कि जिस प्रकार अंधकार में दीपक मार्ग दिखाता है, उसी प्रकार गुरु अज्ञान रूपी अंधकार को दूर करके ज्ञान का प्रकाश प्रदान करते हैं। आज के आधुनिक युग में अनेक लोग यह प्रश्न पूछते हैं कि वास्तविकता में गुरु का क्या महत्व है? क्या गुरु केवल धार्मिक जीवन के लिए आवश्यक हैं या सामान्य जीवन में भी उनका महत्व है? इस लेख में हम गुरु की वास्तविक आवश्यकता, उनका महत्व और जीवन में उनकी भूमिका के बारे में विस्तार से जानेंगे। गुरु का अर्थ क्या है? संस्कृत भाषा में “गुरु” शब्द दो अक्षरों से मिलकर बना है— अर्थात जो अज्ञान रूपी अंधकार को दूर करके ज्ञान का प्रकाश प्रदान करे, वही गुरु कहलाता है। गुरु केवल धार्मिक शिक्षा देने वाला व्यक्ति नहीं होता, बल्कि वह जीवन को सही दिशा देने वाला मार्गदर्शक भी होता है। शास्त्रों में गुरु का महत्व सनातन धर्म के ग्रंथों में गुरु को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। प्रसिद्ध गुरु मंत्र में कहा गया है— गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ इस श्लोक का अर्थ है कि गुरु ही ब्रह्मा हैं, गुरु ही विष्णु हैं और गुरु ही भगवान शिव के समान हैं। गुरु साक्षात परम ब्रह्म स्वरूप हैं, ऐसे श्रीगुरु को प्रणाम है। वास्तविकता में गुरु का क्या महत्व है? 1. गुरु सही मार्ग दिखाते हैं मनुष्य के जीवन में अनेक बार ऐसी परिस्थितियाँ आती हैं जब सही और गलत का निर्णय करना कठिन हो जाता है। ऐसे समय में गुरु अपने अनुभव और ज्ञान से उचित मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। 2. अज्ञान को दूर करते हैं ज्ञान के बिना जीवन अधूरा माना जाता है। गुरु व्यक्ति के भीतर छिपी हुई क्षमताओं को पहचानकर उसे ज्ञान प्रदान करते हैं और जीवन का वास्तविक उद्देश्य समझाते हैं। 3. आध्यात्मिक उन्नति में सहायक आध्यात्मिक मार्ग सरल नहीं होता। ध्यान, भक्ति और आत्मज्ञान के मार्ग पर चलने के लिए योग्य गुरु का मार्गदर्शन अत्यंत आवश्यक माना गया है। 4. जीवन में अनुशासन लाते हैं गुरु व्यक्ति को संयम, धैर्य, सत्य, करुणा और सदाचार का महत्व समझाते हैं। उनके उपदेश जीवन को व्यवस्थित और संतुलित बनाते हैं। 5. आत्मविश्वास बढ़ाते हैं जब व्यक्ति कठिनाइयों का सामना करता है, तब गुरु उसे निराशा से बाहर निकालकर आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच प्रदान करते हैं। गुरु और शिक्षक में अंतर बहुत से लोग गुरु और शिक्षक को एक समान मान लेते हैं, जबकि दोनों में अंतर होता है। शिक्षक गुरु विषयों का ज्ञान देते हैं जीवन का ज्ञान देते हैं शिक्षा प्रदान करते हैं दिशा प्रदान करते हैं पुस्तक आधारित ज्ञान देते हैं अनुभव आधारित ज्ञान देते हैं परीक्षा के लिए तैयार करते हैं जीवन के लिए तैयार करते हैं सीमित भूमिका होती है व्यापक भूमिका होती है इस प्रकार गुरु का महत्व केवल शिक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि वे संपूर्ण जीवन को प्रभावित करते हैं। भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन का उदाहरण     Lord Krishna और Arjuna का संबंध गुरु और शिष्य के आदर्श उदाहरण के रूप में देखा जाता है। महाभारत युद्ध के समय अर्जुन मोह और भ्रम में पड़ गए थे। उस समय भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें गीता का ज्ञान देकर उनके संदेह दूर किए और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। इससे स्पष्ट होता है कि गुरु व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों में सही निर्णय लेने की शक्ति प्रदान करते हैं। भगवान राम और गुरु वशिष्ठ Rama के जीवन में गुरु वशिष्ठ का महत्वपूर्ण स्थान था। गुरु वशिष्ठ ने भगवान राम को धर्म, नीति और आदर्श जीवन का ज्ञान प्रदान किया। यह उदाहरण बताता है कि महान व्यक्तित्वों को भी गुरु की आवश्यकता होती है। क्या जीवन में गुरु आवश्यक हैं? यह प्रश्न अक्सर पूछा जाता है कि क्या प्रत्येक व्यक्ति के लिए गुरु आवश्यक हैं? उत्तर है—हाँ। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में किसी न किसी रूप में गुरु की आवश्यकता होती है। गुरु के बिना जीवन की चुनौतियाँ यदि व्यक्ति को उचित मार्गदर्शन न मिले तो वह— गुरु इन समस्याओं से बचाने में सहायता करते हैं। एक सच्चे गुरु की पहचान हर व्यक्ति जो स्वयं को गुरु कहता है, वह सद्गुरु नहीं होता। शास्त्रों के अनुसार सच्चे गुरु में निम्न गुण होने चाहिए— 1. सत्य और धर्म का पालन करने वाला सद्गुरु सदैव सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं। 2. स्वार्थ रहित होना सच्चा गुरु अपने शिष्यों का कल्याण चाहता है। 3. विनम्रता अहंकार रहित और करुणामय स्वभाव सद्गुरु की पहचान है। 4. ज्ञान और अनुभव केवल पुस्तकीय ज्ञान ही नहीं, बल्कि जीवन का व्यावहारिक अनुभव भी होना चाहिए। 5. आचरण की पवित्रता सद्गुरु का जीवन उनके उपदेशों के अनुरूप होना चाहिए। गुरु का सम्मान क्यों आवश्यक है? भारतीय संस्कृति में गुरु के प्रति श्रद्धा और सम्मान को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। गुरु का सम्मान करने से— गुरु पूर्णिमा का महत्व         Guru Purnima गुरु के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का प्रमुख पर्व है। इस दिन शिष्य अपने गुरु के प्रति सम्मान और कृतज्ञता प्रकट करते हैं। आधुनिक जीवन में गुरु का महत्व आज के समय में जीवन की गति अत्यधिक तेज हो गई है। तनाव, प्रतिस्पर्धा और भ्रम के कारण व्यक्ति कई बार मानसिक रूप से अस्थिर हो जाता है। ऐसी परिस्थितियों में गुरु— क्या बिना गुरु के आध्यात्मिक प्रगति संभव है? कुछ लोग मानते हैं कि केवल पुस्तकों से ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। हालांकि, शास्त्रों में गुरु के मार्गदर्शन को विशेष महत्व दिया गया है। योग्य गुरु साधक की शंकाओं का समाधान करते हैं और उसे सही दिशा प्रदान करते हैं। इसलिए आध्यात्मिक जीवन में गुरु का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। गुरु और भगवान में कौन बड़ा है? भक्ति परंपरा में कहा गया है कि गुरु ही भगवान तक पहुँचने का मार्ग दिखाते हैं। संत कबीरदास जी का प्रसिद्ध दोहा है— गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय।बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥ अर्थात गुरु और

