परिचय
या देवी सर्वभूतेषु स्तोत्र (Ya Devi Sarvabhuteshu Stotra) माँ दुर्गा की महिमा का वर्णन करने वाला एक अत्यंत पवित्र और शक्तिशाली देवी स्तोत्र है। यह स्तुति मार्कण्डेय पुराण के अंतर्गत आने वाले देवी महात्म्य (दुर्गा सप्तशती) का महत्वपूर्ण भाग है। इसमें देवताओं द्वारा माँ भगवती की स्तुति की गई है और बताया गया है कि देवी संपूर्ण संसार के प्रत्येक जीव में किसी न किसी दिव्य शक्ति के रूप में विराजमान हैं।
“या देवी सर्वभूतेषु…” का अर्थ है — वह देवी जो सभी प्राणियों में विद्यमान हैं। इस स्तोत्र के माध्यम से भक्त माँ जगदंबा को न केवल मंदिरों में स्थापित प्रतिमा के रूप में, बल्कि हर जीव के भीतर स्थित चेतना, बुद्धि, शक्ति और जीवन ऊर्जा के रूप में नमन करते हैं।
सनातन धर्म में माँ दुर्गा को सम्पूर्ण सृष्टि की मूल शक्ति अर्थात आदिशक्ति माना गया है। यही शक्ति संसार का निर्माण, पालन और संरक्षण करती है। या देवी सर्वभूतेषु स्तोत्र हमें यह आध्यात्मिक संदेश देता है कि ईश्वर की शक्ति हर जगह मौजूद है और प्रत्येक प्राणी में देवी का अंश विद्यमान है।
नवरात्रि, दुर्गा पूजा, अष्टमी, नवमी और अन्य देवी आराधना के अवसरों पर इस स्तोत्र का पाठ विशेष फलदायी माना जाता है।
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इस लेख में आप क्या जानेंगे?
इस विस्तृत लेख में आप जानेंगे—
- या देवी सर्वभूतेषु स्तोत्र क्या है?
- या देवी सर्वभूतेषु स्तोत्र का स्रोत और इतिहास
- दुर्गा सप्तशती में इसका महत्व
- संपूर्ण संस्कृत पाठ
- प्रत्येक श्लोक का सरल हिंदी अर्थ
- या देवी सर्वभूतेषु स्तोत्र का आध्यात्मिक रहस्य
- पाठ करने की विधि
- इसके धार्मिक लाभ
- अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
या देवी सर्वभूतेषु स्तोत्र क्या है?
या देवी सर्वभूतेषु स्तोत्र माँ भगवती की वह दिव्य स्तुति है जिसमें देवी के विभिन्न स्वरूपों और शक्तियों का स्मरण किया गया है। इस स्तोत्र में देवता माँ दुर्गा को प्रणाम करते हुए कहते हैं कि हे देवी! आप संसार के प्रत्येक प्राणी में अलग-अलग रूपों में निवास करती हैं, इसलिए आपको बार-बार नमस्कार है।
देवी को इस स्तोत्र में अनेक रूपों में स्वीकार किया गया है, जैसे—
- चेतना के रूप में
- बुद्धि के रूप में
- शक्ति के रूप में
- क्षमा के रूप में
- श्रद्धा के रूप में
- शांति के रूप में
- मातृ भाव के रूप में
- स्मृति के रूप में
- दया और करुणा के रूप में
यह स्तोत्र केवल देवी की स्तुति नहीं करता, बल्कि यह समझाता है कि जीवन में मौजूद प्रत्येक सकारात्मक गुण माँ भगवती की ही अभिव्यक्ति है।
या देवी सर्वभूतेषु स्तोत्र का स्रोत
या देवी सर्वभूतेषु स्तोत्र का वर्णन दुर्गा सप्तशती के पाँचवें अध्याय (देवी महात्म्य) में मिलता है। दुर्गा सप्तशती में कुल 13 अध्याय और लगभग 700 श्लोक हैं, जिनमें माँ दुर्गा की महिमा, असुरों के विनाश और देवी की दिव्य शक्तियों का वर्णन किया गया है।
देवी महात्म्य में जब देवी ने देवताओं को असुरों के अत्याचार से मुक्त किया, तब देवताओं ने माँ भगवती की स्तुति की। इसी स्तुति में “या देवी सर्वभूतेषु…” मंत्रों का वर्णन आता है।
इस स्तोत्र के माध्यम से देवता यह स्वीकार करते हैं कि सम्पूर्ण संसार में जो भी चेतना, शक्ति और गुण दिखाई देते हैं, वे सभी माँ देवी की ही कृपा से उत्पन्न होते हैं।
