
रावण वध कथा हिंदू धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में आती है। यह कथा मुख्य रूप से...
जब अधर्म अपनी सीमा पार कर देता है, तब धर्म की रक्षा के लिए कोई न कोई दिव्य शक्ति अवश्य प्रकट होती है।
ऐसा ही एक अद्भुत प्रसंग है—हनुमान जी द्वारा लंका दहन, जो भक्ति, साहस और बुद्धि का अनुपम उदाहरण है।
यह कथा हमें बताती है कि सच्चे सेवक के लिए कोई भी कार्य असंभव नहीं होता।
जब रावण माता सीता का हरण करके उन्हें लंका ले गया, तब भगवान श्रीराम अत्यंत व्याकुल हो उठे।
सीता माता की खोज के लिए वानर सेना चारों दिशाओं में भेजी गई।
दक्षिण दिशा में खोज करते हुए जब सभी वानर समुद्र तट पर पहुँचे, तब विशाल समुद्र को देखकर वे निराश हो गए।
तभी जाम्बवन्त जी ने हनुमान को उनकी छिपी हुई शक्तियों का स्मरण कराया।
जैसे ही हनुमान जी को अपनी शक्ति का बोध हुआ, उनका आत्मविश्वास जाग उठा।
उन्होंने विशाल रूप धारण किया और श्रीराम का नाम लेकर आकाश में छलांग लगा दी।
कई बाधाओं को पार करते हुए हनुमान जी लंका के द्वार पर पहुँचे।
वहाँ लंकिनी नाम की राक्षसी पहरेदार थी, जिसे परास्त कर उन्होंने लंका में प्रवेश किया।
रात्रि के समय उन्होंने सूक्ष्म रूप धारण किया और पूरे नगर का निरीक्षण किया।
स्वर्ण से बनी लंका अत्यंत भव्य थी, परंतु हनुमान जी का लक्ष्य केवल एक था—सीता माता को ढूँढना।
अंततः वे अशोक वाटिका पहुँचे, जहाँ सीता अत्यंत दुःखी अवस्था में बैठी थीं।
हनुमान जी ने वृक्ष पर बैठकर श्रीराम की अंगूठी नीचे गिराई।
अंगूठी देखते ही सीता माता समझ गईं कि यह श्रीराम के दूत हैं।
हनुमान जी ने विनम्रता से उन्हें श्रीराम का संदेश दिया और आश्वासन दिया कि शीघ्र ही उन्हें मुक्त कराया जाएगा।
सीता माता ने भी अपना चूड़ामणि देकर श्रीराम को संदेश भेजा।
सीता माता से मिलकर हनुमान जी ने सोचा कि लंका की शक्ति का परीक्षण भी आवश्यक है।
उन्होंने अशोक वाटिका के वृक्ष उखाड़ दिए और राक्षसों को पराजित किया।
जब उन्हें पकड़कर रावण के दरबार में लाया गया, तब उन्होंने निर्भय होकर कहा:
“हे लंकेश्वर, अभी भी समय है—माता सीता को सम्मानपूर्वक लौटा दो, अन्यथा विनाश निश्चित है।”
परंतु रावण अपने अहंकार में डूबा रहा।
क्रोधित होकर रावण ने आदेश दिया कि हनुमान की पूँछ में आग लगा दी जाए।
राक्षसों ने उनकी पूँछ पर कपड़े और तेल लपेटकर आग लगा दी।
लेकिन यह रावण की सबसे बड़ी भूल साबित हुई।
हनुमान जी ने तुरंत अपना आकार बढ़ा लिया और पूरी लंका में कूद-कूदकर आग फैलाने लगे।
महल, भवन, अस्त्र-शस्त्र भंडार—सब जलने लगे।
पूरी लंका अग्नि की लपटों में घिर गई।
यह केवल दहन नहीं था, बल्कि अहंकार और अधर्म के अंत की शुरुआत थी।
लंका दहन के बाद हनुमान जी समुद्र में कूदकर अपनी पूँछ की आग बुझाते हैं।
फिर वे पुनः सीता माता के पास जाकर उन्हें आश्वस्त करते हैं और श्रीराम का संदेश देकर लौट पड़ते हैं।
वापस आकर उन्होंने श्रीराम को सारी घटना बताई, जिससे पूरी वानर सेना का उत्साह बढ़ गया।
यह कथा केवल एक घटना नहीं, बल्कि गहरा संदेश है:
सच्ची भक्ति में असीम शक्ति होती है
अहंकार का अंत निश्चित है
संकट में धैर्य और विश्वास आवश्यक है
धर्म की विजय हमेशा होती है
हनुमान जी का लंका दहन केवल एक युद्ध की शुरुआत नहीं, बल्कि धर्म की विजय का संकेत था।
यह कथा हमें सिखाती है कि यदि मन में विश्वास, भक्ति और साहस हो, तो सबसे बड़ी बाधा भी पार की जा सकती है।

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