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हिंदू त्योहार (Hindu Festivals)

हरियाली तीज 2026: तिथि, पूजा विधि, महत्व, कथा और शुभकामनाएं (Haryali Teej 2026

हरियाली तीज हिंदू धर्म के प्रमुख और अत्यंत शुभ पर्वों में से एक है। यह पर्व भगवान शिव और माता पार्वती के पवित्र मिलन का प्रतीक माना जाता है। सावन मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाने वाला यह त्योहार विशेष रूप से विवाहित महिलाओं और अविवाहित कन्याओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन महिलाएं पति की लंबी आयु, सुखी दांपत्य जीवन और परिवार की समृद्धि के लिए व्रत रखती हैं, जबकि अविवाहित कन्याएं मनचाहे वर की प्राप्ति की कामना करती हैं।

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सरस्वती मंत्र (Saraswati Mantra)

माँ सरस्वती बीज मंत्र (Maa Saraswati Beej Mantra)

माँ सरस्वती बीज मंत्र ज्ञान, बुद्धि, वाणी, स्मरण शक्ति और विद्या की अधिष्ठात्री देवी माँ सरस्वती को समर्पित एक अत्यंत प्रभावशाली मंत्र है। इस मंत्र का नियमित जप विद्यार्थियों, शिक्षकों, कलाकारों, लेखकों और संगीत साधकों के लिए विशेष रूप से लाभकारी माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माँ सरस्वती बीज मंत्र का श्रद्धापूर्वक जप करने से एकाग्रता बढ़ती है, मानसिक भ्रम दूर होता है और शिक्षा एवं कला के क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त होता है। इस लेख में माँ सरस्वती बीज मंत्र, उसका अर्थ, जप विधि, नियम तथा आध्यात्मिक एवं व्यावहारिक लाभों के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई है।

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भैरव मंत्र (Bhairav Mantra)

काल भैरव गायत्री मंत्र (Kala Bhairava Gayatri Mantra)

काल भैरव भगवान शिव के उग्र और रक्षक स्वरूप माने जाते हैं। हिंदू धर्म में इन्हें समय (काल), न्याय, सुरक्षा और तंत्र साधना के अधिष्ठाता देवता के रूप में पूजा जाता है। मान्यता है कि काल भैरव की उपासना करने से भय, नकारात्मक शक्तियों और जीवन की बाधाओं से मुक्ति मिलती है। विशेष रूप से काल भैरव गायत्री मंत्र का नियमित जाप साधक को मानसिक शक्ति, आत्मविश्वास और आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करता है।

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सरस्वती मंत्र (Saraswati Mantra)

माँ सरस्वती वंदना (Maa Saraswati Vandana)

या कुन्देन्दु तुषारहार धवला, या शुभ्रवस्त्रावृता।
या वीणावरदण्डमण्डितकरा, या श्वेतपद्मासना॥
या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता।
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा॥

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