दुर्गा सप्तशती में या देवी सर्वभूतेषु स्तोत्र का महत्व
दुर्गा सप्तशती केवल देवी की कथा नहीं है, बल्कि यह शक्ति उपासना का एक महान ग्रंथ है। इसमें माँ दुर्गा को ब्रह्मांड की मूल शक्ति बताया गया है।
“या देवी सर्वभूतेषु” स्तोत्र का विशेष महत्व इसलिए है क्योंकि इसमें देवी को किसी एक स्थान या रूप तक सीमित नहीं माना गया है। यह स्तोत्र बताता है कि—
“माँ भगवती हर जीव के अंदर शक्ति के रूप में निवास करती हैं।”
जो व्यक्ति इस भाव के साथ इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसके मन में श्रद्धा, विनम्रता और सकारात्मक विचारों का विकास होता है।
या देवी सर्वभूतेषु स्तोत्र पाठ
॥ या देवी सर्वभूतेषु ॥
या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु निद्रारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु क्षुधारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु छायारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु तृष्णारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु स्तोत्र के श्लोक और हिंदी अर्थ
“या देवी सर्वभूतेषु” स्तोत्र में माँ भगवती को संसार के प्रत्येक प्राणी में विद्यमान विभिन्न शक्तियों के रूप में नमन किया गया है। प्रत्येक मंत्र हमें यह समझाता है कि जीवन में दिखाई देने वाली चेतना, ज्ञान, शक्ति, धैर्य, श्रद्धा और शांति सभी माँ आदिशक्ति की ही दिव्य अभिव्यक्तियाँ हैं।
1. विष्णुमाया स्वरूप में देवी की स्तुति
या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
हिंदी अर्थ:
जो देवी सभी प्राणियों में भगवान विष्णु की माया शक्ति के रूप में विद्यमान हैं, उन देवी को बार-बार नमस्कार है।
भावार्थ:
संपूर्ण संसार जिस दिव्य शक्ति के कारण संचालित हो रहा है, वह माँ भगवती की ही शक्ति है। संसार की रचना, पालन और परिवर्तन में जो अद्भुत व्यवस्था दिखाई देती है, वह देवी की माया शक्ति का ही स्वरूप है।
2. चेतना स्वरूप में देवी की स्तुति
या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
हिंदी अर्थ:
जो देवी सभी प्राणियों में चेतना (जीवन शक्ति) के रूप में स्थित हैं, उन देवी को बार-बार नमस्कार है।
भावार्थ:
मनुष्य, पशु-पक्षी और सभी जीवों में जो जीवन का अनुभव होता है, वह माँ देवी की चेतना शक्ति के कारण है। शरीर को जीवंत रखने वाली ऊर्जा और जीवन का आधार स्वयं देवी की कृपा है।
यह श्लोक हमें सिखाता है कि प्रत्येक जीव में ईश्वर का अंश मौजूद है और इसलिए सभी प्राणियों का सम्मान करना चाहिए।
3. बुद्धि स्वरूप में देवी की स्तुति
या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
हिंदी अर्थ:
जो देवी सभी प्राणियों में बुद्धि के रूप में स्थित हैं, उन देवी को बार-बार नमस्कार है।
भावार्थ:
मनुष्य को सही और गलत का निर्णय करने की क्षमता माँ भगवती की बुद्धि शक्ति से प्राप्त होती है। ज्ञान, विवेक और समझ देवी की ही कृपा माने जाते हैं।
जो व्यक्ति अपनी बुद्धि का सदुपयोग करता है, वह जीवन में सही मार्ग पर आगे बढ़ता है।
4. निद्रा स्वरूप में देवी की स्तुति
या देवी सर्वभूतेषु निद्रारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
हिंदी अर्थ:
जो देवी सभी प्राणियों में निद्रा के रूप में विद्यमान हैं, उन देवी को बार-बार नमस्कार है।
भावार्थ:
निद्रा केवल शरीर का विश्राम नहीं है, बल्कि यह प्रकृति द्वारा प्रदान की गई एक दिव्य शक्ति है। उचित विश्राम से शरीर और मन को नई ऊर्जा प्राप्त होती है।
माँ देवी की यह शक्ति जीवन में संतुलन बनाए रखने में सहायता करती है।
5. क्षुधा (भूख) स्वरूप में देवी की स्तुति
या देवी सर्वभूतेषु क्षुधारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
हिंदी अर्थ:
जो देवी सभी प्राणियों में भूख के रूप में स्थित हैं, उन देवी को बार-बार नमस्कार है।
भावार्थ:
भूख जीवन को चलाने वाली प्राकृतिक शक्ति है। यही शक्ति जीवों को भोजन ग्रहण करने और शरीर की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए प्रेरित करती है।
देवी हमें यह भी सिखाती हैं कि अन्न का सम्मान करना चाहिए क्योंकि अन्न में भी माँ की शक्ति विद्यमान मानी जाती है।
6. छाया स्वरूप में देवी की स्तुति
या देवी सर्वभूतेषु छायारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
हिंदी अर्थ:
जो देवी सभी प्राणियों में छाया के रूप में स्थित हैं, उन देवी को बार-बार नमस्कार है।
भावार्थ:
छाया सुरक्षा और संरक्षण का प्रतीक है। जिस प्रकार छाया मनुष्य के साथ रहती है, उसी प्रकार माँ भगवती अपनी कृपा से भक्तों की रक्षा करती हैं।
यह स्वरूप हमें विश्वास दिलाता है कि देवी की कृपा सदैव हमारे साथ रहती है।
7. शक्ति स्वरूप में देवी की स्तुति
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
हिंदी अर्थ:
जो देवी सभी प्राणियों में शक्ति के रूप में स्थित हैं, उन देवी को बार-बार नमस्कार है।
भावार्थ:
संसार में प्रत्येक कार्य करने की क्षमता माँ भगवती की शक्ति से प्राप्त होती है। साहस, परिश्रम, आत्मविश्वास और संघर्ष करने की क्षमता देवी शक्ति का ही रूप है।
इसी शक्ति के कारण मनुष्य कठिन परिस्थितियों का सामना कर पाता है।
8. तृष्णा स्वरूप में देवी की स्तुति
या देवी सर्वभूतेषु तृष्णारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
हिंदी अर्थ:
जो देवी सभी प्राणियों में इच्छा या तृष्णा के रूप में स्थित हैं, उन देवी को बार-बार नमस्कार है।
भावार्थ:
मनुष्य के अंदर आगे बढ़ने की इच्छा, लक्ष्य प्राप्त करने की प्रेरणा और जीवन में कुछ करने की आकांक्षा भी प्रकृति की शक्ति है।
लेकिन यह इच्छा जब संतुलित रहती है तो विकास का कारण बनती है और जब अत्यधिक बढ़ जाती है तो मोह का कारण बन सकती है। इसलिए देवी से सही मार्ग और विवेक की प्रार्थना करनी चाहिए।
9. क्षमा स्वरूप में देवी की स्तुति
या देवी सर्वभूतेषु क्षान्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
हिंदी अर्थ:
जो देवी सभी प्राणियों में क्षमा के रूप में स्थित हैं, उन देवी को बार-बार नमस्कार है।
भावार्थ:
क्षमा मनुष्य का सबसे महान गुण माना गया है। क्रोध और द्वेष को त्यागकर दूसरों को क्षमा करने की शक्ति माँ भगवती की ही कृपा से प्राप्त होती है।
क्षमा करने वाला व्यक्ति मन की शांति प्राप्त करता है और उसके अंदर प्रेम, करुणा तथा विनम्रता का विकास होता है। माँ देवी का यह स्वरूप हमें सिखाता है कि क्षमा कमजोरी नहीं, बल्कि आंतरिक शक्ति का प्रतीक है।
10. लज्जा स्वरूप में देवी की स्तुति
या देवी सर्वभूतेषु लज्जारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
हिंदी अर्थ:
जो देवी सभी प्राणियों में लज्जा के रूप में स्थित हैं, उन देवी को बार-बार नमस्कार है।
भावार्थ:
लज्जा मनुष्य के सदाचार और मर्यादा की रक्षा करने वाली शक्ति है। यह व्यक्ति को गलत कार्यों से रोकती है और जीवन में विनम्रता बनाए रखती है।
माँ भगवती का यह स्वरूप हमें अपनी संस्कृति, संस्कार और नैतिक मूल्यों का पालन करने की प्रेरणा देता है।
11. शांति स्वरूप में देवी की स्तुति
या देवी सर्वभूतेषु शान्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
हिंदी अर्थ:
जो देवी सभी प्राणियों में शांति के रूप में विद्यमान हैं, उन देवी को बार-बार नमस्कार है।
भावार्थ:
मन की शांति जीवन का सबसे बड़ा सुख है। जब मनुष्य के अंदर संतोष, धैर्य और सकारात्मक विचार आते हैं, तब वह देवी की शांति शक्ति का अनुभव करता है।
माँ भगवती का यह स्वरूप हमें क्रोध, चिंता और तनाव से दूर रहकर शांतिपूर्ण जीवन जीने की प्रेरणा देता है।
12. श्रद्धा स्वरूप में देवी की स्तुति
या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
हिंदी अर्थ:
जो देवी सभी प्राणियों में श्रद्धा के रूप में स्थित हैं, उन देवी को बार-बार नमस्कार है।
भावार्थ:
श्रद्धा ही व्यक्ति को अपने लक्ष्य और ईश्वर के प्रति समर्पित रहने की प्रेरणा देती है। बिना श्रद्धा के कोई भी साधना पूर्ण नहीं होती।
भक्ति, विश्वास और आस्था माँ देवी की ही दिव्य शक्ति मानी जाती है।
13. कान्ति स्वरूप में देवी की स्तुति
या देवी सर्वभूतेषु कान्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
हिंदी अर्थ:
जो देवी सभी प्राणियों में कांति या तेज के रूप में स्थित हैं, उन देवी को बार-बार नमस्कार है।
भावार्थ:
मनुष्य के चेहरे का तेज, व्यक्तित्व की सुंदरता और जीवन में सकारात्मक आकर्षण भी देवी की कृपा का स्वरूप माना गया है।
सच्ची सुंदरता केवल बाहरी रूप में नहीं, बल्कि अच्छे विचारों, अच्छे कर्मों और पवित्र भावनाओं में होती है।
14. लक्ष्मी स्वरूप में देवी की स्तुति
या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
हिंदी अर्थ:
जो देवी सभी प्राणियों में लक्ष्मी स्वरूप में स्थित हैं, उन देवी को बार-बार नमस्कार है।
भावार्थ:
माँ लक्ष्मी केवल धन की देवी नहीं हैं, बल्कि सुख, समृद्धि, सौभाग्य और वैभव की शक्ति हैं।
जीवन में जो भी शुभता, संपन्नता और मंगल दिखाई देता है, वह देवी की कृपा का ही स्वरूप माना जाता है।
15. वृत्ति स्वरूप में देवी की स्तुति
या देवी सर्वभूतेषु वृत्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
हिंदी अर्थ:
जो देवी सभी प्राणियों में जीवन संचालन करने वाली वृत्ति के रूप में स्थित हैं, उन देवी को बार-बार नमस्कार है।
भावार्थ:
मनुष्य के विचार, व्यवहार और जीवन को चलाने वाली प्रवृत्तियाँ भी देवी शक्ति से उत्पन्न होती हैं।
अच्छे विचार और अच्छे कर्म जीवन को श्रेष्ठ बनाते हैं। इसलिए देवी से सद्बुद्धि और शुभ वृत्ति की प्रार्थना करनी चाहिए।
16. स्मृति स्वरूप में देवी की स्तुति
या देवी सर्वभूतेषु स्मृतिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
हिंदी अर्थ:
जो देवी सभी प्राणियों में स्मृति के रूप में स्थित हैं, उन देवी को बार-बार नमस्कार है।
भावार्थ:
याद रखने की शक्ति, अनुभवों से सीखने की क्षमता और ज्ञान को सुरक्षित रखने की शक्ति माँ भगवती का ही स्वरूप है।
स्मृति के कारण मनुष्य अपने अनुभवों से सीखता है और जीवन में आगे बढ़ता है।
17. दया स्वरूप में देवी की स्तुति
या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
हिंदी अर्थ:
जो देवी सभी प्राणियों में दया और करुणा के रूप में स्थित हैं, उन देवी को बार-बार नमस्कार है।
भावार्थ:
दया मानव जीवन का सबसे सुंदर गुण है। दूसरों के दुख को समझना और सहायता करने की भावना माँ देवी की करुणा शक्ति का प्रतीक है।
जो व्यक्ति दया और प्रेम के मार्ग पर चलता है, उसके जीवन में देवी की कृपा बनी रहती है।
18. मातृ स्वरूप में देवी की स्तुति
या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
हिंदी अर्थ:
जो देवी सभी प्राणियों में माँ के रूप में स्थित हैं, उन देवी को बार-बार नमस्कार है।
भावार्थ:
माँ का प्रेम, स्नेह, त्याग और संरक्षण स्वयं देवी का स्वरूप माना गया है। संसार की प्रत्येक माता में माँ भगवती की करुणा और ममता का अंश दिखाई देता है।
यह श्लोक हमें सभी माताओं और नारी शक्ति का सम्मान करने की प्रेरणा देता है।
19. भ्रम स्वरूप में देवी की स्तुति
या देवी सर्वभूतेषु भ्रान्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
हिंदी अर्थ:
जो देवी सभी प्राणियों में भ्रम या मोह के रूप में स्थित हैं, उन देवी को बार-बार नमस्कार है।
भावार्थ:
प्रकृति की शक्ति के कारण ही संसार में विभिन्न अनुभव और परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं। देवी की कृपा से ही मनुष्य अज्ञान और भ्रम से निकलकर सत्य का ज्ञान प्राप्त करता है।
20. देवी के सभी स्वरूपों को नमस्कार
इन्द्रियाणामधिष्ठात्री भूतानां चाखिलेषु या।
भूतेषु सततं तस्यै व्याप्तिदेव्यै नमो नमः॥
हिंदी अर्थ:
जो देवी सभी प्राणियों की इंद्रियों और समस्त जीवों में व्यापक रूप से स्थित हैं, उन सर्वव्यापी देवी को बार-बार नमस्कार है।
भावार्थ:
माँ भगवती केवल किसी एक स्थान पर सीमित नहीं हैं। वह संपूर्ण ब्रह्मांड में चेतना और शक्ति के रूप में व्याप्त हैं। हमारी देखने, सुनने, समझने और कार्य करने की क्षमता भी देवी की कृपा से ही संभव होती है।
यह श्लोक हमें यह अनुभव कराता है कि प्रत्येक जीव और प्रकृति के हर कण में देवी की दिव्य उपस्थिति है।
21. देवी की स्तुति और देवताओं की प्रार्थना
स्तुता सुरैः पूर्वमभीष्टसंश्रया-
त्तथा सुरेन्द्रेण दिनेषु सेविता।
करोतु सा नः शुभहेतुरीश्वरी
शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापदः॥
हिंदी अर्थ:
जिन देवी की पहले देवताओं ने स्तुति की थी और जो सभी शुभ इच्छाओं को पूर्ण करने वाली हैं, वे ईश्वरी माँ हमारे जीवन में मंगल करें और सभी संकटों को दूर करें।
भावार्थ:
देवताओं ने भी माँ भगवती की शरण लेकर उनकी कृपा प्राप्त की। यह श्लोक भक्तों को विश्वास दिलाता है कि सच्ची श्रद्धा और भक्ति से माँ देवी अपने भक्तों की रक्षा करती हैं और जीवन की कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति प्रदान करती हैं।

या देवी सर्वभूतेषु स्तोत्र का आध्यात्मिक रहस्य
या देवी सर्वभूतेषु स्तोत्र केवल मंत्रों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह जीवन को देखने की एक आध्यात्मिक दृष्टि प्रदान करता है।
यह स्तोत्र हमें बताता है कि—
- ज्ञान में माँ सरस्वती का स्वरूप है।
- धन और समृद्धि में माँ लक्ष्मी का स्वरूप है।
- साहस और शक्ति में माँ दुर्गा का स्वरूप है।
- करुणा और प्रेम में देवी की उपस्थिति है।
- शांति और धैर्य में माँ की कृपा है।
जब मनुष्य प्रत्येक प्राणी में देवी का अंश देखने लगता है, तब उसके अंदर अहंकार कम होता है और प्रेम, सम्मान तथा करुणा की भावना बढ़ती है।
या देवी सर्वभूतेषु स्तोत्र का धार्मिक महत्व
सनातन धर्म में इस स्तोत्र को शक्ति उपासना का अत्यंत महत्वपूर्ण भाग माना गया है। विशेष रूप से नवरात्रि के दिनों में माँ दुर्गा की आराधना करते समय इसका पाठ किया जाता है।
इस स्तोत्र का महत्व इस प्रकार समझा जा सकता है—
1. माँ दुर्गा की कृपा प्राप्त करने का माध्यम
श्रद्धा और भक्ति के साथ “या देवी सर्वभूतेषु” का पाठ करने से भक्त माँ भगवती का स्मरण करता है और देवी की कृपा प्राप्त करने का प्रयास करता है।
2. आत्मिक शक्ति का विकास
यह स्तोत्र मनुष्य को याद दिलाता है कि वास्तविक शक्ति उसके अंदर ही मौजूद है। नियमित पाठ से आत्मविश्वास, धैर्य और सकारात्मक सोच का विकास होता है।
3. सभी जीवों के प्रति सम्मान की भावना
जब हम समझते हैं कि देवी प्रत्येक प्राणी में विद्यमान हैं, तो हमारे अंदर सभी के प्रति प्रेम और सम्मान की भावना उत्पन्न होती है।
या देवी सर्वभूतेषु स्तोत्र पाठ करने की विधि
माँ भगवती की पूजा करते समय इस स्तोत्र का पाठ सरल विधि से किया जा सकता है।
पूजा सामग्री
- माँ दुर्गा की तस्वीर या प्रतिमा
- दीपक
- धूप या अगरबत्ती
- लाल पुष्प
- अक्षत (चावल)
- जल
- फल या प्रसाद
पाठ विधि
1. स्नान और शुद्धता
सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थान को साफ करके माँ दुर्गा के सामने दीपक जलाएँ।
2. देवी का ध्यान करें
माँ दुर्गा का स्मरण करते हुए मन को शांत करें और श्रद्धा भाव से प्रार्थना करें।
3. स्तोत्र का पाठ करें
“या देवी सर्वभूतेषु…” स्तोत्र का पाठ एकाग्र मन से करें।
4. प्रार्थना करें
पाठ पूर्ण होने के बाद माँ भगवती से परिवार की सुख-शांति और कल्याण की प्रार्थना करें।
या देवी सर्वभूतेषु स्तोत्र पाठ के लाभ
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस स्तोत्र का नियमित पाठ करने से अनेक आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं।
1. मन को शांति मिलती है
देवी स्तुति का पाठ मन में सकारात्मक विचार उत्पन्न करता है और मानसिक शांति प्रदान करता है।
2. भय और नकारात्मकता कम होती है
माँ दुर्गा को शक्ति और रक्षा की देवी माना जाता है। उनके स्मरण से मन में साहस और आत्मविश्वास बढ़ता है।
3. आध्यात्मिक चेतना बढ़ती है
यह स्तोत्र व्यक्ति को अपने भीतर मौजूद दिव्य शक्ति को पहचानने की प्रेरणा देता है।
4. सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव
देवी मंत्रों के उच्चारण से वातावरण में भक्तिमय और सकारात्मक भाव उत्पन्न होता है।
5. भक्ति और श्रद्धा मजबूत होती है
नियमित पाठ करने से मन ईश्वर के प्रति अधिक समर्पित होता है।
नवरात्रि में या देवी सर्वभूतेषु स्तोत्र का महत्व
नवरात्रि माँ दुर्गा की आराधना का सबसे पवित्र समय माना जाता है। इन नौ दिनों में देवी के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है।
नवरात्रि के दौरान “या देवी सर्वभूतेषु” स्तोत्र का पाठ करने से भक्त माँ के सभी स्वरूपों का ध्यान करता है।
विशेष रूप से—
- दुर्गाष्टमी
- महानवमी
- कन्या पूजन
- देवी जागरण
के अवसर पर इस स्तोत्र का पाठ विशेष रूप से किया जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1: या देवी सर्वभूतेषु स्तोत्र क्या है?
उत्तर:
या देवी सर्वभूतेषु स्तोत्र माँ आदिशक्ति की एक प्रसिद्ध स्तुति है, जिसका वर्णन दुर्गा सप्तशती (देवी महात्म्य) में मिलता है। इसमें माँ भगवती को सभी प्राणियों में चेतना, बुद्धि, शक्ति, श्रद्धा, शांति, दया और मातृ स्वरूप के रूप में नमन किया गया है।
प्रश्न 2: या देवी सर्वभूतेषु स्तोत्र किस ग्रंथ में मिलता है?
उत्तर:
या देवी सर्वभूतेषु स्तोत्र का वर्णन मार्कण्डेय पुराण के देवी महात्म्य भाग (दुर्गा सप्तशती) में मिलता है। यह शक्ति उपासना का एक महत्वपूर्ण स्तोत्र माना जाता है।
प्रश्न 3: या देवी सर्वभूतेषु स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए?
उत्तर:
इस स्तोत्र का पाठ किसी भी शुभ समय किया जा सकता है। विशेष रूप से नवरात्रि, दुर्गाष्टमी, महानवमी, शुक्रवार और देवी पूजा के अवसरों पर इसका पाठ करना विशेष फलदायी माना जाता है।
प्रश्न 4: क्या घर पर या देवी सर्वभूतेषु स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं?
उत्तर:
हाँ, श्रद्धा और पवित्र भावना के साथ घर पर भी या देवी सर्वभूतेषु स्तोत्र का पाठ किया जा सकता है। इसके लिए किसी विशेष स्थान की आवश्यकता नहीं होती, लेकिन पूजा स्थान को स्वच्छ रखना और मन को शांत रखना शुभ माना जाता है।
प्रश्न 5: या देवी सर्वभूतेषु स्तोत्र पढ़ने से क्या लाभ होता है?
उत्तर:
धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस स्तोत्र के पाठ से माँ दुर्गा की कृपा प्राप्त होती है, मन को शांति मिलती है, नकारात्मक विचार दूर होते हैं और व्यक्ति के अंदर आत्मविश्वास, भक्ति तथा सकारात्मक ऊर्जा का विकास होता है।
प्रश्न 6: या देवी सर्वभूतेषु स्तोत्र कितनी बार पढ़ना चाहिए?
उत्तर:
भक्त अपनी श्रद्धा और सुविधा के अनुसार इसका पाठ कर सकते हैं। कई लोग इसे प्रतिदिन एक बार पढ़ते हैं, जबकि नवरात्रि जैसे विशेष अवसरों पर अधिक बार पाठ करने की परंपरा भी है।
या देवी सर्वभूतेषु स्तोत्र का आध्यात्मिक संदेश
या देवी सर्वभूतेषु स्तोत्र हमें केवल देवी की पूजा करना ही नहीं सिखाता, बल्कि जीवन को देखने का सही दृष्टिकोण भी प्रदान करता है।
यह स्तोत्र हमें बताता है कि—
“संपूर्ण संसार में जो भी जीवन, ज्ञान, शक्ति, प्रेम और करुणा दिखाई देती है, वह माँ आदिशक्ति की ही अभिव्यक्ति है।”
जब मनुष्य हर जीव में देवी का अंश देखने लगता है, तब उसके अंदर अहंकार कम होता है और प्रेम, दया तथा सेवा की भावना बढ़ती है।
यह स्तोत्र हमें प्रकृति, जीव-जंतु और सभी मनुष्यों का सम्मान करने की प्रेरणा देता है।
निष्कर्ष (Conclusion)
या देवी सर्वभूतेषु स्तोत्र (Ya Devi Sarvabhuteshu Stotra) माँ दुर्गा की महिमा का एक दिव्य स्तोत्र है, जिसमें देवी को संसार के प्रत्येक प्राणी में स्थित शक्ति के रूप में स्वीकार किया गया है।
इस स्तोत्र के माध्यम से भक्त माँ भगवती के विभिन्न स्वरूपों का स्मरण करता है और अपने जीवन में शक्ति, शांति, ज्ञान तथा सकारात्मक ऊर्जा की कामना करता है।
नवरात्रि, दुर्गा पूजा या दैनिक साधना के समय श्रद्धापूर्वक इस स्तोत्र का पाठ करना आध्यात्मिक रूप से अत्यंत लाभकारी माना जाता है।
माँ दुर्गा की कृपा से जीवन में साहस, भक्ति और सद्बुद्धि का प्रकाश बना रहे, यही इस स्तोत्र का मुख्य संदेश है।
॥ या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥
